Wednesday, 24 May 2017

गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के पक्षधर हैं ?
मौलाना सैयद अरसाद मदानी 
सरकार उनकी बात सुने एवं हिन्द के मुसलमानों को भी गौरक्षक समूह से जोड़े।
            जमीयत उलेमा ए हिन्द के सदर सैयद अरसाद मदानी ने राज्य सरकार को सलाह दी है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाये। जनाब मदानी साहब का सुझाव मुल्क के लिये अत्यंत फायदेमंद हैै पर आज मुल्क में हिन्दुस्तानी नस्ल की गायों सहित हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक तथा पूर्व में अरूणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र कच्छ काठियावाड़ सहित राजस्थान और मालवा (पंजाब) तक हिन्द की देसी गायों की संख्या गुजरात की महत्वपूर्ण गौ नस्ल गिर गायों की संख्या का आकलन करने वाले बताते हैं कि गुजरात में गिर नस्ल की गाय संख्या पंद्रह हजार से अठारह हजार के बीच है। राजपूताना, हरयाणा और मध्यप्रदेश में कालंजर से लेकर नर्मदा नदी के समूचे तट की देसी नस्ल की गायों की संख्या क्या है ? दुग्ध विज्ञानी कहते हैं कि मुल्क में ए-1 दूध जरसी गायों व संकर गायों का दूध मांग में देसी नस्ल की गायों से बहुत आगे हैै। भारत सरकार और राज्य सरकारें भी जरसी गायों और संकर गायों के दूध के बल पर ही हिन्द में श्वेतक्रांति का संकल्प लिये हैं। दुग्ध विज्ञानी कहते हैं ए-1 दूध बाजार में चालीस से पैंतालीस रूपये लीटर बिक रहा है। उनका यह भी कहना है कि ए-2 दूध गुणवत्ता वाला है। यह हिन्द की परम्परागत गायोें का दूध है जो बाजार में साठ रूपये से लेकर पैंसठ रूपये लीटर तक बिकता है। दुग्ध प्रेमीजन इसी ए-2 दूध को पसंद करते हैं। दूध के बाजार में बोलबाला ए-1 दूध का ही है। मौलाना मदानी का यह कहना बहुत महत्वपूर्ण है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करो। इसमें ए-1 दूध और ए-2 दूध जो क्रमशः जरसी गायों व संकर गायों के दूध तथा हिन्द की परम्परागत गायों नस्ल की गायों की जो साठ नस्लें हिन्द की आजादी के वक्त थीं उनकी संख्या घट कर देसी गायों की 24 नस्लें मात्र रह गयी हैं। अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोेषित किया गया तो लोकतंत्र में संख्या बल बलवान होता है। जरसी गायंे और संकर गायें ही लाभान्वित होंगी देसी गायें पिछड़ जायेंगीं। एक तो उनकी संख्या ही कम है दूसरे उनका दूध पौष्टिक तो बहुत है किन्तु मात्रा कम है। दूध के व्यापार में देसी गायों के दूध के उपयुक्त होने के बावजूद देसी गायें पिछड़ जायेंगी। इसलिये जरूरत इस बात की है कि देसी गायों की जो 24 नस्लें देश में अभी बरकरार हैं उनकी गणना की जाये। देसी व संकर गायों को छोड़ कर हिन्द की देसी नस्ल वाली गायों को ही राष्ट्रीय पशु घोषित किये जाने का संकल्प लिया जाये। मुल्क का संपन्न समाज ही ए-1 दूध का उपभोक्ता तथा लाभार्थी है। ए-2 दूध की मात्रा कम होने के कारण दूध के बाजार में देसी गायों के दूध का वे ही लोग उपयोग करते हैं जो स्वयं गो पालक हैं अथवा जिन्हें देसी गायों के दूध का महत्व ज्ञात है। सर्वोत्तम दूध ताम्र या तांबे की रंग वाली गाय का होता है जिसे ताम्रवर्णा गौ कहते हैं। पूर्णतः सफेद रंग की गाय का दही, कपिला गौ का घी, शुद्ध देसी शहद तथा शुद्ध देसी शर्करा या बूरा से बने पंचामृत को यदि आप पीकर घर से बाहर निकलें