
क्या मौजूदा खादी आयोग खादी मार्क के समानांतर
खेस दुतई को भी बढ़ावा देगा ??
यदि हां तो कैसे ???
खेस और दुतई को फिर अपनाइये ! खादी को हिन्द के घर घर पहुंचाइये !!
रोअड़ कताई से पश्चिमी उत्तर प्रदेश व हरियाणा के जुलाहों को आर्थिक आजादी दिलाइये !!!
सहारनपुर जिले के एक कस्बे का नाम रामपुर मनितारन है। इस कस्बे के रहने वाले राजाराम शर्मा आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी के उन 25 शिष्योें में थे जिन्होंने 20 नवंबर 1920 के रोज काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बाहर आकर काशी के ईश्वर गंगी मुहल्ले में लाहिड़ी महाशय की राय मान कर श्री गांधी आश्रम की शुरूआत की। फरवरी 1929 में सवा नौ साल बाद गढ़ रोड मेरठ में चौधरी रघुवीर सिंह त्यागी के सक्रिय सहयोग से श्री गांधी आश्रम कानून सम्मत सामाजिक संगठन के रूप में स्थापित हुआ। इसके ट्रस्ट बोर्ड के सदर पंडित जवाहरलाल नेहरू, संचालक जीवतराम भगवानदास कृपलानी तथा सेक्रेटरी विचित्र नारायण शर्मा निश्चित हुए। फरवरी 1929 से श्री गांधी आश्रम एक समर्थ संगठन के रूप में विकसित होता रहा। वर्तमान में इस संगठन के क्षेत्रीय संगठन उ.प्र., उत्तराखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर, मध्यप्रदेश, दिल्ली तथा पश्चिम बंगाल में भारतीय संघ के सात घटक राज्यों में काम करते आरहे हैं। इनकी भूसंपदा स्वामित्व का बाजार मूल्य वर्तमान में तीस अरब रूपये से ज्यादा है। इस संगठन की मुख्य विशेषता यह थी कि सर्वसम्मत बिन्दुओं पर ही संगठन 1929 से लगातार कार्य करता आरहा हैै। 1953 में भारत सरकार ने वैकुंठ ल. मेहता की सदारत में अ.भा. खादी ग्रामोद्योग मंडल गठित किया। उ.प्र. से इस बोर्ड के सदस्य श्री विचित्र नारायण शर्मा थे जो उ.प्र. सरकार में केबिनेट मंत्री भी थे साथ ही खादी प्रमाण पत्र समिति के अध्यक्ष भी। तब राजाराम शर्मा अ.भा. खादी ग्रामोद्योग मंडल के जोनल डाइरेक्टर थे। उनका कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश व विन्ध्य प्रदेश था। उन्होंने रोअड़ कताई तथा खेस दुतई बुनाई गांधी आश्रम द्वारा किये जाने का श्री गांधी आश्रम प्रबंध समिति में प्रस्तुत किया। प्रबंध समिति ने रोअड़ कताई खेस दुतई बुनाई प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया। सेक्रेटरी विचित्र नारायण शर्मा ने राजाराम शर्मा से कहा - प्रस्ताव तो बहुत अच्छा है पर राजाराम भाई प्रस्ताव आपकी अपनी भाषा में नहीं है यह किसने लिखा ? यह ब्लागर तब राजाराम शर्मा का सहायक था। प्रबंध समिति के एक सदस्य रघुवर दत्त पंत ने उन्हें बताया कि राजाराम भाई के प्रस्ताव को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने में रमेश चंद्र पंत का हाथ है। यह ब्लागर बैठक में तलब हुआ, विचित्र नारायण शर्मा ने पूछा - क्या यह प्रस्ताव तुमने तैयार किया है ? इस ब्लागर ने नम्रतापूर्वक निवेदन करते हुए कहा - प्रस्ताव का भाव तो राजाराम भाई का है मैंने उसे