क्या जनाब सलमान नसीम सोज़ भारत के
प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को डुबा पायेंगे ?
या अपने नेता राहुल गांधी के साथ खुद डूब जायेंगे ?
प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को डुबा पायेंगे ?
या अपने नेता राहुल गांधी के साथ खुद डूब जायेंगे ?
देखते रहिये ग्यारह मार्च 2017 को नजारा सामने आ जायेगा।
कांग्रेस का जमीनी हालात से साबका पड़ने ही वाला है।
अपने निजी भूतकाल में विश्व बैंक से जुड़े जनाब सलमान अनीस सोज ने टाइम्स आफ इंडिया के सोमवार फरवरी 6 सन 2017 के संपादकीय स्तंभ में डवकप Modi and the Suncost Fallcy शीर्षक में अपनी राय को तेज धार देने की कोशिश करते हुए - Demonetisation is too big to fail, even if the evidence is it has indeed failed The P.M. packages and markets his ideas brilliantly but in the absence of deeper thinking proper planning and efficient execution, these ideas can impose a heavy cost on ordinary people.। अखबार ने चुस्ती दिखा कर जनाब सलमान अनीस सोज के कथन की उनका निजी विचार घोषित कर जहां यह सफाई दी कि विश्व बैंक के पुराने कारिन्दे जनाब सलमान अनीस सोज कांग्रेस के प्रवक्ता हैं उन्हें विचार स्वातंत्र्य का संवैधानिक अधिकार एक नागरिक की हैसियत से उपलब्ध है। विमुद्रीकरण भारत सरकार ने किया, जनाब सलमान उसे बी.जे.पी. कृत्य मानते हैं। उन्हें अपनी सोच शैली को पंद्रह सूत्रों में पिरोया है। जिस अखिल भारतीय राजनीतिक दल इंडियन नेशनल कांग्रेस के वे प्रवक्ता हैं उसे विमुद्रीकरण रत्ती भर भी पसंद नहीं है। कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी कांग्रेसाध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की अस्वस्थता के कारण कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं। यद्यपि हिन्दुस्तानी नजरिया किसी भी व्यक्ति को जब वह जीवन का चालीसवां बसंत देख लेता है प्रौढ़ कहा जाता है युवा नहीं पर सैफई राजकुमार अखिलेश यादव तथा राहुल गांधी को उनके राजनीतिक सुप्रीमो नौजवान ही मानते हैं। दोनों नौजवान मिल कर उ.प्र. में घोषित विधानसभा चुनावों में अग्रणी रहने के लिये रात दिन मेहनत कर रहे हैं। यह हो सकता है कि राहुल गांधी महाशय को खुश करने के लिये प्रवक्ता सलमान Sunk cost fallacy का गाना गारहे हों। जनाब सलमान अनीस सोज की मादरे जबान तो अंग्रेजी नहीं है। उन्होंने संक कास्ट फालसी लिखने से पहले अपनी मादरे जबान में सोचा होगा। उनकी राय में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किया गया विमुद्रीकरण या नोटबंदी का काम हाथ आई चीज को गंवाने का ‘आप डूबे बामना ले डूबे जजमान’ कहावत को चरितार्थ कर रहा है। जनाब सलमान अनीस सोज साहब फरमाते हैं कि विमुद्रीकरण डूब गया है इसका प्रमाण वे देख चुके हैं। जब कोई व्यक्ति इतनी उग्रता से किसी सरकारी फैसले का नख शिख विरोध करता है उसके पीछे छिपी हुई रणनीति राजनीतिक या सियासी उद्देश्य लिये हुए रहती है। अनर्जित धन जिसे सरकारी भाषा अथवा राजनीतिक भाषा ब्लैक मनी कहती है तथा अनर्जित धन से बढ़ने वाले कदाचार जिसे लोग भ्रष्टाचार या करप्शन कहते हैं वह हिन्दुस्तान की आजादी के पिछले सत्तर सालों में निरंतर बढ़ता गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने अनर्जित धन (वह धन जिसके लिये अर्जनकर्ता ने राजकर नहीं अदा किया है) अपने साथ अन्य सामाजिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक खामियां पैदा करता है। आज आसेतु हिमाचल सरकारी अमला बिना दानदक्षिणा अथवा शराब की बोतल लिये जनसामान्य की समस्या सुनने के लिये तैयार ही नहीं है। सरकारी कर्मचारी अनुशासित नहीं रह गया वह राजनीतिक सुप्रीमो क्षत्रपों का खेमा पकड़ कर अपना भविष्य सुधारने में लगा है। सेवानिवृत्त सरकारी अफसर कर्मचारी जातिवादी खेमों में रम गये हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन सिस्टम फेल हो चुका है। उसे बदले बिना नया सिस्टम शुरू किये बिना हिन्द की प्रशासनिक व राजनीतिक सियासी गाड़ी पटरी पर लाना एकदम कठिन कार्य है। यह अच्छा है कि सलमान अनीस सोज सरीखा कांग्रेस प्रवक्ता यह तो स्वीकार कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री के शब्दों में जादुई प्रभाव करने वाली शब्द शक्ति है उनके विचार बड़ी विवेकशीलता से प्रस्तुत होते रहते हैं। जिन विसंगतियों को वे जिक्र कर रहे हैं उन्हें तो उसी दल ने बढ़ावा दिया है जिसकी पैरवी जनाब सलमान कर रहे हैं। जनाब सलमान अनीस सोज ने यह स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी अहर्निश अपने राष्ट्र हितैषी उपक्रम में संलग्न व्यक्तित्त्व हैं पर उन्होंने जो शीर्षक अपने स्तंभ के लिये चुना उसका एक ही उद्देश्य है कांग्रसी हाईकमान के नये सर्वेसर्वा राहुल गांधी को खुश करने वाली बातें करना उनके पंद्रहों तर्कों में वह स्थिति है जो किसी टूटी रीढ़ वाले व्यक्ति में होती है। जनाब सलमान अनीस सोज महाशय अपने अंतर्मन में यह मान रहे हैं कि विमुद्रीकरण ने कई तह खोली हैं पर जिस राजनीतिक पोखर का वह प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वह डूबता हुआ पानी का जहाज सरीखा फिल्मी चिंतन को प्रस्तुत कर रहा है। जब कोई आदमी स्वयं डुबंत के घेरे में होता है वह सारी दुनियां को डूबा हुआ समझने लगता है। जनाब सलमान पंद्रह सीरियल वाले टी.वी. सिरीज का उल्लेख कर रहे हैं कहना चाह रहे हैं कि ग्यारह मार्च 2017 के दिन जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आयेंगे विमुद्रीकरण के प्रभाव के उनकी व उनके दल के नेताओं की दृष्टि में झलक रहा है कि विमुद्रीकरण में असफल होजाने से नरेन्द्र मोदी के साहसिक नेतृत्व के उन हालातों को भुगतना पड़ेगा। चूहा शेर होगया पर उसे फिर चूहा बनने की शंकायें सताने लग गयी। उन्हें व उनके दल के हाईकमान को यह पता ही नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का अगला कदम क्या होगा ? जो राजनीतिक रणनीति के क्षत्रप अथवा सुप्रीमो विमुद्रीकरण का नखशिख विरोध कर रहे हैं उनके भी आपस में गहरी दरारें हैं। वे कल्पना कर रहे हैं अगर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश यादव और राहुल गांधी का साथ दे दिया तो उ.