Monday, 2 January 2017

त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् 
क्या यह मंत्र ट्रंप का संकल्प हो सकता है?
          ट्रंप महाशय ने यू.एन.ओ. को एक क्लब अथवा मनोविनोदकारी बहस मुबाहसे का केन्द्र माना है। जो राष्ट्र राज्य यूएनओ के सदस्य नहीं हैं उनकी संख्या वेटिकन तथा ताइवान सहित कुल मिला कर मात्र 6 है। ये सभी 6 देश राष्ट्र राज्य या सार्वभौम राज्य तो हैं किन्तु संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 सदस्य राष्ट्रों के मुकाबले यह संख्या नगण्य है। ताइवान और वैटिकन के अलावा अन्य चार राष्ट्र तुर्क साइप्रस कोसोयो फिलिस्तीन तथा सउदी अरब डेमो हैं। ताइवान चीन में माओ त्से दुंग के नेतृत्व में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी च्यांग काइ शेक के राष्ट्रवादी चीन को सत्ताच्युत करने के पश्चात राष्ट्रवादी चीन ताइवान तक सीमित होगया। राष्ट्र संघ ने राष्ट्रवादी चीन की जगह माओ त्से दुंग के नेतृत्व की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पेइचिंग पर कब्जा कर लेने के पश्चात राष्ट्र संघ ने कम्यूनिस्ट चीन को ही असल चीन मान लिया। चीन का तर्क है एक चीन पर वास्तविकता यह भी है कि तिब्बत जो न मजहबी नजरिये से चीनी है न ही भाषायी और सांस्कृतिक नजरिये से भी चीनी नहीं है। माओवादी चीन का मानना है कि पाकिस्तान आतंक फैलाने वाले जिहादियों का संवर्धक नहीं माना जा सकता। चीन की साम्यवादी निरीश्वरवादी सरकार का यह भी मानना है कि अजहर को आतंक प्रवर्तक मानने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव का अपने वीटो पावर से निरस्त कर चुका हैै। इसलिये महाशय डोनाल्ड ट्रंप की इस मान्यता में काफी दम लगता है कि यूएनओ एक क्लब मात्र है। अमरीकी राष्ट्रपति के पद के लिये चुने जाने के पश्चात महाशय डोनाल्ड ट्रंप ने अनेक देशों के प्रमुख शासकों से फोन वार्ता करते समय ताइवान (राष्ट्रवादी चीन) से भी संपर्क साधा जिसका कम्यूनिस्ट चीन ने तत्काल विरोध दर्ज किया और चीन एक है, दो या तीन नहीं जबकि कम्यूनिस्ट चीन यदि किसी से भयभीत है तो वह व्यक्तित्त्व परम पावन चौदहवें दलाई लामा का है। तिब्बत पर जबर्दस्ती कब्जा जमाये रख कर यह भी कहना कि तिब्बत चीन का Autonomus Region है प्रकारांतर से तिब्बत की स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकार करना ही है। भारतीय संस्कृति मानती है कि धर्म एक चतुष्पद अवधारणा है। पहला चरण ध्यान धर्म है जिसके प्रमुख प्रवर्तक परम पावन चौदहवें दलाई लामा हैं। धर्म का दूसरा चरण प्रार्थना धर्म है जिसके प्रतीक वेटिकन सिटी स्थित परम पावन पोप हैं। धर्म का तीसरा चरण नमस्या है। हिन्दी वैयाकरण किशोरी दास वाजपेयी के मुताबिक महाभारत के अनुशासनिक पर्व में व्यक्त नमस्या शब्द ही नमाज है। दुनियां के एक अरब साठ करोड़ इस्लाम धर्मावलंबी नमाज अता करते हैं, नमाज अता करने के लिये और्वोपदिष्ट मार्ग और्वोपदिष्ट योग हठासन योग है जिसके माध्यम से नमाज अता की जाती है। धर्म का चौथा व आखिरी चरण हवन कर वायु शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करना है। जिसे दुनियां हिन्दू धर्म कहती है वह जलवायु शुद्धि का कारक है। ऐसे लोगों की संख्या आज विश्व मजहबी वातावरण में एक अरब से ज्यादा है और जिसे मजहब कहना इसलिये तर्कसंगत नहीं है क्योंकि उसका कोई एक मसीह या प्रोफेट नहीं। वह समाज एकेश्वरवादी भी नहीं है। किसी खास व्यक्ति ने इस धर्म को नहीं चलाया और न ही इसकी कोई अकेली एक धर्मपुस्तक है। दुनियां में ख्रिस्ती धर्मावलंबी अढ़ाई अरब हैं। बौद्ध धर्मावलंबी गौतम बुद्ध की जन्मभूमि भारत में ज्यादा नहीं हैं। तिब्बत लंका भूटान पूर्वी एशियायी देशों में बौद्ध धर्मावलंबी हैं। चीन में ज्यादातर लोग ताओ पंथी हैं कुछ बौद्ध मतावलंबी भी हैं। हिन्दुओं की तरह बौद्ध मतावलंबी भी संगठित नहीं हैं। भारत में ईसा से एक हजार वर्ष पहले आदि शंकर ने गौतम बुद्ध को महाविष्णु का अवतार घोषित कर बौद्धावतार के द्वारा गौतम बुद्ध को भारत चेतना का अग्रदूत निश्चित कर डाला। 
