अथातो काम जिज्ञासा ?
ब्रह्मसूत्र व योगसूत्र की तरह अथातो काम जिज्ञासा का नया मंत्र।
मनुष्य को काक मैथुन से सीख लेनी जरूरी लगती है।
स्त्री पुरूष प्रसंग पूर्णतः दोनों की वैयक्तिक निजता है उसे उघाड़िये नहीं।
नारी प्रवेश को सम्मान दीजिये।
सुप्रीम कोर्ट की वकील महाशया अवनि बंसल ने अपने बारह सूत्रीय स्तंभ में सेक्स (भारतीय वाङमय का स्त्री सुख शब्द यूनान होकर यूरप को पार कर विलायत पहुंचने पर सेक्स कहा जाने लगा) पर खुली बहस करने का आह्वान किया है। अंग्रेजी भाषा के सेक्स शब्द को लैटिन भाषा के शब्द ‘सेक्सस’ से निसृत बताया गया है। अंग्रेजी शब्दकोष सेक्स की मीमांसा करते हुए व्यक्त करता है - मानवों में पुरूष-स्त्री जोड़ा, मनुष्यों में पुरूष-स्त्री पार्थक्य। वह पुरूष है अथवा स्त्री ? पुरूष स्त्री युगल, कोशकार सेक्सुअल इन्टरकोर्स कह कर पुरूष स्त्री समागम की व्याख्या करता हैै पर हिन्दुस्तान जहां के सुप्रीम कोर्ट में महाशया अवनि बंसल वकालत करती हैं उस मुल्क में एक शब्द मिथुन प्रयोग में आता है। मिथुन के मायने एक पुरूष और एक स्त्री का जोड़ा। पिता पुत्री एक साथ जारहे हों वह मिथुन है। मां बेटे एक साथ चल रहे हों वह भी मिथुन है। भाई और बहन का जोड़ा भी मिथुन है। एक पुरूष और एक स्त्री यदि अमरकोश के अनुसार चल रहे हैं वह भी मिथुन है। ‘विवाहो उत्वाहश्च’ अमरकोश विवाह की व्याख्या करता है। स्त्री पुरूष समागम विवाह या उद्वाह है। यह है हिन्द की बारह राशियों में तीसरी राशि मिथुन का भाष्य। मिथुन का सूर्य आमतौर पर पंद्रह या सोलह जून ग्रेग्रेरियन XIII कैलेंडर के अनुसार पड़ता है। इसे हिन्द में आषाढ़ का महीना कहा जाता है। महाकवि कालिदास ने लिखा - आषाढ़स्य प्रथम दिवसे मेघमाच्छन्न आकाशे। आषाढ़ महीने के पहले दिन मिथुन संक्रांति को आकाश में बादल छाये रहते हैं। सूर्य के उत्तरायण के छः महीनों में आषाढ़ पांचवां महीना है। आषाढ़ समाप्त होने के अगले दिन कर्क संक्रांति या सूर्य दक्षिणायन का पहला दिन होता हैै। दक्षिणायन के पहले महीने को श्रावण या सावन कहते हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय की वकील महाशया अवनि बंसल फरमाती हैं - इस दुनियां का स्वयंभू (वैसे ब्रह्म शब्द बहुत व्यापक है वह परब्रह्म भी कहलाता है) सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जिनको चतुर्मुख माना जाता है वे क्षीरसागर में मणिधर शेषनाग की शय्या में सोने वाले महाविष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल में आसीन हैं। जब अवनि बंसल सरीखी विदुषी और वकील यह कहती हैं कि सरस्वती का सृजन ब्रह्मा ने किया, वे सरस्वती को ब्रह्मा की भार्या कहने में भी संकोच नहीं करतीं जबकि गीर्वाक् वाणी सरस्वती का उद्भव नटराजराज के महाताण्डव नृत्यांत में आदिदेव महादेव के डमरू से चौदह ध्वनियां निकलीं ‘नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्’ तो गीर्वाक् वाणी सरस्वती का वही उद्गम है। महाशय अवनि बंसल के आलेख से यही प्रतीति होती है कि उन्होंने गायत्री और सरस्वती को एक मान लिया जबकि गायत्री और सरस्वती दो अलग अलग व्यक्तित्त्व हैं। पहले महाशय अवनि बंसल के शेष ग्यारह सूत्रों