सन्यास क्या है ? असल सन्यासी कौन है ?
काम्यानां कर्मणा सन्यासम कवयो विदुः। गीता
काम्यानां कर्मणा सन्यासम कवयो विदुः। गीता
क्या चैतन्य महाप्रभु के सन्यास और बाबा रामदेव के साधुत्व (सन्यस्त जीवन) को एक सा समझा जाये ??
श्रीमद्भगवद्गीता मेें सन्यास शब्द अठारह बार उपयुक्त हुआ है। पार्थ अर्जुन ने पूछा -
सन्यासस्य महाबाहो तत्वमिच्छामि वेदितुम।
अर्जुन के इस सवाल के जवाब में योगेश्वर वासुदेव कृष्ण ने अपने भक्त पार्थ अर्जुन को कहा -
पार्थ, विद्वान लोग काम्य कर्म न्यास को ही सन्यास कहते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता केे अठारह अध्यायों में चौथा अध्याय ज्ञान, कर्म, सन्यास योग, पांचवां अध्याय सन्यास योग, छठा अध्याय आत्मसंयम योग, नौवां अध्याय राजविद्या, राजगुह्ययोग और अठारहवां अध्याय मोक्ष संन्यास योग में क्रमशः दो, चार, सात, एक तथा पुनः चार बार ‘सन्यास’ शब्द का उल्लेख हुआ है। हिन्द के प्रयाग नाम से विख्यात भारतीय नगर इलाहाबाद में हर बारहवें वर्ष कुंभ मेला लगता हैै। पौषी पूनम से लेकर माघी पूनम पर्यन्त माघ मेला तो हर वर्ष लगता है। गंगा जमना और अदृश्य सरस्वती का संगम त्रिवेणी कहलाता है। वर्तमान कल्प वाराह कल्प कहलाता है। कल्प के प्रारंभ से लेकर अब तक 1972947118 वर्ष व्यतीत होगये हैं। वर्तमान सृष्टि 1955885118 वर्ष पूर्व संवत्सर पड़वा, गुडि पड़वा, चैती चांद, उगादि तथा युगादि नामों से पहचाने जाने वाले चैत सुदी पड़वा को सृष्टि हुई। वर्तमान चतुर्युगी का अठाईसवां युग कलियुग 5118 वर्ष पहले शुरू हुआ। कलियुग के प्रारंभ से पहले योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण आज से 5242 वर्ष पूर्व मथुरा में कंस केे कारागार में भाद्रवदी अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में जन्मे थे। उत्तर भारत में जन्माष्टमी भाद्रपद अष्टमी कृष्णपक्ष तथा नर्मदा से दक्षिण में श्रावण कृष्णपक्ष कहा जाता है। दिन वही है केवल सवाल पूर्णिमांत चान्द्रमास और अमांत चान्द्रमास विभेद है। दक्षिण में अमावस्या को अमांत याने चान्द्रमास पूर्ति माना जाता है। इलाहाबाद में कुंभ के अवसर पर माघ महीने की अमावस जिसे इलाहाबादी लोग मौनी अमावस कहते हैं बारह साला कुंभ पर्व अमांत पर्व के तौर पर मनाया जाता है। यही त्रिवेणी कुंभ स्नान का महापर्व है जब समुद्र मंथन हुआ था जिसमें अमृत सहित चौदह रत्न निकले थे। अमृत कलश धन्वंतरि के कंधे पर था। देव दानवों में अमृत लूटने के लिये छीना झपटी होरही थी। अमृत कलश से अमृत की बूंदें मकरार्क माघ महीने की मौनी अमावस को त्रिवेणी में गिरीं। उसी उपलक्ष्य में हर बारहवें वर्ष प्रयाग में कुंभ का आयोजन होता है। अमृत की छीना झपटी के चलते प्रयाग के अलावा हरिद्वार या हरद्वार नामक स्थान में भी मेष संक्रांति (बैशाखी) के दिन अमृत बूंदें गिरीं इसलिये हर बारहवें वर्ष में वैशाख महीने की पहली सौर संक्रांति के पर्व में हरिद्वार या हरद्वार में भी कुंभ पर्व का आयोजन होता है। इसी तरह उज्जयिनी या उज्जैन तथा नासिक में भी सिंहस्थ सूर्य याने भादों के महीनेे की संक्रांति को भी अमृत बूंदें गिरीं इसलिये इन दोनों जगहों पर भी कुंभ हर बारहवें वर्ष सिंह संक्रांति को संपन्न होता है। कुंभ पर्व संसार का सबसे बड़ा मेला है जो भारत के कोने कोने से प्रयाग, हरिद्वार, उज्जयिनी तथा नासिक