Friday, 23 December 2016

आज के हिन्द स्कूलों (सुकुलों) का आपदधर्म?
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने India’s School Emergency  शीर्षक से टाइम्स आफ इंडिया केे 14 दिसंबर 2016 के An Ecastasy of Ideas iés esa Rajasthan’s campaign to fix Schools will create prosperity and equality of opportunity  में व्यक्त किया कि वे अर्जेन्टाइना लातिन अमरीकी राष्ट्र राज्य जिसका क्षेत्रफल पौंने अठाईस लाख वर्ग किलोमीटर जनसंख्या तैंतालीस करोड़ भाषायें स्पेनिश और इटैलियन हैं ज्ञातव्य है कि स्पेनिश भाषा बोलने वाले लोग समूची दुनियां में उनतालीस करोड़ से ज्यादा हैं। अर्जेन्टाइना जिसे लातिनी अमरीका का ब्राजील के बाद सबसे बड़ा क्षेत्र माना जाता है यहां के अर्जेन्टाइनी लेखक जार्ज लुइस बोरगेस के लेखन से प्रभावित होते हुए राजस्थान में जो मुहिम उन्होंने चलायी है उनकी मान्यता बनी है कि उनकी शैक्षिक मुहिम से संपन्नता और अवसरों का लाभार्जन करने में समानता आयेगी। अर्जेन्टाइना के लेखक ने अपनी कृति अपनी स्वभाषा - स्पेनिश में लिखी या अंग्रेजी में यह महाशया वसुन्धरा राजे के स्तंभ ने स्पष्ट नहीं किया। भारतीय वाङमय जिसकी मराठी, हिन्दी, डिंगल शब्दशक्ति से उन्हें शक्ति मिली है, उसे हिन्द के आंतर भारती विशेषज्ञ साने गुरू जी ने कहा है कि भारत की भाषायी सृजन शक्ति केवल आंतर भारती के समीक्षित उपयोग से ही संभव है। महाशया राजे ने शैक्षिक उत्कर्ष के लिये संभवतः इलिच इवान की Deschooling कृति का भी अध्ययन किया हो। आज दुनियां में शुकदेव और कृष्ण के युवा आक्रोश को संयमित करने का जो अभियान मातृशक्ति के जरिये लगाना सवा पांच हजार वर्ष पूर्व गोकुल-मथुरा वृन्दावन से शुरू हुआ जिसे शब्दायित करने का श्रेय मात्रोक्ता बादरायण सूत्र के व्याख्याता कृष्ण द्वैपायन बादरायण वेदव्यास ने अपनी अनूठी कृति पंचमवेद महाभारत तथा अपनी महत्वपूर्ण रचना श्रीमद्भागवत महापुराण रचना में व्यक्त की है। वह युवा शक्ति संक्रमण आज भारत सहित समूची धरती में पुनः जाग उठा है। इलिच इवान ने अपनी कृति डिस्कूलिंग के जरिये अमरीका को पचपन साल पहले आगाह किया था कि वह वर्तमान स्कूल प्रबंधन पर परिवर्तन का मुलम्म चढ़ाये। याने भारत में जो गुरूकुल व्यवस्था थी जिसमें गुरू उतने ही विद्यार्थियों को पढ़ाता या योग्य बनाता था जो उसकी अपनी क्षमता के अनुकूल हों। अमरीका में डिस्कूलिंग की चर्चा हुई पढ़ी गई पर स्कूल प्रबंधन पर कोई फर्क नहीं आया। जैसा चल रहा था वह ज्यों का त्यों चलता रहा। नतीजा सामने है आज अमरीका Gun Culture का प्रतीक है। इस ब्लागर ने दिल्ली के स्कूलों के बारे में तीन सवाल के संदर्भ में दिल्ली के 1850 सेकेंडरी स्कूलों के हजारों नाप्तयौवन छात्रों और उन्हें शिक्षा देने वाले गुरूजनों में जो हिंस्र वातावरण उभर रहा है वह तत्काल विचारणीय बिन्दु है। दिल्ली में आसेतु हिमाचल पूर्व से पश्चिम तक सभी भारतीय संघ के घटक राज्यों के हजारों हजार परिवार रहते हैं उनकी मातृभाषायें अलग अलग हैं। संपन्न लोग अपने