          ट्रंप ख्रिस्ती धर्मावलंबी हैं। मूलतः जर्मनी में कैथोलिक क्रिश्चियनिटि में धर्म सुधार केे लिये प्रोटेस्टेंट धर्म का उद्गान किया गया। अमरीका के 52 प्रतिशत लोग ख्रिस्ती धर्म की प्रोटेस्टेंट शाखा के अनुयायी हैं। रोमन कैथोलिक जनसंख्या 24 प्रतिशत है। दस प्रतिशत लोग धर्म से जुड़े नहीं हैं। मोमिन 2 प्रतिशत, यहूदी एक प्रतिशत, मुसलमान एक प्रतिशत दूसरे धर्मावलंबी सब मिला कर दस प्रतिशत यह है संयुक्त राज्य अमरीका धर्माचरण की जनसंख्या। लगता है डोनाल्ड ट्रंप स्वयं प्रोटेस्टेंट हैं तथा धार्मिक उदारता बरतने के बावजूद जिहादियों वाली धार्मिक कट्टरता व धार्मिक विग्रह के उग्र आलोचक भी हैं। दुनियां के तीन संख्या बहुल मजहबों में रोमन कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट ख्रिस्तियों के अलावा रूस का ख्रिस्ती धर्मावलंबन कैैथोलिकों व प्रोटेस्टेंट से थोड़ा भिन्न प्रतीत होता है शायद इसका मूल कारण वर्तमान में रसिया या रूस के नाम से संबोधित देश का भारतीय वाङमय वाला नाम ऋषि देश है। भारत में ऋत्विक् ऋषि एवं मुनियों, मुनियों से तात्पर्य ऐसे मनीषी समूह से है जिसने ममत्व का त्याग कर दिया हो, जो सृष्टि में सभी जीवधारियों को समान भाव से देखता है। साइबेरिया सहित समूचे रूस में जो कार्लमार्क्स की कम्यूनिस्ट थिअरी के तहत यूएसएसआर कहा जाने लगा। रूस में कम्यूनिस्ट थिअरी के राजतंत्र का श्रीगणेश लेनिन द्वारा 1917 में प्रारंभ किये जाने के बावजूद रूसी ख्रिस्तियों में एक विशेष प्रकार की मजहबी सत्ता विद्यमान रही। 1917 से लेकर 1991 तक मार्क्स की नीसेमता से चलने वाला Union of Soviet Socialist Republic सन 1991 में धराशायी होगया। पिछले पच्चीस वर्षों में रूस में समाजवाद या साम्यवाद का प्रेत भी नजर नहीं आता। अमरीका सहित कई कूटनीतिक हस्तियों का मानना है कि अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के अंदर भी विरोध का सामना करने वाले ब्लादिर पुतिन रूसी राष्ट्रपति ने ऐसी सुई चुभोई कि डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव में अमरीकियों तथा अश्वेत मतदाताओं के विरोध के बावजूद अमरीकी श्वेत नस्लवादियों के एकमुश्त डोनाल्ड ट्रंप महोदय का लोकसमर्थन उन्हें संयुक्त राज्य अमरीका केे पैंतालीसवें राष्ट्रपति के आसन पर आरूढ़ कर गया। संयुक्त राज्य अमरीका उत्तर-दक्षिण घटक राज्यों में दास प्रथा का समर्थन दास प्रथा का उन्मूलन दो पक्ष बन गये थे। डेढ़ सौ वर्ष पहले दास प्रथा समाप्त करने वाले महामानव अब्राहम लिंकन ने उग्रतर सिविल वार का सामना करते हुए उस सिद्धांत का अनुसरण किया जिसके अनुसार पार्थ अर्जुन को पार्थसारथी योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने कहा था - तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय युद्धस्व कृतनिश्चयः। वासुदेव श्रीकृष्ण अपने भक्त अर्जुन को आगे कहते हैं - निराशी निर्ममो भूत्वा युद्धस्व विगत ज्वरः। 