या वाहन से यात्रा करें तो दुर्घटनाओं सहित अकालमृत्यु, अल्पमृत्यु, तथा अपमृत्यु से बच सकते हैं। हिन्दुस्तानी गायों में नीलवर्णा गौ या नीलगाय का गोमूत्र तथा पूर्णतः कृष्णवर्णा गौ या काली गाय का गोबर, ताम्रवर्णा गौ या तांबई रंग की गाय का दूध, श्वेतवर्णा गौ या सफेद गाय का दही, कपिला गौ का घी तथा कुशोदक मिला कर जो पंचगव्य बनता है वह कायशोधक है। मौलाना मदानी ने हिन्द की राजग सरकार को जो मशविरा पेश किया है वह हिन्द के हिन्दू व मुसलमानों के बीच दरार डालने वाले अंग्रेजी राज की फूट डालो व राज करो की नीति की प्रतीक है। अंग्रेेज बिना बीफ भोजन के जिन्दा नहीं रह सकते, उनके लिये बीफ भोजन अनिवार्य है पर सामिष होने के बावजूद हिन्द के मुसलमान रोजाना मांस का भोजन नहीं करते। आधुनिक हिन्द को यदि देसी नस्ल की गायों की संरक्षा करनी हो तो देश के नागरिक इस नतीजे पर पहुंच जायें कि भारत देश की देसी गायों की तथा यूरोपीय नस्ल की जरसी गायों व संकर गायों के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींचने की आवश्यकता निहायत जरूरी होगयी हैै तो देसी नस्ल की गायों की जो नस्लें आज भी भारत में बची हुई हैं उन्हें ही पूर्ण रूप से संरक्षण देना अब राष्ट्रहित में आवश्यक होगया हैै। पùभूषण महाशय किरीट शांतिला परेख ने भारत के गौ रक्षकोें को आगाह किया है कि आज देश में गौओं याने देसी नस्ल की गायों व बैलों की जो स्थिति है वह ऐसे ही चलती रही तो आने वाले पचास वर्षों में देसी नस्ल की गायें व गौवंश भारत में दिया लेकर ढूंढने पर भी कहीं दिखायी नहीं देंगे। दूसरी ओर भारत के सामिष आहारी समाज से पूछा जाये कि क्या उन्हें गौमांस या बीफ से परहेज है या वे शौक के कारण खाते हैं ? हिन्द के दो दिवंगत महानुभाव पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी केे सहपाठी अय्यर तथा जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने छाती फुला कर घोषणा की कि वे बीफ भोजी हैं। अगर मुल्क के सामिष भोजी समाज में बीस से पच्चीस प्रतिशत लोग बीफ भोजी हैं, मुल्क की जरसी गायों व संकर गायों का बीफ उन्हें निरन्तर मिलता रहे पर मुल्क की देसी नस्ल की गौ और बैलों को मार कर बीफ महोत्सव मनाने वाले हिन्द के लोगों को यूरप व अमरीका में जिसे मैडकाउ कहा जाता है उसका बीफ वे पाते रहें। देसी नस्ल की गौओं और बछड़ों को बूचड़खाने न जाने दिया जाये। राष्ट्रीय पशु मुल्क की केवल देसी नस्ल की गायों, बैलों व बछड़ों को ही घोषित किया जाये। हिन्द के नामचीन गौरक्षक उद्योगपति रामकृष्ण डालमियां के अनुज गौरहरि डालमियां बिहार के जसीडीह में गौरक्षा चलाते। उनका इकलौता बेटा संयुक्त राज्य अमरीका में बीफ भोजी था। गौरहरि डालमियां को अपने बेटे से वही तकलीफ थी जिसका महात्मा गांधी अपने पुत्र हरिलाल से अनुभव कर चुके थे। 
मौलाना सैयद अरसाद मदानी ने जो सुझाव दिया है उसमें ए-1 दूध देने वाली जरसी गायों व संकर गायों को राष्ट्रीय पशु का सम्मान दिये जाने के बजाय उन्हें हिन्द की श्वेतक्रांति का अग्रदूत माना जाये और काराकोरम से लेकर कन्याकुमारी तक पूर्व में अरूणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र काठियावाड़ व मेवाड़ के जोधपुर बीकानेर सहित पाकिस्तान की सीमा से जुड़े इलाकों की देसी नस्ल की गायों की पहचान, देसी नस्ल की गायों व बैलों की वास्तविक संख्या, आगणित