क्या सांख्ययोग ही इन्सान को
स्थितप्रज्ञ और छिन्नसंशय व्यक्तित्त्व दाता है ?
स्थितप्रज्ञ और छिन्नसंशय व्यक्तित्त्व दाता है ?
इसीलिये महात्मा गांधी की स्थितप्रज्ञस्य का भाषा
आज के डिजिटल युग की पहली जरूरत है।
स्थितप्रज्ञ बनने का प्रयास कर हर व्यक्ति गांधी प्रार्थना से लाभान्वित हो सकेगा।
मन का भ्रम निवारण करने की पात्रता पा सकेगा।
प्राप्तोतीहांजसा धीरः स्वदृश्य छिन्नसंशयः, यद्गत्वा न निवर्तन्ते योगी सिंगाद् विनिर्गमे।
यदानु योगांपवित्यस्तु चेतो मायासु सिद्धस्य विषज्जतेंग,
अनन्य हेतुश्चध मे गतिः स्याद् आत्यंतिकी यत्र न मृत्युहासः।
आत्यंतिकी यत्र न मृत्युहासः यह बात सांख्याचार्य कपिल ने अपनी मां देवहूति से कही। इतिहास या मृत्युहास एक दूसरेे के पर्याय हैं। आधुनिक हिन्द के इतिहास पर दखल रखने वाले महाशय रामचंद्र गुह ने हिन्दुस्तान टाइम्स के एच. टी. थिंक याने हिन्दुस्तान टाइम्स के विचार पोखर या थिंक टैंक में उत्तर प्रदेश केे प्रथम रोमन अक्षर ‘यू’ से मंतव्य निकालते हुए हिन्दुस्तान टाइम्स के 12 फरवरी 2017 के रविवासरीय अंक में लिखा - U. in U.P. stands for Ungovernable। उनके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द अनगवर्नेबल कालिन्स कन्साइस डिक्शनरी के अनुसार मर्यादा और शिष्टाचार का अथवा अनुशासन का न मानना है। अमरीकी अंग्रेज लेखकों तथा बर्तानिया की मूल अंग्रेजी लिखने और बोलने वाले लोग सोचते भी अंग्रेजी में हैं इसलिये भाषायी दृष्टिकोण से पाठक को उनका लालित्य लेखन पढ़ने वाले को आत्मसंतोष देता है बशर्त्ते पढ़ने वाला व्यक्ति भाषा की अंतरात्मा को छूता रहता हो। आम तौर पर व्यक्ति का भूमि व मातृभाषा से भावनात्मक जुड़ाव होता है इसलिये अंग्रेजी भाषा में अभिव्यक्ति करने वाले महानुभाव जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं होती वे शब्द शक्ति सामर्थ्य को आत्मसात नहीं कर पाते। उनके कथन में अपूर्णता रहना एक प्राकृतिक भाषायी नियम है जो महाशय रामचंद्र गुह पर भी लागू होता है। भारतीय वाङमय में वाणी के अनुशासन को हृदयंगम न कर पाने वाले महानुभाव अराजक मानसिक स्थिति में सोच विचार करते हैं। हिन्द में ऐसे लोगों के लिये दस्युधर्मी राज चिंतन करने वाले गिने जा सकते हैं। राजधर्म व दस्युधर्म एक दूसरे के विलोम हैं। महाशय रामचंद्र गुह ने अपनी एक पुस्तक में आधुनिक हिन्द के उन्नीस निर्माताओं में मूलतः गुजराती भाषी शिया मुसलमान कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत के निर्माताओं में स्थान दिया है पर उस व्यक्ति को अपनी सूची में शुमार नहीं किया जिसने 1942 में महात्मा गांधी के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही के तौर पर पवनार धाम में रहने वाले आचार्य विनोबा भावे को पहला सत्याग्रही नामजद किया। पंडित नेहरू दूसरे सत्याग्रही थे जिन्हें महात्मा ने चुना। महात्मा गांधी के समूचे जीवन दर्शन को सही सही समझने वाले केवल एक व्यक्ति थे संत विनोबा भावे। महात्मा के भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन में इतिहासकार