Friday, 17 February 2017

छिन्नसंशय, दृढनिश्चयी, आलोचना से न घबराने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी मतदाता का मन जीत लिया।
तो आर जगन्नाथन क्या करें ?
जगन्नाथन की की इस धारणा में दम लगता है कि रोजगार अनदेखी न हो, गांधी का रास्ता अपनाया जाये।
हिन्दुस्तान के संदर्भ में महाशय आर. जगन्नाथन स्वराज्य के ऐडिटोरियल डाइरेक्टर हैं। उन्होंने पूर्व में भी हिन्द की मौजूदा सरकार को रोजगार के मामले में चेतावनी दी थी कि रोजगार मुहैया  न कराये जाने की स्थिति में हिन्द के संकल्पित एक सौ स्मार्ट सिटी सहित देश के 640867 गांवों और 7915 शहरों में Rule of Mob. के हालात पैदा हो सकते हैं। सुराज जिसे कुछ लोग रामराज भी कहने लग जाते हैं हिन्दुस्तान की आजादी संघर्ष के दर्मियान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ यह उद्घोष किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जब यह मंत्रोच्चार किया लगभग दो दशाब्दियों के अंतराल में महात्मा गांधी के नेतृत्व में पंडित नेहरू ने पूर्ण स्वराज का नारा 1930 में रावी के तट पर कांग्रेस अध्यक्ष के नाते बुलंद किया। सुराज, रामराज्य, स्वराज्य के समानांतर वैदिक स्वराज्य की संकल्पन भी भारतीय मनीषा में गहरे अंतर्मन तक पहुंची हुई स्वराज्य संकल्पना है। महाशय आर. जगन्नाथन बात तो स्वराज्य या स्वराज्य के संदर्भ को लेकर सवाल उठाते हुए टाइम्स आफ इंडिया के आज के आप्त वाक्य भारत रत्न बाबा साहेेब भीमराव रामराव अंबेडकर को उद्धृत करते हुए संकेत करता है संविधान कोरा वकीली दस्तावेज नहीं यह जीवन संचालन करने वाला वाहन (हंस वाहन) सरीखा नीर क्षीर विवेक का माध्यम है। महाशय जगन्नाथन कहते हैं जब हिन्द संघ या फेडरल है इसकी राजनीतिक पार्टियों को हाईकमान ढोता है। अपनी वार्ता शुरू करते हुए वे कहते हैं अगर बीजेपी अंततोगत्वा उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस संविद से पिछड़ गई तो देश के राजनीतिक नेतृत्व की असफलता का प्रतीक होगा। वे यह भी कहते हैं कि संशयच्छेत्ता नेतृत्व राजनीतिक बीमारी है। महाशय जगन्नाथन यह भूल जाते हैं कि हिन्द की वर्तमान डैमोक्रेसी की जमा जमा कुल उम्र 15 अगस्त 1947 से मात्र सत्तर वर्ष तथा हिन्द के संविधान लागू होने के दिन 26 जनवरी 1950 से मात्र अठावन वर्ष मात्र है जबकि हिन्द कश्यप-दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप दैत्यराज की एक अरब सतानबे करोड़ वर्ष पुरानी राज व्यवस्था है जिसने पहले दैत्यराज की दैत्यधानी गंगा बेसिन के हरिद्रोही नामक स्थान में स्थापित की। उस जगह को आजकल लोग हरदोई नाम से पुकारते हैं। महाविष्णु के रूप में शक्तिशाली ईश्वरीय शक्ति को हिन्दुस्तान मेें पहली चुनौती दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने पूरे वेग से दी और महाविष्णु को हिरण्यकश्यप के प्रपौत्र राजा बलि ने तीन कदम भूमि की भीख मांग कर अदिति के पुत्रों आदित्य सहित शक्र वगैरह को बलि के साथ पूरे छलकपट तरीके से समुद्र मंथन और अजरता व अमरता का