को सार रूप में प्रस्तुत करना इसलिये जरूरी है क्योंकि वे हिन्द की उस पीढ़ी की उत्पाद हैं जब माता से बेटी, सास से बहू पीढ़ियों से खानदान में चले आरहे श्रौत संस्कार निरन्तरता बनाये रखते थे। पंद्रह अगस्त 1947 के पश्चात हिन्द के पिछले सत्तर वर्षों में भारत के आधुनिक समाज हिमालयनुमा क्रांतिकारी बदलाव आया है। यह बदलाव सवा पांच हजार वर्ष पूर्व कृष्ण द्वैपायन बादरायण वेदव्यास के अवधूत पुत्र शुकदेव तथा वसुदेव देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण जिन्हें हिन्द केे लोग महाविष्णु का सोलह कलाओं वाला अवतार मानते हैं, को उनकी स्त्री मनोज्ञता याने स्त्रियों के मनोभावों का सटीक रूप से समझने वाला व्यक्तित्त्व माना गया है। शुक और कृष्ण द्वैपायन यमुना के किनारे किनारे गोकुल की तरफ जारहे थे। यमुना में गोपियां स्नान कर रही थीं। शुकदेव ने उन्हें यमुना में नग्न स्नान करते हुए देखा। शुकदेव आगे बढ़ गये क्योंकि उनकी दृष्टि में हर स्त्री मां थी। मां अपने पुत्र के सामने नग्न रह सकती है। जब बूढ़े व्यास उस स्थान पर पहुंचे गोपियां अपने अपने कपड़े खोज कर पहनने लगीं। यह घटना नारद भी देख रहे थे। पिता पुत्र के निकल जाने के बाद नारद ने गोपियों से पूछा - शुक तो सोलह साल का नौजवान है उसे देख कर आप लोगोें को लज्जा नहीं आयी पर बूढ़े व्यास को देख कर आप अपने अपने कपड़ों पर क्यों झपट पड़ीं ? गोपियों ने नारद से कहा - देवर्षि ! शुक की नजर में औरत मां है पर व्यास जी के लिये यह नहीं कहा जा सकता। उन्होंने अपनी मां सत्यवती के कहने पर अंबिके और अंबालिके से संतान पैदा की। यहां तक कि जार कर्म के लिये कृष्ण द्वैपायन ने अंबिके की दासी से भी सहवास किया। कहा - यह उन्होंने मां के हुक्म पर किया।
महाशया अवनि बंसल फरमाती हैं कि गणेश भगवान शिव व देवी पार्वती के अयोनिज पुत्र हैं। संभव है उन्होंने अपने माता पिता के धाम में सावन के महीने में शिवार्चन देखा हो। सावन का महीना भगवान शंकर जी का प्रिय महीना है। घर घर में पार्थिव पूजन होता है। गणपति आराधना को सही समझना हो तो महाराष्ट्र में मनाये जाने वाले ग्यारह दिवसीय गणपति महोत्सव क्यों मनाया जाता है, गणपति क्या हैं ? महाराष्ट्र में बालगंगाधर तिलक ने गणपति महोत्सव शुरू कर भादों सुदी चतुर्थी गणपति चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी पर्यन्त मनाया जाने वाला उत्सव यजुर्वेद के रूद्राभिषेेक से जुड़ा हुआ है। समूचे यजुर्वेद में ‘गणानांत्वा गणपति ग्वं हवामहे निधिनांत्वा निधिपति ग्वं हवामहे’ गणेश शब्द का कहीं उपयोग नहीं हुआ हैै। गणेश का मूल शब्द तो गणपति है याने लोगों का एक झुंड या समुच्चय गण कहलाता है उसका अग्रचर गणपति कहलाता है। इस ब्लागर ने भी बचपन में अपने घर में गोबर गणेश की पूजा करते हुए अपने पिता को देखा है। वे गणेश को विघ्नेश भी कहते थे। विघ्नेश माने विघ्न करने वाला साथ ही विघ्नों से छुटकारा देने वाला भी। वे मंत्र बोलते थे - ‘विघ्नेश विघ्न रूपेण ग्रहाण दश मोदकान्’। विघ्नेश ब्राह्मण के रूप में दस लड्डू पावो मेरे विघ्न दूर करो। यह टोटका है। वे कृष्ण की सोलह हजार एक सौ आठ पटरानियों का भी जिक्र करती हैं। हजारों