Tuesday, 10 January 2017

नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्का नवपंचवारम का
अनुसरण तुरन्त क्यों न हो ?
यदि ट्रंप प्रशासन में इंडोलाजी छब्बीस नहीं बावन अल्फाबेट व शब्द लेखन, उच्चारण समता युगधर्म है ?
यदि हां तो नृत्यावसाने नटराजराजो का अनुसरण तुरंत क्यों नहीं हो ?
आने वाले अढ़तालीस या छियानब्बे महीनों में 20 जनवरी 2017 के पश्चात संयुक्त राज्य अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्राध्यक्ष क्या रूख अपनाते हैं ? अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान उनका लक्ष्य अमरीकी श्वेत नस्लवादी मनोभावना को संवर्धित करना था। अमरीकी श्वेत नस्ल वाले लोगों को लगा कि ट्रंप ही उनको श्वेत वैभव फिर मुहैया कर सकते हैं। चीन तथा इस्लामी आतंकवाद ट्रंप के ज्ञानकोश की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। वे यह भी मानते रहे कि श्वेत नस्ल अमरीकी लोगों को रोजगार के क्षेत्र में जो विसंगतियां भुगतने की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है वह अमरीकी कार्यक्षेत्र में श्वेत नस्ल के अलावा जो आव्रजक समाज है रोजगार में श्वेत अमरीकियों को पीछे पछाड़ता जारहा है उसे अमरीका श्वेत नस्ल हित में दुरूस्त करना भी ट्रंप की कामना थी। उनकी प्राथमिकताओं में चीन को रोकना भी एक महत्वपूर्ण बिन्दु रहा है। यद्यपि अमरीकी विश्लेषकों में से अनेक की यह मान्यता है कि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की कूटनीतिक चाल ने ट्रंप को विजय श्री हासिल कराई। वास्तविकता यह थी कि अमरीकी श्वेत नस्ल वाद आत्मपीड़ित महसूस करने की स्थिति तक पहुंच गया था। यद्यपि रिपब्लिकन पार्टी के अधिकांश राजनीति विद और उनके समर्थक ट्रंप के पक्ष में नहीं थे। ट्रंप की अप्रत्याशित परंतु ट्रंप के नजरिये से स्वाभाविक विजय ने दुनियां की दलीय राजनीति को अप्रासंगिक बना डाला। रूस में सोवियत यूनियन के खण्डन के पश्चात लगभग पंद्रह वर्षों के अंतराल में पुतिन के रूप में नया नेतृत्व उभरा। अमरीका सहित सारी दुनियां यह मान रही थी कि अब रूस संभल नहीं पायेगा पर पुतिन ने रूस को उसका प्राचीन वैभव जो भारतीय वाङमय के अनुसार रूस के पूर्ववर्ती स्वरूप ऋषि देश को था कार्लमार्क्स की दास कैपिटल थिअरी का साम्यवादी अथवा पूंजीवाद विरोधी चिंतन पोखर जिसके सहारे लेनिन ने रूस में क्रांति संपन्न की जो 1917 में हुई उसकी जिन्दगी पिचहत्तर वर्ष भी पूरे नहीं कर पाई। 1991 में सोवियत यूनियन बिखर गया। अमरीकी चिंतन पोखर मानने लगा कि शीतयुद्ध समाप्त हुआ दुनियां की चौधराहट अमरीकी जागीर होगई। अगर यह मान लिया जाये कि पुतिन की आन्वीक्षिकी राजनीति ने अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप को विजय श्री हासिल कराई, एक नया यक्ष प्रश्न उदय होगया कि क्या दुनियां का कोई दूरस्थ मुल्क किसी दूसरे मुल्क की राजनीतिक नब्ज का संचालन कर सकता है ? पुतिन के तौर तरीकों पर स्वयं डोनाल्ड ट्रंप क्या सोचते हैं यह तो डोनाल्ड ट्रंप के शासन काल में धीरे धीरे पता चलेगा। मार्टिन लूथर किंग महात्मा गांधी की अहिंसक राजनीतिक चिंतन पोखर के पक्षधर रहे। उन्हें आशा थी कि अमरीका एक न एक दिन अश्वेत राष्ट्रपति चुनेगा। 