स्थायित्व अदिति के पुत्र पौत्रों को उपलब्ध कराया इसलिये महाशय आर. जगन्नाथन के क्षीर सागर मंथन तथा उससे उपलब्ध चौदह रत्नों जिनमें पहली उपलब्धि हलाहल विष की थी इसलिये बिना हिन्द की परंपराओं ईश निन्दा सहित भक्ति के प्रह्लाद घोषित नौ तरीकों गुजराती वैष्णव भक्त नरसी की दशधा भक्ति तथा देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा था - ईश्वर तक पहुंचने का सीधा सादा रास्ता ईशनिन्दा या ईशद्रोह भी है। नैऋत समाज Blashfamy या ईशनिन्दा को अक्षम्य अपराधा मानता है जबकि हिन्दुस्तानी सनातन परंपरा यह मान कर चलती है कि ईशद्रोह या ईशनिन्दा भी भक्ति का ग्यारहवां सूत्र है। सदाचार निर्णय देते हुए भी नारद ने युधिष्ठिर से कहा - 
यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः। 
आश्चर्य इस बात पर होता है कि स्वराज्य के संपादन निदेश हिन्द में अंग्रेजी राज के उदय पर्व सूरत में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना मुगल सल्तनत के हुक्मनामे से लेकर हिन्द की आजादी के सत्तर वर्ष भीतर कुल मिला कर रोमन लिपि में हिन्दुस्तानी बोलचाल की भाषा उर्दू का प्रयोग कर पिछले साढ़े चार सौ वर्षों का इतिहास सर्वांगीण नहीं माना जा सकता पर भारत का मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक आजादी के वक्त की पौने छः सौ छियानबे तथा उससे पहले राजे रजवारों और मुस्लिम तालुकेदारों तथा नवाबों में भी जिनमें ज्यादातर धर्माचारित थे उन्होंने अपनी सनातन संस्कृति के पूर्ण रूप से त्याग नहीं किया। टाइम्स आफ इंडिया ने हाथी, हाथ, कमल और हंसिया हथौड़ा चित्रित किये जाने पर सपा की साइकिल को उन्होंने अखिल भारतीय राजनीतिक दल का चिह्न नहीं माना जबकि संविद अथवा अलायंस की जो घोषणा हुई उसमें मुख्यमंत्री याने फेडरल प्रतिनिधि सपा के अध्यक्ष तथा उ.प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का चित्रांकन नहीं किया। राष्ट्रीय पार्टी बैलून का जो उद्धरण महाशय जगन्नाथन प्रस्तुत कर रहे हैं अगर गहराई में पैठ की जाये तो कांग्रेस अध्यक्ष बीजेपी या साम्यवादी दल निर्वाचन आयोग की परिभाषा में अखिल भारतीय दल कहे जाते हैं पर जमीनी यथार्थ को देखें तो आज के राजनीतिक दलों में राष्ट्रीय दल का ठप्पा लगाना विवेकसंगत नहीं है क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल भारत के हर घटक राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता। जब हम फेडरल आकार के दलीय संरचना के बारे में सोचें हिन्द में इस्लामी आक्रमण से पूर्व जो राज्य, राजे महाराजे थे उनमें अंग, बंग, कलिंग, मगध, मिथिला, भोजपुर, काशी, कौशल, अवध, अहिच्छत्र, ब्रज, कुरूक्षेत्र, नैपाल, कुमांऊँ, गढ़वाल, कांगड़ा, चम्बा, कश्मीर, जम्मू, पंजाब, मुल्तान, सिंध, बलूचिस्तान, हरयाणा, डिंगल, राजपूताना की अनेक रियासतें, सौराष्ट्र, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्णाटक, उत्तर व दक्षिण निवांकुर, केरल, द्रविड़, आंध्र, तेलंगाना सहित बीसियों भाषायी सांस्कृतिक इकाइयां थीं तथा राजपरिवारों