Sunday, 11 December 2016

जय हो नैमिषारण्य ललिता चक्रतीर्थ, ललिता सहस्त्रनाम
और गुरु शिष्या परम्परा को अप्रत्याशित ऊँचाई पर पहुँचाने वाली
तमिल भारती जन जन की अम्मा जयराम जयललिता जय जय हो।
 

          24 फरवरी 1948 को जन्मी पांच दिसंबर 2016 के दिन जीवन यात्रा का सफर पूरा कर इतिहास के पन्नों में याद किये जाने वाली जय राम जय ललिता ने हिन्दुस्तान की भारत गणतंत्र के घटक राज्यों के राजनीतिक सुप्रीमो समूह के लिये सागरिका घोष का मानना है कि भारत के आज के राजनीति करने वाले स्वयं को वीवीआइपी दर्जे में खड़ा करने वाले लोक प्रतिनिधियों के लिये अम्मा का व्यक्तित्त्व परम आदर्श हो सकता है बशर्ते वे अम्मा की मानवीय मातृत्व मर्यादाओं पर गौर करें। वह कौनसी विशेषता अम्मा में थी किसने तमिलनाडु के जन जन को अभिभूत किया। कबीर ने करीब चार सौ साल पहले कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने अपने अठारह पुराणों में से एक पद्म पुराण में भक्ति-नारद संवाद का ब्यौरा देते हुए श्री नारद को भक्ति से कहलवाया - अहम् भक्ति रिति ख्याता इमौ मे तरूणौ सुतौ ज्ञान वैराग्य नामानो कालेन जरसागतौ। भक्ति नारद से फिर कहती है - द्रविड़े साऽहम् समुत्पन्ना वृद्धिम् कर्णाटके गता क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतांगता। भक्ति की जीवन यात्रा द्रविड़ (तमिलनाडु में) से शुरू होकर गुजरात तक पहुंची जहां वह बुढ़िया होगई उसके दो बेटे ज्ञान वैराग्य अपनी मां को गंगा स्नान कराने के लिये ले गये। यहां आगे की कहानी भक्तिपथ वैसा ही है जैसा मानसून का पथ। तमिल का भक्ति साहित्य के समानांतर नास्तिकता का भी बोलबाला है, संप्रति वर्तमान राजनीतिक यात्रा में तमिलनाडु में जयललिता की ईश्वरवादिता और एम. करूणानिधि की निरीश्वरवादिता दोनों चरम पर थीं। यह तो हिन्दुस्तान है यहां हिरण्यकश्यप के घर प्रह्लाद सरीखा वैष्णव पुत्र हो सकता है। महाभागवत ध्रुव के पौत्र सरीखा अनीश्वरवादी वेन भी भारत में पैदा होता है। निरीश्वरवादी जिसे अंग्रेजी बोलने वाले Ahiest कहते हैं कभी कभी जिसे लोग अराजकवादी होने में भी गर्व महसूस करते हैं। और जो हो निरीश्वरवादी एम. करूणानिधि के घर में ईश वन्दना करने वाला पुत्र एम.के. स्टालिन तमिलनाडु के मंदिरों में माथा टेक कर अपने पिता की अनीश्वरवादी राजनीति को तिलांजलि देकर की मार्ग अपनाना पसंद कर रहा है, जो गुरू शिष्या प्रयोजन की प्रायोगिक विश्लेषण कर्मी जय ललिता ने पूरे वेग से अपनाया। हिन्दी में एक कहावत है - गुुरू गुड़ ही रह गये चेला हुए शक्कर। यह कहावत पूरी पूरी तरह जन जन की अम्मा जयराम जयललिता जो वस्तुतः अय्यंगर ब्राह्मण कन्या थीं उन्होंने अपनी राजनीतिक चर्या को मातृत्व करूणा का पर्याय बना डाला। हिन्द की राजनीतिक चेतना में गुरू शिष्या परम्परा के वर्तमान में दो ही उदाहरण हैं पहला दिवंगता जयराम जयललिता तथा उनके गुरू एम.जी. रामचंद्रन तथा बसपा सुप्रीमो बहन मायावती व उनकेे राजगुरू कांशीराम। एम.