Wednesday, 2 August 2017

क्या हिन्द की वाणियों को संवैधानिक महत्त्व देना जरूरी है ? 
हिन्द की पहली जरूरत वाणी के सौतिया डाह से उबरने के लिये
किं कर्मम् किं अकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिता - भगवद्गीता
वाणी का सौतिया डाह क्या है ? क्या हिन्द के संविधान निर्माताओं ने भाषायी वाणी के सौतिया डाह पर गहराई से विचार करना वाजिब नहीं माना ? हिन्दी का एक महत्वपूर्ण काव्य कामायनी है जिसके रचयिता काशी के जयशंकर प्रसाद हैं। कामायनी मनु-शतरूपा के गृहस्थ की मार्मिक गाथा है। यदि कामायनी का अंग्रेजी अनुवाद को नोबेल पुरस्कार के लिये प्रस्तुत किया जाता तो इसमें कोई दो राय नहीं कि कामायनी को नोबल पुरस्कार से सम्मानित कराया जा सकता था। नागरी लिपि और संस्कृत शब्द भंडार से खड़ी बोली जो हिन्द की दूसरी भाषा वाणियों की अनुजा है पर हिन्द की आजादी की जंग में खड़ी बोली के हिन्दी संस्करण ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। हिन्द के ब्रज और अवध क्षेत्रोें में ब्रजभाषा तथा अवधी का व्यापक प्रभाव था, ये दोनों भाषायें हिन्दी की मातृशक्ति हैं। ब्रज और अवधी दोनों महत्वपूर्ण भक्तिपरक भाषाओं ने हिन्द के हिन्दत्व को तब जीवित रखा जब मुल्क में इस्लामी सल्तनत का बोलबाला था। इस्लामी सल्तनत की राजभाषा फारसी थी जो लोग फारसी भाषा के मर्मज्ञ बनने की पात्रता नहीं पा सके उनके लिये खड़ी बोली का उर्दू संस्करण उसी इलाके में बढ़त पाया जहां खड़ी बोली का हिन्दी संस्करण हिन्द की आजादी के लिये अहर्निश संघर्ष करता आरहा था। भारत भारती के जरिये कविवर मैथिली शरण गुप्त ने - हम कौन थे ? क्या होगये ? और क्या होंगे अभी ? ये तीन सवाल उठाये जिन्होंने हिन्द में आजादी की जाग्रति फैलाई। भारत भारती के रचयिता मैथिली शरण गुप्त आगे अपने महाकाव्य में कहते हैं - आओ मिल कर अब विचारें ये समस्यायें सभी। मैथिली शरण गुप्त के अलावा हिन्दी के मूर्धन्य कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, कामायनी रचयिता जयशंकर प्रसाद, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जिन्होंने सत्य हरिश्चन्द्र द्वारा हिन्द केे लोगों की भाषायी जाग्रति का सूत्रपात किया। कवियित्री महादेवी वर्मा, छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंतत्र राष्ट्रीय जोश की प्रतीक सुभद्रा कुमारी चौहान और रामधारी सिंह दिनकर की दिल को धड़काने वाली कवितायें गद्य साहित्य के अनेकानेक महारथियों तथा हिन्दी पत्रकारिता के चमकीले नक्षत्र गणेश शंकर विद्यार्थी हिन्दी पत्रकारिता के द्वारा राष्ट्र जागरण का माहौल तैयार करने वाले बाबूराव पराडकर तथा कमलापति त्रिपाठी सरीखे अनेकानेक देशभक्तों ने हिन्द की सबसे कम उम्र वाली भाषा हिन्दी को हिन्द के आजादी संग्राम में एक ऐसी पहचान दे दी। डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी (यद्यपि उनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं बंगला थी) पहले हिन्दुस्तानी थे जिन्होंने हिन्दी भाषा शैली से मुल्क को एक नया पैगाम दिया। वे जब हिन्दी में भाषण देते उन्हें सुनने के लिये लोगों का अंबार लग जाता था। स्वयं पंडित नेहरू श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भाषणा कला के जबर्दस्त प्रशंसक थे और डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी का भाषण ध्यानपूर्वक सुनते थे। हिन्दी भाषण कला के अन्य मर्मज्ञों में जयप्रकाश नारायण डाक्टर लोहिया राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन बरेली के सेठ दामोदर दास स्वरूप उद्भट हिन्दी भाषण कर्ता थे। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की हिन्दी भाषण शैली के प्रशंसक स्वयं पंडित नेहरू थे। उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनते और प्रशंसा भी किया करते थे। हिन्द के जो लोग हिन्दी विरोध के अग्रणी रहे उनमें चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ई वी रामास्वामी सी.