यदि हां तो सामूहिक सम्मत फैसला तुरत हो ??
मीथिक मंत्र स्तंभ में महाशया अरूंधती दास गुप्त कहती हैं कि सरिता, नदी, नदियां जिसके जन्मदाता जनक गिरिराज हैं जिन्हें आम बोलचाल में पहाड़ कहा जाता है। नदी की माता पृथ्वी तथा पति समुद्र हैं। इससे पहले कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सरिता या नदी को मानवाधिकार माना है यह भी देखा जाये कि अरूंधती शब्द के मायने होते हैं नाक की नोक याने मनुष्य मात्र की इज्जत। अरूंधती कर्दम-देवहूति की आठवीं कन्या संतान थी। दसवीं संतान का पद सांख्याचार्य कपिल का प्राप्त था। रामायण में एक कथा आती है अयोध्या नरेश राजा दशरथ अपने प्रथम पुत्र कौसल्येय दाशरथि राम का राज्याभिषेक करना चाहते थे। वे अपने पुरोहित वशिष्ठ के पास जारहे थे। पुरोहित वशिष्ठ को यह आभास हो चुका था कि राजा दशरथ की मृत्यु निकट है। वे अपनी पत्नी अरूंधती से कह रहे थे अरूंधती मेरे सामने बड़ा धर्मसंकट उपस्थित होगया है। राजा दशरथ आरहे हैं वे अपने पुत्र राम का राज्याभिषेक कल करना चाहते हैं। मैं अपने जजमान से कैसे कहूँ राजा तुम्हारी मौत आरही है। जब राजा दशरथ वशिष्ठ कुटी में सरयू तट पर पहुंचे पुरोहिताई के नाते वशिष्ठ उन्हें शतजीवी चिरंजीवी होने की आशीष देने लगे। अरूंधती को आश्चर्य होरहा था कि उसके पति जो कहते हैं वह करते नहीं। राजा दशरथ ने कुलगुरू वशिष्ठ से कहा - राम का राज्याभिषेक कर वनवासी बनना चाहता हूँं लग्न मुहूर्त तय कर दीजिये। वशिष्ठ ने राजा दशरथ से कहा - महाराज दशरथ राम के राज्याभिषेक का मुहूर्त चौदह वर्ष पश्चात आरहा है। कल राम का राज्याभिषेक नहीं हो पायेगा। राजा दशरथ राजहठ से पीड़ित थे उन्होंने वशिष्ठ के परामर्श को न मान कर पुनः कहा - गुरूदेव वशिष्ठ कृपा करके कल का मुहूर्त तय कीजिये। वशिष्ठ अरूंधती तथा राजा दशरथ का प्रसंग इसलिये प्रस्तुत किया कि अरूंधती दास गुप्त की तरह हिन्द की लाखों महिलाओं का नाम मेष राशि होने पर लोग अपनी कन्या का नाम अरूंधती, अनामिका, अपराजिता, अनुसूया, अनंता, अदिति, आनंदी आदि रखते हैं। मां और बेटे का संवाद कपिल मुनि का सांख्य दर्शन कहलाता है।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नदी को मानवाधिकार की पात्रता मानी है। कावेरी, सतलुज और यमुना नदियों के पानी के न्यायपूर्ण बटवारे का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया। इस ब्लागर के ब्लाग को पढ़ने की कृपा करेंगे जो कावेरी शतद्रू यमुना जल के बारे में है। महाभारत पंचम वेद भी कहलाता है। महाभारत के महानायक गांगेय भीष्म हैं। भीष्म महाराज शांतनु तथा गंगा की जीवित प्रथम संतान होने के नाते कुरूकुल केेे जन्मजात नरेश थे। दुष्यंत-शकुन्तला पुत्र भरत के पास गंगा नारी रूप में पहुंची। गंगा ने राजा भरत से कहा - मुझसे विवाह कर लो। भरत ने गंगा की बात नहीं मानी यानी गंगा ने भरत से कहा तुम्हारे बेटे पोते पड़पोते के पास भी जाऊँगी। शांतनु के पास गंगा पहुंची उसने कहा - तुम्हारे पूर्वज ने मुझे नहीं अपनाया तुम्हारे पास आयी हूँं पर शर्त्त यह है कि जिस दिन मुझे रोकोगे तुम्हें छोड़ कर चल दूँगी। गंगा ने शांतनु और अपने सात पुत्र गंगा में बहा दिये। आठवें पुत्र देवव्रत थे उन्हें भी गंगा में डुबाना चाहती थी पर शांतनु ने गंगा को रोक दिया। गंगा ने कहा - बात याद है क्या ? शांतनु बोले - याद है किन्तु तुम इस बच्चे को गंगा में नहीं बहा सकती हो। गंगा चल दी लेकिन चंद मिनटों में पुनः शांतनु के पास आकर बोली - तुम्हारे पुत्र को पालना पोसना तथा योग्य बनाना मेरा स्त्री धर्म है। जब यह बालक सोलह वर्ष का हो जायेगा तुम्हें वापस कर दूँगी। गंगा ने सात वर्ष बालक देवव्रत को पाला पोसा जब बालक साढ़े सात वर्ष का हुआ तो उसको लेकर जामदग्न्य राम जिन्हें लोग परशुराम या फरसा वाले राम कहते थे उनके पास लेगयी। जामदग्न्य राम से कहा - परशुराम मेरे बेटे को पढ़ा लिखा कर योग्य बना दो। देवव्रत के गुरू परशुराम थे। देवव्रत-भीष्माचार्य अद्वितीय उदाहरण हैं जिन्हें भारत का आबाल वृद्ध नर नारी समाज गांगेय भीष्म केे नाम से पुकारता है। भागवत महापुराण के दसवें स्कंध के अठावनवें अध्याय बीसवें श्लोक से लेकर पचीसवें श्लोक तक कालिन्दी कृष्ण विवाह का वर्णन है।
