Monday, 15 May 2017

वाणी उद्भव महाताण्डव नृत्यजन्य है ?
नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्।
हिन्दत्व को चमक देने वाला सूत्र आंतर भारती ही है।
हिन्द की वाणियों में व्याकरण सम्मत संस्कृत, व्याकरण रहित प्राकृत तथा साने गुरू जी की आंतर भारती याने प्राकृत के तद्भव स्वरूप की हिन्द की वर्तमान वाणियों असमी, मइती, बांगला, नैपाली, भूटानी, उड़िया, तेलुगुु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कोंकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कश्मीरी, डोगरी, फारसी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ी बोली को उर्दू नाम दिया गया है। वही खड़ी बोली जब नागरी लिपि में लिखी जाती है तो उसे हिन्द के लोग हिन्दी के नाम से पुकारते हैं। इन वाणियों के अलावा भारतीय संविधान ने सिंधी, संथाली, बोडो, मैथिली को भी हिन्द की भाषायी सूची में जोड़ा है। डाक्टर ग्रियर्सन ने हिन्द में 276 वाणियों के अस्तित्व को स्वीकारा। टाइम्स आफ इंडिया के बंगलुरू संस्करण के 30 अप्रेल 2017 के अंक के अठारहवें पृष्ठ में ‘आल दैट मैटर्स’ स्तंभ के अन्तर्गत अंग्रेजी उपन्यासकार विक्रम चंद्र का साक्षात्कार पांच सवालों पर महाशय अमुल्य गोपालकृष्णन ने लिया। अपनी बात को महत्व दिलाने वाले विक्रम चंद्र कहते हैं वामपंथी और दक्षिणपंथी हिन्द के समाज के लोगों की सोच शैली भाग्यपंथी का प्रतीक हैं। वस्तुतः 1991 के सोवियत संघ के विलय ने कार्लमार्क्स के समाजवादी या साम्यवादी सूत्र को अस्तित्वहीन कर दिया था। पूरी चौथाई शती बीत जाने पर भी जहां जहां दुनियां में वामपंथी अस्तित्व की बात की जाती है वाम अथवा कम्यूनिस्ट शैली दुनियां से गुम होगयी है। जहां कहीं भी चीन के कम्यूनिस्ट शास्ताओं सहित हिन्द के नक्सलवादियों का जहां जहां अस्तित्व रह गया है वे सब कार्लमार्क्स की डैस कैपिटल थिअरी के प्रेत मात्र हैं। उनके प्रेतत्व की मुक्ति के लिये चलने वाली गति बहुत धीमी है। इसलिये विक्रम चंद्र के इस कथन में कोई दम नहीं है कि संस्कृत ब्राह्मणी काल रिस्ट्रिकटेड लैंग्वेज है। विक्रम चंद्र की मातृभाषा (मदरटंग) पंजाबी है या हिन्दी के हरयाणवी डिंगल की खड़ी बोली में कौन सी भाषा है ? उन्होंने अपने आत्मवैभव में ये खुलासा नहीं किया। वैदिक ग्रंथ यह बताता है कि - ब्राह्मणोसि मुख मासीत्। आदमी हो या औरत उसके मुख से ही उसकी पहचान होती है। मनुष्य के शरीर में मुख के अलावा बाहु, उदर तथा पैर ये तीन हिस्से और हैं। वेदांत कहता है - यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे। सृष्टिकर्त्ता परमात्मा ने दो हाथ दो पांव वाले जीवों को वाणी स्वातंत्र्य दिया है जो दूसरे प्राणियों यथा पशु पक्षी सभी थलचर, जलचर तथा नभचर जीवों को उपलब्ध नहीं है इसलिये मनुष्य मात्र में उसकी पहचान कराने वाला मुख है वही ब्राह्मण है। विक्रम चंद्र ने रेडअर्थ, पोअरिंग रेन, सेक्रेड गेम्स, वीक, सबलाइन वगैरह कृतियां दक्षिण कैलिफोर्निया में जहां हालीवुड विश्व सिनेमायतन है अपने उपन्यास रचे हैं। उनसे जो पांच सवाल पूछे गये।
1. आपकी दृष्टि में संस्कृत का क्या मूल्य है ? 2. तो आप क्या यह मान्यता रखते हैं कि हम हिन्दुस्तानी अपने भूतकाल को राजनीतिक असहमति के कारण वर्जना संकटग्रस्त हैं ? 3.किस किस्म का ज्ञान हमारे दृष्टिपथ का अवरोध है ? 4. कौन से इतर तरीके हैं जिनसे आधुनिक तकनालाजी तथा मानव शास्त्र एक दूसरे से सीख सकते हैं ? 5. हिन्द की सरकार सांख्यपथ पर सांख्यमार्ग के किस तरह सक्रियता कर सकती है ?