की संख्या भी आज के 36 इलाकों से ज्यादा थीं इसलिये महाशय आर. जगन्नाथन की कल्पना दृढ़ निश्चयी नेता का उदय भारत की राजनीतिक रूग्णता है। इस पर एकदम यकीन करना कठिन लगता है। स्वराज्य के यशस्वी संपादन निर्देशक महाशय आर. जगन्नाथन महाशय को सत्तर या सतावन वर्ष की स्वातंत्र्य पूर्ण पश्चिमी जगत की आद्योगिक क्रांति से उपजी राजनीतिक सभ्यता के समानांतर हिन्द की पारंपरिक सनातन सोच वाली पंचायती व्यवस्था का भी आमूलचूल अध्ययन इसलिये करना चाहिये क्योंकि वे स्वयं को स्वराज्य का अधिपति समझ कर राजनीतिक व्यवहार कर रहे हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि एकदम काम राजनीति के प्रणेता साम्यवाद हंसिया हथौड़ा चुनाव चिह्न वाले मार्क्सवादी साम्यवादी दल को आधुनिक राजनीतिक शैली के मुताबिक सैद्धांतिक राजनीति दल माना जाता रहा है परंतु 1917 में लेनिन के जो मार्क्सवादी चिंतन मूलक यूनियन आज सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक का ढांचा कार्लमार्क्स की शैली पर खड़ा किया वह लेनिन के पश्चात स्टालिन प्रभुत्व काल में ही व्यक्ति प्रधान होगया। उसे ढहने में पचहत्तर वर्ष में एक कम वर्ष लगा। रूस जिसे भारतीय वाङमय ऋषि देश मानता है और ऋषि देश का ख्रिस्ती धर्मावलंबन यूरप के दूसरे ख्रिस्ती देशों के मुकाबले एक बड़ा फर्ज लिये है। रूसी ख्रिस्ती हिन्दुस्तानियों के सनातनियों की तरह मजहबी नजरिये से एकजुट समाज है। चौहत्तर वर्ष का मार्क्सवादी समाजवादी चिंतन रूस की मजहबी मान्यता को बदल नहीं सका। जिस तरह सिंगापुर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक असित के. विश्वास और उनके साथी हिन्दुस्तान के टूटने की कल्पना कर रहे हैं अगर जगन्नाथन महाशय एक विश्लेषक तथा संपादक के नाते तटस्थ भाव न रख कर हिन्द के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के वैसे ही कटु आलोचक प्रतीत होते हैं जैसे उन्होंने जिन लोगों को फेडरल आइडिया का सूत्रपात है और अपने कथन में ऊँचे स्वर से तीन बार कहा फेडरेट! फेडरेट!! फेडरेट!!! महाशय जगन्नाथन हिन्दुस्तान के बहुसंख्य राज्य घटकों में पिछले सत्तर वर्षों में परिवारवादी अथवा जातिवादी या सुप्रीमो क्षत्रप शैली के राजनीतिक अग्रणियों की क्षत्रप एकोहम् द्वितीयो नास्ति अकेला या अकेली नेतृत्व क्षमता केवल मुझमें है शेष लोग या तो मेरे अनुयायी हैं या दुश्मन। कश्मीर से लेकर तमिलनाडु कर्णाटक तक यह क्षत्रप शक्ति अथवा पारिवारिक राजसत्ता कश्मीर के अब्दुल्ला खानदान मुफ्ती खानदान पंजाब के बादल खानदान दिल्ली के स्वयंभू एकछत्र राजनेता महाशय अरविन्द केजरीवाल सैफई का राजकुल वाला राजपरिवार नेताजी मुलायम सिंह यादव का राजघराना बसपा सुप्रीमो बहन मायावती की बहुजन समाज की छतरी बिहार के लौहपुरूष जननेता तथा नांदीमुख लालू प्रसाद यादव अपने अस्तित्व को ज्यों त्यों बचाये रखने वाले बाबू नितीश कुमार उन्हें राजसत्ता खानदान नहीं माना जा सकता। बीजद प्रमुख नवीन पटनायक पश्चिम बंग के लोकनेत्री ममता बनर्जी ससुर जमाई की मेढ़ी एन टी