Sunday, 1 January 2017

 क्या मूलतः जर्मन भाषी डोनाल्ड ट्रंप को
भारतीय वाङमय का द्रोणगिरि त्र्यम्बक-त्र्यम्बकम यजामहे माना जाये?
 आतंकवादी इस्लामिक जिहादियों का महाकाल कहा जाये ?
          मूलतः जर्मन भाषी अमरीकी खरबपति औद्योगिक घराने के मुखिया महाशय डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सन 1987 में मैनहट्टनइन्स नाम की मैगजीन (जो अब नहीं छपती) उसे साक्षात्कार दिया गया। यह बात आज से लगभग 30 वर्ष पुरानी है। जब 20 जनवरी 2017 को अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन में अमरीका राजप्रासाद में शपथपूर्वक प्रवेश करेंगे, उनका साक्षात्कार तीस वर्ष की उम्र वाला होगा। संदर्भ था वाशिंगटन की Neuclear Policy का जिसकी तीव्र भर्त्सना करते हुए महाशय टंªप ने कहा - I believe they are sort of fools they only think about Russian, Russian and our weapons. महाशय डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीकी परमाणु अस्त्रों के संबंध में अपने राष्ट्र राज्य नीति निर्माताओं की दृष्टि पर घातक वज्र का प्रहार किया तब सोवियत यूनियन विखंडित नहीं हुआ था और सोवियत रूस व अमरीका के बीच शीतयुद्धनुमा कूटनीतिक रास्ते का उपयोग होता था। अभिजित अय्यर मित्रा जो Peace and conflict studies के वरिष्ठ चिंतक हैं उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तित्त्व के महत्वपूर्ण वैचारिक पहलुओं पर विवेचन करने का भगीरथ प्रयास किया है। महाशय डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इंटरव्यू में आगे कहा - Before pilloring the French for playing footlessly and faulty fro with their Nuclear Technology but perhaps the most important part of their interview was his views on Pakistan and U.S. Russia relationship. He believed that the only solution was “ For the Big two to make a deal now to step in and prevent the next generation if nations about to go nuclear from doing so. By whatever means necessary. His views get better on Pakistan ‘I think the solution is largely economic. Because there are so many of these countries that are so fragile and we have a vast power that’s never been used you do whatever is necessary so these people will have riots in the streets, So they can get water. Because that is the only thing going to do it, the people, the riots.’
France was pole third in the proliferation field compared to what we now know about China and Pakistan Transposing the tee 1987 Trump to today we still fired a peer respect for Russia, the contempt for China that he once had for France and the deep suspicious of Pakistan that has never left him. ट्रंप ने हर राजनीतिक विश्लेषक पंडित को गलत कदमताल वाला साबित कर दिया। संभावना यह लगती प्रतीत होती है कि भारत की राजनीतिक लामभागिता उसी स्तर पर पहुंचने वाली है जैसा अढ़ाई तीन हजार वर्ष पहले आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र के 6 हजार श्लोकों में वर्णित राजनीतिक गुर से मगध नरेश की