गोपियों के साथ यमुना तट पर क्रीड़ा करने का प्रसंग भी उठाती हैं। याज्ञसेवी अयोनिजा द्रौपदी के पांच पति होने का उल्लेख भी करती हैं। शायद उन्होंने महाशया कमला सुब्रह्मण्यम का महाभारत अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा हो मूल महाभारत नहीं। अगर वे पूरा महाभारत नहीं भी पढ़ती केवल शांतिपर्व के युधिष्ठिर के सवाल व भीष्माचार्य के जवाब पढ़ती तो शायद उन्हें वैचारिक तौर पर महाभारत महाकाव्य की पंचम वेद सरीखी विशेषता का आभास होता। उन्होंने केवल गणेश, शिव पार्वती, देवकीनंदन वासुदेव श्रीकृष्ण और द्रौपदी कथानकों के आधार पर आध्यात्मिक संदेश का जिक्र किया है। युवा कन्याओं तथा कुमारों में रति और काम किस तरह अपना आक्रमण करते हैं ऐसा लगता है उन्हें युवा युवतियों में जो आकर्षण उनके अपनी जवानी के दिनों से जो फर्क लगता है वह समय की परिवर्तनशीलता का द्योतक है। आज युवा युवतियों में कामातुरता का जो वेग है वह भी बदलाव लायेगा। विवाह संस्था लगभग टूट गयी है पुरूष का स्त्री के लिये आकर्षण स्त्री का पुरूष के लिये आकर्षण ने नया बाना पहन लिया है। महाशया अवनि बंसल को इस दौर की चिंता छोड़ देनी चाहिये। उन्होंने अपने पड़ोस की लड़़की का जो आठवें दर्जे मेें पढ़ती है उसका भी जिक्र किया है। वह किशोरी लगभग बारह तेरह वर्ष की रही होगी। उसने महाशय अवनि बंसल से अपनी मां से सुनी हुई बात बताई। कुमारी कन्या ने महाशय अवनि बंसल से पूछा - दीदी क्या कोई मनचला मुझे छू ले तो क्या मैं गर्भवती हो जाऊँगी ? कन्या ने महाशय अवनि बंसल को कहा - उसकी मां ने कहा है अगर कोई लड़का उसेे छू ले तो वह गर्भवती हो जायेगी। महाशया अवनि बंसल भी मानती हैं कि कन्या की मां ने जो कहा वे उसकी प्रशंसक हैं। अगले सूत्र में महाशया अवनि बंसल कहती हैं - विलायत में कन्या-कुमारों को सेक्स ऐजुकेशन दी जाती है। संयुक्त राज्य अमरीका के भी कई राज्य घटकों में यह व्यवस्था है। वे कहती हैं हिन्द की सरकार भी इस पर विचार करे। वे कहती हैं सेक्स के बारे में भ्रांत धारणाओं का बोलबाला है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मानव संसाधन मंत्रालय ‘सेक्स’ शब्द के प्रयोग से भी परहेज कर रहा है।
प्रतीति होती है कि किशोरावस्था की कन्या तथा कुमार का रति आकर्षण व कामाकर्षण का वेग अत्यंत तीव्र होता है। महाशया बंसल के पुत्र पुत्री किस वय के हैं ? उनके विवाह की चिंता महाशय बंसल व उनके पतिदेव को होनी स्वाभाविक है। उनका उपनाम प्रतीति कराता है कि वे मारवाड़ी बनिया समुदाय से हैं। हिन्द का बनिया समुदाय अपने सद्व्यवहार के कारण इस्लाम या इसाईयत की तरफ नहीं बढ़ा। परम्पराओं तथा पारिवारिक मर्यादाओं के साथ साथ ज्यादातर बनिये अपने पुरोहित के निर्देशन में परिवार के कार्य संपन्न करते हैं पर व्यापक युगांतर के कारण जो असर युवाओं पर हुआ है वह युगधर्म है। परिवार के कृत्य मीडिया और अखबारों की सुर्खियां न बनें इसको हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ मान कर जिसे आज पारिवारिक प्राइवेसी कहा जाता है परिवार के प्रसंग गोपनीय रहें लोकचर्चित न हों इसके लिये विघ्नेश गणेश की षोडषांग पूजा भी संपन्न करनी पड़े वह करनी ही चाहिये।
