Tuesday, 27 June 2017

भारत का आज का युगधर्म देसी गौ संरक्षण है।
संरक्षा पात्रता केवल देसी नस्ल की गायों की ही है।
जरसी व संकर गायें देसी नस्ल की गायों से न जोड़ी जायें।
गाय और वीर सावरकर के मत में पशु बुद्धि को आध्यात्मिक मेधा नहीं माना जा सकता। वीर सावरकर हिन्द के नासिक नामक महत्वपूर्ण सह्याद्रि पर्वत श्रंखला के उत्पाद थे। नासिक हिन्द के उन चार स्थानों में से एक है जहां हर बारहवें वर्ष कुंभ मेला लगता है जिसका संबंध क्षीर सागर मंथन से निकले अमृत कलश की अमृत बूंदें देव दानवों की छीना झपटी और अमृत कलश हथियाने के प्रयास में गिरी थीं। उनमें पहला स्थान प्रयाग (मौजूदा इलाहाबाद शहर) दूसरा हरद्वार तीसरा उज्जयिनी चौथा नासिक था। नासिक का महत्व हिन्द में प्रयाग, हरद्वार, अवंति (उज्जयिनी) के समान है। यहां त्र्यंबक महादेव का त्र्यंबकेश्वर मंदिर है। जो लोग स्वयं को हिन्दू कहते हैं उनके लिये त्र्यंबकेश्वर महादेव ‘त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्’ का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। सोमनाथ सहित हिन्द में जो ज्योर्तिलिंग हैं उनमें त्र्यंबकेश्वर एक महत्वशील ज्योर्तिलिंग है। वैभव पुरन्दरे ने टाइम्स आफ इंडिया में शुक्रवार 9 जून 2017 के संपादकीय पृष्ठ में पशु बुद्धि ओर आध्यात्मिकता का विश्लेषण सन 1930 से 1940 के बीच याने बीसवीं शती के चौथे दशक में प्रसिद्ध मराठी पत्रिका माला के संपादक ने हिन्दुओं के सामने एक सवाल उछाला और स्वयं उसका निर्णायक प्रश्न किया - असल हिन्दू कौन है ? क्या जो गाय को माता मानता है उसे असल हिन्दू कहा जाये ? विनायक दामोदर सावरकर अंडमान जेल में थे। उन्होंने लिखा - यदि गाय किसी व्यक्ति की माता है वह केवल वृषभ या बैल है जिसकी माता गाय है। हिन्दू अगर हिन्दुत्व के लिये गाय को हिन्दुत्व के अस्तित्व का आधार समझना संकटापन्न स्थिति है। वीर सावरकर के मत में गाय को हिन्दुत्व का कारक समझना विवेक संगत नहीं है। हिन्दुत्व के मूल चिंतक उत्कृष्ट कोटि के राष्ट्रवादी वीर विनायक दामोदर सावरकर गाय को एक उपयोगी पशु मानते थे पर गाय की आराधना अर्चना उन्हें अस्वीकार थी। वे पशु जीवन को मानव जीवन से श्रेष्ठतर मानने के पक्षधर नहीं थे। गाय को पूज्या माता का दर्जा देने की जो परंपरा हिन्दुओं में व्याप्त थी उसे वीर सावरकर ने दिमागी दिवालियापन - स्वबुद्धि हत्या अथवा स्वविवेक की हत्या कह कर अपना मत स्पष्ट किया। वैभव पुरन्दरे केे अनुसार वीर सावरकर गौ हत्या के खिलाफ नहीं थे। वे मानते थे कि हमें गाय की देखभाल तो करनी चाहिये पर गाय को पूजना उन्हें विवेकहीनता लगती थी। आर्थिक तथा वैज्ञानिक नजरिये से अमरीका ने पशु बुद्धि का दोहन अपने मुल्क को दूध और बीफ उपलब्धि केक लिये किया। वीर सावरकर इस राय के थे कि गोमूत्र सेवन तथा गोबर उपयोग संभवतः प्राचीन भारत में प्रायश्चित्त तथा आम दण्ड के तौर पर चलता था ताकि कोई यति जो गोमूत्र सेवन कर रहा है अपने पापों के प्रायश्चित्त के लिये गोमूत्र सेवन याने गोमूत्र पीता है। इसे उन्होंने ईशनिन्दा का एक तरीका बताया। कैसे हिन्द में ईशनिन्दा ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग माना जाता है। हिन्द में ईश्वर निंदा गर्हित नहीं है। प्रह्लाद की नवधा भक्ति और नरसी मेहता की दशधा भक्ति के समानांतर ईशनिन्दा एकादश या भक्ति का प्रतीक है। शरद पवार ने एक वक्तव्य में कहा - वीर सावरकर गाय को उपयोगी पशु मानते थे पूज्या नहीं। हिन्द का पहला दैत्य नरेश हिरण्यकश्यप था। उसने वर्तमान उ.