संस्कृत और प्राकृत जहां तक वाणी का सवाल है वाणी तादाम्य अथवा वाणी विलास है। संस्कृत कवियों नाट्यकारों ने निरक्षर परन्तु श्रोत्रिय समाज के लिये वाणी के प्राकृत स्वरूप को अपनाया। वाणी शब्द शक्ति तथा अक्षर की महत्ता समझने और भाषा विज्ञान अथवा फिलोलौजी पर गहरी पैठ के बिना संभव नहीं है। वाल्मीकि रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि को हिन्द के लोग आदि कवि कहते हैं। वाल्मीकि के महाकाव्य तथा कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास में पंचम वेद महाभारत की संस्कृत से कालांतर में पाणिनि व्याकरण अस्तित्व में आया। महाशय विक्रम चंद्र, हम उन्हें संस्कृत शब्द योग के लिये योगा चंद्रा नहीं लिख रहे हैं वे फार्मल कम्प्यूटर लैंग्वेज तथा नेचुरल लैंग्वेज का प्रसंग भी उठा रहे हैं। अंग्रेजी अपने मूल देश बर्तानिया में भूमि की भाषा है। जब अंग्रेजी अपने उपनिवेश अमरीका पहुंची उसमें जमीनी बदलाव आगया। जब आप यूरप में जाते हैं फ्रांस, जर्मनी पुर्तगाल, स्पेन केे लोग अपने भाषायी देश में केवल विलायती लोगों की अंग्रेजी सुनते हैं बाकी लोगों को कह देते हैं अपनी भाषा में बात करो या हमारी भाषा में बोलो तभी संवाद होगा पर हिन्दुस्तान सरीखे देशोें में अंग्रेजी और अंग्रेजियत दोनों बेतहाशा हावी हैं। अंग्रेजी की लिपि दूसरे यूरप भाषाओं की तरह रोमन है जिसमें छब्बीस हरूफ, अक्षर या अल्फाबेट हैं। ग्रीक यूनानी अंग्रेजी या यूरप की दूसरी भाषाओं की अग्रजा है जिसमें केवल 24 हरूफ, अक्षर या अल्फाबेट हैं। ईरान की भाषा फारसी में फारसी लिपि में 28 हरूफ, अरबी में 32 हरूफ और हिन्द की उर्दू व अंग्रेजी को छोड़ कर 52 अक्षरों वाली नागरी के अलावा पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयाली, तेलुगु, ओड़िया, बांग्ला, मइती (मणिपुरी), असमी भाषाओं की लिपियों में नागरी की भांति 52 हरूफ हैं। हिन्द की ये सभी भाषाओं में जो लिखा जाता है वही उच्चारित भी होता है इसलिये नागरी लिपि व संस्कृत भाषा के शब्द जैसे बोले जाते हैं वैसे ही लिखे भी जाते हैं। कम्प्यूटर तकनालाजी के लिये भारतीय भाषायें पूर्णतया अनुकूल हैं। स्वामी विवेकानंद तथा ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी द्वारा अमरीका में अंग्रेजी के माध्यम से आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण हुआ। महाशय विक्रम चंद्र सहित हिन्दवी अंग्रेजी लेखकों के लिये अंग्रेजी वर्णमाला याने ए से लेकर जेड तक के 26 हरूफ थोड़ा बहुत रूपांतरित कर कम्प्यूटर तकनालाजी के अनुरूप ढाले जा सकते हैं ताकि रोमन लिपि उच्चारण के नजरिये से कम्प्यूटर अनुकूल बन सके। 