गद्दी पर चंद्रगुप्त मौर्य को प्रतिष्ठित कर डाला था तथा पौने छः सौ सूत्रों के जरिये आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति का प्रयोग चंद्रगुप्त मौर्य के राज्याभिषेक से पूर्व पूरी तैयारी के साथ पाटलिपुत्र के राजसिंहासन पर चंद्रगुप्त मौर्य एक सामान्य ग्वालबाल पुत्र को आसीन किया। चाणक्य स्वयं गंगा तट में कुटी बना कर रहते थे। भारतीय वाङमय जिसे आधुनिक दुनियां एशिया यूरोप कहती है उसे जंबू द्वीप कहता था जिसमें कश्यप अदिति, कश्यप दिति तथा कश्यप दनु की संतानों का प्रभुत्व था। अदिति पुत्रों को आदित्य, उनके राज्य को त्रिविष्टप अथवा त्रिदश कहा जाता था। कश्यप दिति के जुड़वां पुत्र हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष में हिरण्यकश्यप ने अपनी दैत्यधानी गंगा यमुना सरस्वती सरयू के मैदान हरिद्रोही निश्चित की थी जिसे आजकल हरदोई नाम से जाना जाता है। दनु पुत्रों में वर्तमान जर्मनी जिसे तब शर्मणी तथा वर्तमान रूस जिसे तब ऋषि देश कहा जाता था जंबू द्वीप के हरिद्रोही, आदित्यधानी त्रिविष्टप तथा जर्मन भाषी शर्मणि रसियन भाषी ऋषि देश के निवासी भारतीय संस्कार से जुड़े देश थे। जर्मनी (भारतीय वाङमय का शर्मणि) रूस (भारतीय वाङमय का ऋषि देश) तिब्बत भारतीय वाङमय का त्रिविष्टप या त्रिदश इन तीनों देशों की भाषाओं में भारतीय भाषा संस्कृत के शब्दों का नब्बे पिचानबे प्रतिशत तक पुरानी जर्मन तथा पुरानी रसियन भाषाओं में विद्यमान थे। अंग्रेजी कंपनी बहादुर तथा बर्तानी राज के लगभग तीन सौ वर्षों के कालखंड के कारण भारत के लोग अंग्रेजी से सुपरिचित हैं फ्रांस का उपनिवेश भी भारत में पुडुचेरी में था। पुर्तगाल का स्वामित्व गोआ दमन दिव में था। इसलिये भी अंग्रेजी के साथ साथ फ्रेंच पुर्तगाली भी भारत में प्रवेश कर चुकी भाषायें थीं यद्यपि पंडित नेहरू द्वारा परम पावन चौदहवें दलाई लामा को 1959 में हिन्द में राजनीतिक शरण देने का स्तुत्य कार्य संपन्न किया पिछले सतावन वर्षों में एक लाख से अधिक तिब्बती भाषी भारत में रह कर ध्यानयोग का मार्ग परम पावन दलाई लामा की अग्रचारिता में संपन्न कर रहे हैं धर्मशाला में तिब्बत ज्ञान केन्द्र भी हैं, यह सब होते हुए भी तिब्बती एक ऐसी विदेशी भाषा है जिसके तार भारतीय वाङमय एवं भारतीय भाषा विज्ञान से जुड़े हुए हैं। यूरेशिया जिस भारत के प्राचीन संस्कृति पुरस्कर्ता जंबू द्वीप कहते हैं उसके उपरोक्त तीन देश (यद्यपि तिब्बत पर चीन का जबरन कब्जा है पर सांस्कृतिक भाषाई तथा मजहबी दृष्टिकोण से तिब्बत चीन का हिस्सा नहीं) त्रिविष्टप, शर्मणी तथा ऋषि देश की पुरानी तिब्बती पुरानी जर्मन और पुरानी रसियन जिनमें संस्कृत के नब्बे से पचानबे प्रतिशत शब्द हैं भारतीय विदेश मंत्रालय को विचार करना चाहिये कि इन तीनों भाषाओं से भारतीय वैदेशिक नीति नाता जोड़ इन देशों में उन्हीें कूटनीतिज्ञों की नियुक्ति या पदस्थापना दे जो रसियन तथा जर्मन भाषाओं का जानकार है। रूस और जर्मनी के साथ भारत का विदेश मंत्रालय क्रमशः रसियन व जर्मन में पत्रव्यवहार व वार्ता संवाद शुरू करे भारत के जो स्कूल या विश्वविद्यालय जर्मन और रूसी भाषाओं का शिक्षण देते हैं उन्हें विदेशी भाषा संवर्धन पर प्रोत्साहित किया