Monday, 12 December 2016

दिल्ली के तीन गम्भीर सवाल
1. क्या अमरीकी शैक्षिक चिंतन पोखर के मसीहा इलिच इवान की पचास साल पहले लिखी पुस्तक Deshooling का पहला जलजला दिल्ली के 1850 सरकारी सेेकेंडरी स्कूलों के दर्जा नौ से दर्जा बारह तक के हजारों हजार जुवेनाईल छात्र और उनके प्रौढ़ गुरूओं के बीच भयावह हिंस्र टकराहट रोकने का माकूल इंतजाम दिल्ली के शिक्षामंत्री महाशय मनीष सिसोदिया के चिंतन पोखर के संज्ञान में है ?
2. क्या भारत के मानव संसाधन मंत्री जनाब जावड़ेकर महाशय अर्ध केन्द्रशासित दिल्ली के सेकेंडरी स्कूलों में बढ़ रही हिंसक घटनाओं पर केन्द्र व दिल्ली सरकार के बीच सामंजस्य स्थापित कर नेशनल कैपिटल रीजन में Law of Mob. की बढ़त रोक पायेंगे ??
3. या महाशय केजरीवाल का Anarchism दिल्ली से ही शुरू होगा ???
           एक जमाने में हिन्द में सोलह के अंक की बड़ी महिमा थी जिसे हिन्द के बंगाल में टका कहा जाता है। संस्कृत वाङमय में टका शब्द का खुल कर उपयोग हुआ। उस एक टके में सोलह आने हुआ करते थे जिसे दशमलव पद्धति ने नेस्तनाबूद कर डाला। हिन्द के परंपरावादी लोगों में आराधना पथ में षोडष उपचार तथा सोलह श्रंगार भी हुआ करते थे। वसुदेव-देवकी के आठवें पुत्र कृष्ण को महाविष्णु का सोलह कलाओं वाला अवतार माना जाता है। कृष्ण से एक पीढ़ी पहले वशिष्ठ अरून्धती के पड़पोते, शक्ति के पोते, सत्यवती-पराशर के बेटे कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की धर्मचारिणी पत्नी वतिका ने एक ऐसे बालक को जन्म दिया जिसका नाम पिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने शुक रखा जो जीवन भर षोडष वर्षीय नाप्तयौवन बटुक ही रहा। इस जमाने में नारी मनोविज्ञान के दो नौजवान कृष्ण तथा शुकदेव थे। शुकदेव हर स्त्री में मातृत्व शक्ति देखते थे जबकि श्रीकृष्ण की ओर स्त्री शक्ति स्वतः ही आकर्षित रहती थी, इस प्रयास में रहती थी कि कृष्ण उसके साथ नाचे। यहां तक कि वनस्पतियों गाय भैंस बकरी हिरण आदि चौपाये भी कृष्ण की वंशी सुनते मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे। युवा ज्ञान शक्ति के प्रतीक शुकदेव थे तथा कर्मयोग का सातत्य वासुदेव कृष्ण के मनोभावों तथा मनोज्ञता से प्रभावित था। कृष्ण को देखते ही सृष्टि में नूतन जोश भर जाता था। कृष्ण एक सौ पच्चीस वर्ष इस धरती पर धर्मग्लानि होने पर अवतरित हुआ करते थे। यही अवतार कथा धरती में आकर मनुष्य के वेश में ईश्वर की मर्यादाओं को बलवती बनाना, कर्म करते हुए भी उसमें लिप्त न होना और कर्मफल का आत्मप्रयोग न करना कृष्णावतार का लक्ष धर्म स्थापना था। इस ब्लागर ने मुंबई में 1967 में अमरीकी लेखक इलिच इवान की पुस्तक Deshooling पढ़ी। मैक्समूलर जर्मन भाषी थे उन्हें वैदिक ज्ञान था। उन्होंने इंग्लैंड के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से ऋग्वेद का प्रकाशन कराया। जब आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने नागरी लिपि का वैदिक स्वरूप प्रयोग कर ऋग्वेद का प्रकाशन कराया उन्होंने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के लिये अक्षपत्तन शब्द का प्रयोग किया। भारतीय वाङमय अक्ष या वृषभ को धर्म का मूल मानता है जिसके चार चरण हैं। मैक्समूलर ने वैदिक संस्कृत में प्रकाशित ऋग्वेद में स्वयं को मोक्षमूलः कहा। इलिच इवान ने अमरीकी स्कूल व्यवस्था को घातक बता कर कहा कि भारत में गुरूकुल परंपरा की पढ़ाई लिखाई ही सटीक इन्सानियत या मानव संवर्धन का तरीका है। पर अमरीका जिसका राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक इतिहास मात्र पांच सौ वर्ष पुराना है तथा जहां महामानव अब्राहम लिंकन ने दासप्रथा का अंत मात्र डेढ़ सौ वर्ष पहले जिसे अमरीकी समाज सिविल वार कहता है उसका सामना करते हुए हजारों व्यक्तियों के मारे जाने तथा स्वयं बंदूक की गोली का शिकार होकर दासता समाप्ति के लिये आत्मबलिदान भी किया। अगर नस्ल वाद या श्वेत-अश्वेत विग्रह भावना फिर जोर पकड़ती है और नव निर्वाचित अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मध्यम मार्ग या सामाजिक नस्लवादी समन्वय का रास्ता न अपना कर अमरीका को विशुद्ध श्वेत राष्ट्र राज्य की ओर खींचते हैं, विश्व में नूतन नस्लभेदी द्वन्द्व बढ़ कर अमरीकी श्वेत समाज को नई ताकत को उपलब्ध करायेगा। दिल्ली नेशनल कैपिटल रीजन में विधान सभा और निर्वाचित सरकार के दो लौह स्तंभ अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्रित्व व मनीष सिसोदिया के शिक्षामंत्री व उपमुख्यमंत्री दिल्ली की सरकार चला रहे हैं। केजरीवाल आआपा के संयोजक की हैसियत से दिल्ली से ज्यादा समय पंजाब गोआ व गुजरात में अपनी गोटी फिट कराने में लगे हैं दिल्ली के मतदाताओं ने उन्हें एकमुश्त मतदान कर सरकार गठन का मार्ग प्रशस्त किया पर उनकी नजर हिन्द के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। वे दोनों अ.भा. राजनीतिक दलों को अपने लक्ष्य का दुश्मन मानते हैं इसलिये वे पंजाब या गोआ में आ.आ.पा. सरकारें सजाने में उनका ज्यादा समय बीतता है। उन्हें दिल्ली की सुध लेने की न तो बलवती आकांक्षा है केवल नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है, पर सवाल यह है कि क्या वे जर्मन मूल के अमरीकी अमीर महाशय डोनाल्ड ट्रंप की तरह सत्तासीन हो पायेंगे। ? पंजाब में उन्हें सरकार बनाने की प्रबल आकांक्षा है पर कांग्रेस नेता कप्तान अमरेन्द्र सिंह का मानना है कि आआपा नौ से ज्यादा विधायक नहीं जितवा सकती। अकाली दल व कांग्रेस पंजाब में हमेशा आमने सामने रहते आये हैं। महाशय केजरीवाल दोनों के राजनीतिक दुश्मन हैं वे नवजोत सिंह सिद्धू को भी हजम नहीं कर पाये बात बनी नहीं बिगड़ पहले गई। लेखिका पत्रकार उमा विष्णु व आलोक सिंह ने मिल कर दिल्ली के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूलों की जमीनी हालात सामने रखे। उत्तर पूर्वी दिल्ली के यमुना विहार के बी ब्लाक के हायर सेकेंडरी स्कूल के संस्कृत अध्यापक सतावन वर्षीय सोम पाल शास्त्री और उनके शिष्यों में जो वाक भिड़ंत हुई उसका लेखाजोखा प्रस्तुत करते हुए मिथुन पत्रकार (पत्रकार द्वय उमा विष्णु व आलोक सिंह) उस नोंकझोकों का अहवाल उन्होंने इंडियन ऐक्सप्रेस के 4 दिसंबर 2016 के रविवारीय संस्करण में आइ-दृष्टि स्तंभ में प्रस्तुत किया। संस्कृत पढ़ाने वाले गुरू जी सोम पाल शास्त्री ने अपने छात्रों से कहा - अन्दर अन्दर अति प्रौढ़ तथा सेवानिवृत्ति के नजदीके पहुंचे शास्त्री संस्कृत मर्मज्ञ हैं। वे युवा स्वभाव के विज्ञ मनोविज्ञानी अध्यापक भी हैं। आक्रांता युवा छात्र अपनी चढ़ती जवानी में हैं उनका खून थोड़ी सी ताड़ना से भी खौल जाता है। नांगलोई के सेकेंडरी स्कूल के अध्यापक की स्कूल छात्रों ने सितंबर 26 (संभवतः इसी वर्ष 2016 में) हत्या कर दी। शास्त्री कहते हैं यमुना विहार के ब्लाक बी के स्कूल के ग्यारहवें दर्जे के छात्र ने गुरू जी से कहा - क्या जीवन बीमा करा रखा है ? शास्त्री पर हुए आक्रमण की जानकारी दिल्ली के शिक्षा और उप मुख्यमंत्री को