प्राश्निक (प्रश्नकर्त्ता) का दूसरा बिन्दु भाषाशास्त्र के बजाय वैचारिक अपकर्ष का प्रतीक होता है। वाणी व ध्वनि और ध्वन्यालोक का पहला सूत्र ‘भिन्न प्रकृतिर्हि लोकः’ है। जिस तरह अलग अलग लोगों की शक्ल सूरत और आवाज अलग अलग होती है उसी तरह मानव समाज में रूचि का भिन्न होना भी स्वाभाविक है इसलिये महाशय अमूल्य गोपालकृष्णन का सवाल ही विवादास्पद है। मिथोलाजी या आध्यात्मिक रहस्यवाद को समझने के लिये मराठी के एकनाथी भागवत के अठारह हजार अभंगों का अनुशीलन करना होगा अथवा संत ज्ञानेश्वर की ज्ञानेश्वरी के माध्यम से जिसे प्रश्नकर्ता पालिटिकल डिसऐग्रीमेंट कह रहे हैं उसका खुलासा संभव हो सकता है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी लगता है कि डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता का अंग्रेजी भाष्य प्रस्तुत करते समय यह स्वीकार किया कि अंग्रेजी के जरिये गीता की थाह पाना बालू से तेल निकालने सरीखा परिश्रम है। चार्वाक, जैन व बौद्ध विवेचना वेदों को अपरिहार्य नहीं मानती। उनके मतांतर से वेद तथा वैदिक ज्ञान एवं वैदिक गणित की महिमा कम नहीं हो जाती। कोई विचार सर्वकालिक व सार्वभौम नहीं होता। परिवर्तनशीलता प्रत्येक व्यक्ति, विचार, वस्तु, स्थान तथा तंत्र में बदलाव लाते रहती आयी है। पाणिनी व्याकरण धातुमूलक है। प्रत्येक अक्षर, शब्द, मंत्र की पाणिनी व्याकरण में व्याख्या हुई है पर अंग्रेजी समेत यूरप की सभी भाषाओं में ऋषि देश (रूस) की भाषा रूसी या रसियन जर्मनी की भाषा जर्मन के मौलिक रूप में नब्बे से पिचानबे शब्द तक संस्कृत मूल के हैं यह रूसी तथा जर्मन विद्वान भी मानते हैं। वे अपनी पुरानी भाषा को पुरानी रूसी या पुरानी जर्मन कह कर संबोधित करते हैं परंतु पाणिनीय व्याकरण में संस्कृत केे हर शब्द की हर धातु की व्याख्या हुई है इसलिये संस्कृत में सृजन क्षमता है जो यूरोप की भाषाओं में विद्यमान नहीं दिखती। पता नहीं महाशय विक्रम चंद्र ने प्रोफेसर सुनीति कुमार चाटुर्ज्या और डाक्टर हेम चंद्र जोशी की हिन्द भाषायी भाषा विज्ञानिता पर गौर फरमाया। इस ब्लागर को अभी तक यह पता नहीं लगा कि महाशय विक्रम चंद्र ने मैक्समूलर संपादित आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ऋग्वेद को पढ़ा या नहीं। यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की ऋचाओं छन्दों के बारे में उनकी मीमांसा क्या है ? उनका यह कहना कि वैदिक वायुयान अथवा गणेश मस्तिष्क के पुनर्स्थापन के यथार्थ क्या हैं ? समूचे यजुर्वेद में ‘गणानाम पतये’ शब्द यत्र तत्र उपलब्ध हैं पर गणेश शब्द अथवा गणेश केे मस्तिष्काभ्यन्तरण प्रसंग कहीं भी नहीं है। लगता है वैदिक वायुयान और गणेश मस्तिष्काभ्यन्तरण या तो भाषायी प्रहसन है या वाहवाही लूटने का मौका खोजने का प्रयास है। अगर महाशय विक्रम चंद्र संस्कृत भाषा वेदांत का अध्ययन पाणिनी व्याकरण और निघंटु के जरिये संपन्न करने के पक्षधर हों तो उन्हें नागरी लिपि में लिखीं संस्कृत पुस्तकें कंठाग्र करनी चाहिये। अंग्रेजी अनुवाद के जरिये संस्कृत की सांस्कृतिकता तथा भाषायी संस्कारिता को समझना मात्र पिष्ट पेषण है। 
