अथातो ब्रह्म जिज्ञासा - बादरायण कृत ब्रह्मसूत्र
अथातो योग जिज्ञासा - योगाचार्य पतंजलि कृत योगसूत्र
भागीरथी गंगा जहां हिमालय व उपहिमालयी उपत्यकाओं से भरतखण्ड या भारतवर्ष के मैदान में प्रवेश करती है उस मायापुरी (अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका, पुरी, द्वारावती चैव सप्तैके मोक्षदायिका) आठ पुरियों में ‘माया’ को वर्तमान में हरद्वार या हरिद्वार नाम से पुकारा जाता है। ज्योतिर्लिंग हिमालये तु केदारम् हिमालय के केदारखण्ड में स्थित है। केदारनाथ भगवान शंकर की पुण्यस्थली है इसलिये लोग मायापुरी को हरद्वार कहते हैं। हिमालय के चार हिमखंडों में पूर्वस्थ मानस खण्ड पहला है जो बदरिकाश्रम तक माना जाता है। जहां भगवान महाविष्णु का क्षेत्र है। विष्णु व हरि पर्यायवाची हैं अतः मायापुरी का दूसरा नाम हरिद्वार है अर्थात बदरीनाथ पहुंचने वाला दरवाजा। यहां एक कनखल नामक गंगा तट तीर्थ है जहां दक्ष प्रजापति ने यज्ञ किया पर अपने जामाता शंकर व सती अपनी कन्या सती के अलावा सभी को न्यौता। सती ने शंकर से कहा - आपके ससुर दक्ष प्रजापति विशाल यज्ञ कर रहे हैं। मैं अपनी मां, मौसियों व भगिनियों से मिलना चाहती हूँ। सती के मन में पितृगेह कौतुक उछालें भर रहा था। शंकर जी ने सती से कहा - बिन बुलाये जाना मौत सरीखा है पर सती अड़ी रहीं कि उन्हें कनखल जाना ही है। शंकर जी ने अपने गण नंदी से कहा - जाओ सती को कनखल पहुंचा आओ। सती ने पिता माता मौसियों मौसाओं भगिनी पतियों भगिनियों को ढोक दी पर किसी ने सती से बात तक नहीं की। सती को अपने पति शंकर का अपमान चुभ गया। यज्ञ भूमि में सती ने अपनी सामर्थ्य से देहाग्नि जाग्रत की और सती यज्ञ कुण्ड में कूद पड़ी। नारद ने समूचा आंखों देखा हाल कैलास में शंकर जी को बताया। शंकर के गणों ने दक्ष यज्ञ विध्वंस कर डाला। दक्ष को पछतावा हुआ - तब पछताये होउ का जब चिड़ियां चुग गयी खेत।
राजपूताना राजपूत योद्धाओं की और मारवाड़ी बनियों की जन्मभूमि है। बनिये लोग घर से निकल कर व्यापार करने जाते हैं। अंग्रेजों के हिन्द आने से पहले बनिये व्यापार करने साधु सन्यासियों तथा तीर्थ यात्रियों के साथ निकलते थे। जहां जहां रात्रि विश्राम करते वहां के लोग तीर्थ यात्रियों, साधुओं, सन्यासियों, फकीरों तथा बनिये सभी को साधु कहते थे। वे जो भाषा बोलते वह सधुक्कड़ी कहलाती। सधुक्कड़ी सारे हिन्द की लिंगुआ फ्रांका थी। सधुक्कड़ी के नामी कवि कबीरदास हुए हैं जिनका कहना था - कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपनो चलो हमारे साथ।