प्र. के गंगा सरयू जल क्षेत्र हरिद्रोही नामक स्थान को अपनी राजधानी या दैत्यधानी घोषित किया। हरिद्रोही को आजकल लोग हरदोई नाम से पुकारते हैं। हिरण्यकश्यप दैत्यराज ने डुुगडुगी पिटवाई थी कि जहां कहीं गौशाला हो उसे बर्बाद कर दो। जहां कहीं यज्ञ होता हो यज्ञ विध्वंस कर दो। इसलिये गौवध गायोें को सुरक्षा न देना कोई नई बात नहीं है। वीर सावरकर ने जो विचार लगभग 84 वर्ष पूर्व व्यक्त किये वह अवधारणा भारत में सृष्टिकाल से विद्यमान थी। गाय को महत्व श्रीकृष्णावतार से मिला। अहीर लोग गौ पालन किया करते थे। गो उत्पाद उनके लिये महत्वपूर्ण थे। गौ पालन पर उनकी आस्था थी। भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 21 अध्याय गौओं से संबंधित हैं। आज हिन्द में गाय अर्चन का जो स्वरूप है वह भागवत महाकाव्य आधारित है। जहां तक पंचगव्य और पंचामृत गो उत्पादों से तैयार करने का सवाल है पंचगव्य और पंचामृत दोनों उत्पाद मनुष्य के लिये फायदेमंद तरीके हैं। पंचगव्य और पंचामृत पर प्रखर हिन्दुत्व वादी विचारक वीर सावरकर ने कोई मत व्यक्त नहीं किया। ये दोनों उत्पाद विधिपूर्वक निर्मित किये जायें तो मनुष्यों के लिये हितकर हैं। 
वीर सावरकर ने जब अपना मत व्यक्त किया तब हिन्दुस्तान में देसी नस्ल की साठ किस्मों की गायें थीं। तत्कालीन ब्रिटिश शासक जिनके लिये गौमांस नित्य भोज था उन्हें आसेतु हिमाचल हिन्दुस्तानी गायों और बैलों का मांस यूरप की जरसी गाय के मुकाबले ज्यादा अनुकूल पड़ता था। कुमांऊँ के कमिश्नर रहे मिस्टर ट्रेल ने हर्षदेव जोशी और रूद्र दत्त ओली केे सुझाव कि कुमांऊँ में गोवध न किया जाये यह अनुरोध किया। मिस्टर ट्रेल ने कहा - गौ मांस उनका प्रिय भोजन है। वे किसी भी हालत में गोवध पर रोक नहीं लगा सकते। 1816 से 1833 तक कुमांऊँ कमिश्नर रहे ट्रेल ने गोवध रोक के अलावा सारी बातें मान लीं। उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धि अस्सीसाला बन्दोबस्त था जो सन 1823 में शुरू हुआ। तब विक्रम संवत 1880 था इसलिये बंदोबस्त का नाम अस्सीसाला बंदोबस्त रखा गया। कुमांऊँ के दूसरे कमिश्नर हेनरी रामजे थे जो 1836 से 1884 तक अठाईस वर्ष कुमांऊँ पर राज करते रहे। अंग्रेजी राज ने हिन्द के गायों की गौकशी को बढ़ावा दिया तथा गोकशी हिन्दू मुस्लिम विभेद में तब्दील कर डाला। 