अहम् देवस्य सवितुर्दुहिता पतिमिच्छति विष्णुम वरेण्यं वरदम् तपः परमभास्थिता।
नान्यम् पतिम् वृणे वीर तमृते श्रीनिकेतनम् तृप्यताम् मे स भगवान मुकुन्दोऽनाथ संश्रयः।
कालिन्दीति समाख्याताः वसामि यमुने गतो निर्मिते भवनो पित्रा यावत् अच्युत दर्शनम।
तथा वदद गुडाकेशोे वासुदेवाय सोऽस्मिताम्।
कालिन्दी को श्रीकृष्ण से जो दस पुत्र हुए उनके बारे में भागवत का कथन है -
श्रुतः कविः वृषो वीरः सुबाहुः भद्र सकलः। शांतिः दर्शः पूर्णमासः कालिन्द्या सोमकोऽवरः।
गंगा और यमुना सहित उत्तराखंड की सभी सदानीरा नदियों को गंगा यमुना की भांति मानवाधिकार की तात्कालिक जरूरत है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गिरिराज हिमालय की आस्थामूलक एवं अध्यात्ममूलक सरिता पितृशक्ति संपात माना है। जरूरत इस बात की है न्यायालय के इस फैसले कोे क्रियान्वयन स्तर पर लाने के लिये भारत सरकार तथा उत्तराखंड सरकार के अलावा जिन जिन राज्यों से गंगाजल व यमुनाजल का संबंध है उन्हें भी जागरूकता दिला कर नदी जल शक्ति को प्रदूषण से बचाने के लिये नदी तटवासी समाज को भी जागरूक किया जाना युगधर्म है। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री महोदया स्वयं साध्वी सन्यासिनी हैं उनके मार्गदर्शन में सदानीरा नदियों को दोष मुक्त किया जाना हिन्द का जल आपद्धर्म है। भारत के पहाड़ों व नदियों का पिता पुत्री रूप में मिथुन, वर्णन करते हुए मलय, मंगलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूढक, कोल्लक, सह््य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल (तिरूपति), वैंकट, महेन्द्र, वारीधर, विन्ध्य, शुक्तिमान, ऋष्यगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रनील, कामगिरि आदि हजारों हजार पहाड़ हैं जिनसे नद नदियां निकलती हैं। नदियों में प्रमुखता देते हुए भागवतकार का कहना है चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी, अवरोदा, कृतमाला, वैहामसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावती, तुंगभद्रा, कृष्णा, वेण्या, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, पयोष्णिी, तापी, रेवा, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती, सिन्धु, अंधः, शोण, महानदी, वेदस्मृती, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मंदाकिनी, सरस्वती, यमुना, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरूद्वृद्धा, वितस्ता, असिक्नी, विश्वा आदि नदियां सदानीरा सरिता बन बह रही हैं।
महाशया अरून्धती दास गुप्ता ने यदि विषय वस्तु को सात समुद्र पार अंग्रेजी भाषा के द्वारा समझने के बजाय अपनी मातृभाषा में गंगा साहित्य व यमुना नदी का आख्यान पढ़ा होता तो वे इस प्रसंग को चमत्कारिक रहस्य न कह कर आंतर भारती नदी साहित्य के जरिये समझने की कोशिश करती तो वे अपने पाठकों को अंग्रेजी के जरिये ही वह आभास करा सकती थीं जो स्वामी विवेकानंद और 69 वर्ष की आयु में अमरीका गये भक्तिवेदांत स्वामी को पढ़ कर अपना मंतव्य प्रस्तुत करतीं तो उनके कथन में अंग्र्रेजी में ही सही चार चांद अपने अष्टसूची वक्तव्य में उन्होंने जो कुछ कहा है उसे आंतर भारती शक्ति प्राप्त होती। अपने अष्टसूची स्तंभ के चौथे सूत्र में