प्र. में भारतीय जनता पार्टी का नाम लेवा पानी देवा शायद ही कोई रहे। जनाब सलमान नसीम सोज यह भूल रहे हैं कि सन 2004 से 2014 तक दस वर्ष जिस राजनीतिक दल के वे प्रवक्ता हैं उसने राज्यसभा सांसद के नेतृत्व में प्रतिनिधि सरकार चलाई नेतृत्व और हुक्म तो था कांग्रेसाध्यक्ष और लोकसभा सदस्या श्रीमती सोनिया गांधी का उन्हें स्वयं प्रधानमंत्री बनने की हिम्मत नहीं जगी। अगर वे त्यागी व त्यागमूर्ति थीं चाहती होतीं उनका इकलौता बेटा हिन्द का प्रधानमंत्री बने पर 2004 व 2009 में दोनों बार वे अपना लक्ष्य भूल गईं और हिन्द पर अपने प्रतिनिधि डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व के जरिये शासन करती रहीं। जहां उनके लाडले बेटे राहुल गांधी और अखिलेश यादव साझा रैली कर रहे हैं उ.प्र. में मायावती व मुलायम सिंह के राज में विधानसभा सदस्य के नेतृत्व में सरकार नहीं चलाई उच्च सदन के सदस्य यू.पी. में भी वही करते रहे जो दिल्ली में होरहा था। इसलिये उ.प्र. का जागरूक मतदाता यह सोचने को बाध्य होरहा है कि जो कांग्रेस इक्कीस साल यूपी बेहाल का नारा बुलंद कर रही थी उसमें नये नेता राहुल गांधी उ.प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मिल कर रैलियां कर रहे हैं। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद सोच रहे हैं अगर बहन मायावती भी उनके साथ आयी तो कांग्रेस के पौ बारह होने वाले हैं पर उ.प्र. की जमीनी राजनीतिक हालात इससे बिल्कुल उलट लगते हैं। विश्लेषक कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम का कहना है कि सन 2003 से उ.प्र. में जंगलराज, गुुंडाराज तथा अपराधों की दिन दूनी राज चौगुनी बढ़त हुई है। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती जिन्हें अखिलेश यादव बुआ का सम्मान देते हैं, मुलायम सिंह का राज हो अथवा उनके पुत्र अखिलेश यादव राज हो अथवा बसपा सुप्रीमो मायावती बहन का राज हो उ.प्र. 2003 से लगातार जंगलराज, गुंडाराज, माफिया राज से पीड़ित क्षेत्र है। उ.प्र. का मतदाता यह भलीभांति जानता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लक्ष्य सबका साथ सबका विकास का गुरूमंत्र होने के अलावा उन पर गुजरात तथा दिल्ली के तख्त पर आसीन हुए पिछले सोलह वर्षों में एक भी आरोप नहीं है इसलिये जो लोग यह कल्पना कर रहे हैं कि डिमोनेटाइजेशन से उन्हें राजनीतिक अथवा चुनावी फायदा होगा वे एक कल्पना लोक में विचरण कर रहे हैं। जिसका खुलासा सलमान नसीम सोज ने अपने स्तंभ में अपने दल के नेताओं को खुश करने के लिये एक नई तकनीक विश्व बैंक की रेटिंग वाली पद्धति से निकाली है। उ.प्र. की जो मौजूदा चुनावी सियासत की तस्वीर सामने आई है उसके अनुसार प्रदेश की सत्तारूढ़ बहुमत वाली समाजवादी सरकार जिसके मुख्यमंत्री नेताजी के यशस्वी पुत्र अखिलेश यादव विधान परिषद की सदस्यता के जरिये कर रहे हैं अगर नेताजी पुत्र मोह में न फंसते अपने अनुज 60 वर्षीय शिवपाल यादव जो विधानसभा सदस्य उसी निर्वाचन क्षेत्र से थे जिसने नेताजी को पहली बार 1967 में विधायक चुना था। यह चूक जिसे राजनीतिक चक्रव्यूह की संज्ञा दी जा सकती है उसने नेताजी मुलायम सिंह यादव के सामने वह स्थिति उत्पन्न कर दी जिसका गुणगान महाशय लालू प्रसाद यादव किया करते हैं। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने यादवी संघर्ष के बारे में भागवत में लिखा -
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स्पर्धा क्रोधः क्षयं निन्दे वैणकेग्निंर्यथा वनम् एवं सर्वेषु नष्टेषु कुलेषु स्वेषु केशवः
अवतारितो भुवि भारः इति मेने विशेषतः।