रामचंद्र गुह ने पर्याप्त महत्व दिया साथ ही केवल सात वर्ष छोटे कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत का निर्माता घोषित किया। इस ब्लागर ने अपने ब्लाग की पूर्ववर्ती पोस्ट में इतिहासकार रामचंद्र गुह के निर्णय का विरोध करने के बजाय आज जो हिन्दुस्तान है - हिन्दुस्तान तो केवल उत्तर है बाकी भारतीय घटक राज्यों की अपनी अपनी पहचान है। वे असमी, बंगाली, उड़िया, बिहारी, छत्तीसगढ़ी, संताली, बुंदेलखंडी, महाकौशली, मालवी, मराठी, गुजराती, मारवाड़ी, पंजाबी, हरयाणवी, कांगड़ी, कश्मीरी, डोंगरे, नैपाली, नया मिजो, मइती, मैथिली, भोजपुरी, मलयाली, कन्नड़, कोंकणी, जयंतिया वगैरह हैं ये सभी हिन्दुस्तान से जुुड़े हुए इलाके हैं। जब इतिहासकार उ.प्र. पर ऐसा कटाक्ष करता है जैसा रामचंद्र गुह कर रहे हैं। कानपुर की ही बात लें जहां के बारे में वे अपनी कलम चला रहे हैं। इतिहासकार भूल रहा है कि पंडित नेहरू के जीवन काल तक उ.प्र. सुव्यवस्था वाला राज्य था। इसी राज्य ने हिन्द की स्वतंत्रता की लड़ाई में सबसे ज्यादा सरोकार दिखाया। अगर हिन्दुस्तान का बटवारा मजहबी आधार पर नहीं होता अखंड भारत बना रहता सबसे ज्यादा कष्ट उत्तर प्रदेश को मिलता। रोमन लिपि और उर्दू भाषा जो पाकिस्तान बनने के मूल कारण हैं संयुक्त प्रांत आगरा व अवध बरकरार रहते। रामचंद्र गुह ने जयप्रकाश नारायण डाक्टर राममनोहर लोहिया तथा सरोजिनी नायडू के अग्रज हरीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय से विधवा ब्राह्मणी होने के बावजूद पुनर्विवाह करने वाली समाजवादी चिंतका कमला देवी चट्टोपाध्याय को भी आधुनिक भारत का निर्माता पद देकर हिन्द की विशाल हृदयता को छुआ है। उन्हें संभवतः डाक्टर संपूर्णानंद द्वारा उ.प्र. को उजड़ने से बचाने का जो भगीरथ प्रयास किया। हिन्द के समाजवादी चिंतन पर वे पहले साहित्यकार थे जिन्होंने आजादी मिलते ही संयुक्त प्रांत की राजभाषा नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी को जो सम्मान आजादी के संघर्ष पर्व में उपलब्ध हुआ उसो आजाद हिन्द की हम समूचे भारत की भाषा हिन्दी नहीं कहते पर हिन्दी ने उ.प्र. बिहार व मध्यप्रदेश सरीखे राज्यों में लोकतंत्र को जनाधारित बनाया। आज भारत में अठारह करोड़ मुस्लिम आबादी है जो हिन्दुस्तान से अलग हुए पाकिस्तान व बांगला देश की मुस्लिम जनसंख्या से ज्यादा है। वर्तमान पाकिस्तान में जो स्थानीय भाषा समूह यथा पंजाबी सिंधी पश्तो बलूच भाषायें हैं उनमें से कोई भी भाषा पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा नहीं है न ही उ.प्र. व बिहार से सिंध में बसे उर्दू भाषी मुसलमान जिनकी आबादी ज्यादा कराची शहर तक ही सीमित है। उनकी मादरे जबान उर्दू पाकिस्तान की घोषित राष्ट्रीय भाषा है। पूर्वी बंगाल का मुस्लिम बहुल इलाका जब पाकिस्तान का हिस्सा घोषित हुआ वहां के ज्यादातर मुसलमानों की मातृभाषा बंगला थी। पूर्वी बंगाल के मुसलमानों ने मातृभाषा को वरीयता दी । हिन्द की सेना व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नैतिक समर्थन ने बंगला भाषी