बच्चों को कान्वेंट व अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में प्रवेश कराते हैं पर जो लोग गरीब हैं दीन हीन हैं वे अपने बच्चों को तीन म्यूनिसिपल कारपोरेशन के प्राथमिक स्कूलों व दिल्ली सरकार संचालित दर्जा 6 से लेकर दर्जा बारह तक के सेेकेंडरी स्कूलों में भेजते हैं। आबादी के घनत्व में दिल्ली और राजस्थान में बहुत बड़ा फासला है दिल्ली में एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 11297 लोग रहते हैं जबकि राजस्थान में मात्र 201 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर में रहते हैं। दिल्ली की आबादी वर्तमान में 168 लाख और राजस्थान की आबादी पौने सात करोड़ है। महाशया वसुंधरा राजे ने अपने मंतव्य में व्यक्त किया है - Many vested interests would like to perpeatate the current low level equilibrium of our schools but the statusquo can be broken with political will. राजस्थान की मुख्यमंत्री महोदया स्वयं राजकुल से आती हैं। राजकुल में ही ब्याही गयी हैं उनकी सद्भावना जनसामान्य से हो सकती है क्योंकि करूणा व्यक्ति का निजी स्वत्व है पर आज भारत में आसेतु हिमाचल नब्बे दिन में अंग्रेजी बोलने की मुहिम जोर पर है। डाक्टर संपूर्णानंद तथा राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री ने जो मुहिम उ.प्र. और राजस्थान में चलाई वह आज उतने वेग से नहीं चल रही है। डाक्टर संपूर्णानंद ने पंडित नेहरू के न चाहते हुए भी उ.प्र. के स्कूलों में आजादी के तुरंत बाद शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी कर दिया। शासन स्तर की भाषा उर्दू के बजाय हिन्दी कर दी। डाक्टर संपूर्णानंद का यह कार्य बहुत बड़ा राजनीतिक स्तूप था उनका विरोध उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने नहीं किया। डाक्टर साहब को शिक्षा व राजभाषा के मामले में पूरी छूट दे दी। पंडित नेहरू जल्दीबाजी के पक्षधर नहीं थे धीरे धीरे चलना चाहते थे। डाक्टर संपूर्णानंद ने उन्हें समझा दिया कि परिवर्तन तो तुरंत करने से आता है। डाक्टर संपूर्णानंद सभी भारतीय भाषाओं के पक्षधर थे। उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि इतर भारतीय भाषा भाषियों पर हिन्दी थोपी जाये। राजस्थान की स्थिति उ.प्र. में बहुत भिन्न थी। जब अनेक रियासतों को मिला कर राजस्थान राज्य का गठन हुआ प्रत्येक रियासत की अपनी स्थानीय भाषा नागरी लिपि में लिखी जाती थी। उसका भाषायी स्वरूप पूर्णतः लोकाधारित था। राजस्थान के राज्यों की प्रमुख भाषायी विशेषता डिंगल है जरूरत इस बात की है कि डिंगल के भाषायी स्वरूप को भाषा विज्ञान की दृष्टि से संवारा जाये। राजस्थान की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तथा सांस्कृतिक चारण साहित्य है। यद्यपि चारण साहित्य में अतिशयोक्तियां भी होती हैं परंतु राजस्थान को उसकी पौराणिक सांस्कृतिक सत्ता से जोड़ने के लिये चन्दबरदायी सहित जितने भी चारण साहित्य के स्तूप हैं उन्हें राजनीति का भारतीय स्वरूप समझने की तात्कालिक जरूरत है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा - सुर नर मुनि सबकी यह रीती स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती। स्वातंत्र्योत्तर सत्तर वर्षों में अनेक निहित स्वार्थ क्षेत्रों का अभ्युदय हुआ है। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता है वह अपना हित साधन करे। आज हिन्द में अंग्रेजी का वर्चस्व इतना गहरा होगया है कि उसे छोड़ना मुश्किल लगता है इसलिये सही रास्ता यह है कि अंग्रेजी के साथ साथ नेतृत्व भारतीय भाषाओं - जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार भारत में 276 भाषायें थीं पर भाषायी क्षेत्रों में भी ‘अहम् पूर्वम्’ पहले मैं यह स्वार्थ सामने आता है। आज भारत जिस चौराहे पर खड़ा है उसका एक ही विकल्प है कि भारत की वर्तमान घटक राज्यों की राजभाषाओं को समान महत्व दिया जाये और साने गुरू जी के संकल्प आंतर भारती याने भारत की भाषाओं की एक दूसरे के नजदीक लाने का भाषायी उपयोग हो। डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मातृभाषा बंगला थी पर वे धाराप्रवाह हिन्दी बोलते थे। हिन्दी भाषणकर्ताओं में गुजराती भाषी भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री दूसरे व्यक्ति हैं जिनकी हिन्दी भाषण कला अद्वितीय है। हिन्दी भाषी भाषणकर्ताओं में आचार्य नरेन्द्र देव, पुरूषोत्तम दास टंडन, जयप्रकाश नारायण, डाक्टर राममनोहर लोहिया तथा पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता संपन्न थे। इतर भारतीय भाषाओं के आशुवक्ताओं, शब्दों का सही उपयोग करने वाले शब्दज्ञानियों तथा आज के श्रोत्रिय समाज - क्योंकि आज हर व्यक्ति हर समय अपने कान और मुंह पे मोबाइल लगाये रहता है वह श्रोता तथा वक्ता दोनों है। हजारों साल पहले जब लिपियों का चलन तीव्र वेग से नहीं हुआ था श्रौत विधा ही मुख्य धारा थी। आज श्रौत परंपरा अपने नये रूप में आयी है। इस नयी श्रौत विधा से ज्यादा लगाव नौजवानों व नवयुवतियों में है। इस नयी श्रौत शक्ति को संसद व विधान मंडलों द्वारा कानून बना कर संयमित नहीं किया जा सकता। नवयुवा वर्ग में मर्यादाओं का निर्धारण करने के लिये अंबुद समान व्यक्तियों की श्रंखला बनानी ही होगी अन्यथा युवा शक्ति का आक्रोश रोकना एकदम कठिन कार्य होगा। वर्तमान में राज्य सरकारों के प्राथमिक तथा सेकेंडरी स्कूलों दर्जा 6 से दर्जा 12 तक के अलावा केन्द्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय आदि उत्कृष्ट योग्यता धारक छात्रों के कल्याणार्थ केन्द्र सरकार स्वयं तथा राज्य सरकारों के माध्यम से चलाती हैं। कान्वेंट स्कूल तथा अंग्रेजी माध्यम वाले पब्लिक स्कूल और अल्पसंख्यक समाज द्वारा संचालित स्कूलों सहित शिक्षा प्रसार सत्शिक्षा उपलब्धि के मिशनरियों द्वारा संचालित कान्वेंट स्कूल, संपन्न व्यक्तियों द्वारा अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूल केन्द्रीय सरकार द्वारा अपने कार्मिकों के बच्चों की शिक्षा का सुप्रबंध करने के लिये संचालित केन्द्रीय विद्यालय तथा उत्कृष्ट