भी होगी। दिल्ली विधान सभा चुनावों के दौरान आआपा सुप्रीमो महाशय केजरीवाल ने छात्रों को बुला कर कहा था - मैं अराजकवादी हूँ जिसे अंग्रेजी में Anarchist कहा जाता है। पता नहीं मनीष सिसोदिया उप मुख्यमंत्री तथा आआपा सुप्रीमो महाशय केजरीवाल ने इलिच इवान की पुस्तक डिस्कूलिंग पढ़ी या नहीं। अमरीकी इतिहास तो मात्र पांच सौ साल का है जब कोलंबस ने अमरीका को खोजा। यह घटना 1492 इस्वी की है। इलिच इवान ने यह किताब साढ़े पांच दशक पूर्व लिखी। अमरीका आज आयुधा सभ्यता याने Gun Culture से अभिशप्त है वहां के समाज में सामाजिक मर्यादायें, आर्थिक मर्यादायें और नैतिक मर्यादाओं के लिये कोई स्थान नहीं है। खाओ पिओ मौज करो की मनोभावना के समानांतर तकनालाजी के मर्यादाहीन विस्तार ने मनुष्य की उच्छ्रंखलता को वैनतेय सरीखा प्रबल शक्ति संपन्न बना डाला है। श्रौत विधा जोरों पर है हर युवा युवती अहोरात्र मोबाइल वार्ता में तल्लीन हैं। वाणी का संयम टूट चुका है। साहित्य तथा सत्साहित्य के लिये न तो तुलसी व सूर सरीखा भक्त कवि आगे आरहा है न खरी खरी सुनाने वाला कबीर साहित्य ही कोई पढ़ रहा है। हिन्दुस्तान सरीखे परंपरावादी राष्ट्र राज्य के लिये जनसंख्या की अपार बढ़त के साथ साथ शैक्षिक आर्थिक राजनीतिक यहां तक कि तथाकथित धर्म गुरूओं द्वारा संवर्धित आस्था के क्षेत्र में भी तकनालाजी ने अपना नया खेल शुरू कर दिया है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण व वायु प्रदूषण के लिये प्रसिद्ध दिल्ली शहर तथा दिल्ली का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जिसका क्षेत्रफल 1483 वर्ग किलामीटर आबादी (2011 की जनणनानुसार) 1,68, लाख के आसपास है। प्रति वर्ग किलोमीटर आबादी 11,297 है आबादी की दशाब्दी बढ़त बीस प्रतिशत से ज्यादा है। यह माना जा सकता है कि 2021 तक दिल्ली की आबादी पौने दो करोड़ होगी और प्रति वर्ग किलोमीटर 11816 लोगोें की आबादी घनत्व होगा। याने दिल्ली में रहने वाले भारतीय और दिल्ली में विश्व के अन्य देशों से आये राजनयिक एक मीटर लंबे एक मीटर चौड़े कुर्सी क्षेत्र में चौरासी लोग अटा कर कंधे से कंधा भिड़ा कर रहने के लिये अभिशप्त होंगे। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा हवा में विष की मात्रा निरंतर बढ़ती रहेगी। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में गुरू शिष्य परंपरा लुप्त हो चली है आये दिन नाप्तयौवन (जुवेनाइल) छात्र अपने गुरूओं पर आक्रमण कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों का प्रशासन इससे बेफिक्र लगता है। इलिच इवान ने अपनी पुस्तक डिस्कूलिंग में हिन्द की गुरूकुल प्रणाली की तारीफ की और कहा कि अमरीका में लोगों को विद्याध्ययन करने वाले बालकों, बालिकाओं तथा जवानी की देहरी पर दस्तक देने वाले नवयुवकों जिन्हें हिन्द का कानून जुवेनाइल कहता है भारतीय वाङमय उन्हें नाप्तयौवन कह कर इंगित करता है। भारतीय वाङमय में सवा पांच हजार वर्ष पुराने दो उदाहरण नाप्तयौवन व्यक्तित्त्वों के हैं उनमें कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास तथा वतिका के षोडष वर्षीय पुत्र शुकदेव और राष्ट्रपाल कंस की चचेरी बहन देवकी पुत्र वासुदेव कृष्ण का उदाहरण महत्वपूर्ण है। कृष्ण व शुकदेव ने तत्कालीन भारतीय युवाशक्ति को नया कर्म पथ दिखाया। महाभारत काल में भी भारत की जनसंख्या में केवल यादव जनसंख्या ही करोड़ों में थी। यादवों के अलावा दूसरी बिरादरियां भी बढ़ीं जो अपने कर्म कौशल तथा ज्ञान कौशल से भारत