जाये। भारतीय कूटनीति को अंग्रेजी के भाषायी प्रभाव से मुक्त करना इसलिये जरूरी होगया है हिन्द विश्व भाषायें जन्मदाता इसलिये है क्योंकि इसी धरती में तांडव नृत्य के पश्चात भगवान महादेव के डमरू के बजने से जो ध्वनि निकली वही भाषाओं की जननी है। अगर हिन्द को भाषाई ऊहापोह तथा भाषाई मद से अपने को मुक्त रखना हो तो विश्व के जिन जिन राष्ट्रों की जो भाषायें हैं उन्हीं के द्वारा कूटनीतिक व्यवहार हो। यहां ऋग्वेद को आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के माध्यम से प्रकाशित कराने वाले मैक्समूलर का उल्लेख इसलिये समसामयिक है भारत न आने के बावजूद जर्मन भाषी मैक्समूलर ने वैदिक संस्कृत निघंटु जन्मातर ज्ञान के जरिये ऋग्वेद का प्रकाशनेय संपादन कर प्रकाशन संपादनकर्ता के तौर पर स्वयं को वैदिक संस्कृत में मोक्षमूलः संबोधित किया तथा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को अक्षपत्तन विश्वविद्यालय कहा। कोलकाता विश्वविद्यालय के मनीषी भाषा विज्ञान विद सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने भारतीय वाङमय के शब्दों की पश्चिम यात्रा का विश्लेषण किया। उन्हें इस भाषा विज्ञानी मुहिम में कोलकाता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डाक्टर हेम चंद्र जोशी ने पूरे तन्मयता से वाणी सहयोग दिया। मोक्षमूलः मैक्समूलर की भांति जर्मन मूल के पैंतालीसवें अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महाशय के नाम की विशेषता भाषायी वैज्ञानिक नजरिये से आंकने की जरूरत है। बर्लिन विश्वविद्यालय के संस्कृत वैदिक मैथमैटिक्स संकाय से अनुरोध किये जाने की तात्कालिक जरूरत है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप शब्द भारतीय वाङमय के द्रोणादि त्रयम्बक शब्द का पर्याय तो नहीं है ? भारत में द्रोणगिरि - द्रोणाद्रि हिमालय में स्थित है जहां अमृत संजीवनी औषध वनस्पति उपलब्ध थी सुषेण वैद्य ने हनुमान से कहा था अगर द्रोणाद्रि से अमृत संजीवनी ला सकते हो तो लक्ष्मण के प्राण बचाये जा सकते हैं। दूसरा शब्द त्रयम्बक है जो दीर्घ जीवन का प्रतीक है इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप और द्रोणाद्रि त्रयंबक पर्यायवाची हैं। अभी यह ब्लागर ऋषि देश की भाषा विज्ञानता पर मौन साध रहा है केवल जर्मन भाषा का ही प्रसंग उठा रहा है। 
          विश्वायतन वातावरण में डोनाल्ड ट्रंप के आगमन से अमरीका सहित समूचे विश्व के राजनीतिक व सामरिक वातावरण में एक नयापन आया है। ट्रंप का संयुक्त राज्य अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति का आसन ग्रहण करना उनके घोषित उद्देश्य - अमरीका को पुनः उसका शीर्षस्थ स्थान उपलब्ध कराना है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने श्वेत नस्लवाद का सहारा लिया। सन 1776 में गिनेचुने अमरीकी भूमि में स्थित बर्तानिया सहित यूरपी उपनिवेशों को ब्रिटिश मोनार्क के बंधन से मुक्त होकर स्वतंत्र समर्थ तथा राजनीतिक प्रज्ञा संपन्न राष्ट्र का संगठन संकल्पित किया जो लोग आपस में मिले वे यूरप की विभिन्न भाषाओं के उपयोगकर्ता थे उनका साझा लक्ष्य बर्तानी राजकुल से नाता तोड़ना था। संयुक्त राज्य अमरीका फ्रांस जर्मनी पुर्तगाल