2008 में संपन्न भी हुआ। चौवालीसवें अमरीकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पहले अश्वेत हैं जिन्हें संयुक्त राज्य अमरीका का शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्ष आठ साल छियानबे महीने दो हजार नौ सौ बाईस अहोरात्र ह्वाइट हाउस वाशिंगटन का अधिपति रहने का अवसर मिला। उन्होंने अपने शासन काल के छियानबे महीने में रूस के साथ कूटनीतिक संबंधों में स्तब्धकारी निर्णय लेकर अमरीकी राष्ट्रपति के विशेषाधिकार का प्रदर्शन किया। रूस के 96 व्यक्ति निर्वासित कूटनीतिज्ञों सहित अपने परिवारों सहित स्वदेश लौटे। ट्रंप महाशय ने पुतिन महाशय द्वारा शठे शाठ्यम् समाचरेत की हिन्दुस्तानी लोकोक्ति का अनुसरण नहीं किया इस हेतु पुतिन महाशय की प्रशंसा की उन्हें उदात्त राजनीतिज्ञ श्रेणी में प्रतिष्ठित किया। यद्यपि पुतिन महाशय भी कम्यूनिस्ट चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर राजनीतिक यकीन नहीं करते पर उन्होंने पाकिस्तान व चीन संबंधी चाइना-पाकिस्तान इकानामिक गलियारा इकहरा अथवा दुहरा का समर्थन कर हिन्द की आतंकवाद विरोधी मुहिम को धक्का लगा है पर प्रतीति यह होती है कि अब की 27 जनवरी 2017 को मौनी अमावस या माघी अमावस्या के दिन अगर ताइवान सिंगापुर हांगकांग ने चीन का राष्ट्रीय पर्व गत वर्ष 8 फरवरी 2016 की भांति उत्साहपूर्वक मनाया गया और हिन्द ने भी इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व को चीन का राष्ट्रीय कैलेंडर का पहला दिन मानने की नीति का खुला समर्थन कर दुनियां की राजनीति को ट्रंप के जरिये नई दिशा देने में मदद की तो दुनियां का राजनीति चोला बदल सकता है। 
राजनीति या सियासत को सही सही समझना हो तो क्षीरसागर मंथन (क्षीरसागर चीन के पूर्ववर्ती भाग में था) से जो स्थितियां बनीं कश्यप अदिति के पुत्र आदित्यों और दिति एवं दनु की संतान दैत्य दानवों में जो राजनीतिक संघर्ष था जो सौतिया डाह था उसे समुद्र मंथन के कर्ता महाविष्णु ने दैत्यों दानवों को अमृत पीने को न मिले इसका पूरा प्रबंध किया। आदित्य अमृतपान से अमर होगये दैत्य दानव पिछड़ गये। उन्हें पछाड़ने में महाविष्णु की भूमिका थी। अमृत की बूँदें देव दैत्य विग्रह छीना झपटी में इलाहाबाद हरिद्वार उज्जैन व नासिक में गिरीं। पहला स्थान त्रिवेणी संगम था। चीन का नववर्ष त्रिवेणी में अमृत बूंदें गिरने से जुड़ा हुआ मसला है। माओ के नेतृत्व वाली पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने चीन के नये साल यानी इलाहाबादी मौनी अमावस पर अमांत पर्व मनाने से 1949 में मनाही कर दी पर 8 फरवरी 2016 को चीन के वर्तमान राष्ट्रपति ने चीन के लोगों को