पश्चिमी भारत व दक्षिणी भारत में इसे यादवी संघर्ष कहा जाता है। महाशय लालू प्रसाद यादव जो बिहार के एकछत्र गोप, अहीर, भगत मंडल तथा यादव नेता हैं छाती फुला कर यादवी संघर्ष की गाथा गाते हुए ऊँचे स्वर से कहते हैं कि यह सब होते हुए भी बिहार के यादव व इस्लाम धर्मावलंबी समाज के वे चहेते हैं। वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व ने यदि पी.वी. नरसिंह राव की अल्पमत सरकार के साथ दलीय स्तर पर सौतेला व्यवहार नहीं किया होता कुंवर अर्जुन सिंह एवं उ.प्र. के ब्राह्मण कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी जिन्हें दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी महाशय ने 1991 के संसदीय निर्वाचन में नैनीताल से कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार बनाया पर तिवारी जी भाजपा नेत्री इला पंत से चुनाव हार गये। अगर तिवारी जी ने चुनाव न लड़ा होता तो संभव था इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चमकीले युवा नेता रहे तिवारी जी प्रधानमंत्री के सशक्त दावेदार हो सकते थे पर राजीव गांधी को डर था कि एक बार तिवारी जी सत्ता में आगये उन्हें हटाना मुश्किल होगा। यही मूल बिन्दु था जिसने पी.वी. नरसिंह राव को नेतृत्व करने का मौका दिया। जहां तक राजनीतिक परिपक्वता का प्रश्न है पी वी नरसिंह राव राजनीतिक तथा आर्थिक चतुराई के समझने वाले नेतृत्व को उन्हीं के डाक्टर मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बना कर आर्थिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया। उनके वैयक्तिक ताल्लुकात विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी से भी अत्यंत मधुर थे। उन्होंने अपने शासनकाल में रामकोट केे विवादास्पद निर्माण जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था उसके तोड़े जाने के प्रसंग का सामना किया। अल्पमत वाली सरकार को अपनी राजनीतिक सूझबूझ से गिरने से बचाया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की त्रासद हत्या के बाद श्रीमती सोनिया गांधी की पकड़ कांग्रेस दल में मजबूत करने के उपाय होते रहे। अंततोगत्वा सीताराम केसरी से कांग्रेस सत्ता को हथिया कर सोनिया गांधी कांग्रेस नेतृत्व की सर्वेसर्वा होगईं। उन्होंने अपनी राजनीतिक योग्यता से राजग की सरकार 2004 में अपदस्थ कर कांग्रेस नेतृत्व वाली यू.पी.ए. का गठन किया पर कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा लड़खड़ा चुका था। आज इंडियन नेशनल कांग्रेस जो दिसंबर 1885 में स्थापित हुई जिसने हिन्द की आजादी के संघर्ष में कई उठापटक देखी, कांग्रेस एक व्यक्ति अथवा परिवार की राजखानदानी नुमा राजवंश कभी नहीं रही। यहां तक कि इंदिरा गांधी को देश के ज्यादा कांग्रेसजनों का समर्थन था उन्होंने कांग्रेस को तोड़मोड़ कर निर्जीव कर डाला पर अपनी सत्ता 1966 से 1977 तक लगातार बनाये रखी। तीन वर्ष पश्चात वे फिर सत्तारूढ़ होगयीं इसलिये चुनावी सियासत का सुदर्शन चक्र किसे आगे बढ़ायेगा किसके पैरों की जमीन खोखली कर देगा यह तो चुनाव के नतीजों के सामने आने पर ही पता चलेगा पर जैसा नजारा है बहन मायावती बसपा सुप्रीमो का जाटव दलित मत तथा उनके द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को जो अहमियत दी जारही है मतदाताओं का रूख यदि जातीय व धार्मिक प्रभाव में आगया राहुल गांधी अखिलेश यादव