जी. रामचंद्रन ने तो राज भी किया पर कांशीराम का गुरूमार्ग लगभग उस तरीके का है जैसा शिवसेना निर्माणकर्ता बाला ठाकरे का था। कांशीराम विचार पोखर थे उन्होंने बहन मायावती को अपनी शिष्या निश्चित कर उन लोगों की शक्ति का उद्वेग कराया जिन्हें लोग अछूत, दलित या शेड्यूल्ड क्लास कहते और उन्हें हिकारत की नजर से देखते। गुरू शिष्या राजनीति के ये दो प्रत्यक्ष उदाहरण संभवतः मातृशक्ति के शक्तिपात के तौर पर आंके जा सकें इसके लिये जयराम जयललिता को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा - मैंने जयललिता का विरोध किया तो भी जयललिता ने सम्मान दिया। ज्ञातव्य है कि जयललिता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाने में मुख्य भूमिका सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ही निभाई थी। भारत के राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी सहित अनेकानेक राजनेताओं ने दिवंगता जयराम जयललिता के निधन पर शोक व्यक्त किया। जयललिता के दिवंगत होने से देश में आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति का उज्ज्वल पक्ष प्रस्तुत करने वाला व्यक्तित्त्व तिरोहित होगया। तमिलनाडु के जनसामान्य के लिये जयराम जयललिता का व्यक्तित्त्व दीनवत्सल करूणा का प्रतीक बन गया। करूणामूर्ति अम्मा तिरोहित होगयी तमिल का जन जन अम्मा के स्वर्ग सिधारने से स्वयं को अनाथ महसूस करने लगा। जरूरत यह महसूस होती है कि कबीर और कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने अपने साहित्य में जो महत्व भक्तिमार्ग को दिया है जिस भक्तिमार्ग की जमीनी वास्तविकता को जयराम जयललिता ने अपने अहर्निश करूणावर्धक मानसिकता से संपन्न किया। अम्मा की करूणापरकता तथा अम्मा की ईश्वर परायणता के समानांतर द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की ईशनिन्दा परकता व जातीयता द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के हर कदम में साफ साफ झलकती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि जयललिता ने भारतीयार हायर सेकेन्डरी स्कूल के विद्यार्थियों ने मां पुतलीबाई दिवस मना कर शराबखोरी के खिलाफ जो अभियान शुरू किया युवकों ने अपनी बुश्शर्ट पर तमिल में लिखवाया कि वे मदिरापान नहीं करेंगे और मदिरा सेवन नहीें होने देंगे। भारतीयार विद्यालय के छात्रों की मुहिम से प्रभावित होकर अम्मा ने घोषणा की कि वे फिर सत्ता में आईं तो धीरे धीरे शराबबन्दी करेंगी। तमिलनाडु सहित भारत के अधिकांश राज्यों में जहां शराबबन्दी नहीं है नशेबाजी ने जनसामान्य का जीवन दुरूह बना डाला है। इस तरफ भी अम्मा की सोच वैसी ही थी जैसी हर मां की होती है। परिवार में मद्यसेवी पिता पुत्र हों तो गृहस्थी नरक बन जाती है। मदिरा सेवन करने से जब व्यक्ति कम उम्र में मर जाता है उसकी स्त्री और बच्चों का योगक्षेम कठिन हो जाता है। सस्ते कैंटीन की तरह शराबखोरी की बुराई पर उनकी नजर थी। अम्मा कोई भी कृत्य धैर्यपूर्वक संपन्न करने की पक्षधर थीं। अम्मा का विरोध पक्ष याने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम पारिवारिक राजप्रथा का पोषक था जबकि अम्मा  का कोई परिवार नहीं था। अम्मा के जीवन पथ के करूणा मूलक क्षणों के, उन्होंने किन किन महिलाओं पुरूषों व बच्चों के योगक्षेम का जो तरीका प्रयोग किया उसके बारे में सर्वप्रथम तमिल भाषा में अभिव्यक्ति की जरूरत है। हम यह नहीं कहते कि अम्मा के राजनीतिक विरोधी एम. करूणानिधि की जो विशिष्टतायें हैं उन्हें भी प्रकाश में लाया जाये। तमिलनाडु में जो जातीय संगठन हैं चाहे वे हिन्दू हों मुसलमान हों