चीनी कैलेंडर का पहला दिन 8 फरवरी 2016 के दिन मनाने दिया। केवल इतना ही कहा लोग अमांत पर्व मनाये जाने पर चीन का सरकारी कैलेंडर 15 अक्टूबर 1582 के दिन ग्रेग्रेरियन कैलेंडर तथा वेटिकन के परम पावन पोप ने तय किया है। चीन रूस का अनुसरण करते हुए अपना राष्ट्रीय कैलेंडर मनाने के बजाय ग्रेग्रेरियन कैलेंडर द्वारा स्वीकृत कैलेंडर चीन का कैलेंडर मानेगा। अगर चीनी राष्ट्रवाद नया मोड़ लेकर चीन से साम्यवादी चिंतन उसी तरह लुप्त हो जाये जिस तरह सोवियत रूस में लुप्त हुआ अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्राध्यक्ष जनाब डोनाल्ड ट्रंप का वैश्विक भाग्योदय का पर्व होगा। 
अमरीकी पैंतालीसवें राष्ट्रपति जर्मन मूल के अमरीकी हैं। यूरप के श्वेत देशों के साथ उनके आत्मिक संबंध हैं। इधर जर्मनी भी इस्लामिक जिहादियों के निशाने पर है यदि पुतिन और तुर्किस्तान के लोग सीरियाई आतंकवादियों के लिये सहानुभूति भी रखें तब भी महाशय डोनाल्ड ट्रंप की मुस्लिम नीति अवधारणा में अचंभा पैदा करने वाला फर्क नहीं आने वाला है। सत्ताधिष्ठान पैंटागन में आरूढ़ होने के पश्चात महाशय डोनाल्ड ट्रंप को अमरीकी परंपराओं को भी देखना होगा। यदि डोनाल्ड ट्रंप महाशय ने अश्वेत मुख्य तथा अफरीकी नीग्रो समाज जो अब अमरीकी राष्ट्रवाद का पुरोधा ख्रिस्ती धर्मावलंबन के सहारे है संभवतः ट्रंप महाशय दास प्रथा समाप्ति के उपलब्ध लक्ष्य को पूरा पूरा बदल न पायें। संयुक्त राज्य अमरीका में दासता मुक्त समाज सहित दास रखने वाली मानसिकता के जो श्वेत नस्लवादी लोग हैं संभव है यदि ट्रंप झुके नहीं तो अमरीकी राष्ट्र के दासता समर्थक तथा अश्वेत ख्रिस्तियों से परहेज करने वाले नस्लवादी श्वेत समाज ट्रंप के समक्ष ऐसी स्थितियां पैदा कर दे। सोवियत यूनियन में रूस अकेला रहा पर अमरीका और अपने आपको एक चीन मानने वाले निरीश्वरवादी चीनी शास्ता संकुल से हांगकांग खिसक सकता है तथा हिन्दुस्तान सहित तिब्बत की स्वतंत्रता के पक्ष पर यूरोपीय देशों की सरकारों ने परम पावन चौदहवें दलाई लामा व उनके आशीर्वाद से धर्मशाला - भारत में चल रही तिब्बती सरकार जिसके मौजूदा नेता लांबसांग हैं उन्हें प्रवासी सरकार की मान्यता भारत के साथ साथ यूरप के कुछ देशों व अमरीका ने दे दी और तिब्बत की बौद्ध सांस्कृतिकता एक स्वतंत्र देश के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के अमरीकी राष्ट्रपतित्व काल में प्रतिष्ठित हो सकी तो यह दुनियां के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना होगी। यह संभव है कि पाकिस्तान और चीन की मौजूदा मिलीभगत को संकुचित किया जा सका चीन यह महसूस करने को बाध्य हो जाये कि पाकिस्तान का साथ देने केे कारण उसे नई दिक्कतें आ सकती हैं। उसका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार क्षेत्र में अमरीका और भारत अवरोध खडे़ कर सकते हैं तथा भारत में जो नेतृत्व 2014 के लोकसभा चुनाव के पश्चात उभार में आया है वह