मुसलमानों को अपना देश अपनी भाषा का आनंदोत्सव मनाने का पुण्यकाल उपलब्ध कराया। बंगला देश दुनियां के नक्शे में स्वतंत्र भाषायी राज्य है पर हिन्दुस्तान के संदर्भ में यह स्वीकार करना ही होगा कि आज भारत पाकिस्तान व बंगला देश को आतंकवादियों का सामना कर रहा है। चीन की मदद इन दोनों मुस्लिम राष्ट्रों को है। पाक स्वयं को इस्लामिक रिपब्लिक आफ पाकिस्तान कहता है। बंगला देश में सत्ता की उलट पलट होती रहती है। जहां तक यादवेतर पिछड़े वर्ग का संबंध है मंडल कमीशन की संस्तुतियों के लाभग्राही उ.प्र. व बिहार के दो यादव राजपरिवार हैं। इन्होंने उ.प्र. व बिहार दोनों राज्यों के मुसलमान समाज को लाभान्वित किया या नहीं यह तो पड़ताल का विषय है पर दोनों राज्यों की मुसलमान जनता को अपने पाले में रखने में नेताजी मुलायम सिंह यादव तथा लालू प्रसाद यादव को भरपूर सहायता मिली। महाशय रामचंद्र गुह के पास्ट एंड प्रजेंट स्तंभ में उन्होंने सैफई राजकुमार अखिलेश यादव का चित्र जो संभवतः हिन्दुस्तान टाइम्स ने उपलब्ध किया होगा, अखबार यह तो स्वीकारता है कि अनगवर्नेबल संबंधी उद्गार इतिहासकार के अपने उद्गार हैं। अखबार संभवतः उसकी भागीदारी से भाग रहा है। उन्होंने लिखा कि महाशय अखिलेश यादव अपने आपको ‘विकास पुरूष’ की भूमिका में उतार रहे हैं। उ.प्र. के लिये विकास पुरूष विशेषण वाला संबोधन नया नहीं है। उ.प्र. के चार बार मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को भी नैनीताल की तराई में रहने वाले लोग विकास पुरूष के रूप में तब से पूजते आये हैं जब तिवारी जी नैनीताल की तराई में वर्तमान में ऊधम सिंह नगर जिले के काशीपुर इलाके का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके साथ विशेषता यह थी कि वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय यूनियन के अध्यक्ष का पद सुशोभित कर चुके थे। उनकी नेहरू राजनैतिक शैली उ.प्र. के सभी आर्थिक क्षेत्रों में चर्चित होती रहती थी पर उन्होंने अपने उ.प्र. मुख्यमंत्रित्व काल में केवल नैनीताल की तराई को ही संवारा। जब श्रीमती सोनिया गांधी ने 2002 में उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री नामित किया तब भी उन्होंने सिडकुल के माध्यम से तीस हजार करोड़ की राशि का विनिवेश तराई के सिडकुल तथा देहरादून के इलाके हरद्वार के कुछ इलाकों को ही उत्तराखंड मान कर संवारा और संपन्न बनाया। देहरादून, हरद्वार तथा ऊधम सिंह नगर के उत्कर्ष ने उत्तराखंड को प्रति व्यक्ति आमदनी की बढ़त का लाभग्राही बना डाला। रेटिंग करने वाली हिन्दुस्तानी व वैश्विक रेटिंग संगठनों में पलायन, उजड़ते हुए पर्वतीय गांवों की दुर्दशा के बावजूद हिन्द का विकासोन्मुख घटक राज्य करार कर दिया। उ.