की जाये और उन गायों बैलों को ही देसी गौ-बैल संरक्षण के लिये हिन्द की गौ वंश की नस्लों का उल्लेख करते हुए देसी गौ, देसी बैल को ही राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाये। श्वेतक्रांति के अग्रदूत ए-1 दूध के समर्थक तथा ए-1 दूध के व्यापार से मालामाल होने वाले लोगों की कोई सहानुभूति हिन्द की नस्ल की गौओं से नहीं है। भारत सरकार और राज्य सरकारें देसी नस्ल की गौओं और बैलों की संरक्षा केवल नाममात्र को कर रही हैं। लगता तो यह है कि बीफ महोत्सव तथा महिषासुर अभिनंदन नये युग के नये समाज का प्रतीक बन गया है जिसकी परिणति मैडकाउ बीफ ही है इसलिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ संचालक मोहन भागवत महाशय सहित जितने भी लोग गौरक्षाव्रती हैं उन्हें समूची दुनियां सहित हिन्द की मानव-पशु युति के बारे में ठंडे दिमाग से सोचनेे की जरूरत है। हिन्द की आज की युग पुकार देसी गौ नस्ल का संरक्षण है इसलिये केवल देसी नस्ल की गौओं को ही राष्ट्रीय पशु मान कर उनको बूचड़खानों में मारने से बचाया जाये। अगर हमने हिन्द की हर जरसी गाय व संकर गाय को भी वही दर्जा दे दिया जो गिर की गौओं, मेवाड़ की गौओं तथा हरयाणा की गौओं सहित हिन्द की देसी नस्ल की गौओं को मिलना चाहिये। गौरक्षा का लाभार्थी केवल यूरप नस्ल की जरसी गायें व हिन्द की संकर गायेें ही होंगी। मुल्क का देसी गौ देसी बैल पूर्ववत कटता रहेगा क्योंकि गो मांस, मानव मांस (निरामिष मनुष्य का मांस) मांसभोजियों के लिये ज्यादा अनुकूल है। 
हिन्द के मौजूदा समाज के बहुमत का युगधर्म यूरप व अमरीका की सभ्यता का अंधानुकरण है। हिन्द के आधुनिक मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक को लगता है कि यूरप व अमरीका की वर्तमान संस्कृति को अपने मुल्क में समृद्ध करना उनका लक्ष्य है इसलिये हिन्द की पुरानी सभ्यता व रहन सहन का तरीका उन्हें स्वीकार्य ही नहीं है। वे मानते हैं कि हिन्द की सभ्यता मौजूदा संसार के अनुकूल नहीं है इसलिये बीफ महोभोज तथा महिषासुर अभिनंदन सरीखे जो तौर तरीके हिन्द के प्रगतिशील विश्वविद्यालय अपना रहे हैं उनका विरोध अरण्यरोदन सरीखा है। देसी गौ संरक्षण हिन्द की संस्कृति का वह मूर्त रूप है जिसे संस्कृति के उद्गाता साने गुरू जी ने आंतर भारती संज्ञा दी। अगर केन्द्र व राज्य सरकारों के अंग्रेजी परस्त नौकरशाह अमरीकी पैंतालीसवें राष्ट्रपति महाशय डोनाल्ड ट्रम्प की तरह श्वेत नस्ल संरक्षा के समानांतर - लार्ड मैकाले द्वारा अपने  पादरी पिता को जो सैंतीस पन्ने लंबा पत्र 1857 में लिखा उसमें लार्ड मैकाले ने अपने पिताश्री पादरी को कहा - अढ़ाई सौ वर्ष पश्चात हर हिन्दुस्तानी भूरा अंग्रेज होगा। वह न तो मुसलमान होगा न ही हिन्दू, बपतिस्मा न होने के कारण उसे ईसाई भी नहीं कहा जा सकता पर भूरा हिन्दुस्तानी ईसाईयत का प्रतीक होगा। वह आज हिन्द में यत्र तत्र सर्वत्र दीख रहा है इसलिये देसी गौ संरक्षण के लिये हिन्द की देसी नस्ल गौ के संरक्षण का रास्ता ही अपनाइये। उसके साथ जरसी गाय व संकर गाय न जोड़िये तभी हिन्द की देसी नस्ल की गायें बच पायेंगी। जनाब सैयद अरसाद मदानी ने हिन्द की सरकार को जो सुझाया है उसे देसी नस्ल की गौ तक ही सीमित रखिये तभी गौरक्षा भी होगी एवं मुल्क का उत्थान भी होगा। 
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