रामाराव चंद्रबाबू नायडू तेलंगाना के नये दिग्दर्शक राव तमिलनाडु के दो राजनीतिक खेमे पहला एम करूणानिधि का राजपरिवार जिसकी सत्ता अब उनके पुत्र एम के स्वलिक के हाथ है गुरू शिष्या परंपरा को तमिलनाडु का वर्तमान परिदृश्य शशिकला चिन्नपा का अन्ना द्रमुक पर कब्जा। कर्णाटक के राजपुरूष देवगौड़़ा जो हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। इन सबके समानांतर 10 जनपद वाल राजपरिवार जिसकी मुखिया श्रीमती सोनिया गांधी इधर अस्वस्थ चल रही हैं कमान अपने पुत्र को सौंपना चाहती हैं पर है यह परिवार भी राजपरिवार राज का आकांक्षी। स्वराज्य के यशस्वी निदेशक संपादक इन राजनीतिक दलों की कार्यशैली के बजाय छिन्नसंशय नेतृत्व के धनी राजकाज को परिवार से न जोड़ने वाले व्यक्तित्त्व को ‘स्ट्रांग लीडर’ डिजीज की संज्ञा देने का प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने नीति आयोग के जरिये फेडरल सिस्टम को मजबूत करने का प्रयास किया है। पहले जब योजना आयोग था उसको जब तक पंडित नेहरू देखते थे उनका व्यवहार राज्यों के साथ बराबरी का था पर जब सत्ता श्रीमती इंदिरा गांधी केे हाथ पहुंची योजना आयोग दाता और घटक राज्यों में संबंध बदल गये। उस बदली हुई स्थिति को पटरी में लाने के लिये ही नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ही ने योजना आयोग का कायाकल्प कर उसे नीति आयोग का सम्मान देकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगई। क्षेत्रीय क्षत्रप सुप्रीमो प्रधानमंत्री के इस महत्वपूर्ण निर्णय को अनदेखा कर रहे हैं। अठारह पुराणों में एक पुराण का नाम विष्णु पुराण है। विष्णु पुराण का कहना है - संघे शक्तिः कलौयुगे। इसकी व्याख्या व मीमांसा करने वाले औद्योगिक क्रांति के मसीहा लोग कलपुर्जों के युग मानते हुए संघ शक्ति अथवा मिलजुल कर काम करने की समूह शक्ति को कलयुग में संगठन अथवा समूह में ही शक्ति संपात की क्षमता रहती है। हिन्द में अभी 36 शक्ति स्त्रोत हैं जिनमें 28 पूर्ण राज्य स्तर के घटक हैं। शेष आठ या तो यूनियन टेरीटरी हैं या अर्ध राज्य जिनमें पुडुचेरी व दिल्ली को अधूरे राज्य स्तर की मान्यता मिली है। ऐसा प्रतीत होता है कि महाशय आर. जगन्नाथन को पूरे उ.प्र. में इसके विभिन्न इलाकों की आर्थिक असमानता पिछले दस वर्षों में समाजवादी पार्टी की यादव परिवार सरकार तथा 2016 से पूर्व 2017 से बसपा सुप्रीमो की सरकार ने जो तौर तरीके अपनाये, उनका जो असर आज उ.प्र. के मतदाताओं पर है। केवल आकर्षक ऐडवर्टोरियल तरीके के विज्ञापन अखबारों में छपवाने से उ.प्र. के मतदाता पर असर पड़ने वाला नहीं है। महाशय जगन्नाथन का सोचना है कि सपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित है उसे कांग्रेस का समर्थन है इसलिये उनकी राय यह है कि चुनाव जीतने की संभावना सपा के पक्ष में ज्यादा तेज है। सत्ता में पांच साल रहने से उन्हें जो संभावित हानि हो सकती है पार्टी में या परिवार में फूट पड़ने से जो प्रतिकूलतायें सपा के सामने आने वाली हैं उन्हें प्रदेश के सट्टेबाजों