प्र. के नये नौजवान यादव राजखानदान के मौजूदा सर्वेसर्वा अखिलेश यादव ने अपने पिता नेताजी मुलायम सिंह यादव से छिटक कर जो काम देखने का नारा बुलंद किया है उनका विकास पुरूषत्व आगरा से लखनऊ तक ही सीमित है वह भी अभी आधा अधूरा है। इतिहासकार की इस संसार से विदा हुए लोगों के सुकृत दुष्कृत को वैसे ही देखना पड़ता जिस तरह दंगे, हिंसा से मृत व्यक्ति का पोस्टमार्टम डाक्टर करते हैं तथा अपनी रपट देते हैं। इतिहासकार के नाते अगर रामचंद्र गुह ने पंडित नेहरू की डिस्कवरी आफ इंडिया को सांगोपांग पढ़ा होता पंडित नेहरू ने जब महात्मा गांधी के पूर्ण स्वराज का मंत्र 1930 में उच्चारा नेशनल हेराल्ड केे जरिये यूपी के किसानों की दिक्कतों को अंग्रेजीदां लोगों तक पहुंचाया अवध के हर गांव के लोगों से पंडित नेहरू का सामीप्य था। अवध के किसानों ने ही पंडित नेहरू को हिन्द का महात्मा गांधी समर्थक राजनेता की महत्ता दिलाई, कानपुर के उद्योगों की बात करते समय इतिहासकार भूल जाता है कि 1947 से 1964 तक उ.प्र. देश का अग्रणी राज्य था पंडित नेहरू के दिवंगत होने के पश्चात कांग्रेस नेतृत्व में सबको साथ लेकर चलने वालीी नेहरू विजन प्रवृत्ति लोप होगई जिसका सबसे बड़ा फायदा उस प्रधानमंत्री ने उठाया जिसकी पत्नी श्रीमती सीता ने अपने पति राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह को सत्ता मद में उन्मत्त करार दिया था। रामचंद्र गुह अनगवर्नेबल विशेषण उ.प्र. के लिये प्रयुक्त करते समय यदि 1937 में जो लोकप्रिय सरकार संयुक्त प्रांत आगरा व अवध में गठित हुई थी उसने 1937 से 1939 तक जो उपलब्धियां की उनको भी इतिहासकार को अपने स्तंभ में पूरा नहीं अधूरा ही सही कुछ तो कहना चाहिये था। उन्होंने अनगवर्नेबल याने मर्यादाओं का लगातार उल्लंघन करने वाला क्षेत्र उ.प्र. को बताया। उनके अष्ट सूची ऐतिहासिक स्तंभ में दूसरे से लेकर आठवें स्तंभ की उनकी उक्ति पर ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। वे अपने दूसरे सूत्र में बीस हजार के बजाय राजनीतिक दल का चंदा दो हजार तक सीमित करने के प्रसंग को अपने स्तंभ का राजनीतिक बिन्दु माना है। उनके प्रस्तुतीकरण से यह प्रतीति होती है कि वे वर्तमान बहुमत वाली केन्द्रीय सरकार के प्रति उतनी भी सहृदयता बरतने को तैयार नहीं जो वे उ.प्र. के वर्तमान मुख्यमंत्री महाशय अखिलेश यादव को विकास पुरूष की संज्ञा से विभूषित करने में तत्परता दिखा रहे हैं। उनके अष्ट सूची स्तंभ में केवल एक बिन्दु महत्वपूर्ण है पूर्वांचल, बुन्देलखंड, अवध, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा, मेरठ मुरादाबाद और रोहिलखंड के अपेक्षाकृत संपन्न इलाके। क्या ही अच्छा होता कि इतिहासकार गुहा महाशय भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को सलाह देते कि जिस तरह पंडित नेहरू ने राज्य पुनर्गठन आयोग निर्मित कर कांग्रेस के भाषायी राज्यों संबंधी संकल्प को क्रियान्वित करने का प्रयास किया राज्य पुनर्गठन आयोग ने उ.प्र. के भी चार पांच हिस्से नये राज्यों के रूप में सृजित करने की संस्तुति दी थी पर तब उ.प्र. का नेतृत्व पंडित पंत करते थे। उन्होंने उ.प्र. का बटवारा नहीं होने दिया, संभवतः इसके पीछे स्वंतत्रता आंदोलन में उ.प्र. की भूमिका के साथ साथ उ.प्र. कांग्रेस के लिये एक धरोहर थी। दिन बदलने में देर कहां लगती है जो इंडियन नेशनल कांग्रेस उ.