पहुंचने वाले करोड़ों तीर्थयात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। भारत में सन्यासियों के सात संगठन हैं जिनमें प्रयाग का शाही स्नान नागा साधुओं द्वारा संपन्न होता है। नागाओं केे शाही स्नान के पश्चात नाथ, तीर्थ, गिरि, गोसाईं, पुरी, भारती तथा सरस्वती साधुओं का स्नान संपन्न होने केे पश्चात तीर्थ यात्रियों व गृहस्थों का स्नान संपन्न हो पाता है। यह प्रक्रिया दीर्घकाल से यथावत चली आरही प्रविधि है। आज हिन्द की पूरी आबादी एक अरब बत्तीस करोड़ के लगभग है जिसमें ईसाई व मुसलमान आबादी मात्र उन्नीस करोड़ के लगभग है। शेष आबादी चाहे वे सिख हों, जैन हों अथवा बौद्ध हों गंगा स्नान को महत्व देते हैं। एक अरब तेरह करोड़ लोगों में से कुंभ स्नान के अवसर पर पौषी पूनम से माघी पूनम तक रोजाना लाखों लोग त्रिवेणी में स्नान करते हैं। स्नान के महत्वपूर्ण पर्व पौषी पूनम, मकर संक्रांति माघी अमावस - मुख्यपर्व वसंत पंचमी तथा माघी पूनम हैं। कुछ लोग महाशिवरात्रि तक कुंभ में निवास करते हैं तथा महाशिवरात्रि के स्नान के पश्चात ही अपने अपने घर लौटते हैं।
पंचम वेद महाभारत के अनुशासनिक पर्व केे विष्णु सहस्त्रनाम स्त्रोत के अनुसार मनुष्य धर्म का पहला चरण ध्यानयोग है। ध्यानयोगी सन्यासी व साधुओं केे अलावा बौद्ध धर्मावलंबी तथा जैन धर्मावलंबी भी ध्यानयोग के राही हैं। ध्यान धर्म के पश्चात स्तुति, प्रार्थना तथा जप का स्थान आता है। धर्म का तीसरा चरण नमस्या है। आचार्य किशोरी दास वाजपेयी के अनुसार नमस्या ही नमाज है। चौथा चरण हवन से वातावरण शुद्धि का है। ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी के अनुसार चैतन्य महाप्रभु के निजी सेवक कृष्णदास विप्र ने महाप्रभु को माघ मेला प्रयाग जाने को कहा। चैतन्य महाप्रभु ने अपने सेवक की बात मान ली और वे प्रयाग के लिये चल पड़े। रास्ते में उन्हें कुछ पठान मिले जिनमें एक पठान मौलाना बड़े विद्वान थे। महाप्रभु की पठानों व मौलाना से संपन्न वार्ता में महाप्रभु ने उन्हें कहा - कुरआन शरीफ में भी भागवत धर्म व कृष्ण चरित्र का वर्णन है। नतीजा यह हुआ कि सारे पठान महाप्रभु के भक्ति संप्रदाय से जुड़ गये। ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी चैतन्य महाप्रभु के परम भक्त थे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु की सन्यास ग्रहण प्रक्रिया का वृन्दावन दास ठाकुर कृत चैतन्य भागवत में महाप्रभु के सन्यास ग्रहण का विस्तृत विश्लेषण किया है। जिस तरह आदि शंकर ने सन्यास ग्रहण करने के लिये अपनी जननी की स्वीकृति ली, माता से कहा कि मां की विधिपूर्वक अन्त्येष्टि करने के लिये सन्यासी होने के बावजूद वे उपस्थित होंगे। माता ने पुत्र को सन्यास ग्रहण करने की आज्ञा दे दी। सन्यास ग्रहण करने के बाद सन्यासी का संबंध परिजनों से छूूट जाता है पर आदि शंकर ने अपनी माता को दिये वचन का पालन पूर्ण रूप से किया यद्यपि उनके बंधु बांधव नंबूदिरियों ने आदि शंकर का साथ नहीं दिया तथापि शंकर ने अपनी माता की अंत्येष्टि अपने बलबूते पर संपूर्ण रूप से संपन्न की। महाप्रभु चैतन्य ने भी अद्वैत प्रभु के सहारे अपनी चैतन्य महाप्रभु की जननी शची को अपने पुत्र चैतन्य महाप्रभु से भेंट कराई। महाप्रभु की मां ने अपने सन्यास ग्रहण करने वाले पुत्र निमाई से कहा - वत्स पुरी को अपना केन्द्र बनाओ ताकि