अथवा ईसाई उनके सामाजिक सरोकारों को साहित्यिक रूप से उजागर करने की जरूरत है। यह ब्लागर महसूस करता है कि अम्मा जयललिता का जनसामान्य के योगक्षेम का चिंतन कौटिल्यीय अर्थशास्त्र पर आधारित है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र डैमोक्रेसी या लोकतंत्र के लिये नहीं अपितु राजतंत्र संवर्धक है परंतु कौटिल्य ने अपने 6 हजार श्लोकों और पौने छः सौ सूत्रों के माध्यम से राजधर्म सुशासन का जो सबक बताया है वह डैमोक्रेसी या लोकतंत्र में अर्थशास्त्र की पैठ शुरू कर लोकतांत्रिक राजव्यवस्था को नया स्थायित्व देने के लिये जयललिता की अभिनय जीवनी और राजनीतिक जीवनी का विश्लेषण होना चाहिये। जयललिता संसद के उच्च सदन की सदस्या रहीं इसलिये तमिल तथा अंग्रेजी में उनकी जीवनी प्रकाशित करने उनके समर्थकों में से कम से कम पांच प्रतिशत प्रशंसकों की राय ली जाकर तमिलनाडु की राज्य सरकार, राज्यसभा के अध्यक्ष के परामर्श से अन्ना द्रमुक दल के 3 प्रतिनिधि तमिलनाडु के उन दूसरे दलों के प्रतिनिधि जिन्हें राज्य के चुनाव में कम से कम 10 प्रतिशत मत मिले हैं जयललिता राजनीति व लोकनीति तथा समाज नीति विभिन्न मतावलंबियों के परिप्रेक्ष्य में आगणित किये जाने चाहिये। जयललिता ने अम्मा कैंटीन सहित जिन सर्वोपयोगी कार्यों का प्रारंभ किया है तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टियों सहित अखिल भारतीय दलों के नुमाइन्दे भी जयललिता की उपलब्धियों के बारे में तमिलनाडु असेंबली व संसद के दोनों सदनों को तमिलनाडु की राजभाषा तमिल व अंग्रेजी में प्रस्तुत किया जाये। साने गुरू जी की आंतर भारती विचार पोखर का जो सुझाव है अम्मा जयललिता का जीवन चरित्र अंग्रेजी संस्करण से भारतीय भाषाओं - उर्दू, पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, कोंकणी, मलयाली, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती, नैपाली और हिन्दी अनूदित कराये जाने के बजाय तमिल संस्करण से भारतीय भाषाओं में अनूदित कराने का निश्चय किया जाये अथवा एक तरफ तमिल में दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी भाषा में अम्मा जीवनी प्रकाशित हो प्रत्येक जनप्रतिनिधि वह ग्राम प्रधान हो ग्राम सभा सदस्य विकासखंड कमेटी का प्रमुख या सदस्य जिला पंचायत सदस्य या अध्यक्ष विधानमंडल सदस्य संसद सदस्य को उसकी अपनी भाषा में अम्मा का जीवन चरित्र अम्मा की लोककल्याणकारी योजनायें सोदाहरण प्रस्तुत हों ताकि हिन्दुस्तान में राजनीति करने वाले हर व्यक्ति को अम्मा चरित पढ़ने को मिले। जीवन चरित से उन्हें जो संदेश मिला उसे अनुभव करें इससे देश में राजनीतिक पथ को सुगम बनाने में मदद मिलेगी। 
राजनैतिक दलों में आपस में विचारों का आदान प्रदान विरोध पक्ष की राजनीतिक रणनीतियों का अध्ययन राजनीतिक साहित्य निर्माण तथा भाषण शैली में निंदा-परूष वाक्य निषेध को प्राथमिकता देना तथा राजनीतिक विचार भिन्नता अथवा सिद्धांत भिन्नता के साथ साथ जातीय परंपराओं में संयत भाषा का प्रयोग जमीनी राजनीतिक वास्तविकता का चित्रण करते समय भाषायी अथवा वाणी संयम विरोध पक्ष अथवा राजनीतिक प्रतिद्वंदी से सामाजिक शिष्टाचार निर्वाह ऐसे प्रसंग हैं जिनमें जयललिता की जीवन शैली प्रबोधनकार की भूमिका अदा कर सकती है। टाइम्स आफ इंडिया ने राज्यसभा सदस्या