प्र. के गांव गांव तक पहुंची थी इंदिरा जी की सत्ता ने कांग्रेस को छिन्न भिन्न कर डाला। जो कमी रह गई थी उसे राज विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन संस्तुतियां तुरंत लागू करके उ.प्र. व बिहार दोनों राज्यों को हिन्द के पिछड़ों में अगड़े - यादव, अहीर, गोप, भगत, मंडल सहित अनेकानेक यादव उपजातियों को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित कर दिया। इतिहासकार के नाते कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक हिन्द के निर्माताओं में जोड़ने की अपनी तजवीज को उ.प्र. और बिहार की राजनीतिक सोच को भी अपना आलोचना का विषय बनाना चाहिये था। यह ब्लागर नहीं जानता कि देहरादून में जन्मे महाशय रामचंद्र गुह ने ब्रज भाषा व अवधी के भक्ति साहित्य को पढ़ने व समझने की कोशिश की क्या ? यदि उन्होंने तुलसी के रामचरित मानस और मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत (दोनों अवधी भाषा के काव्य हैं) सरसरी नजर से भी पढ़ा होता तो शायद ब्रज भाषा के भ्रमर गीत सार सहित सूर की कृष्ण साहित्य से अपना ऐतिहासिक ज्ञान संवर्धित किया होता। उन्होंने चुनाव निधि संबंधी नये संकल्प पर अपनी कलम चलाई पर करण थापर महाशय ने संडे सेंटिमेंट्स इतवारी भावुकता स्तंभ में कहा है - नया पोल फंडिंग रूल कामयाब नहीं हो पायेगा। उन्होंने जो कारण गिनाये हैं वित्त मंत्री अरूण जेटली महाशय के प्रशंसक नई पोल फंडिंग रूल की प्रशंसा करते हैं जबकि आलोचक समूह की मान्यता महाशय करण थापर की सोच के मुताबिक हमारी आंखों में धूल झोंक रहे हैं हमें दिग् भ्रमित कर रहे हैं। करण थापर कहते हैं सच्चाई कहां हैै ? हिन्द के लोगों में जो दानी लोग हैं वे गुप्तदान को ज्यादा पसंद करते हैं। दान की रकम किसने दी यह पता न चले। राजनीतिक दलों को दो हजार रूपये तक के चंदे में दाता का नाम उसका हुलिया जरूरी नहीं याने वह गुप्तदान है। हिन्द के लोग यह भी सोचते हैं कि धन की तीन ही दशायें हैं - दान, भोग और नाश। करण थापर महाशय द्वारा उठाये गये सवाल में वर्तमान बीस हजार रूपये घटा कर केवल दो हजार रूपये सीमित करने से राजनीतिक दल गुप्तदान दाताओं की संख्या में बढ़त कर लेंगे। वह कहते हैं जब तक नकद दान या चंदे की रकम को जब तक गैर कानूनी घोषित नहीं किया जायेगा रकम बीस हजार रूपये हो या दो हजार रूपये कोई बड़ा फर्क पहुंचने वाला नहीं है। एक गुप्तदान दाता के बजाये दस गुप्तदान दाता की संख्या नाम गुप्त रख कर लिखनी होगी। इलैक्ट्रल बांड भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किये जाने के संबंध में महाशय थापर की सोच है कि इस प्रकरण में भी गुप्तदान तथा गुप्तदाता की पहचान न हो पाना करण थापर सोचते हैं यह विचार बहुत उपयोगी लगता है पर क्या यह वास्तविकी है या कल्पना ? गुप्तदाता की पहचान नहीं बताया जाना मामले को गुप्तदाता की पुण्यलब्धि अंततोगत्वा राजनीतिक दल के लिये पुण्य नहीं वरदान साबित होगी। डैमोक्रेसी का तकाजा है गुप्तदान दाताओं का पता लगे ताकि यह मालूम हो कि वह पुण्यात्मा कौन है जो राजनीतिक दल को गुप्तदान देरहा है वह दान 2001 रूपये हो, दो लाख हो