राजपूताना के मारवाड़ी बनियों में एक शब्द ‘उपराम’ प्रचलन में है। वे कहते हैं व्यापार से धन कमा कर उम्र साठ वर्ष से आगे बढ़ जाये तो ‘उपराम’ लो। मारवाड़ी बनियों और मारवाड़ी वामनों का एक गांव पिलानी है। यहां से माहेश्वरी बनिया समाज के बलदेव दास बिड़ला बीस वर्ष की उम्र में पहनने के कपड़ों के अलावा एक लोटा, कुंऐ से पानी खींचने के लिये रस्सी लेकर पूरब की ओर चल पड़े। कोलकाता बड़ा शहर था वह व्यापार करने लगे। चालीस वर्ष लगातार मेहनत कर धन अर्जन करने के पश्चात बलदेव दास बिड़ला ने अपने सभी बेटों को बुला कर कहा - उपराम लेरहा हूँ, काशी में गंगा तट पर रहूँगा। व्यापार संभालो एक भव्य मंदिर दिल्ली में बनाओ। मथुरा में जहां कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म हुआ वहां कृष्ण मंदिर बनाओ, मस्जिद को वैसे ही रहने देना। मस्जिद के बगल में कृष्ण मंदिर बनाओ। मंदिर में श्रीमद्भागवत का सदाचार श्लोक - यावत् भ्रियेत जठरम् तावत्स्वत्व हि देहिनाम्, अधिकम् योऽभिमन्येत स स्तेन दण्डमर्हति। यह उत्कीर्ण कर डालो। कोलकाता से पिलानी आते जाते सर्दियों में कंबल रख दो, व्यापार करो खुश रहो। कालीबाड़ी की काली तथा कृष्ण दोनों का बीजमंत्र क्लीं है। उसकी कृपा तुम्हारे खानदान पर बनी रहे। मुझे बुढ़ापा काशी विश्वनाथ की भूमि में बिताने दो। सेठ बलदेव दास बिड़ला को अंग्रेजी सरकार ने राजा की उपाधि दी और कहा - कोलकाता को उद्यमचारी बनाने का श्रेय राजा बलदेव दास बिड़ला को जाता है।
भगवद्गीता के अठारहों अध्यायों के अठारह योग हैं। उनमें नवां अध्याय राजविद्या, राजगुह्ययोग कहलाता है। मनुष्य मात्र में योगमार्ग का प्रथम स्त्रोत राजविद्या राजगुह्ययोग ही है। इस ब्लागर की कन्या जो लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में मास्टर आफ आर्ट्स उपाधिकारिता होने के साथ साथ तमिल भाषा का गहन अध्ययन प्राचार्य पद्मावती के सान्निध्य में संपन्न करती थी। उसने अपने पिता (इस ब्लागर) से पूछा - मा हि पार्थ व्यपाश्रित्य येप्युभि पाप योनयः स्त्रियो वैश्या स्तन्या शूद्रा तेऽपि यांति परागतिम्। कन्या का कहना था उक्त श्लोक में स्त्रियो शब्द जोड़ना अनुचित है। वह स्त्री स्वातंत्र्य की पक्षधर थी। इस ब्लागर ने कन्या को समझाना चाहा पर वह संतुष्ट नहीं हुई। उसका विरोध पापयोनयः से था। राजा बलदेव दास बिड़ला की मान्यता थी कि व्यापार में लाभार्जन तथा ब्याज कमाने से उन्हें जो अवांछित लाभ हुआ उससे छुटकारा तभी पाया जा सकता है जब व्यापार से बाहर निकल कर उपराम लिया जाये तथा प्रायश्चित्त किया जाये। पाप और पुण्य की अवधारणा केवल मनुष्य के लिये ही है दूसरे प्राणियों के लिये नहीं जो भोगयोनि में बसर कर रहे हैं। पाप का प्रक्षालन करने के लिये मनुष्य को केवल वही रास्ता सुगम है जिसके लिये व्यास जी ने अपने अठारह पुराणों में मूलतत्त्व क्या है ? यह बताते हुए कहा - अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम् द्वयम्। परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्। याने दूसरे को दुःख देना ही पाप है। एक बार पंडित नेहरू बिना बताये पवनार पहुंचे, उनकी संत विनोबा से राम राम दुआ सलाम हुई। संत ने पंडित जी से कहा - पंडित जी ‘राज्यान्ते नरकम् ध्रुवम्’। पंडित जी सोच में पड़ गये। विनोबा जी ने पंडित जी से कहा - पंडित जी यह तो प्रहसन है। मैंने विनोद में सही बात कही है। हिम्मत न हारिये पर पंक्तिभेद का पाप न कीजिये।