मां को बेटे के समाचार मिलते रहें। चैतन्य महाप्रभु ने मां के इस आदेश का पालन किया। हिन्द में पचासों ऐसे सन्यासी हैं जो प्रचार में यकीन नहीं करते। महाविष्णु के परम भक्त रहते हुए भी सांसारिक दोषों से बचते रहते हैं। ऐसे सच्चे सन्यासियों के बारे में तभी ज्ञान प्राप्त हो सकता है जब परमात्मा की असीम कृपा हो जाये। भक्तिवेदांत स्वामी ने अपने आराध्य चैतन्य महाप्रभु के सन्यास मार्ग का जो खाका खींचा है उसके मुताबिक ‘वेदांत का अध्ययन करने के बदले मैं संकीर्तन आंदोलन में इसलिये लगा हूँ क्योंकि मैं महामूर्ख हूँ।’ इस तरह चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं को इस युग के मूर्खों में से एक बताया जो वेदांत दर्शन का अध्ययन करने में सर्वथा अक्षम है। मूर्खोें द्वारा वेदांत का अध्ययन करने से समाज में इतनी अफरातफरी मची हुई है। महाप्रभु ने आगे कहा - चूंकि मैं महामूर्ख हूँ अतएव मेरे गुरू ने मुझेे वेदांत का अध्ययन करने से मना किया है ताकि मैं वेदांत दर्शन के साथ खिलवाड़ न करूँ। उन्होंने कहा - अच्छा यह होगा कि मैं भगवान के पवित्र नामों का संकीर्तन करते रहूँ क्योंकि हरिनाम संकीर्तन से ही मैं भवबंधन से सहजता से मुक्त हो सकूँगा। वृहद् नारदीय पुराण में ‘हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम केवलम् कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा’। महाप्रभु ने कहा - वेदांत सूत्र दिव्य शब्दों से अर्थात दिव्य परमेश्वर द्वारा उच्चारित ध्वन्यालोक है अतः वेदांत में त्रुटि, भ्रम, धोखा या अक्षमता जैसी मानवीय दुर्बलतायें नहीं हो सकतीं। उपनिषदों का संदेश वेदांत सूत्र में अभिव्यक्त है। उसमें जो कुछ भी प्रत्यक्ष रूप से कहा गया है वह निश्चित रूप से महिमामंडित है। शंकराचार्य ने जो व्याख्यायें (भाष्य) की हैं उनका वेदांत सूत्र से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। वे आगे कहते हैं - ब्रह्म सर्वोच्च सूचक है, दिव्य ऐश्वर्य से परिपूर्ण है तथा सर्वश्रेष्ठ है। ब्रह्म अंततः भगवान के व्यक्तित्त्व का सूचक है। अप्रत्यक्ष भाष्यों से प्रच्छन्न हो जाते हैं तथा निराकार रूप में स्थित किये जाते हैं। अध्यात्म जगत में जो कुछ भी है भगवान का रूप, शरीर, सामग्री सम्मिलित है, दिव्य आनंद से परिपूर्ण है। यह आचार्य शंकर का दोष नहीं है कि उन्होंने वेदांत का भाष्य लिखा। चैतन्य महाप्रभु की दृष्टि में हरिनाम संकीर्तन ही महत्वपूर्ण है।
पातंजल योग को हिन्द के हर आदमी तक पहुंचाने वाले योग गुरू बाबा रामदेव का जन्म पुरूषोत्तमी एकादशी, स्वाति नक्षत्र में हरयाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के एक गांव में 25 दिसंबर 1965 में हुआ। उनके पिता रामनिवास यादव ने बालक का नाम रामकृष्ण रखा। पिता पुत्र दोनों नामराशि थे। तब संवत् 2022 शकाब्द 1887 मलमास/अधिमास/पुरूषोत्तम मास था जो ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के मुताबिक पंद्रह दिसंबर 1965 को शुरू हुआ। अधिमास 16 दिसंबर से 29 दिसंबर 1965 अधिक शुक्ल पक्ष तथा 30 दिसंबर 1965 से 13 जनवरी 1966 तक पौष अधिक कृष्ण पक्ष याने दो संक्रांतियों (धनु संक्रांति व मकर संक्रांति) के बीच अमावस्या न होना अधिमास कहलाता है। भारतीय वाङमय के अनुसार हर उन्नीसवें वर्ष में तिथि, वार, ग्रह, नक्षत्र, करण तथा योग बदल वही होते हैं जो