कानिमोझी करूणानिधि का साक्षात्कार बुधवार दिसंबर सात 2016 के संपादकीय पृष्ठ में सागरिका घोष के स्तंभ अम्मा की महत्ता के पश्चात प्रकाशित किया। राज्यसभा सांसद का साक्षात्कार लेने वाले व्यक्ति श्री नलिन मेहता हैं। सांसद कानिमोझी ने कहा - जयललिता मजबूत नेतृत्व की स्वामिनी थीं। उनके निधन से बहुत बड़ी रिक्तता आयी है। नलिन मेहता के नौ सवालों का जवाब द्रमुक नेत्री तथा कालग्नार करूणानिधि कन्या कानिमोझी ने दिये। कानिमोझी ने कहा - जयललिता निधन से केवल अन्ना द्रमुक में ही रिक्तता नहीं आयी तमिल राजनीति पर भी जयललिता के दिवंगत होने से एक अनिर्वचनीय रिक्तता तमिलनाडु में भी घर कर गई है। अगर एम. करूणानिधि स्वस्थ्य होते साक्षात्कार उन्होंने दिया होता तो उनका मत अपनी कन्या के मत भिन्न होता साथ ही कानिमोझी भी महिला हैं अपने मातापिता की अत्यंत प्रिय संतान हैं पर उसका स्त्री स्वभाव जयराम जयललिता के राजनीतिक कैरियर के प्रति प्रतिकूल नहीं प्रशंसात्मक ज्यादा है। अपने मतदाताओं के अलावा जयललिता में जनसामान्य के लिये जो मनोभाव था तथा अम्मा कैंटीन सहित उन्होंने जो जो लोक हितैषी कार्यक्रम ईमानदारी से शुरू किये उससे केवल गरीब ही नहीं जो लोग मध्यवर्गीय हैं आमदनी ठीकठाक है वे भी अम्मा के लोकसंग्रह के तरीके के प्रशंसक थे। यहां तक कि जो अनेक जातीय या राजनैतिक कारणों से उनके दल का समर्थन करना उचित नहीं समझते वे भी अम्मा की कार्य शैली से प्रसन्न थे। उनकी वाणी का मिठास व शत्रुभाव रखने वाले व्यक्ति के लिये भी सामाजिक शिष्टाचार उनके जीवन का स्वधर्म था यही कारण है कि तमिल समाज में उनको आदर से देखा जाता था। 
अब हम कबीर की बात पर आते हैं। कबीर निर्गुण ईश्वर के भक्त थे उन्हें रामकीर्तन से बैर नहीं था। मध्यकालीन इस्लामी सल्तनत वाले हिन्द में कबीर पहले हिन्दुस्तानी थे जिन्होंने भक्ति का उद्भव तमिल से माना। ललिता चक्र तीर्थ, ललिता सहस्त्रनाम तथा नैमिषारण्य जहां अठासी हजार सन्यासी अथवा वानप्रस्थी अध्यात्म चिंतन करते थे यहां तक कि कुरूक्षेत्र में महाभारत युद्ध होरहा था एक योद्धा बलराम थे जो न तो दुर्योधन का साथ देना चाहते थे न युधिष्ठिर का उन्होंने संकल्प लिया कि वे तीर्थयात्रा पर निकलेंगे। अपनी यात्रा में वे नैमिषारण्य भी आये वहां उन्होंने अध्यात्म चर्चा में भाग लिया। नैमिषारण्य भारत के मैदानों में अकेला स्थल है जहां जल का स्त्रोत धरती में ऊपर आता है इसे चक्रतीर्थ कहते हैं। यहीं पास में ललिता मंदिर है। भारत में विष्णु सहस्त्रनाम गोपाल सहस्त्रनाम की तरह ललिता सहस्त्रनाम का जप होता है। ललिता आराधना ललिता सहस्त्रनाम उत्तर में कम दक्षिण में ज्यादा है। चक्रतीर्थ ललिता स्थल से ही गोमती नदी का उद्भव है। 
ललिता सहस्त्रनाम दक्षिण भारत के ब्राह्मणों का अत्यंत प्रिय पाठ है। यहां तक कि भारतीय समाज के मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक समूह में जो ब्राह्मण नागरी और संस्कृत नहीं पढ़ पाते हैं वे सी डी के माध्यम से ललिता सहस्त्रनाम पाठ सुनते हैं। अम्मा के नाम में ललिता शब्द है ललिता दक्षिण भारत की वैसी ही दैवी शक्ति है जैसे बंगाल में कात्यायनी, गुजरात में अंबा, हिमालय में शैल पुत्री सहित नव दुर्गायें हैं। शक्ति आराधना भारतीय मान्यता का महत्वपूर्ण अंग है। इस