सौर पंचांगी हिन्द में बारह राशियों में पहली राशि मेष है। मेष राशि के पहले दिन को मेष संक्रांति भी कहते हैं। चांद्रमास और चांद्रवर्ष के मुताबिक पहला महीना चैत्र कहलाता है। जो संवत्सर पड़वा (महाराष्ट्र में गुड़ि पड़वा तथा दक्षिण में युगादि या उगादि कहलाता है) से शुरू होकर उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल पक्ष के बाद जो कृष्ण पक्ष आता है उसे वैशाख कृष्ण पक्ष कहते हैं पर आर्य सिद्धांत मानने वाले दक्षिण में चैती पूनम के बाद आने वाले कृष्ण पक्ष पड़वा को चैत्र कृष्ण कहा जाता है। नर्मदा नदी से दक्षिण में यही प्रथा है। वैशाख शुक्ल पक्ष इस बार ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अनुसार 26 अप्रेल 2019 को था। इस पक्ष का पहला महत्वपूर्ण दिन अक्खातीज, अक्षय तृतीया या परशुराम जयंती हैै। परशुराम जयंती पूरे पश्चिमी भारत तथा दक्षिण का अद्भुत व महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस पक्ष में आदि शंकर जयंती वैशाख शुक्ल पंचमी आदि शंकर जयंती है। वैशाख शुक्ल षष्टी रामानुजाचार्य जयंती है। गंगोत्पत्ति वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन हुई वह वैशाख शुक्ल सप्तमी कहलाती है। इस वर्ष केदारनाथ धाम के कपाट वैशाख शुक्ल अष्टमी को खुले वार बुध था नक्षत्र पुष्य दिन के नौ बज कर पैंतालीस मिनट तक मातंग योग बव करण रात्रि पौन बजे तक भारत के प्रधानमंत्री ने केदारनाथ में रूद्राभिषेक संपन्न किया। \ गणानांत्त्वा गणपति ग्वं हवामहे निधिनांत्त्वा निधिपति ग्वं हवामहे पक्ष में शनिवार को मोहनी एकादशी, परशुराम द्वादशी, नृसिंह चतुर्दशी, वैशाखी पूनम गंगाद्वारे (हरिद्वारे) स्नानम् बुद्ध जयंती इतने पर्व थे। योग गुरू के रूप में भारत विख्यात स्वामी बाबा रामदेव ने अपने संस्थान का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री के हाथों संपन्न कराया उन्हें राष्ट्रऋषि कहा। स्वामी रामदेव महाराज ने अपने संबोधन में गोमूत्र का जिक्र भी किया। उत्तराखंड के हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर में नीलगायें हैं। उत्तराखंड भूतपूर्व मुख्यमंत्री महाशय ने केन्द्रीय वन्य जीव संरक्षण मंत्रालय से गत वर्ष हरिद्वार की नीलगायों को मारने की अनुमति चाही। नीलगायें बिहार में भी फसल चौपट करती हैं। बिहार सरकार भी नीलगायों को मारना चाहती है। नीलगाय, जंगली सुअर तथा बन्दरों को मारने के लिये राज्य सरकारों में मारामारी हैै। जहां तक हरिद्वार जिले की नीलगायों जिन्हें हिन्द का अंग्रेजीदां भद्रलोक अमरीका व यूरप की तर्ज पर ब्लू बुल कहता है उसे हिन्द का वैदिक गणित नीलवर्णा गौ कहता है। यजुर्वेद की मान्यता है कि नीलवर्णा गौ मूत्र, पूर्णतः कृष्ण वर्णा गौ का गोबर, पूर्णतः ताम्र वर्णा गौ का दूध, पूर्णतः श्वेत वर्णा गौ का दही, कपिला गौ का घृत और कुशोदक मिला कर जो