एन. अन्नादुरई एम. करूणानिधि एम.जी. रामचंद्रन जयललिता सहित वे सभी राजनीतिक ओर अपने भाषायी स्वरूप केे प्रशंसक वे किसी भी हिन्दीतर भाषायी विद्वान हों उन्हें हिन्दी सरीखी एकदम नयी भाषा को जिसकी अपेक्षा मुल्क के तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयाली, कांेकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, नैपाली, बांगला, मइती मणिपुरी, असमी, बोडो, संताली, मैथिली, सिंधी, डोंगरी भाषायें हिन्दी के मुकाबले पुरानी भाषायें हैं एवं उनका साहित्य भी अनमोल है। उन भाषाओं को बोलने वाले समाज में हिन्दी के लिये ईर्ष्या होना भाषायी स्वाभाविकता है। हिन्द के राजनेताओं में जिन्हें अंग्रेजी का कामचलाऊ ज्ञान रहा अंग्रेजी भाषा के भाषायी सौष्ठव से उनका गहरा नाता नहीं रहा पर मुल्क में ऐसे लोगों की भी राजनीतिक क्षेत्र अच्छी खासी संख्या थी जो अंग्रेजी का पूर्ण ज्ञाता व विशारद होते हुए भी हिन्दी के उदात्त पक्षधर थे जिनमें लाहौर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर आफ आर्ट की डिग्री लिये राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन का नाम अग्रणी है। हिन्दी विरोध ने कई नेताओं को महत्वपूर्ण व्यक्तित्त्व का स्वामी बना डाला पर उनका हिन्दी विरोध अंग्रेजी की वैशाखी पर निर्भर कर रहा था। अगर राजा जी सहित सभी हिन्दी विरोधी नेताओं को परमात्मा ने सद्बुद्धि दी होती तो वे भारतीय संसद से अपनी अपनी भाषाओं को वह संवैधानिक स्तर दिलाते जो भारत के संविधान में अंग्रेजी व हिन्दी को उपलब्ध है। तब उनका हिन्दी विरोध ज्यादा तर्कसंगत होता और उनकी मातृभाषा को भारतीय संविधान में वह स्थान दिलाया जा सकता था जो संविधान सभा ने अंग्रेजी को मुख्यतया तथा हिन्दी को उसके बाद का दर्जा दिया। देर आयद दुरूस्त आयद ही सही आजादी के सत्तर वर्ष पश्चात ही सही यदि हिन्द की अंग्रेजी व हिन्दी के अलावा असमी, मइती मणिपुरी, बांगला, नैपाली, उड़िया तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कांेकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी व उर्दू भाषायें जो क्रमशः असम, मणिपुर, पश्चिम बंग व त्रिपुरा, उड़ीसा, आंध्र व तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, कर्णाटक, गोआ, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब की राजभाषायें हैं तथा जम्मू कश्मीर की भाषा कश्मीरी या डोंगरी के बजाय उर्दू राजभाषा रहे। इन सभी भाषाओं में भारतीय संविधान की अधिकृत प्रति उपलब्ध कराने का संकल्प संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री लें और अपने अपने विधानमंडल का प्रस्ताव भारत के राष्ट्रपति की सेवा में प्रस्तुत करें कि उनकी भाषा व लिपि में भारतीय संविधान की प्राधिकृत प्रति उपलब्ध कराई जाये तथा उन भाषाओं को अपनी मातृभाषा कहने वाले संसद के दोनों सदनों के सांसद अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति का मानवाधिकार संसद से मांगें तथा दूसरे सांसदों के वक्तव्यों को अपनी मातृभाषा या चाहत भाषा में सुनने के लिये अहर्निश प्रयत्नशील रहें तो मुल्क में आज जो भाषायी ऊहापोह व्याप्त है वह छंट सकती है तथा संसद एक निश्चित अवधि के अंदर हिन्दी व अंग्रेजी के अलावा प्रादेशिक राजभाषाओं में भारतीय संविधान के अधिकृत संस्करण मान्य हो जाने से हिन्दी व नागरी लिपि का विरोध स्वयं तिरोहित हो जायेगा तथा प्दकपं जींज पे ठींतंज में जो इंडिया शब्द है उसे दक्षिण पूर्व में हिन्दुस्तान कहा जाता है याने इंडिया हिन्दुस्तान का पर्याय है। उत्त्र प्रदेश में गंगा तट पर स्थित बिठूर का पुराना हिन्दुस्तानी नाम