नवोदय विद्यालय, उद्योगपतियों द्वारा संचालित पब्लिक स्कूल ये सब मिला कर शिक्षा के क्षेत्र में कहीं कहीं 6 तथा कहीं कहीं 7 किस्म के स्कूल चल रहे हैं। प्राथमिक तथा माध्यमिक शिक्षा यद्यपि संबंधित घटक राज्य का उत्तरदायित्त्व हैै। केन्द्रीय विद्यालयों तथा कान्वेंट एवं पब्लिक स्कूलों पर संबंधित घटक राज्य सरकार का संबंध अत्यंत कच्चे तागे सरीखा है। सरकार चलाने वाले राजनैतिक व्यक्तित्त्वों तथा सरकार की प्रशासनिक मशीनरी के सामर्थ्यवान जन अपने बच्चों को कान्वेंट अथवा पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं इसलिये उनकी महाविभूति वाली सहानुभूति कान्वेंट और प्राइवेट पब्लिक स्कूलों के प्रबंधतंत्र को कानून के अंतर्गत और कानून की अवहेलना करने वाले दोनों स्तरों पर है। एक ही स्थान में जहां कान्वेंट पब्लिक स्कूल तथा राज्य सरकार के सरकारी स्कूलों के छात्रों व अध्यापकों में घेरे अलग अलग हैं। अंग्रेजी माध्यम के स्कूल देशी भाषाओं के प्राथमिक माध्यमिक स्कूलों को अपनी बराबरी का दर्जा देने के लिये तैयार नहीं हैं। जिस दिन भारत संघ का हरेक घटक राज्य सातवें वेतन आयोग की संस्तुतियां 1.1.2016 से लागू करने का फैसला लेगा इन सरकारी स्कूलों में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी कार्मिक भी माहवारी सताईस हजार रूपये वेतन भत्ते पाने लगेगा। प्राथमिक विद्यालय का अध्यापक का वेतन भत्ते पचास हजार रूपये से ज्यादा होंगे। जिन लोगों के बच्चों को वह गुरू जी पढ़ायेंगे उनके परिवार की प्रति व्यक्ति क्रय शक्ति रूपये बीस से ज्यादा नहीं होने के कारण गुरू शिष्य संबंधों में खटास आने के साथ साथ छात्र छात्रा युवा व युवा अभिभावकों के दिलों में दरार पड़ना स्वाभाविक है। दिल्ली के 1850 सेकेंडरी स्कूलों में जुवेनाइल छात्र छात्राओं व उनके गुरूजनों में जो उलझन भरा मनमुटाव बढ़ रहा है वह अध्यापक नवयुवा छात्र छात्राओं में हिंसा की लकीर तो खींच चुका है उसका उग्र रूप धारण करना ही शेष बचा है। चूंकि राजस्थान यद्यपि दिल्ली से सटा हुआ है पड़ोस का कुछ न कुछ असर तो राजस्थान को भी भुगतना पड़ सकता है। जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति का उल्लेख राजस्थान की मुख्यमंत्री महोदया कर रही हैं वह प्रशंसनीय है। प्राथमिक तथा माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापकों को निरंतर प्रशिक्षण तथा कर्तव्य निष्ठा से जोड़ना पहला कदम है। राजस्थान में हीरालाल शास्त्री द्वारा स्थापित वनस्थली विद्यापीठ एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। महिला शिक्षिकाओं को समय समय पर प्रशिक्षण तथा उनकी पात्रता संवर्धन के लिये वनस्थली विद्यापीठ से राज्य सरकार को करारनामा करना चाहिये तथा जो शिक्षिकायें वनस्थली में समय समय पर Periodic Refresher Course करती हैं उनमें वनस्थली विद्यापीठ की पहली शर्त कि वह खादी पहनेंगी यह विचार तथा स्वयं हैंडनिटिंग करेंगी है एवं निटिंग का अभ्यास अपनी छात्राओं को देंगी। इसी तरह पुरूष अध्यापकों के लिये एक या दो