विक्रम चंद्र फरमाते हैं कि कैलिफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय में अपने छात्रों को ध्वनि एवं रस (साहित्य का नवरस सिद्धांत जिसका षडरस सिद्धांत नहीं) का प्रयोग करते हैं। ध्वनिशास्त्र का मूल ग्रंथ ध्वन्यालोक विलुप्त है। संभव है जिस एक कालखण्ड के पश्चात लुप्त वेद और लुप्त ज्ञानक्रिया खुदा की तरह स्वयं धरती पर उतरती है जिसका उद्घोष स्वयं योगेश्वर वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किया और कहा - 
इमम् विवस्वते योगम् प्रोक्तवानहमव्ययम् विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकु वे प्रवीत्।
एवं परम्परा प्राप्तम् इमम् राजर्षयो विदुः स काले नेह महता योगो नष्ट परन्तप।
आगे श्रीकृष्ण ने अपने फुफेरे भाई अर्जुन से फिर कहा - 
स एवायम् मया तेद्य योगः प्रोक्त पुरातन। भक्तोऽसिमे सखा चेति रहस्यम् ह्येतदुन्तमम्।
          महाशय विक्रम चंद्र फिर कहते हैं उनके शिष्य - संभवतः उनमें और इनके शिष्यों में गुरू शिष्य प्रयोजन विद्यमान है। उनकी सोच है उनके छात्र उनके रस व ध्वनि प्रकरण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भावनात्मक गाथा से उसी प्रकार जुड़ते हैं जिस प्रकार तुलसीदास ने कहा -
 स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषामति मंजुल भातनोति।
तुलसी ने अवध की लोकभाषा अवधी में रामचरित मानस स्वान्तः सुखाय रचा। महाशय चंद्र फरमाते हैं कि वे अपने शिष्यों पर प्रवासी आनंदातिरेक बरसाते हैं तथा फ्रांसीसी भाषा के हेमलेट शब्द से प्रेरणा लेकर अंग्रेजी में हैमलेट शब्द का प्रयोग करते हैं। उसे हम हिन्दुस्तानी लहजे में पुरवा, तोक या बाखली कह सकते हैं, ज्यादा से ज्याद चार पांच घरों वाला पुरवा। विक्रम चंद्र सन्यासी (जिसे हिन्द में यति कहते हैं पूर्ण सन्यास लेने से पूर्व की स्थिति) का जिक्र भी किया है। हिन्द में स्वामी रामकृष्ण परमहंस विवाहित होने के बावजूद परमहंस थे। अपनी विवाहिता स्त्री से सहवास करने के बजाय उन्हें भी परमहंस संहिता का पाठ पढ़ाया करते थे। आधुनिक युग में बाबू जयप्रकाश नारायण विवाहित थे। उनकी भार्या प्रभावती मुजफ्फरपुर के नामी वकील बाबू ब्रज किशोर की कन्या थीं। विवाहित जोड़ा होने के बावजूद जयप्रभा दम्पत्ति क्रमशः ब्रह्मचारी व ब्रह्मचारिणी थे। हिन्द की योग मार्ग वाली जीवनी बिताने वाले लोगों की संख्या करोड़ों में है। महाशय विक्रम चंद्र जी भारतीय वाङमय में एक शब्द नैऋत है। हिन्द के दैत्यराजों, राक्षसों व रजोगुण धारकों सहित और्वोपदिष्ट योग, और्वोपदिष्ट मार्ग तथा और्व शुक्राचार्य का एक नाम और्व भी है। वर्तमान अरब देश शुक्राचार्य के दैत्य व दानव शिष्यों का मूल देश है। शुक्राचार्य में यह शक्ति थी कि वे अपने मृत शिष्य को चुटकी बजा कर जिन्दा कर देते इसीलिये तो अरब के लोग हर जुम्मे (शुक्रवार) को पांच बार नमस्या (नमाज) अता करते हैं। हठयोग से एक नया समाज बनाते हैं। जिसे यूरप के लोग ह्यूमैनिटीज कहते हैं यद्यपि यूरप के ऋषि देश (रसिया) व शर्मणी जर्मनी का मूल प्रादुर्भाव कश्यप