Monday, 3 July 2017

स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा, भाषा मति मंजुल मातनोसि 
के परम लाभार्थी राष्ट्रपति प्रत्याशी महाशय रामनाथ कोविन्द।
हिन्द में चातुवर्ण्य व्यवस्था की वकालत करने वाले रामभक्त मोहनदास करमचंद गांधी थे जिन्होंने बिना लागलपेट के यह कह कर तत्कालीन राजनीति करने वाले भद्रलोक को चौंका दिया कि वे वर्णव्यवस्था के पक्षधर हैं। हिन्द में वर्ण व्यवस्था के पहले चरण को शर्म, द्वितीय चरण को वर्म, तृतीय चरण को गुप्त तथा चतुर्थ चरण को दास नाम दिया गया। भक्ति मार्ग में दास्य भक्ति याने परमात्मा या परब्रह्म की सेवा करने वाला व्यक्ति अपने आप को दास कहता था। यह हिन्दुस्तानी दास शब्द अमरीकी ‘स्लेव’ शब्द का पर्याय नहीं है। अमरीका में स्लेव लोगों की खरीदफरोख्त उसी तरह होती थी जिस तरह साप्ताहिक पशु हाट में जानवरों की बिक्री या खरीद हुआ करती है। तुलसीदास के मन में यह बात घर कर गई थी कि रामकथा को उन लोगों तक पहुंचाया जाये जिन्हें संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं है। काशी का विद्वत् समाज जो स्वयं को ब्राह्मण कहता और मानता था उसे तुलसी की रामकथा को लोकभाषा में व्यक्त करना कतई नामंजूर था पर तुलसी ने अपने मन में ठान ली थी कि वे रामकथा को जनसामान्य तक पहुंचायेंगे। तुलसीदास ने रामगाथा अवधी भाषा में गाई। हिन्दुस्तान की दो भाषायें ब्रज और अवधी भक्ति मार्ग की राष्ट्रीय धरोहर हैं। इन दोनों भाषाओं के भक्त कवियों ने हिन्द में भक्ति की अविरल धारा बहा कर जब समूचा हिन्दुस्तान सल्तनत के साये में था हिन्द में एक नयी जाग्रति का संचार किया। तुलसी के रामचरित मानस ने हिन्द के उस समाज के आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जो बहुश्रुत था पर संस्कृत भाषा से परिचित न होने के कारण जातिवादी दौड़ में पिछड़ गया था। तुलसी ने यद्यपि रामकथा स्वान्तः सुखाय रची पर रामगाथा की भाषायी मति मंजुलता ने उन लोगों में एक नयी जाग्रति उत्पन्न कर दी जो सामाजिक दौड़ में पिछड़ गये थे पर जिनमें भगवद् भक्ति उस स्तर पर थी जिसे काशी के रैदास ने एक नया स्वर दिया था। मीरा के गिरिधर गोपाल ने कहा - मीरा तुम्हें गुरूमंत्र लेना हो तो काशी जाओ, रैदास से गुरूमंत्र ग्रहण करो। मीरा जब काशी पहुंची रैदास के पास गयी। संत रैदास ने मीरा से कहा - महाराणी क्षत्रियाणी हो मैं चमार हूँं अतः आपको किसी ब्राह्मण या राजर्षि से गुरूमंत्र लेना चाहिये। जब रैदास को मीरा ने बताया कि वह उनके पास गिरिधर गोपाल के हुक्म से आयी है रैदास ने मीरा को गुरूमंत्र दिया। यह बात तो लगभग पांच सौ साल पुरानी है। तुलसी के रामचरित मानस ने कनौजिया रामनाथ कोविंद को राम का कोविद बना डाला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और जाटव दो शब्द हैं। जाट पश्चिमी भारत की शक्तिशाली मानव श्रंखला है। संभवतः जाटों के ताल्लुकात कनिष्क तथा शालिवाहन से हों। हिन्द में विक्रम संवत केे समानांतर शक संवत भी चलता है। आजकल विक्रम संवत 2074 शकाब्द 1939 है। जाट गुज्जरों की तरह पश्चिमी उ.