सहित ज्यादातर लोग यह मान कर चल रहे हैं कि अखिलेश यादव को 203 से ज्यादा याने 250 अथवा 300 सीटों में कांग्रेस सहित विजय श्री हासिल हो सकती है। पार्टी में या कहें परिवार में फूट पड़ने से जो प्रतिकूलतायें सपा के सामने आने वाली हैं उन्हें प्रदेश के सट्टे वालों सहित ज्यादातर लोग यह मान कर चल रहे हैं कि अखिलेेश यादव को 203 से ज्यादा याने 250 अथवा 300 सीटों में कांग्रेस सहित विजय श्री हासिल हो सकती है। इस चुनाव में उ.प्र. मंे सत्ताधारी समाजवादी पार्टी विधानसभा में मुख्य विरोधी दल बसपा की मुस्लिम उम्मीदवार अच्छी संख्या में उतार कर दलितों के जाटव समाज की संरक्षिका बसपा सुप्रीमो मायावती पुनः पांच वर्ष पश्चात सत्ता सुख पाने के लिये लालायित है। 
स्वराज्य की सुखद संकल्पना करने वाले महानुभाव आर. जगन्नाथन को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त घटक राज्यों व क्षेत्रफल तथा जनसंख्या की दृष्टि से उ.प्र. सरीखे विशालकाय घटक राज्यों की क्षेत्रीय सांस्कृतिकता आर्थिक दीनता तथा पेय एवं सिंचाई जल व्यवस्था कोे संबंधित इलाकों की जनता की जरूरतों के मुताबिक तभी सामने लाया जा सकता है जब उन्हें राजनीतिक सत्ता हासिल हो। उ.प्र. से भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने उत्तराखंड को अलग राज्य के रूप में स्थापित किया। उ.प्र. में आज भी संपन्न पश्चिमी उ.प्र. गरीबी से जूझता हुआ बुंदेलखंड की आबादी की बहुतायत के कारण विशेष ध्यान देने योग्य पूर्वांचल याने गोरखपुर, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, बस्ती, सिद्धार्थ नगर, देवरिया, विन्ध्यांचल, चंदौली, जौनपुर, संत कबीर नगर, संत रैदास नगर सहित पूर्वांचल बुंदेलखंड की तरह अलग स्वतंत्र राज्य के हकदार हैं। जरूरत इस बात की लगती है कि स्वराज्य के कर्ताधर्ता उ.प्र. के चार राज्य बनाने की बात करते तो उनका फेडरल चिंतन कुल नयापन लाया जा सकता था। इसी तरह बिहार महाराष्ट्र गुजरात मध्यप्रदेश तथा राजस्थान भी देश के सब क्षेत्रों के उत्कर्ष के लिये छोटे छोटे राज्यों की तात्कालिक जरूरत है। अगर भारतीय घटक राज्य संख्या वर्तमान अठाईस से अठावन साठ तक भी पहुंच जाये जिस फेडरल की चर्चा महाशय जगन्नाथन कर रहे हैं वह देश केे कहर इलाके केे विकास के लिये मुफीद हो सकता है। जगन्नाथन महाशय के अनुसार नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का ‘स्ट्रांग लीडर’ होना बीमारी का लक्षण है वह देश के लिये सक्षम, निस्वार्थ सबका साथ सबका विकास चाहने वाले नेतृत्व के बजाय राजपरिवार, सुप्रीमो क्षत्रप किस्म के लोकनेता या लोकनेत्रियों का जमावड़ा चाहते हैं। संभवतः दूसरे अखबार नवीसों और सोशल मीडिया की चहलकदमी की तरह वे यह कल्पना करते हैं कि देश का प्रधानमंत्री ऐसा हो जो महाशय केजरीवाल की तरह मजीठिया का कालर पकड़ कर उन्हें जेल की हवा खिलाये अथवा दिल्ली के तख्त में ऐसी नेत्री विराजमान हो जो वर्तमान प्रधानमंत्री को जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे लोकनेता चुनाव के लिये