आश्रम कश्यप सागर तथा कश्यप के दिति और दनु भार्याओं की संतान से जुड़ा हुआ है। यूरप की नजर में प्रागैतिहासिक है पर देखने की बात यह है कि यूरप के केवल दो देश रसिया और जर्मनी का सीधा नाता कश्यप आश्रम कश्यप गृहस्थ भार्याओं दिति और दनु पुत्रों पर आधारित है। कश्यप की पहली भार्या अदिति के पुत्र आदित्यादि इन्द्र वगैरह त्रिविष्टप (तिब्बत) निवासी थे। आदित्य होने के कारण उन्हें देवता तथा दिति दनु पुत्रों को दैत्य दानव कहा जाता था पर दिति दनु के पुत्र असाधारण योग्यता धारक थे। महत्वपूर्ण सवाल आज यह है कि तथाकथित वर्तमान पूरे यूरेसिया में जिसे भारतीय वाङमय जम्बू द्वीप कहता है चार मुख्य स्थान थे। दितिनंदन हिरण्यकश्यप की दैत्यधानी हरिद्रोही अदितिनंदन इंद्रादि की देवधानी त्रिविष्टप तथा दनुनंदनों की दानवधानी ऋषि देश तथा शर्मणी के अलावा दनु के पुत्रों शुंभ निशुंभ की दानवधानी शुंभगढ़ उत्तराखंड राज्य के बागेश्वर जिले में सरयू तट पर स्थित गांव जिसे आजकल सुमगढ़ कहते हैं, में थी। इन सभी की भाषा वैदिक संस्कृत तथा व्याकरण निघंटु था। मार्कण्डेय पुराण में शुंभ शक्तिमत्ता का विश्लेषण किया गया है। गिरिराज कन्या - गिरिजा ने शुंभ को कहला भेजा -
यो माम् जयति संग्रामे यो मे दर्पम् व्यपोहति यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति।
आज की भारतीय नारी शक्ति के लिये गिरिजा का उक्त कथन नारी कवच का मुख्य बिन्दु है। आधुनिक तकनालाजी एकदम ताजा अभियान है। यूरप की ह्यूमैनिटी मात्र दो हजार वर्ष उम्र की है। भारतीय नृवंश यात्रा एक अरब पिचानबे करोड़ अठावन लाख पिचासी हजार एक सौ अठारह वर्ष पुरानी है इसलिये हिन्द नृवंश पंक्ति आधुनिक हिन्द के अंग्रेजीदां भद्रलोक इतिहासवेत्ताओं के लिये अस्पष्ट प्रागैतिहासिक चिंतन पोखर सरीखा है जिसमें गोते लगाना उन्हें समय की बर्बादी महसूस होता है इसलिये वे हिन्द के हिन्दत्व को बर्तानियां राज का प्रसाद मान कर आधुनिक हिन्दुस्तान की कहानी गढ़ना चाहते हैं। दुनियां के विकसित राष्ट्रों में केवल जापान ही ऐसा देश है जो सूर्य नमस्कार करने के साथ साथ यूरप की सभ्यता के समानांतर चल कर विशुद्ध जापानी रह कर ही अपना प्रभामंडल संजोये हुए है। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने जब मई 2014 में भारत का राजतंत्र अपनी मुट्ठी में रखा उन्हें बधाई देने आस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महोदय महाताण्डव के नृत्य उद्घोष कांस्य नटराज प्रतिमा जो हिन्द से चुरा ली गयी थी उसे आस्ट्रेलिया ने प्राप्त कर भारत के प्रधानमंत्री को लौटाया। वह कांस्य नटराज मूर्ति लगभग 4000 वर्ष पुरानी है उसे हिन्द की सरकार को हिन्द की वाणी विश्व में प्रतिष्ठित हो इस दृष्टि से राजपथ में भव्य द्वार बना कर प्रतिष्ठित किया जाये ताकि हिन्दत्व अपने वाणी वैभव से विश्व का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सके। 