उन्नीस वर्ष पहले मलमास में रहे हों। भारतीय पंचांग कर्ता हर चौथे वर्ष सौर वर्ष 366 का दिन मानते हैं। यह स्थिति कमोबेश वही है जो ग्रेेग्रेरियन XIIIवें पोप द्वारा ग्रेग्रेरियन कैलेंडर तथा फरवरी का महीना 29 दिन वाला मनाये जाने बाबत निर्णय लिया। परम पावन पोप ने ग्रेग्रेरियन कैलेंडर 15 अक्टूबर 1582 को निश्चित किया तथा पहला लीप ईयर 1584 निश्चित किया। सन 1600 तक पांच लीप ईयर सन 1600 से आगे सन 2000 तक 100 लीप ईयर तय करने से पिछले 416 वर्षों में 104 लीप ईयर संपन्न हो चुके हैं। वेटिकन के सामने अहम सवाल चार अतिरिक्त दिनों को कहां और कैसे संयोजित किया जाये ? पुरूषोत्तमी एकादशी व स्वाति नक्षत्र में जन्मे रामकृष्ण यादव ने गेरूआ धारण कर अथातो योग जिज्ञासा से पातंजल योग मार्ग अपनाया। उनकी शिक्षा दीक्षा हरयाणा के गुरूकुलों के पश्चात ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के माध्यम से संपन्न हुआ। अभी उनकी जीवन नैया का इक्यावनवां वर्ष चल रहा है। आगामी 25 दिसंबर 2017 को वे बावनवेें वर्ष में प्रवेश करेंगे। उस दिन पौष शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि, चंद्रवार, पूर्वा भाद्रपदा नक्षत्र रात्रि आठ बज कर इकतालीस मिनट तक मूसल योग तीसरा पंचक होगा। हिन्द का मीडिया कहता है योग गुरू बाबा रामदेव व्यापार योग गुरू भी हैं। सवाल उठता है क्या गेरूआ पहनने से कोई सन्यासी हो जाता है ? क्या सन्यासी के लिये कांचन मुक्ति अनिवार्य शर्त नहीं है ? हिन्द में सन्यास शब्द के साथ बहुत ज्यादती होरही मालूम पड़ती हैै। क्रिकेट के खेल में रमण करने वाले महाशय कभी कभी घोषणा करते हैं कि वे क्रिकेट से सन्यास लेरहे हैं। राजनीति में रमण करने वाले महानुभाव कहते हैं कि वे राजनीति से सन्यास लेरहे हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सवाल कि मैं सन्यास के बारे में जानना चाहता हूँ ? यह सन्यास क्या है ? इसे कैसे अपनाया जा सकता है ? पार्थ अर्जुन और योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण दोनों सन्यासी नहीं गृहस्थ थे पर उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के जरिये सन्यास मार्ग का व्यापक खुलासा किया। ज्ञान, कर्म, सन्यास योग - ज्ञान योग याने गीता का दूसरा अध्याय जिसे सांख्य या ज्ञान योग भी कहा जाता हैै। ज्ञान योग के समानांतर कर्म योग तथा चौथा अध्याय ज्ञान व कर्म दोनों से सन्यस्त होने का मार्ग। अगला सूत्र कर्म सन्यास से प्रतीति होती है कि कर्म सन्यास का वरण करने वाले महानुभाव कर्म फल का सन्यास अपनायेंगे क्योंकि जब तक सांस है तब तक कर्म चाहते न चाहते होता रहेगा इसलिये कर्म सन्यास के कर्म (फल सन्यासी) के रूप में देखा जाना ज्यादा तर्कसंगत प्रतीत होता है। गीता का संदेश देने वाले योगेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं सोलह कलाओं के अवतार थे। कर्म वे भी करते थे पर कर्म फल से बंधे हुए नहीं थे। उन्होंने योग सन्यस्त कर्म का मार्ग सुझाया। नित्य सन्यासी कौन है ? क्या बाबा रामदेव को नित्य सन्यासी कहा जा सकता है ? नित्य सन्यासी का पहला गुण - यो न द्वेष्टि न कांक्षति अर्थात जो न तो वैर करता है और न ही कोई अपेक्षा (आकांक्षा) रखता है। क्या बाबा रामदेव किसी से भी द्वेष नहीं रखते ? और न किसी से कोई आकांक्षा या अपेक्षा रखते हैं ? इन दोनों सवालों का