वीर सावरकर ने गाय के बारे में अपनी आत्म अवधारणा आज से अस्सी वर्ष पूर्व व्यक्त की थी तब हिन्द में शायद जरसी गायें अथवा संकर गायों की संख्या पारंपरिक देसी गायों की संख्या के मुकाबले बहुत कम थी। आज ए-1 दूध देने वाली जरसी गायों व संकर गायोें का जमावड़ा पहली पंगत में बैठा है। देसी गायों की नस्ल की गिर गौ संख्या पंद्रह से अठारह हजार के बीच आंकी गयी है। राजपूताना मेवाड़ गुजरात की गिर नस्ल के अलावा अन्य नस्ल की गायों मध्यप्रदेश महाराष्ट्र की गायें कर्णाटक कोंकण केरल तमिलनाडु आंध्र व तैलंगाना की गायों उड़ीसा बंगाल असमी मणिपुर की देसी गाय संख्या श्वेतक्रांति के अग्रदूत जरसी व संकर गायों के तादाद देसी नस्ल की गायों से सौगुना ज्यादा है। दूध का कोई भी व्यापारी देसी गौ के दूध से संपन्न नहीं हो सकता। उसे देहाती गरीबी में ही दिन बिताने हैं। सरकार चाहे केन्द्र की हो या घटक राज्यों की उसका संबल भी संख्याबल ही होता है। इसलिये देसी गौ को श्वेतक्रांति के इस महायुग में दुबक कर ही रहना है। सरकारी ऐजेंसियां कर्तव्य की खानापूरी करने के लिहाज से यह भले ही कहें देसी गायों का दूध जिसे दुग्धवेत्ता ए-2 दूध कहते हैं उन देसी गायों का दूध साठ से पैंसठ रूपये प्रति लीटर बिकता है। देसी गौओं की दूध मात्रा प्रति बार क्या है यह अनुसंधान का विषय प्रतीत होता है। चूंकि देसी नस्ल की गौओं की संख्या कम होते रहने के समानांतर देसी नस्लें भी घटती पर हैं। इसलिये देसी नस्ल के गौ उत्पाद तथा जरसी गौ उत्पाद संकर गौ उत्पादों का  रासायनिक परीक्षण जामनगर कृषि विश्वविद्यालय सहित वेटिनरी कालेजों पशु चिकित्सा पर पशुपाल विधि अपनाने वाले संस्थानों में भी सौंपी जाये। पहली जरूरत तो यह लगती है कि नीलगाय जिसे अंग्रेजी में ब्लू बुल कहते हैं उसके गोमूत्र की रासायनिक परीक्षण कराया जाये ताकि वैदिक गणित वैदिक संस्कृत में जो कहा गया है - 
मूत्रम तु नीलवर्णाया कृष्णाया गोमयम् स्मृतम्। 
दुग्धम् तु ताम्रवर्णाया दधिम् श्वेतवर्णाया संस्मृतम्।
 कपिलाया घृतं ग्राह््यम् ततश्च कुशोदकम्। 
गोमूत्र कितना ? गोबर कितना ? दूध कितना ? दही कितना ? घी कितना ? तथा कुशोदक कितना ? 
इसकी व्यवस्था विवरण देते हुए -
मूत्रम् तु पलम् दद्यात, गोमयम् तदर्धकम्, दुग्धम् सप्त पलम् दद्यात, 
तदर्धकम् च दधिम् स्मरेत, घृतम चैक पलम् दद्यात, तदर्धम् कुशोदकम् स्मरेत।
तात्पर्य यह कि गो उत्पाद मात्रा साढ़े तेरह पल हों, नक्षत्र सत्ताईस होते हैं इसलिये सभी नक्षत्रों को पंचगव्य से जोड़ा जाये। गोमूत्र 2 पल, गोबर 1 पल, गोदुग्ध 14 पल, दही 7 पल, घी 2 पल तथा कुशोदक एक पल याने सब मिला कर मात्रा 27 नक्षत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिये 27 पल हों। इस प्रकार विधिपूर्वक जो पंचगव्य बनेगा वह कायशोधक होगा।। इसी प्रकार पंचामृत बनाने से प्रवास पर जाने से पहले पंचामृत पान करने से दुर्घटनायें नहीं होंगी। तात्कालिक जरूरत यह है कि प्रत्येक राज्य सरकार अपने राज्य में कारगर गौशालाओं जिनमें जहां हरेक गौशाला के पार्श्व में नीलगाय भी बसे। पूर्णतः श्याम वर्ण गौ, पूर्णतः ताम्र वर्ण गौ, पूर्णतः श्वेत वर्ण गौ तथा कपिला गौ उत्पादों का रासायनिक परीक्षण किया जाये। साथ ही जरसी गौ व संकर गौ उत्पादों का भी रासायनिक परीक्षण करा कर राज्य सरकारें देश भर की गौशालाओं के प्रबंधक समाज को उनकी भाषा में उपलब्ध कराये ताकि गौपालकों को यह ज्ञात हो सके कि उनके गौ उत्पादों की रासायनिक स्थिति क्या है ? हिन्द के परंपरागत गौपालक समाज में तथा उस समाज