Sunday, 14 May 2017

क्या हिन्द को पश्चिम की तरह उग्र नस्लवादी कहा जाये ?
क्या नस्लवाद (रेसिज्म) और ‘वर्णाश्रम’ एवं हिन्दत्व का जातिवाद समान है ?
या यूरप व अमरीका के नस्लवाद व हिन्द की जाति व्यवस्था में मौलिक भेद है ??
सेमेटिक मजहबों व हिन्द की सनातन जीवनशैली को मजहब माना जा सकता है ???
हिन्दू अखबार ने अपने 7 अप्रेल 2017 के अंक में नस्लवाद पर वामपंथी, दक्षिणपंथी तथा मध्यम मार्गी विचार पोखरों केे सर्वश्री सैमुअल जैक अफ्रीकी छात्र संगठन के सदर, राकेश सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के शिक्षक तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े आर्थिक उत्कर्ष नीति संस्थान के सदर तथा प्राचार्य संजय श्रीवास्तव आर्थिक उत्कर्ष संस्थान के समाज विज्ञान का मत प्रस्तुत किया है। महाशय सैमुअल जैक हिन्दुस्तानी नहीं हैं। उनकी मान्यता है कि हिन्द की सरकार को यह स्वीकारोक्ति करनी ही चाहिये कि हिन्द में नस्लवाद की जड़ें गहरी हैं। नस्ल अथवा हिन्द की जातिवादी सामाजिक व्यवस्था को भी महाशय सैमुअल जैक नस्लवाद ही मानते हैं। अफ्रीकी छात्रों के साथ दिल्ली सहित भारत के अन्य विश्वविद्यालयों में जहां वे अफ्रीकी छात्र पढ़ते हैं, महाशय सैमुअल जैक को उनके साथ होने वाले व्यवहार से उद्विग्न लगते हैं। उनकी धारणा बन गयी है कि हिन्द का जातिवादी सामाजिक व्यवहार नस्लवादी चिंतन का मूल कारण है। वे कृष्ण वर्ण के लोगों के अलावा हिन्द के वे लोग अपने आपको दलित मानते हैं दलितों को उन्होंने अननृचेवत याने अछूत भी कहा है, जातिवादी सामाजिकता से जोड़ रहे हैं। हिन्द की वर्णाश्रम व्यवस्था तथा यूरप व अमरीका के लोगों द्वारा अफ्रीकी कृष्ण वर्ण के लोगों की दासप्रथा के द्वारा अमरीका में जिस तरह खरीद फरोख्त की वस्तु समझा गया वह विचारधारा हिन्द की जाति व्यवस्था से मेल नहीं खाती है। सैमुअल जैक कहते हैं जब हम हिन्द की धरती पर पैर रखते हैं हमारे शरीर का रंग या वर्ण घृणा का कारण बनता है। महाशय सैमुअल जैक की जो अवधारणा बनी है उसके गर्भ में यह मानना कि हिन्द में नस्लवाद है नस्लवादी आचरण भी। उन्होंने अपने तर्कों से हिन्द में नस्लवाद की गहरी जड़ें होना स्वीकार किया है। महाशय एस.एन. चारी का भारत संबंधी चिंतन मैकोलाइट अंग्रेजीदां भारतीय भद्रलोक की सोच है जो हिन्द के इतिहास को मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक के नजरिये से देखने के आदी होगये हैं। उन्होंने अपने कथ्य में तैलुगु व मलयाली भाषाओं में संस्कृत शब्दों के बाहुल्य का उल्लेख किया हैै पर उनकी अवधारणा साने गुरू जी के आंतर भारती चिंतन के नजदीक नहीं है। चारी महाशय ने तमिल भाषा का उल्लेख नहीं किया। कबीर ने कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। कबीर तो केवल पांच सौ वर्ष पुराने हैं याने जितना अमरीका का इतिहास है। पांच हजार वर्ष पहले कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने पद्मपुराण में कहा - भक्ति से अपना परिचय देवर्षि नारद को वृन्दावन में दिलाते हुए भक्ति कहती है - द्रविड़े साऽहम् समुत्पन्ना वृद्धिम् कर्णाटके गता क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णताम् गता। भक्ति तमिलनाडु में जन्मी, कर्णाटक में बचपन बीता। महाराष्ट्र में भक्ति प्रौढ़ हुई यहां उसके दो बेटे ज्ञान और वैराग्य हुए। गुजरात पहुंच कर भक्ति बुढ़िया होगयी। उसके बेटों ने कहा - मां तुम्हें गंगा स्नान करा लायें। भक्ति दोनों