महाशया अवनि बंसल का आठवां सवाल संभवतः स्वपरिवार से ज्यादा संबंधित लगता है। वह सही कहती हैं परिवार में पुत्र या पुत्री विवाह दोनों स्थितियों में यदि परिवार संयुक्त है, दम्पत्ति के वृद्ध माता पिता, सास ससुर जिन्हें दुनियावी ज्ञान का अनुभव है जिनके सामने अनुकूल प्रतिकूल दोनों ही तरह की परिस्थितियां आयीं उन्होंने उन आसन्न संकटों को प्रत्यक्ष देखा, ये सभी बातें विवाह में देखनी जरूरी होती हैं। पंडित मोतीलाल नेहरू की कन्या विजयलक्ष्मी मेहरअली नामक एक मुसलमान से ब्याह करना चाहती थी। पंडित मोतीलाल ने यह प्रसंग महात्मा गांधी को सुनाया। महात्मा को भी अपने पुत्र हरिलाल के तौर तरीके पसंद नहीं थे। महात्मा ने इलाहाबाद पहुंच कर पंडित मोतीलाल की समस्या का समाधान कर डाला। विजयलक्ष्मी का विवाह आर.एस. पंडित से किया। पीढ़ी बदली, पंडित नेहरू की एकमात्र संतान इंदिरा थी। पंडित नेहरू को उनकी पत्नी कमला नेहरू ने अपनी मृत्यु के समय वादा करवाया था कि इंदु फिरोज से विवाह करना चाहती है उसे मना मत करना। पंडित नेहरू के निकटवर्ती कश्मीरी पंडितों में कैलाशनाथ काटजू, हृदयनाथ कुंजरू थे। कुंजरू महाशय ने पंडित जी को सलाह दी कि वे इंदिरा को फिरोज से विवाह करने को मंजूरी न दें। पंडित जी ने अपनी पत्नी को दिया वादा निभाया। फिरोज गांधी से इंदिरा की शादी 1942 में संपन्न होगयी। इंदिरा जी का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। अपने अगले तीन सवालों में महाशया अवनि बंसल कहती हैं नौवां सवाल - पितृ प्रधान परम्पराओं से जुड़ा हुआ है। उन्होंने अंग्रेजी के मैनलिनेस शब्द का प्रयोग किया है। मैनलिनेस शब्द को हम हिन्दी में पौरूष ग्रंथि कह सकते हैं। अगर उन्हें संस्कृत का कामचलाऊ ज्ञान हो योगवाशिष्ठ ग्रंथ पढ़ें। यह ग्रंथ राम के सवाल व वशिष्ठ केे जवाबों का है। वशिष्ठ का गृहस्थ आदर्श कहा जाता है पर अरूंधती भी कभी कभी वशिष्ठ से कुपित हो जाती थीं। पुरूष स्त्री के अलग अलग विद्युत करेंट है। इनके संयोग से प्रकाश, ऊष्मा, ऊर्जा प्राप्त होती है। विचारग्रस्त होने पर यह भयानक अग्नि भय भी दे सकती है। शिवार्चन क्या है ? शिवलिंग अर्चना ही शिवार्चन या पार्थिव पूजा है। पुरूष का लिंग व स्त्री की योनि जिसे पाश्चात्य जन विजायना कहते हैं वह अर्घ्य है लिंग को समर्पित है। महाशया अवनि बंसल शिवपुराण या लिंगपुराण सावन के महीने में सुनें उनकी समस्यायें हल हो जायेंगी। अपने दसवें सवाल में महाशया अवनि बंसल सीता व जयललिता का उल्लेख कर रही हैं। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास भागवत महापुराण के नवम स्कंध के रामोपाख्यान अध्याय में लिखते हैं - ‘स्त्री पुङ प्रसंग एतादृक् सर्वत्र त्रास भावह’। राम साकेेत के मुहल्लों में वेष बदल कर अपने प्रतिकूल लोकमत जानने केे लिये घूम रहे थे। एक धोबी अपनी भार्या से कह रहा था - ‘नाहम् विभर्नित्वाम दुष्टाम् असतीं परवेश्ययाम स्त्री लोभी विभृयात सीताम रामोनाहम् भजे पुनः’। राम ने गुरू वशिष्ठ से कहा - भरत को अयोध्या नरेश बना दें व मुझे सीता के साथ अकेला रहने दें। वशिष्ठ ने राम से कहा - अयोध्या के लोग आपको ही अपना राजा मानते हैं। मैं