में जो जरसी गाय तथा संकर गायों के गौ उत्पादों के उत्पादन व विपणन में लगा हुआ है। ऐसेे उन लोगों के संज्ञान में वैज्ञानिक सोच पहुंचाई जाये। श्वेतक्रांति तथा पारंपरिक देसी गौ द्वारा जो अलग अलग उत्पाद हैं उनकी रासायनिक समीक्षा पर केन्द्रीय तथा राज्य मंत्रिमंडल विस्तार से विचार करें। आज जो गौ रक्षा बनाम गौ मांस भक्षक जो दो परस्पर विरोधी अवधारणा अपनी अपनी जड़ें मजबूत करना चाह रही हैं उन्हें वास्तविकता का आभास हो कि मुल्क की चाहत क्या है ? क्या मुल्क हिन्द गुजरात केे गिर नस्ल की गौओं सहित जो 24 नस्लें आसेतु हिमाचल उनका संरक्षण लोकसंग्रह का मार्ग है ? या पशु क्रूरता निराकरण सहित हिन्द के उन लोगों को आजादी दी जाये जो गोमांस करने के आदी हैं जिन्हें गो मांस अत्यंत प्रिय है। लोकजनमत के जरिये यह पता लगाना ही चाहिये कि गौ मांस भोजी समाज को गौ मांस भोज अधिकार मिले। ऐसा लग रहा है कि परंपरागत देसी नस्ल की गायों और बैलों की संख्या दिन प्रतिदिन घट रही है। क्या मुल्क के लोग चाहते हैं कि देसी नस्ल की गायों को नष्ट होने दिया जाये। एक वर्ष की अवधि तक ज्यादा से ज्यादा 2019 के लोकसभा चुनाव के वक्त तक देसी नस्ल की गायों की महत्ता भारत के जन जन तक उसकी भाषा में पहुंचे। लोकसभा के लिये अपने नुमाइंदों को चुनते समय मतदाता यह भी राय जाहिर करे कि वह पारंपरिक हिन्द की देसी नस्ल की गौ रक्षा का पक्षधर है या गौ मांस भक्षण का पक्षधर ? पशुपालन, खेतीबाड़ी, कानून व्यवस्था राज्य सरकारों का विषय है। जो राज्य पारंपरिक गौ रक्षा के पक्षधर हैं उन्हें अधिकार दिया जाये कि उनके राज्य में देसी नस्ल की किन्हीं भी गायों व बैलों का वध कानून सम्मत नहीं होगा। केरल, तमिलनाडु, बंग सहित जो राज्य गौ मांस भोजन के पक्षधर हैं यदि राज्य के जनमत का बहुमत उनके पक्ष में है तो उन्हें अपने राज्य में गौ भक्षण की इजाजत हो पर वे निरामिष समाज को चिढ़ायें नहीं। केन्द्र सरकार की तरफ से आज भी बीफ भोज पर रोक लगभग नहीं है। कौन व्यक्ति क्या खाना चाहता है उसे अपन भोज स्वातंत्र्य मानवाधिकार केे साथ मिले पर कानून की अवहेलना से नहीं। जहां एक बार तय हो जायेगा कि गौ मांस भोज स्वातंत्र्य तथा परंपरागत देसी नस्ल की गौ प्रजातियों का संरक्षण केवल पशु क्रूरता से बचाव नहीं। हिन्द के लोगों के लिये महान मानवीय आदर्श है देश में आज जो अकारण, अहैतुक हलचल मची हुई है उस पर रोक लग सकेगी और जनसामान्य की समझ में आ सकेगा कि जैविक खेती केे उत्पाद मुल्क को कितनी ऊँचाई दे सकते हैं। वीर सावरकर के नजरिये में गाय अत्यंत उपयोगी पशु होते हुए पर गाय की अर्चन पूजा के बारे में वीर सावरकर की मान्यता थी कि गौ पूजा उद्देश्यहीन है। मानव केवल अपने से उत्कृष्ट व्यक्तित्त्व महामानव की ही अर्चना कर सकता है, के साथ साथ श्रीमद्भागवत महापुराण के चौदहवें अध्याय केे ब्रह्म, परब्रह्म श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहते हैं - 
नौमीऽयते जबपुषे तडिदम्बराय, गंुजावहंस परिधितसनमुखाया, 
वण्यसजे कवल नेत्र विपण वेपु लरभाजिये मृददे पक्रपावक। 
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