ऐसे पुनराभ्यास प्रशिक्षण केन्द्र संकल्पित किये जाने चाहिये ताकि अध्यापक अपने विषय का ज्ञाता बने और अपने छात्रों को करीने से पढ़ा सके। राजा बलदेव दास बिड़ला राजस्थान के व्यापार क्षेत्र से जुड़े ऐसे महापुरूष हैं जो एक लोटा व पहनने के कपड़े लेकर बीस वर्ष की उम्र में कोलकाता पहुंचे। चालीस साल व्यापार किया साठ वर्ष के हुए तो उपराम ले लिया। पहली जरूरत यह है कि राज बलदेव दास बिड़ला तथा हनुमान प्रसाद पोद्दार सरीखे व्यक्तियों की जीवनियां प्रकाशित कर राजस्थान सरकार प्रत्येक अध्यापक अध्यापिका को पढ़ने को दे। मीराबाई का व्यक्तित्त्व मीरा का गिरधर गोपाल को समर्पण प्रत्येक महिला अध्यापिका के संज्ञान में हो। प्रत्येक अध्यापक अध्यापिका अपने कर्तव्य पथ का अवलोकन कर अपने छात्र छात्राओं को विवेकशील बनाने का रास्ता अपनाये। आज भारत का हर तीसरा व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे गुजारा कर रहा है इसलिये जरूरत इस बात की है कि परिवार की आमदनी को बढ़ाने के उपायों पर तत्काल विचार हो। हथकरघा और खादी का कपड़ा गांवों व शहरों में रोजगार व परिवार की आमदनी बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं इसलिये समाज के उस वर्ग को जो गरीब है उसे निरंतर आमदनी होती रहे इसके उपाय केवल खादी और हथकरघा वस्त्रों के उत्पादन तथा भारत सहित जिन जिन देशों में हाथ कते हाथ बुने कपड़ों की मांग बढ़ती है भारत कपड़ा मंत्रालय हर विदेशी दूतावास के साथ राजस्थान की हाथ कता करघा बुनी खादी परिधान उपलब्ध कराने की शुरूआत करे ताकि ज्यादा से ज्यादा मां बहिनें अपने परिवार को गरीबी रेखा से ऊपर उठा सकें तथा युवा अशांति - बेरोजगारी एवं भीड़तंत्र Law of Mob. से बचा जा सके। इसलिये हिन्द के स्कूलों को सुकुल बनाने के लिये आपद् धर्म की शुरूआत पौने सात करोड़ राजस्थानियों से ही शुरू की जाये। 
          हिन्द के घटक राज्य राजस्थान की मुख्यमंत्री महोदया ने सोलह सूची स्तंभ में हिन्द की पढ़ाई लिखाई वाले स्कूलों यह ब्लागर स्कूल को हिन्दुस्तानी लहजे में सुकुल कहना इसलिये वाजिब समझता है क्योंकि वाणी और भाषा का उदय हिन्द की धरती में नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नवपंचवारम् से हुआ। महातांडव नृत्य में देवाधिदेव महादेव ने वाणी का उद्घोष किया। जिस तरह हिन्द से मातृ, पितृ, भ्रातृ, स्वसा अपनी शब्द यात्रा में इंग्लिस्तान पहुंचते पहुंचते क्रमशः मदर, फादर, ब्रदर और सिस्टर होगये गुरूकुल या सुकुल शब्द भी विलायत में स्कूल बन गया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 1948 में इस ब्लागर को अल्मोड़ा में कहा - चलो कटारमल सूर्य मंदिर देख आयें। वे अपनी झोली में लार्ड मैकाले और उनके पादरी पिता जो विलायत के राजपरिवार के गिरजाघर के महापुरोहित (आर्कबिशप) थे पिता पुत्र के बीच हुए पत्राचार को यायावर राहुल सांकृत्यायन लोगों को पढ़ाया करते। उन्होंने वह पिता पुत्र पत्र व्यवहार इस ब्लागर को भी पढ़ाया। पादरी पिता मातृभाषा में ही शिक्षा देने के घोर पक्षधर