          1776 में जार्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में उत्तर अमरीका के बर्तानी तथा अन्य यूरप देशों की उपनिवेशनुमा बस्तियों में ब्रिटिश राजतंत्र से मुक्ति पाकर गिनेचुने उपनिवेशों का संघ खड़ा किया। तब उस संघ में उपनिवेश संख्या दहाई में न होकर अत्यंत न्यून थी जो आज बढ़ कर पचास घटकों वाले संयुक्त राज्य अमरीका में तब्दील हो चुका है जिसके पैंतालीसवें अमरीकी राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप शीर्षस्थ पुरूष बने हैं। उनका बीजमंत्र राजकुमार ध्रुव को देवर्षि नारद द्वारा दिये गये द्वादशाक्षर मंत्र की तरह श्वेत नस्ल वाले अमरीकियों की पकड़ अमरीका में मजबूत करना है। अमरीकी श्वेत नस्ल वाले लोगों को पुनः श्वेत वैभव वाला संस्कार का सर्वगुण संपन्न राज्यों की शिखर मूर्ति बनाया जा सके। जब तक सोवियत यूनियन अस्तित्व में था अमरीकी प्रभुताई शीतयुद्ध का फुहारा छोड़ती थी, पिछले पच्चीस वर्षों में अमरीका अकेला राष्ट्र राज्य था जिसका वैभव पूरी धरती में अपना डंका बजा रहा था। चीन जो आबादी में अमरीकी आबादी से लगभग पांच गुना ज्यादा है क्षेत्रफल के नजरिये से अमरीका चीन से लगभग तीन लाख वर्ग किलोमीटर ज्यादा है। अगर भारतीय वाङमय के श्वेतद्वीप अथवा क्षीरसागर कल्पना का आश्रय लें क्षीरसागर चीन के पूर्ववर्ती भाग में था जिसके समुद्र मंथन के द्वारा श्री रंभा विष वारूणी अमिय शंख गजराज धनु धन्वंतरि धेनु तरू चंद्रमणि अरू बाजि ये चौदह रत्न निकले। भारत के इलाहाबाद नाम के शहर में प्रति वर्ष माघी अमावस जिसे इलाहाबादी मौनी अमावस कहते हैं उसके अमांत पर्व समुद्र मंथन जनित अमृत कलश से अमृत बूंदें छलक कर त्रिवेणी में पड़ी थीं। चीन के पारंपरिक राष्ट्रवादी समाज द्वारा प्रतिवर्ष माघ अमावस अमांत पर्व को चीन जो नये वर्ष का पहला दिन माना जाता है तथा उस दिन को 1949 तक उत्साह से मनाया जाता रहा है। 8 फरवरी 2016 के दिन माघी अमावस का अमांत पर्व चीन के देहाती लोगों हांगकांग के चीनियों ताइवान के राष्ट्रवादी चीनियों ने तथा सिंगापुर के मंदारिन भाषियों ने सतसठ वर्ष पश्चात चीन के नये वर्ष का पहला दिन अमांत पर्व या माघी अमावस जिसे इलाहाबादी मौनी अमावस कहते हैं उत्साहपूर्वक मनाया। शी जिनपिंग चीन के वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष ने कहा - हमारा नया साल तो ग्रेग्रेरियन कैलेंडर है याने पहली जनवरी पर देहाती चीन के लोग चीनी नये वर्ष का पहला दिन माघी अमावस के अमांत पर्व में मनायें तो कम्यूनिस्ट चीन उन्हें रोकेगा नहीं। 
          अमरीका में 20 जनवरी 2017 को अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति की ताजपोशी से आठवें दिन इलाहाबादी मौनी अमावस या माघ महीने की अमावस का अमांत पर्व संपन्न होरहा है। प्रतीति यह होती है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने गत वर्ष चीनी नये साल का विरोध नहीं किया। वे समझ चुके हैं कि राष्ट्रवादी चीनियों को ज्यादा जोर लगा कर दबाया नहीं जा सकता। हांगकांग के चीनी लोग कम्यूनिस्ट चीन का प्रभुत्व मानने के लिये उसी तरह तैयार नहीं है जिस तरह ताइवान ने अपनी चीनी राष्ट्रीयता को अक्षुण्ण रखा है। महाशय डोनाल्ड ट्रंप ने ताइवान के राष्ट्राध्यक्ष से फोन वार्ता की तो कम्यूनिस्ट चीन को मार्मिक पीड़ा हुई। चीन की मुख्यभूमि सहित दुनियां में जहां जहां चीनी लोग हैं उनकी पूरी संख्या डेढ़ अरब से कम नहीं है। भाषाओं और बोलियों के तराजू पर नापजोख की जाये तो दुनियां में मंदारिन भाषी पहली पंगत में खड़े हैं। विश्व की नब्ज को सही सही तौर पर नाड़ी वैद्य डोनाल्ड ट्रंप ताइवान को राष्ट्रीय