की धरती को विशेष महत्व देते थे। गुरूकुलों व वानप्रस्थ समाजों के द्वारा लोकसंग्रह का मार्ग अपनाया जाता था। बहुत आश्चर्यजनक उदाहरण राष्ट्रपाल कंस ने अपने विश्वस्त सहायक अक्रूर को बलराम व कृष्ण को मथुरा बुलाने भेज। अपना उद्देश्य भी अक्रूर को साफ साफ कहा कि कंस मल्ल युद्ध करा कर कृष्ण को मारना चाहता है। अक्रूर भोजवंशियों व वृष्णिवंशियों में कूटनीतिक पुल का काम करते थे। उन्होंने राजाज्ञा का अनुपालन किया गोकुल से बलराम व कृष्ण को बुला लाये। गोपराज नंद ने कहा - राष्ट्रपाल कंस को वार्षिक कर देना है मैं भी चलता हूँ। नंद को ज्ञात था कि राष्ट्रपाल कंस अपने भागिनेय कृष्ण की हत्या करना चाहता है पर प्रजा के स्वधर्म को निर्वाह करने वाले गोपराज आभीर नंद कंस के राजमहल जाकर कर राशि जमा करा आये। 
नव निर्वाचित अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी 2017 को पेंतालीसवें राष्ट्रपति का आसन ग्रहण कर अमरीका की श्वेत नस्ल संरक्षा का नया अध्याय शुरू करेंगे। संयुक्त राज्य अमरीका की जनसंख्या बत्तीस करोड़ है तथा क्षेत्रफल हवाई पचासवें राज्य सहित 98,28,630 वर्ग किलोमीटर है। साक्षरता 99 प्रतिशत है अमरीकी मानकों के अंतर्गत वहां की 15.1 प्रतिशत आबादी गरीब है। अमरीका की जनसंख्या के मुकाबले उसका क्षेत्र फैला हुआ है। वह पूर्णतः नया राष्ट्र राज्य है जिसका इतिहास मात्र पांच सौ वर्ष पुराना है। इलिच इवान ने जो चेतावनी अमरीका को दी है ऐसा प्रतीत होता है शिक्षा में जो आपाधापी है वह हिन्दुस्तान के लिये ज्यादा तकलीफ देने वाली साबित हो सकती है। दिल्ली शहर में 1850 प्राथमिक विद्यालय, दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय के तहत 1150 मिडिल सेेेेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूल हैं जो कक्षा 6 से कक्षा 12 तक पढ़ाई कराते हैं जिनमें सर्वोदय विद्यालय तथा दर्जा एक से दर्जा 12 तक के अलावा प्रतिभा विकास विद्यालय जवाहर नवोदय विद्यालय भी हैं। छात्र-शिक्षक संबंधों में खटास आने का कारण क्या है ? अध्यापक छात्रों के मुकाबले संख्या बल में कम हैं। स्वाधीनांतर सत्तर वर्षों में छात्र अध्यापक संबंधों में तीखापन लिया हुआ खटास एक दूसरे के प्रति हिंस्र स्वभाव का उदय हुआ है। समान वेतन के जिनके पास मानक स्तर का रहन सहन सरकारी नौकरी या कारपोरेट नौकरी की अच्छी पगार मिलती है वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों अथवा कान्वेंट स्कूलों में ऊँची फीसें और प्रवेशार्थ ऊँची दक्षिणा भी पब्लिक स्कूल वसूल करते हैं। अध्यापकों में केवल बारह प्रतिशत अध्यापक अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक हैं शेष सतासी अठासी प्रतिशत अध्यापक केवल ऊँचा वेतन लेते हैं। उन्हें छात्रों को माकूल शिक्षा देने में रूचि नहीं है। छात्र जुवेनाइल उसे खलता को छात्रों के अभिभावक समाज से भी बढ़ावा मिलने के कारण जुवेनाइल अपराध वृत्ति बढ़ती जारही है। कर्तव्य पथ पर चलने वाले अध्यापक अल्पसंख्यक हैं। छात्र-अभिभावक भगदड़ एक ऐसी सामाजिक संख्याबल अवधारणा को मजबूत बनाने में लगे हैं जहां कर्तव्य पथ पर चलने वाला अध्यापक समाज अत्यंत न्यून मात्रा में है। दिल्ली विधान सभा का 2015 में संपन्न निर्वाचन इस अवधारणा को संबल देता है। मतदाता भी अपने तात्कालिक हित को ज्यादा महत्व देते हुए स्कूलों की अराजकता के साथ साथ सामाजिक अराजकता को प्रश्रय देरहे हैं। प्रत्यक्ष उदाहरण आआपा के स्वघोषित राष्ट्रीय नेतृत्व ने वकील प्रशांत भूषण