अथवा बीस करोड़ ही क्यों न हो ? डैमोक्रेसी में इस प्रकार की गुप्तदान तथा गुप्त दानदाता की पहचान न होना अटपटा मानते हैं महाशय करण थापर उनकी राय में वित्त मंत्री गुप्तदान दाता की पहचान न होना हिन्द की पुण्यार्जन शैली का तरीका समझ रहे हैं। खैर जो हो, वित्त मंत्री ने जो नया रास्ता अपनाया है उस पर पक्ष विपक्ष में बहस होती रहे राजनीतिक दलों को मिलने वाले गुप्तदान तथा गुप्तदान दाताओं के पुण्यार्जन पर चर्चा चलती रहे।आजकल के उ.प्र. के वर्तमान राजनीतिक नेताओं के बारे में अपनी कलम चलाते हुए इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिख रहे हैं उ.प्र. के राजनीतिक नेताओं ने अपने आपको चुनावी मसलों में रमा रखा है पर उन्होंने अपनी इतिहास विवेकशीलता का परिचय भी दिया होता पंडित नेहरू के समवयस्क आचार्य नरेन्द्र देव, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन, गोविन्द वल्लभ पंत, श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल, श्रीप्रकाश ये सभी लोग उन्नीसवीं शती की उपज थे जबकि चन्द्रभानु गुप्त डाक्टर संपूर्णानंद प्रोफेसर वासुदेव सिंह समाजवादी चिंतक द्वय जयप्रकाश नारायण व डाक्टर राममनोहर लोहिया जैसे सद्विचारक राजनेता हिन्द को उ.प्र. ने ही दिये थे। राजर्षि टंडन ने जब वे यूपी असेंबली के स्पीकर चुने गये उन्होंने मुस्लिम लीग के नेताओं से निवेदन किया यदि वे न चाहें या मुझे पक्षपाती मानें एक सेंकड भी स्पीकर रहना पसंद नहीं करूँगा। तब यू.पी. असेंबली में मुस्लिम सदस्यों की अच्छी खासी संख्या थी सबने टंडन जी को कहा - हमें आप पर पूरा यकीन है। आप पूरी तरह निष्पक्षता से असेंबली चलायेंगे। अलीगढ़ जहां सर सैयद अहमद द्वारा स्थापित अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय है वहां से पंडित नेहरू व पंडित पंत के टक्करदार कांग्रेसी नेता श्री कृष्ण दत्त पालीवाल थे। वे पंडित पंत के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री थे नैनीताल जारहे थे। नैनीताल के नौजवान डिप्टी कमिश्नर की पत्नी से छेड़खानी करने के कारण डिप्टी कमिश्नर ने पंडित पंत को फोन कर घटना बताई। पंडित पंत ने नैनीताल से श्री कृष्ण दत्त पालीवाल सरीखे पश्चिमी उ.प्र. के जबर्दस्त जननेता को लखनऊ बुलाया व उनसे त्यागपत्र लिया। पंडित नेहरू को सूचना दी कि उन्होंने श्री कृष्ण दत्त पालीवाल को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया है। इसे कहते हैं राजनीतिक काबिलियत जिससे पंडित पंत ने श्री कृष्ण दत्त पालीवाल सरीखे महत्वपूर्ण जननेता को बाहर का रास्ता दिखा दिया कोई होहल्ला नहीं हुआ। अगर इतिहासकार रामचंद्र गुह ने इतिहास की सच्चाई का स्वीकारा होता तो उन्हें यू से मतलब अनगवर्नेबल बताने के जरूरत नहीं पड़ती। सांख्याचार्य कपिल मनु शतरूपा द्वितीय पुत्री देवहूति और कर्दम की दसवीं संतान थे। कपिल मुनि का सांख्य दर्शन इस नये जमाने में डिजिटल सर्विस के नये अवतार में आया है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
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