भाषा के अनुकूल उत्तर प्रदेश व हरियाणा के रोअड़ कातने वालों को योजना का लाभ मिले उस नजरिये से तैयार किया। प्रस्ताव प्रस्तुत करने का श्रेय तो राजाराम भाई का ही है मैंने तो उनके दर्जी का काम किया है इसलिये मेरी भूमिका इसमें गौण है मुख्य नहीं। विचित्र नारायण शर्मा बोले - क्या तुम इसे अंग्रेजी में प्रस्तुत कर सकते हो ? मैंने कहा - मुझे अंग्रेजी टाइप नहीं आता। उनके स्टेनोग्राफर श्री शर्मा जी भी बैठे हुए थे उन्होंने कहा - पंत जी आप बोलेंगे मैं अंग्रेजी में टाइप करूँगा और आज ही भाई जी को अंग्रेजी अनुवाद सौंप देंगे। प्रस्ताव सैंतीस पृष्ठ लम्बा था। उसको अंग्रेजी में अनुवाद करने तथा टाइप करने में चार घंटे लगे। ज्योंही प्रस्ताव अंग्रेजी में टाइप होकर तैयार हुआ फौरन विचित्र नारायण शर्मा जी की सेवा में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने हिदायत दी - एक पत्र मेरी तरफ से वैकुंठ भाई के नाम तैयार करो जिसमें रोअड़ कताई एवं खेस दुतई बुनाई के लिये कार्यकर्त्ताओं के वेतन सहित कत्तिन व बुनकरों के पारिश्रमिक के लिये पूंजी मांगो। श्री गांधी आश्रम मेरठ ने जिस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था उसी प्रस्ताव को विचित्र नारायण शर्मा ने अ.भा. खादी ग्रामोद्योग मंडल मुंबई से रोअड़ कताई एवं खेस दुतई बुनाई कार्यक्रम के तहत स्वीकार करा लिया। सन 1955 से लेकर सन 1964-65 पर्यन्त इस योजना का लाभ तत्कालीन मूल्यों के अनुसार रूपये 20/- लाख था जिसका लाभार्जन श्री गांधी आश्रम को हुआ और कार्यक्रम में 200 कार्यकर्त्ताओं को नौकरी मिली।यह ब्लागर अपने ज्येष्ठ पुत्र जो कि बैंकर है उसके निवास स्थान बंगलुरू पहुंचा। रविवारीय दक्कन हेरल्ड में पानीपत के तारतन आफ लौस्ट वीभर्स संबंधी स्तंभ लेखिका ऋतु सेठी का लेख पढ़ने तथा उनके द्वारा बुनाई कौशल के दक्ष बुनकर खेमराज सुंदरियाल का खेस बुनते हुए फोटो भी छपा था। ऋतु सेठी कहती हैं - उन्होंने केवल खेस का हवाला दिया है दुतई का नहीं। ऋतु सेठी की इस बात में बहुत बड़ी सामर्थ्य है कि खेस जुलाहों की आर्थिक आजादी थी। आज जो बुनकर पावरलूम में बुनाई करते हैं वे मजदूर हैं। पावरलूम मालिक उनसे जितना काम लेते हैं उतनी मजदूरी नहीं देते। खादी ग्रामोद्योग आयोग और एमएसएमई मंत्रालय का जोर खादी मार्क का है परंपरागत खादी को वे भूल गये हैं। ऋतु सेठी ने मुख्यतया खेस बुनाई पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया है। चूंकि ऋतु सेठी मूलतः पंजाबी होने के साथ साथ पंजाब व हरियाणा के अलग अलग सूबे बन जाने के कारण केवल पानीपत की बात कर रही हैं और उनके द्वारा मास्टर वीभर खेमराज सुंदरियाल के कर्मकौशल को प्रस्तुत कर रही हैं। खेस और दुतई निर्माण मूलतः उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बड़ौत, बुलंदशहर, गाजियाबाद, हापुड़ के अलावा गौतम बुद्ध नगर जिलों के हिन्दू कोरियों व मुसलमान जुलाहों की बुनाई कला है। पानीपत में तो यह काम तब शुरू हुआ जब वहां खादी आश्रम की शुरूआत गांधी आश्रम के सक्रिय कार्यकर्त्ता रहे सोमदत्त वेदालंकार जी ने की। सोमदत्त जी सन 1977 से सन 1980 तक खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष भी रहे।