प्र. का जाटव शब्द भी बहुत महत्वपूर्ण है। जाटव स्वयं को चमार या चर्मकार मानते हैं पर इनका शाब्दिक अस्तित्व जाटव है। ठीक इसी तरह हिन्द का महत्वपूर्ण इलाका कान्यकुब्ज अथवा वर्तमान कन्नौज है जहां के रहने वाले कनौजिये कहलाते हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी कन्नौजिये ही हैं। जिस तरह पश्चिमी उ.प्र. जिसे पुराने हिन्दुस्तानी मयराष्ट्र कहते हैं जहां हिन्द के महान वास्तुकार मय दानव ने अपनी पीठ स्थापित की। मय दानव को अर्जुन ने खांडव वन में दावानल से जलने से बचाया और मय की प्राण रक्षा की। मय ने अर्जुन से कहा - कौंतेय अर्जुन आपने मुझे प्राणदान दिया है। मैं उसका निष्क्रय समर्पित करना चाहता हूँ। कौंतेय अर्जुन ने वास्तुकार मय दानव से कहा - कृपापूर्वक योगेश्वर श्रीकृष्ण से चर्चा करो वे जो सुझायें वह कर दो। मय से श्रीकृष्ण ने कहा - इन्द्रप्रस्थ में एक ऐसा वास्तु निर्माण करो जिसमें राजा युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ कर सकें। मय दानव ने श्रीकृष्ण के आदेशानुसार इन्द्रप्रस्थ में जहां आजकल पांडव किला है वहां ऐसा राजसभा मंडप निर्मित किया जिसमें जल एवं थल में विभेद कठिन था। दुर्योधन स्थल को जल समझ कर गिर पड़ा जिस पर भीम और द्रौपदी के मुंह से निकल पड़ा - अंततोगत्वा अंधे के बेटे अंधे ही होते हैं। 
राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द कोविद भी हैं। कोविद का हिन्दी में अर्थ सर्वज्ञ से होता है। उन्हें हिन्द का अगला राष्ट्रपति आसन ग्रहण कराने में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने तुलसीदास के कथन - ‘हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी, सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी’ को यथार्थ में तब्दील कर हिन्द को एक ऐसा राष्ट्रपति उपलब्ण्ध कराने का मार्ग प्रशस्त किया है जो अपनी कोविद क्षमता, संविधानज्ञ होने के साथ साथ मनुष्य मात्र बंधु हैं यही बड़ा विवेक है इस कथन को वास्तविकता केेे क्षेत्र में उतारने की क्षमता रखता है। आज हिन्द ऐसे चौराहे में खड़ा है जहां चारों ओर से अनगिनत समस्याओं की मार सह रहा है। स्वाधीनता केे सत्तर वर्षों में भारत के लोग अपनी सनातनता को भूल चुके हैं। जो परंपरायें देश को इस्लामी और बर्तानी राज की बर्बरतायें सहने की शक्तिदाता थीं आज वे परंपरायें नष्टप्रायः हो चुकी हैं। बर्तानी राज ने जिला प्रशासन का जो मजबूत समझा जाने वाला सिस्टम खड़ा किया था वह सिस्टम भी अब लड़खड़ा गया हैै। ऐसी विषम स्थिति में केवल राजनीति करने वाला व्यक्ति सफलता के शीर्षासन में हाजिरी कैसे दे सकता है। रामनाथ कोविन्द के रूप में तुलसी की रामगाथा का पुष्ट फल हिन्द को मिला है। हिन्द में नाथ शब्द की भी एक गरिमा गाथा है जिसे गुरू गोरखनाथ ने विशेषता प्रदान की है। सोमनाथ, केेदारनाथ, बदरीनाथ, हिन्द के तमिलनाडु राज्य का रामनाडपुरम जिला जो मूलतः रामनाथ ही तो है जहां सेतुबंध रामेश्वर का निर्माण राम ने बन्दरों की सहायता से किया। हिन्द की एक विशेषता का जिक्र श्रीमद्भवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से किया। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अपनी शंका व्यक्त की - 