तथा राजनीतिक विवेक के प्रतीक योगेन्द्र यादव को आआपा से निष्कासित करने का जो तरीका अपनाया वह वस्तुतः राजनीतिक राजनीति का हास्यास्पद पहलू है। दिल्ली के स्कूलों में छात्र गुरू संकट मंडरा रहा है, दिल्ली सरकार इस पर राजनीतिक नहीं शैक्षिक व नैतिक विवेक का सहारा लेकर मनन करे। दिल्ली के शिक्षा मंत्री श्री मनीष सिसोदिया दिल्ली के नगर निगम संचालित प्राइमरी स्कूलों का श्वेतपत्र तीन हिस्सों में बांटे गये नगर निगम से मांगे। चूंकि दिल्ली सरकार स्वयं को दूध का धुला हुआ ईमानदार मानती है उसकी नजर में भाजपा नेतृत्व वाले नगर निगम भ्रष्ट है इसलिये दिल्ली के स्कूलों का जो उबलता हुआ प्रसंग है उसमें नगर निगम व दिल्ली सरकार को अपने अपने स्कूल सिस्टम पर श्वेतपत्र जारी करना चाहिये। भारत के मानव संसाधन मंत्रालय को भी दिल्ली के तीनों नगर निगमों को और दिल्ली सरकार के सरकारी स्कूलों का यथातथ्य निरूपण करना चाहिये। गुरू शिष्य समाज के बीच जो चौड़ी खाई होगई है जिसमें स्कूली बच्चों के अभिभावकों का समाज भी अपने अभिभावकों के साथ है। नाप्तयौवन जुवेनाइल तथा प्रौढ़ एवं अति प्रौढ अध्यापकों के बीच जो शैक्षिक दरार पड़ गई है उसे दुरूस्त करने का उत्तरदायित्त्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री महाशय जावड़ेकर को प्राथमिकता देते हुए दिल्ली में समेकित गुरू शिष्य झंझावत से बाहर निकलने के उपायों को सोचना चाहिये। नाप्तयौवन जुवेनाइल शिक्षार्थी व उनके अभिभावक वर्ग का आक्रोश अध्यापक समाज पर वज्रपात न कर पाये, मध्यम मार्ग की खोज तुरंत की जानी चाहिये। इलिच इवान की डिस्कूलिंग अवधारणा संयुक्त राज्य अमरीका से ज्यादा हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली के सभी किस्म के स्कूलों पर देश काल पात्र की त्रिवेणी को प्रभावित कर सकती है। इसलिये मानव संसाधन मंत्रालय दिल्ली के स्कूलों के बारे में चैतन्य होकर राजनीति से नहीं शिक्षा नीति के तहत विचार करे तथा  दिल्ली प्रशासन के अंतर्गत जो सेकेंडरी विद्यालय चलते हैं उनके पचास हजार अध्यापकों तथा हजारों जुवेनाइल छात्रों में जो संकटापन्न स्थिति उभर रही है हिंसा का जो वातावरण बन रहा है उसे रोकने और स्कूलों के छात्रों उनके अभिभावकों तथा अध्यापक समाज के बीच जो हिंस्र वातावरण बन रहा है उसे रोकने के उपायों में बदला जाना पहला जरूरी काम इलिच इवान की पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करा कर दिल्ली के अध्यापकों में वितरित किया जाये। अध्यापकों छात्रों व उनके अभिभावकों के बीच एक समझदारी वाला वातावरण बनाने की पहल जरूरी है। दिल्ली की सरकार और भारत सरकार के बीच राजनीतिक शत्रुता का शमन करने का तरीका विचारित किया जाये यह सारा संबंध केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के मंत्री को सोच विचार कर दिल्ली के स्कूलों में खूनखराबी रोकने के उपायों पर विचार करना चाहिये। इलिच इवान ने अमरीकी समाज को जो चेतावनी पचपन वर्ष पहले दी उसका पहला विस्फोट दिल्ली के सरकारी स्कूलों में होने से बचाया जाना आज का युगधर्म है। आबादी के बढ़ते रहने के साथ भारत राष्ट्र राज्य किशोर - किशोरी क्रांति की संक्रांति से उसी तरह गुजर रहा है जिस तरह योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्णावतार के दर्मियान संक्रांति हुई थी। देश के गहन विचार पुष्करों को किशोर क्रांति की संक्रांति पर मानवीय दृष्टिकोण से विचार करना ही चाहिये।
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