स्पेन रसिया सऊदी अरब ईरान इजरायल इटली जापान की तरह सांस्कृतिक राष्ट्र नहीं है। भारतीय वाङमय में राष्ट्र जिसे बोलचाल की हिन्दी में राठ कहते हैं यहां सौराष्ट्र (सौवीर) महाराष्ट्र विराष्ट्र (विराट) आदि नामावली है। यूरप के राष्ट्र या नेशन ज्यादातर भाषायी आधारमूलक हैं मजहबी आधारमूलक नहीं। पश्चिम एशिया के राष्ट्र या नेशन भी मजहब आधारित न होकर ज्यादातर भाषायी आधारमूलक हैं। ख्रिस्ती मजहब और इस्लाम मजहब संसार के दो बड़े मजहब हैं जिनका मूलाधार एक ईश्वर, गौड या खुदा, एक धर्म पुस्तक बाइबिल अथवा कुरआन शरीफ तथा एक पैगम्बर - मसीहा याने ईसामसीह या मोहम्मद साहब इन दोनों मजहबों के एकेश्वरवाद का मूल स्थान ख्रिस्ती धर्म के लिये वैटिकन सिटी तथा इस्लाम के लिये मक्का शरीफ इन मजहबों को ताकत देते हैं तथा इनके अनुयायियों के लिये शीर्षस्थ केन्द्र हैैं। इन दोनों मजहबों में एक बहुत बड़ा फर्क यह है कि जहां कुरआन शरीफ की आयतें केवल अरबी में ही उच्चारित हैं बाइबिल अपनी मूल भाषा हिब्रू में नहीं यूरप की सभी मुख्य भाषाओं में पढ़ी जाती है तथा बाइबिल के निदेश गिरजाघरों में प्रार्थना के रूप में गाये जाते हैं। रूस सहित कई देशों में बाइबिल की प्रार्थना का लहजा हिन्दुस्तानी सामवेद के छंदों के उद्गान सरीखा है। इंग्लैंड में सैक्स्टन प्रार्थना तो पूर्णतः सामवेदी गान के किस्म की है। 
परिवर्तिनि संसारे मृतको वा न जायते स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नितम्।
          ट्रंप के अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति के रूप में वाशिंगटन में आने वाले चार वर्षों याने 2017 से 2021 तक आसनस्थ होना और उनका यह संकल्प कि वे अमरीका को उसका वह शीर्ष स्थान फिर उपलब्ध करायेंगे जो उनकी नजरों स्थानच्युत होगया है। अभिजित अय्यर मित्रा का सोचना है कि पेंटागन व क्रेमलिन दोनों ही चीन को सशंकित नजरिये से देखते हैं। चीन के वे लोग जो निरीश्वरवादी नहीं हैं और मंदारिन वाङमय से प्रभावित है वे यह भी मानते हैं कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी बेपेंदे की लोटे की तरह लुढ़के हुए विचारों वाली है। मारक आणविक अस्त्रों का कब चीन अथवा उसका अनुसरण करने वाला पाकिस्तान प्रयोग कर विश्वयुद्ध की ओर पटक देंगे यह नहीं कहा जा सकता। पाकिस्तान के आतंकवादियों के हाथ अगर आणविक अस्त्र आगये वह कब उनका दुरूपयोग करले यह भविष्यवाणी करना कठिन है। युद्ध की हालात में कौन किसका साथ देगा ? यह भविष्यवाणी भी नहीं की जा सकती। इसका प्रत्यक्ष महाभारतीय उदाहरण - भद्राधिपति राजा शल्य है जो भद्र देश से कुरूक्षेत्र के लिये अपने भांजे नकुल सहदेव के बड़े भाई युधिष्ठिर का साथ देने आया पर दुर्योधन शकुनि व कर्ण की युद्धशैली का स्वागत शल्य को मजबूर कर गया कि वह महाभारत युद्ध में दुर्योधन का साथ दे। इसलिये संसार की परिवर्तनशीलता की आस्था पर यकीन करें। ट्रंप का क्या रूख होगा ? अमरीका के 32 करोड़ आबादी में से एक प्रतिशत मुसलमान जनसंख्या है वहां पंद्रह लाख हिन्दू हैं जिन्हें ट्रंप विश्वास करते है। मुस्लिम जनसंख्या 32 लाख है उनके लिये ट्रंप क्या राय रखते हैं ?
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