अपरम भवतो जन्म परम् जन्म विवस्वतः, कथमेतद् विजानीयाम् त्वमादौ प्रोक्तवानिति। 
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा - अर्जुन तुम और मैं देखने में एक सरीखे मनुष्य हैं। 
श्रीकृष्ण कहते हैं - बहूनि मे व्यतीतानि जन्मनि तवचार्जुन तान्यहम् वेद सर्वाणि नत्वं वेत्थदंसय। 
यही हिन्द की चिंतन विशेषता है। इस सत्य को समझने के लिये स्थितप्रज्ञता की जरूरत होती है। गांधी ने गीता के अठारहों अध्यायों सात सौ श्लोकों में केवल स्थितप्रज्ञता व समाधिस्थता को अपनी नित्य प्रार्थना का हिस्सा बनाया। व्यक्ति का छिन्नसंशय होना पहली आवश्यकता हैै। ज्ञानपथ में चलने की यह छिन्नसंशयता प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में कूट कूट कर भरी हुई है। उन्होंने राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में अपने मनोनुकूल व्यक्तित्त्व का चयन कर रामनाथ कोविन्द को हिन्द के चौदहवें राष्ट्रपति का आसन ग्रहण करने वाले सुयोग्य व्यक्ति को उसके योग्य आसन उपलब्ध किया। प्रतीति यह होती है कि संभवतः महाशय रामनाथ कोविन्द हिन्द के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के पश्चात एकमात्र चौदहवें राष्ट्राध्यक्ष होंगे जिन्हें संविधान हिन्द के कानून तथा हिन्द की कानूनेतर मर्यादाओं का गहन अध्ययन तथा विवकेसंगत परिणति वाला मानस प्राप्त है। महात्मा गांधी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की आधारशिला वसंत पंचमी पन्द्रह फरवरी 1915 को रखते समय अपने मन की बात महामना मदनमोहन मालवीय के समक्ष प्रस्तुत की। महामना से कहा - वड़ील, मेरे मन में पीड़ा है कि क्या छुआछूत शास्त्रसम्मत है ? वड़ील महामना मदनमोहन मालवीय ने महात्मा गांधी से कहा - छुआछूत तो मैं भी मानता हूँ पर मुझे यह अहसास नहीं है कि क्या छुआछूत शास्त्रसम्मत है ? प्रोफेसर सर्वपल्ली राधाकृष्णन सनातन धर्म के परम मर्मज्ञ हैं इसलिये वे आपके सवाल का वाजिब जवाब देने की पात्रता धारक हैं। विश्वविद्यालय आधारशिला समारोह संपन्न होने पर महात्मा ने महामना से कहा - वड़ील, प्रोफेसर राधाकृष्णन के डेरे पर चलें ? दोनों महानुभाव प्रोफेसर राधाकृष्णन के डेरे पर पहुंचे तो प्रोफेसर ने दोनों महापुरूषों से विनयपूर्वक कहा - मुझे बुला लेते। महात्मा ने कहा - प्रोफेसर मेरे मन में एक सवाल है ? क्या छुुआछूत शास्त्रसम्मत है ? प्रोफेसर बोले - महात्मा जी आपसे असत्य क्यों कहूँ, छुआछूत तो मैं भी मानता हूँ पर आपके सवाल का सटीक जवाब देने के लिये मुझे पंद्र्रह दिन की मोहलत दीजिये। प्रोफेसर ने पंद्रह दिनों में शास्त्रों का गहन अध्ययन करने के बाद महात्मा से मुलाकात की और उनसे कहा - महात्मा जी आपकी शंका सही है। छुआछूत शास्त्रसम्मत नहीं है। यह दोष हमारे समाज में घुसा हुआ महादोष है। महात्मा गांधी को अपने मन की बात पर यकीन होगया। अस्पृश्यता निवारण महात्मा का सबसे महत्वपूर्ण व्रत था। हिन्द आजाद होगया था। छुआछूत कानूनन