भारतीय राष्ट्रवाद के लिये समर्पित वैष्णव मतावलंबी व्यक्तित्त्व है। फ्रेंच भविष्यवक्ता नास्टर्डम ने हिन्दुस्तान में उपजे तीन ऐसे व्यक्तित्त्वों का उल्लेख किया जिन्होंने विवाह तो किया पर वे गृहस्थ नहीं रहे। उन तीनों व्यक्तित्त्वों में ईसा सदी द्वि सहस्त्राब्दी बीत जाने पर जो व्यक्तित्त्व प्रधान नेतृत्व भारत में उजागर हुआ वह नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का है। विश्व राजनीति में ख्रिस्ती मजहब मानने वालों और इस्लाम मजहब मानने वाले लोग क्रमशः अढ़ाई अरब और एक अरब साठ करोड़ लोग हैं। हिजरा के पंद्रहवीं शती (हिजरा वर्ष मात्र चांद्रमासीय उन्तीस दिन वाले महीने के कारण चांद्रवर्ष के रूप में 355 दिन वाला होता है) ग्रेग्रेरियन कैलेंडर अथवा हिन्द के साठ संवत्सर वाले कैलेंडर में जिसे सौरमास कहते हैं तीन साल लगा कर (365 दिन तथा चौथे साल 29 दिन वाली फरवरी के कारण ग्रेग्रेरियन कैलेंडर उसे लीप इयर कहते हैं भारतीय कैलेंडर में जैसे भादों सरीखे महीने 32 दिन के पौष व अगहन 29 दिन के भी होते हैं। सूर्य के बारहों राशियों में संक्रमण करने वाले दिन को संक्रांति कहा जाता है। भारतीय सौरमास में पहली संक्रांति मेष संक्रांति जिसे पंजाब में वैशाखी कहते हैं वह है महीने का नाम वैशाख, दूसरी संक्रांति वृष, तीसरी मिथुन चौथी कर्क पांचवीं सिंह छटी कन्या सातवीं तुला (मेष संक्रांति की तरह तुला संक्रांति को भी दिन रात बराबर होते हैं) आठवीं वृश्चिक नवीं धनु दसवीं मकर ग्यारहवीं कुंभ व बारहवीं संक्रांति मीन संक्रांति के नाम से जानी जाती है। महाशय ट्रंप मजहबी नजरिये से संयुक्त राज्य अमरीका के बावन प्रतिशत प्रोटेस्टेंटों में से हैं। वहां रोमन कैथोलिक 24 प्रतिशत हैं। दोनों मिला कर यूएसए मजहबी नजरिये से ख्रिस्ती राष्ट्र हैं।
विलायत के उपनिवेश ज्यादा मात्रा में होने विलायती राजकुल की सत्ता को अमरीकी उपनिवेश समूह ने 1776 में स्थान दिया। संयुक्त राज्य अमरीका में बर्तानी राजकुल का जुआ अपने कंधे से उतार देने के पश्चात पिछले 240 वर्षों में संयुक्त राज्य अमरीका की प्रभुताई चौंवालीस राष्ट्रपतियों ने संपन्न की। संयुक्त राज्य अमरीका के प्रथम अश्वेत अफरीकी अमरीकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने श्वेत नस्लवाद से पीड़ित अमरीकी समाज को चौंवालीसवें राष्ट्रपति के रूप में अमरीकी मतदाताओं ने चुना। समूची दुनियां में यह संदेश गया कि अमरीका अश्वेत समाज के प्रति सहानुभूति के समानांतर समता दृष्टि भी रखता है परंतु नवंबर 2016 में अमरीकी मतदाताओं ने महाशय डोनाल्ड ट्रंप को पैंतालीसवें राष्ट्रपति चुन कर श्वेत नस्लवाद की पताका फहरा दी। नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राय में संयुक्त राष्ट्र संघ एक बहस मुबाहसा क्लब सरीखा आयाम है। कम्यूनिस्ट चीन जिस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ के आतंकी अजहर को आतंक का हेतु मानने के प्रस्ताव पर दो बार अपना वीटो प्रयोग कर चुका है। 