लोकमत के खिलाफ नहीं जा सकता। भरत भी राजा बनना स्वीकार नहीं करते। राम ने वशिष्ठ से कहा - गुरूदेव तब मुझे सीता का परित्याग करना पड़ेगा। यह राम के लिये कठिन स्थिति थी। जयललिता व सीता के युगों में भयावह युगांतर है दोनों की तुलना नहीं हो सकती। इस ब्लागर की प्रथम कन्या लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी व तमिल भाषा में मास्टर आफ ऑर्ट्स की परास्नातक थी। इसरो में नौकरी करती थी इस ब्लागर को बोली - पिताजी आप नित्य गीतापाठ करते हो मेेरी मां भी पढ़ती है। कभी कभी मैं भी पढ़ लेती हूँ। गीता का यह श्लोक - ‘स्त्रियो वैश्या तथा शूद्रा ते अपियांति परांगतिम्’ पर मुझे ऐतराज है। उसमें स्त्रियां क्यों गिनी गयीं। यह ब्लागर अपनी कन्या को समझा नहीं सका। उसने अपना सवाल जारी रखा। पुरूष के लिये स्त्री का सहवास तथा स्त्री के लिये पुरूष का सहवास - वाल्मीकि के उत्तरकाण्ड के अनुसार पुरूष के लिये कर्म तथा स्त्री के लिये प्रतिकर्म कहा जाता है। निधिपति कुबेर के सहोदर भाई दशग्रीव रावण ने सीता का अपहरण किया। वह दौरचार्य था। रावण चाहता था कि सीता उसकी भार्या बनना स्वीकार कर ले पर सीता ने रावण का प्रस्ताव ठुकरा दिया।
ब्लागर हिमकर के ‘कर्मानुबंधीनि मनुष्यलोके’ शीर्षक के अंतर्गत - मां पुतलीबाई शीर्षक वाली पोस्ट को पढ़ें तो उन्हें पुतलीबाई करमचंद कबा गांधी की चौथी पत्नी जब करमचंद कबा गांधी बयालीस साल के थे उनकी तीन पत्नियां दिवंगत होगयी थीं। उन्होंने अठारह वर्ष की नौजवान लड़की पुतलीबाई से शादी की जिनकी सबसे छोटी संतान मोहनदास करमचंद गांधी थे। पुतलीबाई अपने प्यारे बेटे को मोनिया कहती थीं। मोहनदास करमचंद गांधी उन्नीस वर्ष की उम्र में सन 1888 में बारिस्टरी की पढ़ाई करने विलायत को रवाना होरहे थे। मां पुतलीबाई ने बेटे मोनिया से प्रतिज्ञा कराई कि वह स्त्री स्पर्श नहीं करेगा। अवनि बंसल महाशया की पड़ोसी दर्जा आठ में पढ़ने वाली लड़की के सवाल, उसकी मां की उसको सलाह तथा महाशया अवनि बंसल की निजी राय इन सब सवालों का जवाब पुतलीबाई मोनिया संवाद है। यूरप की जमीन, यूरप के लोगोें का मानस चिंतन भगवान ईसामसीह के ख्रिस्ती धर्म के चौखट से बाहर नहीं निकलना चाहता। यूरप व अमरीका के लोगों को हिन्दुस्तानी सोच तरीका हजम नहीं हो पारहा है बल्कि हिन्द के पढ़े लिखे लोगों पर लार्ड मैकाले का जादू काम कर रहा है। राहुल सांकृत्यायन अपनी जेब में लार्ड मैकाले द्वारा अपने पादरी पिता को लिखे पत्र की प्रति हमेशा अपने साथ रखते। वे लार्ड मैकाले के पत्र के उस अंश को जिसमें उन्होंने लिखा था - हिन्दुस्तान का हर आदमी और औरत अढ़ाई साल बाद भूरा अंग्रेज हो जायेगा। अंग्रेजों की सभ्यता, संस्कृति और सामाजिकता केे कायल रहेंगे। वे ईसाई धर्म में बपतिस्मा भले ही न करायें पर मन, वचन और कर्म से पूरे अंग्रेज रहेंगे। आज हिन्द में नब्बे दिन में धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलना सिखाने का सिलसिला चालू है। नारायण मूर्ति व उनके बेटे तथा चेतन भगत जैसे लोग चाहते हैं हिन्द की भाषा से भी रोमन अपनावें परंतु हिन्द से हिन्द की आंतर भारती को नेस्तनाबूद नहीं किया जा सकता है। अगर हिन्द के