समझौता के बावजूद कांग्रेस व समाजवादी दृष्टि के मतदाता मतों को एक दूसरे को देने के बजाय अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग अलापेंगे ऐसी स्थिति में यदि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का गुरूमंत्र सबका साथ सबका विकास हिन्दुत्ववादी भाजपा नेताओं के अंतर्मन में पैठ नहीं कर पाया तो त्रिशंकु असेंबली भी हो सकती है। अखिलेश यादव मायावती अपना अपना प्रभुत्व चाहेंगे। बीजेपी को पूर्ण बहुमत या त्रिशंकु असेंबली होने से राष्ट्रपति शासन दोनों स्थितियां प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के लिये अनुकूल हैं। शेष चार राज्यों में पंजाब में क्या स्थिति होती है ? क्या आआपा और कांग्रेस मिल कर सरकार बना सकते हैं ? या कांग्रेस को अगर आआपा से ज्यादा सीटें मिलीं क्या अकाली दल व भाजपा अपने न्यूनतम सदस्यों को कांग्रेस को सरकार बनाने के लिये समर्थन दे सकते हैं ? अगर आआपा को पूर्ण बहुमत मिलता है क्या पंजाब में फिर वही हालात हो सकते हैं जिसकी शंका के.पी.एस. गिल ने व्यक्त की है ? महाशय अरविन्द केजरीवाल के बयानों से लगता है उन्हें डर सता रहा है कि कहीं उनकी दलीय मान्यता पर आंच न आ जाये ? वे निर्वाचन आयोग को भी कोस रहे हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का विरोध उनका स्वधर्म है इसलिये जो भी नतीजा विधानसभाओं के चुनाव से सामने आवे हिन्द को उसका सामना करना ही होगा। इस सारे प्रकरण में एक बात बहुत मुफीद लगती है कि पश्चिम बंग की स्वयंभू राजनेत्री ममता बनर्जी अपने आपको कालजयी राजनीतिज्ञ मानने वाले महाशय अरविन्द केजरीवाल स्वयं को राजनीति और दलित हित की प्रतिमूर्ति साबित करने वाली बहन मायावती तथा अनुभवहीन राजनीतिक नेता कांग्रेस हाईकमान के प्रतीक राहुल गांधी की स्थिति कहां रहती है ? अपने पिता नेताजी मुलायम सिंह यादव को राजनीति की नयी बारहखड़ी समझा कर दूध की मक्खी की तरह यादव राजनीति से निष्कासित करने वाले अखिलेश यादव ग्यारह मार्च 2017 के पश्चात किस चौखट में फिट होते हैं यह देखते रहिये। पंडित नेहरू ने आचार्य नरेन्द्र देव की सिफारिश स्वीकार कर हिन्द के सरकारी पंचांग याने राष्ट्रीय पंचांग का पहला दिन 21 मार्च तय किया है। अबकी बार 2017 का 21 मार्च का दिन हिन्दुस्तानी सोचसमझ के अनुसार विक्रम संवत 2073 शक संवत 1938 चैत्र कृष्णपक्ष उदया अष्टमी तिथि मंगल मूल नक्षत्र कौलव करण छत्र योग धनुर्धर राशिस्थ चंद्र वृद्धांगारक पर्व बुढ़वा मंगल शुक्रास्त प्रतीची राशि 10 बज कर 23 मिनट नये वर्ष का पहला दिन हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय सांस्कृतिकता का प्रतीक है। इस महत्वपूर्ण दिन जब रात दिन बराबर होते हैं हिन्द के राष्ट्रीय पंचांग का पहला दिन जिसे राष्ट्रीय पंचांग समिति के अध्यक्ष आचार्य नरेन्द्र देव ने प्रथम चैत्र संवत 2073 शक संवत 1938 तदनुसार ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक भारतीय पंचांग का वर्ष का प्रथम दिन 21 मार्च 2017 को है। तब तक चुनावी हलचल समाप्त होकर नयी स्थितियां होंगी। हिन्द के लिये वर्ष का पहला दिन मंगलमय हो यही मंगलकामना है बुढ़वा मंगल की।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
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