अपराध घोषित हो चुका था। कुमांऊँ में रानीखेत में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर वड्डा पिथौरागढ़ के मूल निवासी महाशय मोहन सिंह चन्द आसीन थे। उनकी अदालत में एक अर्दली अस्पृश्य कहा जाने वाला हरिजन तथा दूसरा अर्दली अपने को ब्राह्मण बताता था। हरिजन अर्दली ने ब्राह्मण अर्दली को चाय पीने के लिये दी किन्तु ब्राह्मण अर्दली ने चाय पीना स्वीकार नहीं किया। हरिजन अर्दली ने असिस्टेंट कमिश्नर मोहन सिंह चन्द की अदालत में अर्जी दाखिल कर ब्राह्मण अर्दली पर कानूनी कार्यवाही करने के लिये प्रार्थना की। मोहन सिंह चंद सुलझे हुए प्रशासक थे, उन्होंने अदालत में मेहतर का काम करने वाले वाल्मीकि से कहा - चाय लाओ और सबको पिलाओ। उन्होंने स्वयं भी मेहतर वाल्मीकि की लाई हुई चाय पी। हरिजन अर्दली बोला - वह मेहतर के हाथ की चाय नहीं पियेगा। असिस्टेंट कमिश्नर चंद ने कहा - जो कह रहे हो वह अर्जी में लिख कर भी दो। अर्दली ने अर्जी पेश कर दी। असिस्टेंट कमिश्नर ने कहा - ब्राह्मण अर्दली को नौकरी से बर्खास्त करने के साथ साथ साथी हरिजन अर्दली पर भी कानूनन कार्यवाही होगी। नौकरी से बर्खास्तगी नहीं चाहते हो व जेल जाना मंजूर नहीं है तो अपनी अर्जी वापस लेने के लिये बाकायदा फिर अर्जी दो वरना कानून अपना काम करेगा। असिस्टेंट कमिश्नर मोहन सिंह चंद ने जो रास्ता अपनाया वह समस्या का समाधान था। छुआछूत आज भी समाज में विद्यमान है। इसके निवारण के लिये आजादी के सत्तर साल बाद ही सही चौदहवें राष्ट्रपति कोे छुआछूत निवारण, दलित मंदिर प्रवेश तथा हिन्द के मौजूदा धार्मिक अल्पसंख्यकों में यह विश्वास जगाना कि हिन्दू धर्म में धर्मांतरण शास्त्रसम्मत नहीं है। घर वापसी अथवा शुद्धि आंदोलन सनातन धर्म में ग्राह्य नहीं है। बिजनौर जिले में ताजपुर नामक एक कस्बा है जहां हिफजुर्रहमान नाम के खादी कार्यकर्ता कार्यरत थे। उनके पूर्वज चौहान राजपूत थे। उस इलाके के विधायक चौधरी खूब सिंह और हिफजुर्रहमान में अच्छा दोस्ताना था। चौधरी खूब सिंह की बहन मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा निवासी शिवस्वरूप सिंह को ब्याही थी। हिफजुर्रहमान चौधरी शिवस्वरूप सिंह को जीजा जी कहते थे। ये तीनों स्वतंत्रता सेनानी थे। हिफजुर्रहमान पुनः हिन्दू बनने में कोई बुराई नहीं देखते पर कहते क्या रोटी बेटी का संबंध रखोगे ? मुसलमान से फिर हिन्दू बनने में सबसे बड़ी बाधा जातिवाद है जो मुसलमान फिर हिन्दू बनना चाहेगा उसके सामने बड़ा सवाल रोटी बेटी का है। यही तर्क था हिफजुर्रहमान का। भारत के चौदहवें राष्ट्रपति को 1. छुआछूत निवारण 2. मंदिर प्रवेश 3. हिन्दू धर्म में इतर धर्मावलंबियों को प्रवेश क्या शास्त्रसम्मत है ? इन तीनों सवालों पर भारत के चौदहवें राष्ट्रपति का ध्यानाकर्षण करते हुए इन सभी प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट को निर्णय देने का अधिकार दिया जाना युगधर्म है। आसन्न समस्याओं को टालने व लटकाने के बजाय त्वरित कार्यवाही पर विचार किया जाना चाहिये।
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