अंग्रेजीदां लोग रोमन लिपि को संस्कृत और वैदिक गणित के अनुकूल रचने में कृतकार्य हो सके तो अंग्रेजी वालो आप भी रहो और हिन्द की आंतर भारती को भी रहने दो। यह सहअस्तित्व स्वामी विवेकानंद और ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी के संस्कृत भाषा को रोमन लिपि के 26 अल्फाबेटों के उच्चारणीयता तथा लेखन समानता का रास्ता प्रशस्त किया जा सकता है। मलिक मोहम्मद जायसी एक सूफी संत थे। उन्हों पद्मावत महाकाव्य उर्दू लिपि व अवधी भाषा में लिखा। जिसे यूरप के लोग सेक्स कहते हैं हिन्दुस्तान के अंग्रेजीदां भद्रलोक में से एक महाशया अवनि बंसल सेक्स पर सार्वजनिक बहस करना चाहती हैं। वे एक बार पद्मावत जरूर पढ़ लें। हस्तिनी, पद्मिनी और शंखिनी तीन प्रकार की स्त्रियों का उल्लेख वात्सायान ने अपने ग्रंथ कामसूत्र में किया है। आज हिन्द के अखबार रेप, गैंगरेप और महिलाओं से छेड़छाड़ से भरे रहते हैं। पुरूष और स्त्री सहअस्तित्व में कैसे रहें यह जानना और सीखना आज हिन्द की पहली सामाजिक जरूरत है। हिन्द के लोगों की मान्यता है कि सृष्टि की अन्नपूर्णा स्त्री ही है। मारीच कश्यप का आश्रम मध्य एशिया में जिसे आजकल कैस्पियन सागर कहते हैं वहां था। कैस्पियन शब्द संस्कृत शब्द कश्यप का तद्भव है। कश्यप की पत्नियों अदिति, दिति व दनु मुख्य थीं। अदिति की संतानें त्रिविष्टप में बस गयीं। उन्होंने त्रिविष्टप याने वर्तमान तिब्बत को अपनाया। वर्तमान तिब्बत का मुख्य केन्द्र ल्हासा है। दिति के पुत्र हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष हिन्द की तरफ बढ़े। हिरण्यकश्यप ने अपनी दैत्यधानी हरिद्रोही (वर्तमान हरदोई) तय की। हिरण्याक्ष हिमालय मानसखंड के वर्तमान अल्मोड़ा व चंपावत जिलों के वाराह मंडल नामक क्षेत्रों में इसलिये बस गया क्योंकि हिरण्याक्ष का पुत्र अंधक पार्वती का अपहरण करना चाहता था। हिरण्याक्ष वाराह द्वारा मारा गया। उसके जुड़वां अग्रज हिरण्यकश्यप ने तय किया कि वह महाविष्णु का यज्ञ धर्म, गौपालन तथा ब्राह्मणों की बस्तियों को जला डालेगा। गौपालन नहीं होने देगा। कश्यप की तीसरी पत्नी दनु थी। दनु के पुत्रों में शुंभ व निशुंभ प्रतापी थे। दनु का एक पुत्र वास्तुकार मय भी था। दिति और दनु पुत्रों में भाईचारा था पर अदिति के पुत्रों को जिन्हें आदित्य कहा जाता था दैत्य व दानव पसंद नहीं करते थे। यही वैरानुबंध सृष्टि की पहली कहानी ही मातृप्रधान परिवार की है। दिति पुत्र व दनु पुत्र कैलासपति महादेव व पार्वती से भी वैर रखते थे। पार्वती गिरिराज हिमवान की कन्या थीं। शुंभ ने दूत भेज कर पार्वती को कहलाया - हमारी भार्या बन जाओ। पार्वती ने दूत से कहा -
यो माम् जयति संग्रामे, यो मे दर्पम विमोहति। यो मे प्रतिबलो लोके, स मे भर्ता भविष्यति।।
आज हिन्द की तात्कालिक जरूरत मातृप्रधान परिवार की पुनः स्थापना करने की है। पार्वती ने कहा था - मेरा भर्ता वही हो सकता है जो मुझसे अधिक बलवान हो, मुझे युद्ध में पराजित कर सके। पार्वती के अलावा मध्यकालीन युग में रानी लक्ष्मीबाई ने उस परम्परा को जीवित रखा। नारी प्रवेश, नारी जागरण आज की युग पुकार है।
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