पंचगव्य बनाया जायेगा वह कायशोधक होगा। इस ब्लागर ने यह प्रसंग मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में प्रस्तुत किया। बाबा रामदेव महाराज को भी लगभग दो वर्ष पूर्व यह प्रसंग उनके संज्ञान में प्रस्तुत किया। गुजरात के जामनगर कृषि विश्वविद्यालय ने जरसी गाय के दूध व संकर गाय के दूध को बहुत हानिकारक घोषित किया है। जरूरत इस बात की है कि जहां जहां नीलगायों की बहुतायत है, नीलगायों के गोमूत्र का परीक्षण राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात सहित सभी प्रदेशों के कृषि तथा पशुपालन विद्यालयों जहां जहां अनुसंधान सुविधायें हैं संपन्न की जायें। हरिद्वार जिले की नीलगायों को नीलवर्णा गौ के गोमूत्र, पूर्णतः कृष्ण वर्णा गौ के गोबर, पूर्णतः ताम्र वर्णा गौ के दूध, पूर्णतः श्वेत वर्णा गौ के दही, कपिला गौ के घृत के लिये बाबा रामदेव नीलगायों को अपनी गौशाला में संरक्षण दें। दस हजार पांच सौ इकसठ करोड़ रूपये का लौटपलट कर रहे हैं, बिजनेस योगी हैं, रूड़की आई.आई.टी. से संपर्क कर उपरोक्त परीक्षण करायें ताकि नीलगायों की व अन्य रंगों की गायों की उपयोगिता व प्रामाणिकता वैज्ञानिक स्तर पर भी सिद्ध हो सके। बाबा रामदेव महाराज के संज्ञान में रघुवंश महाकाव्य में कालिदास ने राजा दिलीप द्वारा वशिष्ठ की कामधेनु गौ नंदिनी का अयोध्या के सरयू तट पर चरा कर मानस खंड में सरयू तट से तीन मील ऊपर चढ़ाई पर दारूकावन तक पहुंचाया। दारूकावन में एक देवदारू वृक्ष का नाम कवि कालिदास ने निकुंभ बताया। देवदारू वृक्ष निकुंभ से दिलीप सेव्या नंदिनी गौ ने अपनी पीठ रगड़ी। दारूकावन में रहने वाला कुंभोदर नामक सिंह नंदिनी गौ पर कुपित होकर झपटने लगा। राजा दिलीप ने कहा - गौ को मत मारो मुझसे युद्ध करो। बाबा रामदेव हिमालय की जड़ी बूटियों पर अंग्रेजी वैज्ञानिक अन्वेषण करा कर हिमालय की जड़ी बूटियों से कर्कव्याधि (कैंसर) के लिये आयुर्वेदिक औषध अथर्ववेद के मंत्रों के अनुसार नहीं जड़ी बूटियों की वैज्ञानिक गवेषणा से संपन्न करना चाहते हैं। उनके पास अथाह धनसंपदा है कोई ऐतराज नहीं। वे डेमोक्रेसी में जो जो उचित लगे वह करें पर विधिपूर्वक बनाया गया पंचगव्य कम खर्चीला उपाय हैै। वे प्रधानमंत्री महोदय से प्रार्थना करें कि हरिद्वार जिले के साथ सटे हुए बिजनौर जिले में जहां गंगा का प्रवाह है और मालिनी नटी का तट कण्वाश्रम जहां महर्षि कण्व ने विश्वामित्र मेनका कन्या शकुंतला का पालन पोषण हुआ दुष्यंत शकुंतला नंदन भरत का पोषण किया उस समूचे क्षेत्र को कनखल से लेकर शुक्रताल गंगा के बायीं तरफ बिजनौर के दायीं तरफ मुजफ्फरनगर नगर का वह इलाका जहां शुकदेव ने राजा परीक्षित को भागवत सप्ताह सुनाया इस समूचे इलाके में नीलगाय सहित हिन्द की विविध नस्ल की गायों के दूध, दही, घी, गोमूत्र तथा गोबर का परीक्षण जामनगर कृषि विश्वविद्यालय गुजरात तथा आई.आई.