26 नवंबर 2008 को मुंबई में जो भयावह नरसंहार हुआ उसका मूल कर्ता अजहर ही था। चीन पाकिस्तान को भी आतंकवादी राष्ट्र मानने के लिये तैयार नहीं है इसलिये यदि तीसरे विश्वयुद्ध की ज्वाला पाकिस्तान सरकार द्वारा आतंक की सरपरस्ती के कारण तीसरे विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो सकती है। नस्लीय शत्रुता राष्ट्र राज्यों का आपस में मनमुटाव कोई नई बात नहीं है। सृष्टि का यह अनिवार्य पहलू है कि व्यक्तियों व व्यक्ति समूहों में मित्रता, बन्धुभाव, प्रतिस्पर्धा ईर्षा द्वेष अनुराग विराग तथा एक दूसरे को पूर्णतया नष्ट करने की प्रवृत्ति निरंतर चलने वाली प्रवृत्तियां और निवृत्तियां हैं। ट्रंप महाशय ने दो टूक शब्दों में राष्ट्र संघ या युनाइटेड नेशन्स के अस्तित्व पर जो यक्ष प्रश्न खड़ा किया है उससे प्रतीत होता है कि संयुक्त राष्ट्र अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति महाशय डोनाल्ड ट्रंप संयुक्त राष्ट्र संघ को अमरीकी भूमि से निष्कासित भी कर सकते हैं। जिस दिन ट्रंप महाशय ताइवान जो अपने आपको राष्ट्रवादी चीन तथा सांस्कृतिक धरोहर वाला राष्ट्र मानता है यदि ट्रंप ने ताइवान को मान्यता देते हुए ताइवान से दौत्य संबंध कायम कर लिये वह घड़ी एक चीन नहीं दो तीन या चार चीन (तिब्बत के स्वतंत्र अस्तित्व सहित) उभर कर सतह में आ जायेंगे। वह मुहूर्त अपने वीटो शक्ति का प्रयोग करने वाले कम्यूनिस्ट तथा विस्तारवादी चीन के लिये कठिन समय की शुरूआत होगा वही घटना राष्ट्र संघ को अस्तित्व छीन भी सकती है। यद्यपि बाहरी तौर पर देखने से लगता है रूस के राष्ट्रपति पुतिन महाशय चीन-पाक इकानामिक कारीडोर को दरअसल में चीन की हिन्द महासागर फतह करने की चाल है उसका समर्थक प्रतीत होता है परंतु रूस अब कम्यूनिस्ट आइडियालाजी वाला मार्क्स के सिद्धांतों का अनुसरण करने के बजाय रूसी ख्रिस्ती विशेषता का प्रतीक होगया है। सोवियत यूनियन की टूट के पच्चीस वर्ष पश्चात रूस ने वह शक्ति संपात पुनः अर्जित कर लिया है जिससे अमरीकी पूंजीवाद संत्रस्त रहता था। पुतिन का ट्रंप समर्थन दुनियां के लिये एक नई घटना है। पेंटागन की तरह ही मस्कवा का क्रेमलिन भी चीन के तौर तरीकों को संदिग्ध दृष्टि से देखता है। चीन वस्तुतः हिन्द की अमृत उत्पादन की क्षीरसागर मंथन महाविष्णु की महापरियोजना का परिणाम है जो राष्ट्रीयता के नाम पर इलाहाबादी मौनी अमावस के अमांत पर्व को अपने कैलेंडर वर्ष का पहला दिन मानता है। ताइवान को जिस दिन ट्रंप दौत्य संबंध जोड़ कर मंदारिन वाङमय के महत्व को स्वीकृति दे देगा कम्यूनिस्ट चीन हताशा में लिप्त हो जाने वाला है। 