दौड़धूप कर रहे थे। ममता बनर्जी महाशया ने कहा था उनकी कमर में रस्सी बांध कर जेल भेजूं। बसपा सुप्रीमो बहन मायावती ने राजा भद्री के पोते को अपने पूरे काल में जेल में बंद रखा और गाल बजा कर जोर से कहा - राजा भैया की ठौर जेल में है। महाशय आर. जगन्नाथन को स्वराज्य का यथार्थ लाभार्जन करने के नुस्खे 15 अगस्त 1947 के पश्चात भारत में जन्मे राजनेतृत्व आकांक्षी पुरूषों और महिलाओं के संज्ञान में लाना चाहिये। हिन्द में जब तक पंडित नेहरू की मानसिकता का राजतंत्र चलता था वाणी स्वतंत्रता विचार प्रकटीकरण स्वतंत्रता उसी किस्म की थी जिस तरीके से हिन्द की आजादी की मुहिम चली थी। पंडित नेहरू के राजनीतिक क्षितिज से ओझल हो जाने के कुुछ दिनों उनकी राजकाज शैली का अनुशरण होता रहा पर श्रीमती इंदिरा गांधी के सत्तानशीन होने पर बदलाव आगया। पिछले तिरेपन वर्षों का भारतीय राजनीतिक चक्रव्यूह सही दिशा देने की क्षमता केवल नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व क्षमता में निहित है। अगर हिन्दुस्तानी समाज चाहता है कि देश में सुराज आये अनर्जित धन की लालसा न बढ़े राजनीतिक तथा बाबूगिरी के भ्रष्टाचार में रोक लगे तो आर. जगन्नाथन सरीखे अखबार नवीसों को तटस्थ चिंतन की राह पकड़न होगी। नरेन्द्र मोदी ज्यादा से ज्यादा आने वाले दस वर्ष तक हिन्दुस्तान को सही नेतृत्व दे सकते हैं ताकि आने वाले भविष्य में जिन लोगों पर देश की बागडोर संभालने का सुअवसर मिले। वे राजनीतिक हाराकिरी के बजाय हिन्दुस्तान को कारगर लोकतंत्र संचालन में अपनी भूमिका निर्वाह कर सकें। सुप्रीमो क्षत्रप शक्ति स्त्रोत के लोकनेता या लोकनेत्री को जिस भाषा में वह मतदाता से वोट भिक्षा मांगे उसी भाषा में शासन सूत्र चले। यह रास्ता संस्कृति के पारखी साने गुरू जी ने अपने आंतर भारती अभियान के जरिये स्पष्ट कर रखा है। अंततोगत्वा हिन्द का हित हिन्द की लोक भाषाओं के जरिये ही साधा जा सकता है। जब तक मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक राजनीतिक बाबूगिरी में हावी रहेगा आर. जगन्नाथन महाशय जो सोच रहे हैं वह दिवास्वप्न ही होगा। देश की मौजूदा जरूरत नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के निस्वार्थ, निर्भाव और अहर्निश सेवामहे के राष्ट्रीय व्यक्तित्त्व में निहित है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी मुख्य कारक है पर जुबान संभाल कर बोलने से अपना और अपने विरोधी विचार के बीच समझौता वादी रास्ता बनाया जा सकता है। स्वराज्य के अधिपति आर. जगन्नाथन को राजनीति नहीं लोकनीति का अनुसरण सीखना लाभदायक होगा। केवल फेडरल का जाप करने से उनकी दौड़ एकांगी ही रह जायेगी। फेडरल सोच तो नीति आयोग के जरिये नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की संकल्पना है। पिछले दरवाजे से घुस कर राज करने वाले अखिलेश यादव तथा कांग्रेस ने नये मसीहा राहुल गांधी की राजनीतिक शैली दोनों दलों की राजनीतिक पकड़ कभी भी फेडरल नहीं रही।
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