चीन का दर्जा पुनः लौटायेंगे। तिब्बत व हांगकांग को पूरी पूरी आजादी दिला कर चीन के आणविक अहंकार को मर्दन कर चीन एक नहीं तिब्बत मंगोलिया ताइवान तथा हांगकांग सहित चीन की मुख्य भूमि के समानांतर भाषायी सांस्कृतिक तथा नस्ल के तौर क्रमशः मंगोल, तिब्बती, ताइवानी, हांगकांगी तथा क्षीरसागर वाली चीन की मुख्य भूमि सहित पांच क्षेत्र हैं। ज्योंही ट्रंप के प्रशासन द्वारा ताइवान में अपना राजदूत नियुक्त किया जायेगा हांगकांग की स्वतंत्रता को अमरीका स्वीकृत करेगा। मंगोलिया और तिब्बत को उनका सांस्कृतिक वैभव तिब्बत की भारत स्थित लांबसांग के नेतृत्व की  प्रवासी तिब्बती सरकार को डोनाल्ड ट्रंप मान्यता देंगेे। विश्व के ध्यान गुरू परम पावन चौदहवें दलाई लामा से मिल कर तिब्बत को मानवाधिकार का सत्पात्र सिद्ध करने में पहल करेंगे। आज की दुनियां में एक नयी जाग्रति आ सकेेगी। संभव है चीन और पाकिस्तान के पंख कतरने में आणविक अस्त्रों का उपयोग चीन व पाकिस्तान मिल कर लें इससे डरने की जरूरत नहीं है। तिब्बत त्रिविष्टप देवाधिदेव महादेव की कैलास भूमि डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में नये जागरूक विश्व के नये जागरूक राष्ट्रों का उत्कर्ष हो सकेगा। चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग इस कोशिश में हैं कि वे माओ त्से दुंग की भांति आजीवन चीन के शास्ता हो जायें परंतु ताइवान का उत्कर्ष, हांगकांग में स्वातंत्र्य चेतना जिसे शी जिनपिंग दबाना चाहते हैं तथा परम पावन चौदहवें दलाई लामा की ध्यान चेतना एवं तिब्बत केे लोगों का दलाई लामा संस्था पर अटूट आस्था तिब्बत में चीनियों के बसाने और तिब्बत की सांस्कृतिक आस्थामूलक राष्ट्रीय चेतना को मिटाने में चीन पिछले पौंने सात दशकों में सफल नहीं हो पाया है। अमरीकी राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के प्रतिष्ठित होने के पश्चात रूस सहित आधुनिक विश्व के वे सभी देश जिनकी हार्दिक कामनाऐं हैं कि तिब्बत विश्व मानवाधिकार का अर्जन कर सके। चीन भरसक कोशिश में लगा है कि संयुक्त राज्य अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति अपने पूर्वाधिकारी राष्ट्रपतियों की भांति एक चीन का चीनी सिद्धांत स्वीकार कर लें ताकि चीन अपने उत्कर्ष को जारी रख सके। ताइवान के अस्तित्व को चीन स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं है पर ताइवान एक समृद्ध राष्ट्र है उसकी संस्कृति राष्ट्रीयता तथा भाषाई महत्ता है। ताइवान पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की तरह निरीश्वरवादी न होकर ताओवादी कुछ हद तक बुद्धवादी है। अमरीका में भी चीनियों से ज्यादा ताइवानियों के सांस्कृतिक स्तूप ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इस ताइवान, हांगकांग तथा तिब्बत के मामले में अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति को वैश्विक मानवीय दृष्टि अपनानी चाहिये। चीन की आणविक मारक क्षमता पर अवरोध लगने से जहां एक तृतीय विश्वयुद्ध का रास्ता प्रशस्त हो सकता है, राष्ट्रसंघ के निर्जीव होने से पहले चीन के विषैले दांतों को उखाड़ना वैश्विक अनिवार्यता है। इसलिये डोनाल्ड ट्रंप जिन्हें भाषाशास्त्री वाङमय द्रोणाद्रि त्रयम्बकम् यजामहे का जर्मन भारतीय संस्कृत सूत्र के नजदीक पाता है विश्व सुरक्षा के लिये एक चीन नहीं तिब्बत, ताइवान, हांगकांग सहित मंगोलिया को भी जोड़ कर चीन की मुख्यभूमि को पंचायती शांति का अखाड़ा घोषित करना चाहिये। 
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