महाशया अरूंधती न्यूजीलैंड जहां काफी बड़ी संख्या में हिन्दुस्तानी बस गये हैं वहां के अदालती फैसले का उद्धरण देती हुई वे कहती हैं माओरिस दर्शन अनुभूति कराता है I am the River & River is me गंगा और कालिन्दी का स्त्रीत्व यह महसूस कराता है कि जल शक्ति अपार है। वह सृष्टि की साक्षी भी है। अरून्धती महाशया भी मां आनंदमयी की तरह दैवीशक्ति संपात कर सकती हैं। आज हिन्दुस्तान के सामने बड़ा यक्ष प्रश्न ही यह है कि हिन्दुस्तान यूरप व अमरीका सरीखा बनना चाह रहा है। हिन्द के हर मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक का यह मानना है कि यूरप और अमरीका सुख के केन्द्र हैं। वे विकसित हैं तथा हिन्द उनकी ओर याने पश्चिम की तरफ मुंह कर खड़ा है। चाहता है कि हिन्द भी यूरप व अमरीका की तरह विकसित देश बने। आजादी के सत्तर वर्षों में हिन्द अपनी हिन्दुस्तानियत छोड़ कर पश्चिम परस्त बनता जारहा है। यह पश्चिम परस्ती हिन्द को कहां लाकर पटक देगी यह अभी अनुमान नहीं है। अमरीका और यूरप पारस्परिक संघर्ष से नया बदलाव भी ला सकते हैं। वे आगे कहती हैं वेदांत के रहस्य में वृत्रासुर एक महासर्प है। अगर उन्होंने शूरसेन और चित्रकेतु का उपाख्यान पढ़ा होता तो वे सही रास्ते में आतीं। एक प्राणी दूसरे प्राणी का श्नाति (माता पिता) बंधु (भाई बहन पति पत्नी) मित्र मित्रतावर्धन करने वाला रिपु, शत्रु, उदासीन तथा कच्चा खाने चबाने वाला होता है। इस प्रसंग को संभवतः उन्होंने महाभारत सहित अन्य पौराणिक ग्रंथों के दोषपूर्ण अंग्रेजी संस्करणों से प्राप्त करने के कारण वे वृत्रासुर को महासर्प कहती हैं। वे जिस रोमन संस्कृति तथा रोमन सभ्यता से प्रभावित हैं वह केवल दो हजार वर्ष पुराना है। संभवतः उनका आदर्श मात्र पांच सौ आठ वर्ष पुराना अमरीकी चिंतन है जो सभी के सभी - स्थान भ्रष्टा न शोभन्ते दन्ता, केशा, नखा, नरः के प्रतीक हैं। लगभग 150 वर्ष पूर्व मैक्समूलर नामक जर्मन भाषी ऋग्वेद ज्ञाता ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के तत्त्वावधान में ऋग्वेद का सुसंपादित संस्करण पहले पहल छापा। उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को अक्षपत्तन संज्ञा से पुकारा और स्वयं को मोक्षमूलः कहा। मैक्समूलर भारत नहीं आये थे उनका वैदिक ज्ञान रामकृष्ण परमहंस और संत ज्ञानेश्वर की तरह ईश्वर प्रदत्त ज्ञान गरिमा थी। डाक्टर राधाकृष्णन ने श्रीमद्भगवदगीता केे अंग्रेजी भाष्य में स्वीकार किया कि भारत जीवन दर्शन अंग्रेजी के जरिये सही सही नहीं समझा जा सकता है। भारत में नागरी सहित तेरह लिपियां और बाईस भाषायें (अंग्रेजी सहित) लिखी व बोली जाती हैं। अंग्रेजी में 26 अक्षर और नागरी सहित भारतीय लिपियों में 51 या 52 अक्षर होते हैं जिन्हें अंग्रेजी में अल्फाबेट कहा जाता है। रोमन में 26 अल्फाबेट अरबी में 32 फारसी में 28 ग्रीक (लैटिन) में 24 तथा हवाई में 12 अल्फाबेट हैं। विभिन्न भाषाओं में सामंजस्य का मार्ग ही समाज को छिन्नसंशय बना सकता है। नैनीताल हाईकोर्ट के फैसलेे के प्रकाश में भारत में नदी सभ्यता को प्रभावी बनाने के लिये नदियों और सांस्कृतिकता की स्फूर्ति का खाका खींचने के लिये नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सम्मति भी ज्ञात करना जरूरी है। अपने स्तंभ के आठवें सूत्र में अरून्धती दास गुप्ता महाशया देवर्षि उद्घोष करती हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कंध के दूसरे अध्याय का इकतालीसवां श्लोक समूचे विश्व को परमात्मा का शरीर मान कर चलता है -
खं वायु अग्निं सलिलं मरींश्च ज्योतिषि सत्वानि
दिशो दु्रमादीन सरित् समुद्राश्च हरेः शरीरम्, यत्किंच भूतम् प्रणमेदमन्यः।
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