टी. रूड़की द्वारा यथाशीघ्र संपन्न करने का संकल्प लिया जाये। अंग्रेजी तरीके से कैंसर की दवा खोजने में वर्षों भी लग सकते हैं खर्चा भी अरबों रूपये में हो सकता है पर नीलवर्णा गौ के गोमूत्र, पूर्णतः कृष्ण वर्णा गौ के गोबर, पूर्णतः ताम्र वर्णा गौ के दूध, पूर्णतः श्वेत वर्णा गौ के दही, कपिला गौ के घृत एवं कुशोदक के विधिपूर्वक मिलान से तथा यजुर्वेद वर्णित मंत्रोच्चार से पंचगव्य बनाया गया तो वह कैंसर सहित ऐच.आई.वी. रोग की अचूक दवा होगी, खर्चा भी कोई खास नहीं होगा तथा कैंसर निवारण को मार्ग सहज ही प्रशस्त हो सकेगा। बाबा रामदेव ने प्रधानमंत्री महोदय को राजर्षि के बजाय राष्ट्रऋषि कह कर शब्द शक्ति का प्रयोग किया। जरूरत इस की बात की लगती है कि शब्द में सृजन शक्ति है। शब्द को तोड़ा मरोड़ा जाने के बजाय उसकी सृजन क्षमता पर श्रद्धा रखी जाये। भारत में श्री नारद को देवर्षि, वशिष्ठ को ब्रह्मर्षि, भीष्माचार्य को राजर्षि, बादरायण कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को महर्षि कहा गया है। आधुनिक युग में पुरूषोत्तम दास टंडन को राजर्षि कहा गया। अब आप ऋषि शब्द के दूसरे प्रयोग ऋषि देश (रसिया) की ओर ध्यान दें।
महर्षि पतंजलि का योगमार्ग, उन्होंने योग की जो विधियां पातंजल योग मूल संस्कृत में प्रस्तुत की हैं पतंजलि की महान अनुकंपा तथा पातंजल योग के मार्ग में बाबा रामदेव महाराज को सिद्धियां दिलाने का वास्तविक श्रेय जिस योगी को है उन्हें उस योगी को भी नहीं भुलाना चाहिये। नैनीताल में संत लीला साह ने योग मार्ग की दीक्षा सिन्ध के नानकपंथी आसाराम बापू को दी। भगवद्गीता के अठारहों अध्यायों के अलावा श्रीमद्भागवत महापुराण का बयालीस श्लोकीय नारायण वर्त्म कथन भगवद्गीता के पश्चात नारायण कवच योग मार्ग का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसमें बयालीस श्लोक हैं। इस योग कवच को परमहंस योगानंद महाराज ने महात्मा गांधी को सन 1935 में वार्धा में बताया। संत लीला साह की शरण में पहुंचे नानकपंथी आसाराम बापू को अंगुलियों के पोरवों में जो योग शक्ति छुपी है उसे समझाया। संत शिरोमणि लीला साह की अनुकंपा से आसाराम बापू ने हिन्द के करोड़ों लोगों को अपना अनुयायी बना डाला परंतु आसाराम बापू अपने भाग्योदय के सूर्य के प्रकाश को चिरस्थायी नहीं बना पाये। हिन्द में आसाराम बापू और संयुक्त राज्य अमरीका में विक्रम चौधरी दोनों सन्यासी नहीं गृहस्थी थे जिस कारण वे उस लोकश्रेय को टिकाऊ नहीं बना पाये जो उन्हें मिला था। अंततोगत्वा पतन के गर्त के राही बन गये। बाबा रामदेव में विशेषता यह है कि वे सन्यासी पहले हैं बिजनेसमैन बाद में। सन्यास योग तथा व्यापार एक दूसरे के पूरक नहीं विरोधी हैं।