विक्रम चंद्र से अपना पांचवां सवाल पूछते वक्त संभवतः प्रश्नकर्ता के मन में कपिल मुनि का सांख्ययोग घूम रहा था। कपिल मुनि मनु शतरूपा के दौहित्र (धेवता) कर्दम देवहूति के पुत्र तथा दुनियां में सांख्यशास्त्र के प्रवर्तक रहे हैं। डिजिटल इंडिया को सांख्याचार्य कपिल इंडिया के रूप में देखने की जरूरत है। कपिलाश्रम में प्रतिवर्ष मकर संक्रांति को हिन्द के लाखों लोग गंगा-समुद्र स्नान लाभ करते हैं। 
संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी सहित हिन्द की 22 भाषाओं का आंतर भारती संगम हिन्द संस्कृति को प्रकाश में लाने वाले साने गुरू जी का स्मरण अत्यंत आवश्यक है। हिन्द की ऊहापोह की स्थिति से निबटने में न केवल अंग्रेजी का दामन मददगार होगा और न हिन्दीतर भाषा भाषियों में हिन्दी के प्रति जोश का वातावरण विद्यमान है। हिन्दी ही नहीं नागरी लिपि के प्रति भी शंकायें व्याप्त हैं उनके निवारण के लिये पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, मइती (मणिपुरी), असमी भाषाओं को पड़ोसी भाषा लिपि को यथा असमी को बांग्ला तथा बांग्ला को असमी, उड़िया को नागरी, तेलुगु को तमिल व नागरी, तमिल को मलयाली तेलुगुु, कन्नड़ को तमिल व नागरी लिपियां अतिरिक्त लिपि के रूप में अपनानी चाहिये ताकि क्षेत्रीय भाषाओं व लिपियों में सामंजस्य कायम हो सके। रोमन लिपि में 26 अल्फाबेट हिन्द की लिपियों में 52 अल्फाबेट हैं। हिन्द से अंग्रेजी को भगाना लगभग असंभव सा है इसलिये हिन्द की लिपियों व रोमन लिपि के उच्चारण तथा लेखन में सामंजस्य के लिये तात्कालिक कदम उठाये जायें। आंतर भारती लिपि सामंजस्य इन्क्वायरी कमीशन का गठन कर भारतीय भाषाओं व अंग्रेजी के बीच भाषायी सौहार्द पुल का निर्माण राष्ट्रीय जरूरत है।
अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का मतलब यह नहीं है कि अभिव्यक्तिकर्ता मनचला हो जाये। शब्द शक्ति की जो जमीनी महत्ता है उसे भूल जाये और यह कहने लगे कि मैं जो कह रहा हूँ वही निर्णायक सत्य है। मध्यम मार्ग को अपनाना वैचारिक समाज के लिये ज्यादा जरूरी है। अभिव्यक्ति भी एक कर्म है उस कर्म के प्रतिफल को कर्ता को भोगना ही होगा इसलिये विक्रम चंद्र महाशय तथा उनकी सोच शैली को अनुयायी भारत के प्रवासी अंग्रेजीदां भद्रलोक समाज के भाषायी मैकोलाइट भंगिमा के समानांतर अगर वह हिन्दुस्तान में जन्मे हैं हिन्दुस्तान की वाणियों में से कोई वाणी उनकी मातृभाषा है उसका परिहास न करें। यह समझने की कोशिश करें कि हिन्द की वाणियों में जो सृजन शक्ति विद्यमान है उसे वे अपनी चाहत वाली अंग्रेजी भाषा के समानांतर रखने का प्रयत्न करें। मानव को जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव में केेवल मातृभाषा ही याद रह जाती है। दो मातृभूमि और मातृभाषा का परिहास मनुष्य को मत्त, उन्मत्त और प्रमत्त हाथी की तरह जीवनयापन से परहेज करना तकनालाजी के युग का युगधर्म है। 
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