ब्रह्मावर्त है इसे ही भारत का मूल देश कहा जाता है। यहां नाभि-मेरूदेवी नंदन ऋषभ ने जन्म लिया। जैन धर्मावलंबी ऋषभ देव को आदि तीर्थंकर मानते हैं। जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर वर्णित हैं जिनमें महावीर स्वामी चौबीसवें तीर्थंकर हैं। हिन्द में बिठूर का एक दूसरा महत्व है यहां ही आदिकवि वाल्मीकि ने रामाणण लिखी। सीता राम द्वारा परित्यक्ता होने के पश्चात वाल्मीकि आश्रम वर्तमान बिठूर में रहीं। बिठूर का द्वितीय शास्ता ऋषभ नंदन भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत है। बिठूर हिन्द की आजादी संग्राम का महत्वपूर्ण केन्द्र भी रहा है। हिन्द में एक ऐसा अखिल भारतीय नेतृत्व कामराज नागर ने दिया जो अपनी मातृभाषा तमिल के पारंगत विद्वान ोि। अंग्रेजी न तो बोलते थे न अच्छी अंग्रेजी जानते थे। यदि कामराज नागर का नेतृत्व तमिलनाडु पर ज्यादा प्रभावी होता तो संभव था कि वे तमिल भाषा में भी भारत के संविधान की अधिकृत संस्करण की मांग करते। हिन्द के घटक राज्यों के प्रमुखों की आज की सबसे बड़ी जरूरत अपने अपने राज्य की राजभाषा को संवैधानिक स्तर दिलाना है। हिन्दी विरोध करने से उनकी वैयक्तिक उन्नति हुई है आगे भी हो सकती है पर अपने राज्य व राज्य की राजभाषा को संवैधानिक स्तर दिलाने के लिये उन्हें प्रयत्नशील रहना आवश्यक है। प्रादेशिक राजभाषाओं में भारतीय संविधान की आधिकारिक संस्करण आज देश की जरूरत है। उसके लिये अहर्निश प्रयत्नशील रहना प्रादेशिक क्षत्रपों का राष्ट्रीय कर्त्तव्य है। जिस दिन हिन्द का संविधान असमी, मइती मणिपुरी, बांगला, नैपाली, उड़िया तेलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कांेकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी व उर्दू भाषाओं में जनसामान्य को उपलब्ध होगा वही दिन हिन्द की डेमोक्रेसी का महापर्व होगा इसलिये मुल्क को वास्तविक व व्यावहारिक डेमोक्रेसी का क्षेत्र निर्माण करने के लिये क्षेत्रीय भाषाओं में भारत के संविधान का प्राधिकृत संस्करण मुल्क के राजनीतिक गणित का महत्वपूर्ण कदम है। यह कदम जितनी जल्दी उठाया जाये उतना ही श्रेयस्कर है। हिन्द का भाषायी सौतिया डाह समाप्त करने का पर्व आगया है उसे प्राथमिकता दीजिये यही भारत की मौलिक आवश्यकता है। अंग्रेजी व हिन्दी भारत के जिन राज्यों की राजभाषायें नहीं हैं जहां लोग स्थानीय भाषा बोलते हैं उनकी अपनी अपनी लिपियां भी हैं। क्षेत्रीय भाषाओं तथा उनकी लिपियों में जहां एक ओर आंतर भारती दृष्टिकोण ग्राह््य हो वहीं घटक राज्यों की राजभाषाओं में भारतीय संविधान की प्राधिकृत संस्करण उपलब्ध होने से देश के गांव गांव में भारतीय संविधान वहां के लोगों की अपनी भाषा में उपलब्ध होगा वहीं लोकतंत्र या डेमोक्रेसी का फेडरल स्वरूप भी निखार पा सकेगा।
भारतीय संविधान में अद्यतन हुए संशोधनों के अंतर्गत कुछ ऐसी लोक भाषायें आगणित हुई हैं जो किसी भी घटक राज्य की राजभाषा नहीं हैं। ऐसी भाषाओं में संस्कृत, सिंधी, कश्मीरी, डोगरी, नैपाली, बोडो, मैथिली व संथाली ऐसी भारतीय भाषायें हैं जो किसी राज्य की राजभाषा नहीं हैं। इन सभी भाषाओं में भी भारतीय संविधान की प्राधिकृत संस्करण उपलब्ध कराना युगधर्म है। इन आठ भाषाओं में एक भाषा सिंधी है। सिंधी भाषा के लिये सिंधी मुसलमान अरबी लिपि अपनाते हैं पर जो सिंधी भाषी भारत विभाजन के पश्चात हिन्द के घटक राज्यों में रहते हैं भाषायी मानवाधिकार उपलब्ध करने के लिये उन राज्यों में जहां आठ प्रतिशत आबादी सिंधी भाषियों की है उन्हें नागरी में लिखी जाने वाली सिंधी भाषा को विधान मंडलों व संसद में अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिये सिंधी को संबंधित राज्य की दूसरी राजभाषा का दर्जा मिलना चाहिये।
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