ब्लागर को प्रतीति होती है कि संभवतः जयराम जयललिता नित्य ललिता सहस्त्रनाम का पाठ किया करती रही होंगी। पुष्टि हो जाने पर यह ब्लागर जयराम जयललिता संबंधी आगामी किसी पोस्ट में ललिता सहस्त्रनाम, ललिता चक्रतीर्थ तथा नैमिषारण्य में स्थापित ललिता मंदिर के विभिन्न पहलुओं पर विस्तारपूर्वक विवेचना प्रस्तुत करेगा। हिन्द की विशेषता ही यह है कि यहां सौराष्ट्र के सोमनाथ सहित बारह ज्योतिर्लिंग हैं जिनमें वही परमात्म तत्व निहित है जो कैलास के देवाधिदेव महादेव और काशी के विश्वनाथ में है। संप्रति हिन्दुस्तानी राजनीतिक क्षितिज में गुरू शिष्या प्रयोजन की पहली चमकीली व्यक्तित्त्व स्वामिनी जयराम जयललिता ही थीं। सिनेमैटिक अभिनय से राजनीतिक शीर्षस्थ व्यक्तियों में एम.जी. रामचंद्रन व एन.टी. रामाराव की अपनी विशेषता हैसियत थी पर अम्मा ने इन दोनों से आगे बढ़ कर जन जन की अम्मा बनना चाहा उन्हें पछाड़ डाला। यद्यपि गुरू शिष्या प्रयोजन में स्वयं को दलित की बेटी बताने वाली बहन मायावती अपने गुरू कांशीराम जिन्होंने स्वयं राज करने से परहेज किया केवल भारतीय संविधान के अनुसार अनुसूचित जाति की गणना में आगणित होने वाले समूहों को वामसेफ आइडिया के तहत संगठन की छतरी के अंदर लाने का सफल प्रयास किया। कांशीराम की दूरदर्शिता तथा समाज के विभिन्न वर्गों की मानसिकता का नाड़ीज्ञान रखने वाले कांशीराम ने एक सुसंगठित श्रंखला कायम की। मायावती को नेतृत्व निर्माण कला में पारंगत बनाने का श्रेय कांशीराम को ही जाता है। इन दो महिलानेत्रियों के अलावा वसुंधरा राजे, ममता बनर्जी, दिल्ली में आआपा की सरकार आने से पहले लगातार पंद्रह वर्ष तक श्रीमती शीला दीक्षित ने केन्द्रीय सरकार के साथ सटीक सामंजस्य रख कर दिल्ली का शासन चलाया। मुफ्ती मुहम्मद सईद की कन्या - महबूबा मुफ्ती जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री हैं। गुजरात में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की उत्तराधिकारी के रूप में आनंदी बेन पटेल कन्या मुख्यमंत्री रहीं पर जो करिश्माई मातृत्व वत्सलता वाला लोकनेतृत्व जयराम जयललिता ने मूलतः तमिल भाषी न होने के बावजूद भारत में राजनीतिक स्तर पर ब्राह्मण विरोध का प्रारंभ तमिलनाडु में ही हुआ पर अय्यंगर समाज में जन्मी जयललिता ने तमिल के जन जन को अम्मा कैंटीन के माध्यम से अपना मुरीद बना डाला। वे करूणा में अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे की पर्याय थीं। जैसे भूखा प्यासा बालक मां की गोद में दौड़ कर बैठता है वही मातृवत्सलता जयललिता ने तमिल भाषी आबाल वृद्ध नरनारियों में अपने लिये अम्मा का प्रतिष्ठित स्थान बना डाला। वे अपने लक्ष्य को देखती थीं रास्ते में आने वाली बाधाओं का अपनी शांत जीवन शैली से निराकरण कर देती थीं। 
अंत में जयराम जयललिता के मानवीय करूणाधन का असर हिन्द के अन्य लोकप्रतिनिधियों में भी उजागर हो। राज्यों के मुख्यमंत्रियों में लोककल्याण की भावना जोर पकड़े ज्यादा से ज्यादा लोकप्रतिनिधि जयललिता की तरह लोक मंगलायतन के लिये आगे आयें जो भारतीय घटक राज्यों के मुख्यमंत्री हैं उन्हें ललिता सहस्त्रनाम वह शक्ति दे जिससे प्रेरित होकर जयराम जयललिता ने चेन्नई से राजधर्म की नयी शुरूआत की।
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