ट्रंप महाशय कम्प्यूटर के संबंध में भी अपने पृथक विचार रखते हैं। अमरीकी कम्प्यूटर विशेषज्ञ रोमन लिपि के 26 अल्फाबेटों के जरिये तकनीकी क्रांति लाना चाह रहे हैं पर छब्बीस रोमन अल्फाबेट सभी ध्वनि के उच्चारण व लेखन में एकरूपता नहीं ला पारहे हैं यही कम्प्यूटर तकनालाजी की रोमन अल्फाबेट की अक्षमता की प्रतीक है। अमरीका का पचासवां घटक हवाई द्वीप समूह की हवाई भाषा में बारह अल्फाबेट हैं। लैटिन अल्फाबेट संख्या चौबीस रोमन छब्बीस फारसी अठाईस तथा अरबी 32 अल्फाबेट है। हिन्दुस्तान की पंजाबी गुजराती कन्नड़ मलयाली तमिल तेलुगु उड़िया बंगला असमी मइती-मणिपुरी तथा नागरी इन ग्यारह लिपियों में अल्फाबेट संख्या 52 है जो उच्चारण और लेखन में एक सरीखी है। कम्प्यूटर के सटीक उपयोग के लिये संस्कृत भाषा ही सबसे ज्यादा अनुकूल है। चूंकि भारत में ही संस्कृत नागरी और भारत के चालीस करोड़ लोगों की जनभाषा हिन्दी का अन्य भाषायी समूह विरोध करते हैं इसलिये दुनियां की भाषायी पंगत में चौथा स्थान पाने वाली हिन्दी की बात हम नहीं करते। अमरीका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति जनाब डोनाल्ड ट्रंप से नम्र अपील है कि वे अमरीकी अंतरिक्ष विज्ञान संगठन नासा का ध्यानाकर्षण करते हुए एक अरब पिचानबे करोड़ वर्ष पहले जब महातांडव नृत्य हुआ देवाधिदेव महादेव के डमरू ने नौ और पांच बार ध्वनियां कीं उन चौदह ध्वनियों का विश्लेषण ध्वन्यालोक नायक ग्रंथ में हुआ है। ध्वन्यालोक ग्रंथ अब उपलब्ध ही नहीं है उसका मूल सिद्धांत जिसे बीज मंत्र कहा जा सकता है ‘भिन्न प्रकृति हि लोके’ भारतीय वाङमय में प्रयुक्त होता है। नासा में अनेक भारतीय वैज्ञानिक भी कार्यरत हैं जिन्हें संस्कृत भाषा सहित वैदिक संस्कृत और वैदिक मैथमैटिक्स की भी जानकारी है इसलिये ध्वन्यालोक का संवाद कृष्णार्जुन गीता संवाद की तरह अंतरिक्ष में ‘शब्दः खे पौरूषम् नृषु’ सिद्धांतानुसार उपलब्ध है। यदि ट्रंप महाशय कम्प्यूटर को दुरूपयोग से बचाने के उपायों में अंतरिक्ष स्थित ध्वन्यालोक व भगवद्गीता संवाद जो श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच पांच हजार एक सौ वर्ष पहले कुरूक्षेत्र के मैदान में संपन्न हुआ था वह हिन्दू क्लासिक नहीं मानव धर्म का प्रतीक है। उसे नासा अभिव्यक्ति देकर महाशय ट्रंप के नेतृत्व में नया जीवन नये संसार को दे सकता है। ट्रंप आधुनिक विश्व के लिये पुतिन और नरेन्द्र मोदी के विचार पोखर के समानांतर नये संसार का उद्गान करा सकते हैं। कम्प्यूटर आज लोगों की निजता या प्राइवेसी पर आक्रामक रूख अपनाये हुए है आप कम्प्यूटर प्रयोग के तरीकों में बावन अल्फाबेट वाला भारतीय उच्चारण अपनाया गया तथा रोमन लिपि की छब्बीस अल्फाबेट के संस्कृत वेद निघंटु के अलावा पाणिनी के व्याकरण के अनुकूल विसर्ग अनुस्वार रेफ एवं उच्चारणीय विधाओं का प्रयोग रोमन लिपि में किया गया तो हिन्दुस्तान की ग्यारह लिपियों के समानांतर रोमन लिपि भी उच्चारण लेखन सामंजस्य का स्त्रोत बन सकती है। पहल ट्रंप महाशय के हाथ में है। यही आधुनिक विश्व का युगधर्म है जो वाराह कल्पांत के पश्चात भी धरती के अस्तित्व की गाथा का गीत गा सकता है।
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