श्री गांधी आश्रम मेरठ जिसका मुख्यालय कालांतर में उ.प्र. की राजधानी लखनऊ में होगया वही संगठन खेस दुतई कार्यक्रम को पुनर्जीवन देने वाला संगठन है। राजाराम शर्मा ने 1955 से लेकर 1961-62 तक अपने जोनल डाइरेक्टर खादी ग्रामोद्योग कमीशन मेरठ के कार्यकाल में खेस दुतई कारोबार को नयी ऊँचाई दी। पश्चिमी उ.प्र. में हापुड़ स्थित खादी ग्रामोद्योग समिति दतियाना ने खेस उत्पादन को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। इस संस्था के संस्थापक चौधरी शिवनाथ सिंह त्यागी ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता तथा सदस्य सचिव प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया को पश्चिमी उ.प्र. की खेस निर्माण कला से अवगत कराया। मेहता-कापड़िया जोड़ी ने पश्चिमी उ.प्र. के गांवों की खेस निर्माण कला को भरपूर प्रोत्साहन भी दिया। खेस दुतई याने रोअड़ कताई और खेस दुतई बुनाई ने खादी के कारोबार को उ.प्र. में अभूतपूर्व ऊँचाई उपलब्ध करायी। खेस दुतई के जरिये जहां एक बार उपयोग हुई रूई को फिर चर्खे में कात कर बुनाई के द्वारा खेस व दुतई के रूप में गांव के लोग पारिश्रमिक के समानांतर ओढ़न बिछावन के तौर पर खेस दुतई का उपयोग करने लग गये यह क्रम एमएसएमई के एक्ट 2006 के अनुपालन तक चलता रहा। जबसे खादी कमीशन परंपरागत खादी उत्पादन को प्राथमिकता न देकर उसे गौण मानता रहेगा पावरलूम का कपड़ा खादी के नाम पर बिकता रहेगा। मामले में सुधार होना कठिन लगता है इसलिये खादी ग्रामोद्योग आयोग को खेस दुतई उत्पादन व विपणन को बुनकरों के हित साधन का जरिया मान कर उत्साहित करना ही एकमात्र तरीका है। जो खादी फैशन के समानांतर उन लोगों को भी फिर अपनायेगा जो खादी के परिधान व ओढ़न बिछावन के क्षेत्र में खेस दुतई का उत्पादन व विपणन करते रही हैं। अंबाला में खादी ग्रामोद्योग आयोग का दफ्तर तब से गतिशील है जब 1953 में भारत सरकार ने अ.भा. खादी ग्रामोद्योग मंडल का जोनल आफिस तय किया तथा चर्खा संघ के आडिटर रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भीमसेन वेदालंकार को जोनल डाइरेक्टर नियुक्त किया। वेदालंकार जी सन 1953 से लेकर सन 1975 पर्यन्त लगातार 22 वर्ष खादी सेवा करते रहे। हरियाणा ही नहीं पंजाब के गांवों मंे भी पश्चिमी उ.प्र. की तरह बिटिया के विवाह के अवसर पर दहेज में चर्खा भी दिया जाता रहा था। ऋतु सेठी ने जो चुभता हुए सवाल बुनकरों की आर्थिक आजादी के संदर्भ में उठाये हैं उन पर सटीक विचार करने का मुहूर्त्त आगया है। ज्ञातव्य है कि खादी आयोग के प्रथम अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता ने नीलोखेड़ी में खादी ग्रामोद्योग प्रशिक्षणा महाविद्यालय स्थापित किया। इस विद्यालय के प्राचार्यों