बेटों के साथ वृन्दावन आयी, गजब होगया भक्ति जवान होगयी बेटे बूढ़े होगये। यह है भक्ति की मूल कहानी। भगति हिन्द में मानसून के तरीके से बढ़ती रही। सैमुअल जैक महाशय के हिन्द को नस्लवादी कहने के सवाल को हम दरकिनार इसलिये कर सकते हैं क्योंकि जनाब सैमुअल का नाता हिन्द की धरती से नहीं है पर महाशय चारी व उनके सरीखे अन्य मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक के संज्ञान में यह लाना बहुत जरूरी है कि हिन्द में शुक्ल (सफेद चमड़ी वाले लोग), रक्त (लाल चमड़ी वाले लोग), पीत (पीली चमड़ी वाले लोग) लोगों को राम और कृष्ण भी श्यामवर्ण के हैं। हिन्दुस्तानियों का ईश्वर या ईश्वरी शक्ति वाली कृष्णवर्ण के हैं। समूचा महाभारत जिसे हिन्दुस्तान के लोग पंचम वेद कहते हैं उस महाकाव्य की नायिका द्रौपदी कृष्णवर्णा है जिस कारण कृष्णा भी कहलाती है। कोलकाता सहित जहां जहां काली बाड़ी है नवदुर्गा केे नौ रूप हैं उनमें गिरिजा पार्वती को छोड़ सभी कृष्णवर्णा हैं। कृष्ण व काली का बीजमंत्र भी क्लीम् क्लम् प्रधान है इसलिये सैमुअल जैक महाशय के कथन में यथार्थ बोध नहीं होता। कोई भी समझदार हिन्दुस्तानी काले वर्ण से घृणा नहीं करता। सैमुअल जैक महाशय नाइजीरियाई अथवा जिन अफ्रीकी छात्रों के साथ असत व्यवहार की चर्चा कर रहे हैं उसका वर्ण से कोई वास्ता नहीं। अमरीका में अफ्रीकी लोगों के साथ जो व्यवहार हुआ उसकी छाप सैमुअल महाशय के मस्तिष्क में गहरी गहराई तक पहुंची है। मार्टिन लूथर किंग का मानना था कि अमरीकी अफ्रीकीयों को सबसे ज्यादा सहारा महात्मा गांधी की विचार शैली से मिला। दिल्ली शहर में खिड़की सहित जहां जहां अफ्रीकी छात्रों व हिन्दुस्तानी नौजवानों में नोंकझोेंक हुई उसका कारण नस्लभेदी सोच नहीं पर सांस्कृतिक चिंतन पार्थक्य है। महात्मा गांधी ने अपनी सामाजिक तथा आध्यात्मिक शैली को दक्षिण अफ्रीका में रह कर समृद्ध किया। इंडियन ओपीनियन केे जरिये उन्होंने अपनी मातृभाषा गुजराती में 20 अध्याय वाला हिन्द स्वराज रचा, दुनियां के सामने एक नयी सोच प्रस्तुत की। महात्मा ने दक्षिण अफ्रीका में कायिक व वाचिक कष्ट भी सहे पर अपना मार्ग बदला नहीं। अगर सैमुअल जैक महाशय हिन्दुस्तान में नस्लवाद संबंधी अपनी धारणा को हिन्द स्वराज का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ने के बाद व्यक्त करते तो उनकी धारणा में स्वयं बदलाव आता। जो भी हो, सैमुअल महाशय की धारणा से असहमत होने के बावजूद विचार स्वातंत्र्य के दृष्टिकोण से उनके कथन पर चिंतन करने की जरूरत है। अपने कथ्य को निर्णायकता की ओर अग्रसर करते हुुए महाशय सैमुअल जैक कहते हैं हमारा कृष्ण वर्ण वे कहते हैं हिन्द की सरकार को कहना चाहिये कि अफ्रीकी छात्रों के साथ जो होरहा है वह उचित नहीं। सैमुअल महाशय फरमाते हैं कि भारत सरकार ज्यादतियों से इन्कार करती है। ये कहते हैं कि कुछ हिन्दुस्तानियों की पीड़ा देने वाले दुर्व्यवहार से अफ्रीकी छात्रों की पढ़ाई के लिये भारत आने में कमी आ सकती है। लगता है सैमुअल जैक महाशय समूचे हिन्द वासियों को अपना दुश्मन नहीं मानते इक्का दुक्का घटनाओं से वे व्यथित प्रतीत होते हैं। सैमुअल जैक और अफ्रीकी छात्रों को कहां कहां अटकना पड़ता है उसके बारे में सरकार से ज्यादा समाज को सोचने की जरूरत है। कृष्ण वर्ण या काला कलूटा होना अफ्रीकी लोगों से कथित व्यवहार का कारण नहीं लगता इसलिये सरकार नहीं समाज के जागरूक वर्ग को अफ्रीकी छात्रों की जमीनी स्थितियों का जायजा लेना चाहिये। सरकारी स्तर पर अफ्रीकी छात्र जो हिन्द में पढ़ाई करने आते हैं उन्हें वांछित सुरक्षा सहयोग उपलब्ध कराने के विषय में विचार करे ताकि वर्ण समस्या के बजाय इसे सामाजिक व्यवहार का संशोधित मार्ग निश्चित किया जाये। इस देश में हजारों एन.जी.ओ. हैं किसी को इस समस्या से निजात पाने के लिये आगे आना ही चाहिये। 