चैतन्य महाप्रभु के जीवन तथा उनके शिक्षामृत के बारे में भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित भक्तिवेदांत स्वामी द्वारा रचित चैतन्य महाप्रभु की जीवनी व उनके उपदेश व्याख्यायित हुए हैं। वे लिखते हैं - वृन्दावन में महाप्रभु ने 24 महत्वपूर्ण स्थानों व घाटों में स्नान किया। उन्होंने बारह महत्वपूर्ण वनों की यात्रा भी संपन्न की। इन वनों की सारी गायों तथा पक्षियों ने उनका स्वागत किया मानो वे उनके पुराने मित्र हों। महाप्रभु उन सारे वनों के वृक्षों को आलिंगन भी करते जाते थे। वृन्दावन के उन महत्वपूर्ण स्थलों जहां जहां महाप्रभु गये - काम्यवन, आदीश्वर, पावन सरोवर, खदिर वन, शेषशायी, खेल तीर्थ, भांडीर वन, भद्र वन, श्रीवन, लौह वन, महावन, गोकुल, कालिय दह, द्वादशादित्य केशतीर्थ हैं। इन सभी स्थलों पर रास नृत्य हुआ।
परिवर्तिनि संसारे मृत को न जायते, स जातो ये न जातेन याति वंश (राष्ट्र) समुन्नितम्।
योगगुरू बाबा रामदेव महाराज कहते हैं उनके पतंजलि योगायतन का उत्तराधिकारी कोई सन्यासी ही होगा। हिन्द में सन्यासियों के छः अखाड़े हैं। पहला है गुरू गोरखनाथ सृजित नाथ अखाड़ा जिसके मौजूदा महंत योगी आदित्यनाथ हैं। संप्रति योगी आदित्यनाथ राजधर्म का पालन कर हिन्द के सबसे ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश को संवारने में लगे हैं। नाथ पंथ के अलावा गिरि, गोसाईं, पुरी, भारती, सरस्वती तथा नागा भी हिन्द के सन्यासी मार्ग के राही समाज हैं। इनके अपने अपने अनुशासन अखाड़े तथा महंत परम्परा की सतत पंक्ति विद्यमान है।
साने गुरू जी की आंतर भारती सभी भाषाओं व उनकी लिपियों में पतंजलि के योग सूत्रों का अनुवाद करा कर जो लोग संस्कृत भाषा से पूर्णतया अवगत नहीं हैं उनके लिये पातंजल योग सूत्र का अनुवाद करने के लिये बाबा रामदेव प्रयत्न करें ताकि ज्ञानेश्वरी, एकनाथी भागवत तथा तुलसीकृत रामचरित मानस की तरह हिन्द के लोग अथातो योग जिज्ञासा का तात्कालिक लाभार्जन कर सकें। उपनिषदों सहित भगवद्गीता में गाये गये - विषाद, सांख्य, कर्म, कर्मसन्यास, ज्ञान कर्म सन्यास, आत्मसंयम, ज्ञान विज्ञान, अक्षर ब्रह्म, राजविद्या, राजगुह्य विभूति, विश्व दर्शन, भक्ति, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ विभाग, गुणत्रय विभाग, पुरूषोत्तम, दैवासुर संपद, श्रद्धात्रय तथा मोक्ष सन्यास इन अठारह योगों का वितान है।
आज की तात्कालिक सामाजिक जरूरत जनसामान्य को ‘योग कर्मसु कौशलम्’ की ओर बढ़ाना है। अथातो ब्रह्म जिज्ञासा के नित्यपाठी स्वर्गीय झबेर भाई पी. पटेल तथा उनकी अर्धांगिनी चंचल बेन पटेल की दिवंगत आत्माओं को श्रद्धांजलि देते हुए भगवद्गीता केे तेरहवें अध्याय के चौथे श्लोक का पुनर्वाचन -
ऋषिभिः बहुधा गीतम्, छन्दोभिर्विविधैपृथक् ब्रह्मसूत्र पदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चते।
हिन्द के रूर्बन सोसाइटी के मंत्रदृष्टा झबेर भाई पी. पटेल को हिन्द के गांवों के उत्कर्ष का मंत्र ब्रह्मसूत्र की निरन्तर जिज्ञासा ने ही उपलब्ध किया जिसे वैकुंठ ल. मेहता, पंडित नेहरू तथा डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने सराहा। इजरायल का गांव निर्माण भारत के लिये प्रेरणा सूत्र है।
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