थे। उन्होंने अपने सामर्थ्यशील पुत्र को कहा - हिन्द को बर्बाद मत करो। हिन्द की पढ़ाई लिखाई हिन्द की भाषाओं में ही हो यह इन्तजाम करो। बेटे मैकाले ने पादरी पिता को लिखा - पिताजी मैं तो आपका ही काम कर रहा हूँ। अढ़ाई सौ वर्ष पश्चात हर हिन्दुस्तानी भूरा अंग्रेज होगा। उन्हें ईसाई बनाना ज्यादा सरल होगा। राहुल सांकृत्यायन का समस्त साहित्य बनारस व इलाहाबाद में हिन्दी साहित्य का पथ प्रदर्शक है। काशी के जयशंकर प्रसाद ने मनु-शतरूपा के गृहस्थी जीवन पर कामायनी नामक ग्रंथ लिखा। अगर कामायनी अंग्रेजी में लिखी गयी होती तो कामायनी पर नोबेल पुरस्कार मिल सकता था। आज की स्कूलों की बद से बदतर होरही हालात बदलने में राजस्थानी डिंगल तथा चारण साहित्य और राहुल सांकृत्यायन का विवेकशील साहित्य के समानांतर जातीय उग्रता को शमन करने में सबसे सहायक ग्रंथ जयशंकर प्रसाद की कामायनी है। राजस्थान के प्राथमिक तथा माध्यमिक स्कूलों के अध्यापक समाज को राहुल सांकृत्यायन, जयशंकर प्रसाद तथा डिंगल चारण सहित्य से अवगत कराये जाने की अत्यंत आवश्यकता है। यूूरप, अमरीका तथा विश्व के अन्य राष्ट्र राज्य जो मातृभाषा में शिक्षा दिये जाने के समर्थक हैं जिनके देशों में वहां की बाल बालिका शक्ति को उनकी मातृभाषा में ही अक्षर बोध कराया जाता है। यूरप की भाषाओं में जर्मन, फ्रेंच, पुर्तगाली, स्पेनिश, इटैलियन भाषा भाषी यूरप के देशों में अंग्रेजी की वैशाखी नहीं अपनाते। जर्मन तथा फ्रेंच भाषायें यूरप के प्रत्येक देश में समझी और बोली जाती हैं। दुनियां में केवल हिन्दुस्तान ही ऐसा देश है जहां गंगा यमुना सरस्वती सरयू नर्मदा सिंधु गोदावरी कृष्णा कावेरी नदियों के सदानीरा जलप्रवाह के समानांतर अपनी अपनी लिपियां सुरक्षित रखते हुए पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, कोंकणी, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांगला, असमी, मइती मणिपुरी, नैपाली, कश्मीरी, डोगरी और हिन्दी के साथ साथ अरबी, फारसी तथा अंग्रेजी ये तीन विदेशी भाषायें भी हिन्दुस्तानी भाषाओं के बीच अपनी साख जमा चुकी हैं। फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू में वाक्य रचना व व्याकरण हिन्दी सरीखा है पर राजनीतिक कारणों से उर्दू को स्वतंत्र भाषा का दर्जा प्राप्त है। उर्दू यदि नागरी लिपि में लिखी जाये तो उसकी फारसी शब्द सामर्थ्य के अलावा शेष बातें हिन्दी की तरह हैं। भारत गीर्वागवाणी सरस्वती का उद्भव क्षेत्र है। अतएव हर वाणी का अस्तित्व स्वीकारना हिन्द का स्वधर्म है फिर भी बच्चों की पढ़ाई उनकी मातृभाषा के जरिये हो यह नैतिक शक्ति सामर्थ्य का प्रतीक है। इसलिये राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की भांति प्रत्येक मुख्यमंत्री को अपने अपने घटक राज्य की जनभाषा को ही प्राथमिकता देनी चाहिये ताकि सटीक साक्षरता और शिक्षा का स्त्रोत छात्र को ‘सुकुल’ भारत के जाग्रत नागरिक के रूप में स्वकर्तव्य के प्रति तत्पर बनाया जा सके। 
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