महाशय राकेश सिन्हा की राय में अफ्रीकी छात्रों का प्रसंग नस्लवादी नहीं कानून और व्यवस्था का प्रश्न है क्योंकि अफ्रीकी संस्कृति व हिन्दत्व की संस्कृति में जो टकराव उठा है वह वास्तविक होने के बजाय बनावटी ज्यादा है। महाशय राकेश सिन्हा की राय में नस्लवाद पूर्णतः पश्चिमी समाज की चिंतनधारा है जो स्वयं को गोरी चमड़ी होने केे कारण काली, भूरी, पीली चमड़ी से श्रेष्ठ समझते हैं। वस्तुतः नस्लवादी सोच हीनग्रंथि की प्रतीक है। नस्लवादी सोच को मानव सृष्टि का अपवाद ही कहा जा सकता है। यूरप की औद्योगिक क्रांति तथा यूरप के समाजों में एक समाज का दूसरे समाज से स्वयं को श्रेष्ठ समझने की हीनग्रंथि ने ही आज यूरप को चौराहे पर ला पटका है। संयुक्त यूरप व्यवस्था बर्तानिया के ब्रेक्जिट अभियान ने यूरो को कमजोर कर दिया है। यूरोप के भिन्न भिन्न भाषायी समूह भी आईएसआईएस याने इस्लामी जिहाद को एकमत होकर टक्कर देना चाहते हैं। 
श्रीकृष्ण उद्धव से एक ऐसे संवाद का जिक्र करते हैं जिसे देवर्षि नारद ने वसुदेव के सवाल के जवाब में कहा - 
अत्राप्यु दाहरत्तीम इतिहासम् पुरातनाम् आर्यभाषा च संवादे विदेहस्य महात्मनः नवा भवन् महाभागा मुनयो ह्यर्थ शांतिनः श्रमणा वातरसा आत्मविद्या विशाखा कविर्हरन्तरिक्ष प्रबुद्ध पिप्पलायनः आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः।
विदेह जनक ने इन नौ आर्षभ ऋषियों से संवाद स्थापित किया। उनमें से पहले आर्षभ कवि ने विदेह जनक को कहा - 
कायेनवाचा मनसेन्द्रियर्वा बुद्ध्याऽत्मना वानुसृत स्वभावात्।
करोति यत् यत् सकलं परस्मै नारायणेति समर्पयेतत्।
उद्धव गीता का महत्वपूर्ण उद्गान करते हुए कवि विदेह जनक से फिर कहते हैं - 
खं वायुमग्निंम् सलिलं महीं च ज्योतीषिं सत्वानि विद्ये द्रुमादीन्।
सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरम् यत्किंच भूतं प्रणमेदनन्यः।
यह समूचा संसार ईश्वरमय है और ईश्वर का शरीर है।
राकेश सिन्हा महाशय सन 1911 की जनगणना का संदर्भ भी देते हुए कहते हैं हिन्दुस्तानियों को अपने मजहब संबंधी ब्यौरे देने में शर्म महसूस नहीं होती थी। जनसंख्या के 1931 वाले आंकड़े यह भी प्रतीति कराते हैं कि तब हिन्द में चौबीस हजार यहूदी एक लाख नौ हजार सात सौ चौवन पारसी धर्मावलंबी थे उनकी शिरकत अ.भा. राष्ट्रीय कांग्रेस में भी थी। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में हिन्द की आजादी के लिये दादा भाई नौरोजी की महत्वपूर्ण प्रतिभागिता का का उल्लेख दिया है। दादा भाई नौरोजी हिन्द के लिये समर्पित थे। हिन्द की आजादी की पहली संवाद शैली में नौ पारसी दो मुसलमान दो इसाई सम्मिलित थे इसलिये हिन्द को नस्लवादी कहना सच्चाई को नकारना हैै। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने अठारह पुराणों की रचना करते हुए कहा,
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयम्। परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।
तुलसीदास उत्तरकाण्ड में कहते हैं - 
परउपकार सम धरम नहिं भाई, परपीड़ा नहिं सम अधमाई।