जवाब बाबा रामदेव स्वयं ही दे सकते हैं। वे अगले पूष महीने में 25 तारीख को अपने बावनवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उत्तराधिकारी कोई सन्यासी ही होगा। उनकी अभिव्यक्ति से लगता है कि उन्हें अपना अगला रास्ता खोजना हैै। जो बिजिनेस यज्ञ वे करते आरहे हैं क्या उससे उपराम लेना उनका लक्ष्य है ? उन्होंने स्वयं को सन्यस्त माना है पर सन्यासी होते हुए भी उन्होंने कांचन मुक्ति वह रास्ता नहीं चुना जो चैतन्य महाप्रभु ने अपनाया। सन्यासी आदि शंकर भी थे। सन्यास का सबसे पहला कदम कर्म फल त्याग व ज्ञान फल त्याग है। त्याग ही सन्यस्त जीवन की पहली सीढ़ी है। आदि शंकर, चैतन्य महाप्रभु तथा स्वामी विवेकानंद ऐसे सन्यासी थे जिन्होंने ज्ञान के समानांतर वैराग्य (त्याग) पथ का उल्लंघन कभी नहीं किया।
एक जमाना था जब ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ के पश्चात चौथी उम्र में व्यक्ति सन्यास मार्ग अपनाता था। वह स्थिति 75 वर्ष के पश्चात आती थी। रतन टाटा ने 75 वर्ष का होने पर टाटा कारपोरेट से अपने को अलग करना चाहा, महाशय मिस्त्री को कमान सौंपी पर करम गति टारे नाहिं टरी उन पर लागू होगया, फिर पुनर्मूषको भवः का रास्ता अपनाना पड़ा। पारसीक धर्मावलंबियों में महाशय जमशेद जी नसरवान टाटा ने हिन्द में उद्योग की जड़ें मजबूत कीं। हिन्द में आज टाटा यत्र तत्र सर्वत्र विद्यमान है। फिर घूम फिर कर बाबा रामदेव के सन्यस्त जीवन की ओर बढ़ते हैं। पुरूषोत्तमी एकादशी को जन्मे बाबा रामदेव पर पुरूषोत्तमी एकादशी सहित नंद यशोदा के लाड़ले श्रीकृष्ण का आशीर्वाद है। भगवद्गीता में पुरूषोत्तम योग में कहा गया है -
ऊर्ध्व मूलम् अधः शाखम् अश्वत्थम् प्राहुर्मव्ययम्, च्छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तम् वेद स वेदावत्।
इस ब्लागर की हार्दिक शुभकामना है कि बाबा रामदेव रचित अश्वत्थ वृक्ष जिसकी जड़ें धरती पर नहीं अंतरिक्ष में हैं, शाखायें छन्द हैं, श्रीकृष्ण का यह पुरूषोत्तम योग पुरूषोत्तमी एकादशी को जन्मे बाबा रामदेव को शतायु बनाये। नम्रतापूर्वक प्रार्थना इतनी ही है कि ध्वन्यालोक की अवहेलना न हो। वे भारत के प्रधानमंत्री महोदय को राष्ट्रऋषि के बजाय राजर्षि संबोधन को अपनाने पर विचार करें। हिन्द में अनेक महानुभाव ऐसे हुए हैं जिन पर भगवद् कृपा विद्यमान रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ऐसे राजर्षि हैं जो वाक्युद्ध कला के पूर्ण पारंगत हैं पर दुश्मनी नहीं रखते। राग द्वेष से ऊपर उठे हुए महान चिंतक हैं। अधिमास दोष से निवृत्ति के लिये बाबा रामदेव को पातंजल योग का अनुवाद भारत की सभी भाषाओं में उपलब्ध कराने का भी संकल्प लेना चाहिये ताकि योगाभ्यासी समाज अपनी अपनी भाषा में पातंजल योग मार्ग को समझ सके, अनुसरण कर सके। देश ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ के अनुसार सन्मार्ग का राही बने।
चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक का पहला श्लोक -
चेतोदर्पणमार्जनम् भवमहादावाग्नि निर्वारणम्, श्रेयः कैरव चन्द्रिका वितरणम् विद्यावधू जीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनम् प्रतिपदम् पूर्णामृता स्वादनम्, सर्वात्मनस्नयनं परम् विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम्।।
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