में श्री विपिन सक्सेना अभी जीवित हैं। श्री सक्सेना खादी ग्रामोद्योग आयोग के अंबाला जोन के निदेशक भी रहे हैं। उन्हें ऐग्रो एक्सपो 1977 ने प्रसिद्धि दी। तब मोरारजी रणछोड़जी देसाई भारत के प्रधानमंत्री थे। वे स्वयं चर्खा कातते थे और खादी के हमदर्द भी थे। खेस दुतई और रोअड़ कताई से रोजगार मुहैया करना तथा पुरानी रूई का सदुपयोग कर आर्थिक मितव्ययता को अपनाना भी गांधी की खादी का लक्ष्य रहा था इसलिये ओढ़न बिछावन तथा परिधानों की लोकप्रियता बढ़ाने के लिये खादी ग्रामोद्योग आयोग को कमर कस कर मेहनत करनी होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का ग्रामीण तथा कुटीर स्तर पर मेक इन इंडिया को संबल देना युग की पुकार है। रोजगार का अकाल सहने के लिये भी अगर मां बहनें चर्खा कात कर अपने खाली समय का उपयोग करें परिवार की आमदनी बढेे़। गांधी की खादी का यह मंत्र जितना महत्वपूर्ण सन 1915 से 1934 के बीच था आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बुनकरों को कबीर की तरह आजादी मिले वह अपने कर्तव्य पथ का दृष्टा हो हथकरघा का कोई दक्ष बुनकर पावरलूम की चाकरी करने न जाये। खादी आयोग केे वर्तमान सदर महाशय विपिन कुमार सक्सेना हिन्द केे प्रधानमंत्री तथा कपड़ा मंत्री से अनुरोध करें कि जिस तरह मिल मालिक प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया टेक्सटाइल कमेटी के स्थायी सदस्य थे, प्रधानमंत्री जी खादी आयोग के सदर अथवा खादी विशेषज्ञ सदस्य को टेक्सटाइल कमेटी से जोड़ें। हथकरघा और खादी में गलबहियां होना पहली शर्त्त है। दूसरी तात्कालिक जरूरत यह भी है कि जो खादी संस्थायें खेस दुतई निर्माण करती थीं उनका मत ज्ञात किया जाये। पश्चिमी उ.प्र., हरियाणा व पंजाब की खादी संस्थाओं और इन इलाकों में बस गये पूर्व खादी आयोग कर्मियों और वरिष्ठ नागरिक खादी सेवियों के साथ मेरठ व अंबाला में बातचीत कर खेस दुतई उद्यमिता को पुनर्जीवन देने के तरीकों पर विचार विमर्श हो।
ऋतु सेठी पंजाब निवासी हैं उन्होंने आईसीएस अधिकारी बी एच बेडन पावेल को उद्धृत करते हुए कहा - (अविभाजित भारत का पंजाब प्रांत) उन्होंने खेस को अद्वितीय और सुन्दर परिधान बताया। पानीपत के सत्तर वर्षीय बुजुर्ग बुनकर का भी ऋतु सेठी ने उल्लेख किया। वे खेस की तुलना डेनमार्क व स्काटलैंड (दोनों पंजाब से ज्यादा ठंडे इलाके) के परिधानों से कर रही हैं। ऋतु सेठी ने अंग्रेजी साहित्यिक रूडयार्ड किपलिंग के पिता जे लोकवुड किपलिंग के साथ खेस का ब्यौरा भी दिया। उन्होंने खेस को पंजाब तक ही सीमित इसलिये किया क्योंकि वे रोअड़ कहां कहां काता जाता है रोअड़ से कितनी कितनी चीजें बनती हैं इसकी पूरी पूरी खोज नहीं की हैं। रोअड़ कताई खेस दुतई बुनाई के बारे में खादी आयोग विचार करे, रोजगार को बढ़ावा देने में रोअड़, खेस तथा दुतई महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने की पात्रता रखते हैं।
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