राकेश सिन्हा महाशय ने नस्लवादी अथवा वर्णवादी चिंतन पोखर के अस्तित्व को नकारा है। यह हिन्दत्व की पहचान है। अठारह पुराणों में एक पुराण का नाम मार्कण्डेय है जिसमें सत्य हरिश्चन्द्रोपाख्यान और देवी माहात्म्य महत्वपूर्ण हैं। सत्यात् नास्ते परो धर्मः सत्याचरण से बड़ा कोई कर्तव्य नहीं है। प्रह्लाद के पौत्र वैरोचन बलि ने वामन को तीन कदम जमीन देने का वादा किया। गुरू शुक्राचार्य ने सम्मति दी कि यह दान मत दो। तुम्हें यह वामन कहीं का नहीं रहने देगा। बलि ने गुरू की बात नहीं मानी यानी अपने वाक्यदान का सम्मान किया। हरिश्चन्द्र ने सत्य रक्षा के लिये स्वयं को मणिकर्णिा घाट के डोमराज को बेच डाला सत्य रक्षा की। महात्मा गांधी के ग्यारह व्रतों में पहला सत्य व दूसरा अहिंसा था। अब हम हिन्द की तथाकथित जातिवादिता पर सोचें। देव्यादूत संवाद में मार्कण्डेय पुराण कहता है - या देवी सर्वभूतेषु जाति रूपेण संस्थितादैवी शक्ति प्राणिमात्र में जाति रूप में विद्यमान है। शिकागोे की विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने कहा - जाति-व्यवस्था हिन्दू सनातन धर्म का मूल आधार है। अगर हिन्द के लोग जातीय व्यवस्था छोड़ देते तो विश्व में हिन्दू धर्म भी तिरोहित हो जाता इसलिये जाति व्यवस्था हिन्द का सांस्कृतिक आभूषण है। हिन्द मध्य मार्ग का पोषक है। संजय श्रीवास्तव समाज विज्ञान के आचार्य इन्स्टीट्यूट आफ इकानामिक ग्रोथ में हैं। उन्होंने केवल संजय नाम लिखा होता तो पहचान मुश्किल होती उन्होंने श्रीवास्तव गोत्रनाम भी लिखा। भारतीय वर्ण व्यवस्था में विवेक व बुद्धि की ठेकेदारी केवल प्रथम वर्ग द्विज और चतुर्थ वर्ण शूद्र में है। विप्र प्राणी की पहचान कराता है यानी प्राणी विशेषतया मनुष्य योनि में मुख्य है जिससे उसकी पहचान होती है, शूद्र पैर है। हिन्द का एक महत्वपूर्ण तीर्थ गया है जहां विष्णुपद पूजन होता है। यजुर्वेद जब यमादि चौदह यमों का तर्पण करने का तरीका बताता है उसके अंतिम दो तर्पणों में चित्रगुप्त व चित्रांश हैं। जातिवादी होने के बावजूद हिन्द में सबसे बड़ा उदाहरण किससे दीक्षा लूं ? महारानी मीराबाई के गिरिधर गोपाल ने मीरा को कहा - काशी में गंगातट पर रैदास नामक चर्मकार रहता है। वह परम भागवत है तुम उसीसे दीक्षा लो। मीरा रैदास के पास गयी औैर दीक्षा का निवेदन किया। रैदास ने कहा - मैं आपको दीक्षा देने की पात्रता नहीं रखता। मीरा ने कहा - संत मुझे तो मेरे गिरिधर गोपाल ने बताया है। इस हिन्द में सच्चा साधु जिस पर अहंकार नहीं है वह केवल रैदास है। मीरा ने संत रैदास से गुरूमंत्र दीक्षा प्राप्त की। भगवद्गीता का कथन है, कर्म संन्यास योग की महत्वपूर्ण उक्ति ही यह है कि व्यक्ति समदर्शी हो। 
विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी, शुन चैव श्वपाकेन पंडितः समदर्शिनः।
समदर्शी ही वह है जो ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते व कुत्ते को रखने वाले चाण्डाल में समभाव से व्यवहार करता है। ऊँच नीच के चक्कर में नहीं पड़ता इसीलिये जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्यते। आज तो हमारा समाज संस्कारविहीन है इसलिये हम सभी शूद्र हैं बराबर हैं स्वयं को सवर्ण द्विज कहना ही निरा पाखंड है। हिन्द की वर्तमानकालीन जरूरत संस्कृति के अग्रदूत साने गुरू जी की आंतर भारती को अपनाने की है। हिन्द की भाषाओं और बोलियों में जो गुण छिपे हैं उन्हें उजागर करना आज का युगधर्म है।
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