हिन्द के संविधान की प्रामाणिक प्रति
हिन्द की हर भाषा व हर लिपि में उपलब्ध कराई जानी युग की पुकार है।
हिन्द की हर भाषा व हर लिपि में उपलब्ध कराई जानी युग की पुकार है।
उत्तिष्ठ! जाग्रत! प्राप्यवरान्निबोधयत!
हिन्द की अहम जरूरत नब्बे दिन में धाराप्रवाह अमरीकी अंग्रेेजी बोलना नहीं पर हिन्द के उन घटक राज्यों की राजभाषा अंग्रेजी या हिन्दी के अलावा कोेई इतर भारतीय भाषा यथा - असमी, मइती (मणिपुरी), नैपाली, बांगला, उड़िया, तैलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कोंकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, और उर्दू भाषाओं में से कोई एक भाषा है, उस भाषा की अपनी लिपि भी हैै। उन घटक राज्यों की विधानसभाओं को यह प्रस्ताव करना हिन्द के संवैधानिक तथा भाषायी हित में है। ज्ञातव्य है कि बांगला पश्चिम बंग व त्रिपुरा दो राज्यों की राजभाषा है। इसी तरह तैलुगु आंध्रप्रदेश व तेलंगाना की राजभाषा है। इन विधानसभाओं को सुझाया जाये कि वे भारत की संसद से अनुरोध करें कि उनके राज्य की राजभाषा में भारतीय संविधान की आधिकारिक प्रति घोषित हो ताकि संबंधित राज्य संविधान के प्रावधानों का अनुुसरण अपनी अपनी राजभाषा व लिपि में संपन्न कर सके। उन राज्यों से जो लोकसभा तथा राज्यसभा सांसद संसद में अपने अपने राज्य की राजभाषा में भारतीय संविधान की आधिकारिक प्रति तैयार करने के लिये लोकसभा व राज्यसभा में निरंतर दबाव बनाये रखें ताकि देश में वह वातावरण बन सके जिसमें देश की हर भाषा में भारतीय संविधान की आधिकारिक प्रति संसद सदस्यों केे दस्तखत सहित तैयार हो। राज्यसभा के प्रमुख उपराष्ट्रपति लोकसभा स्पीकर तथा राष्ट्रपति द्वारा भारतीय संविधान की आधिकारिक प्रति असमी, मइती (मणिपुरी), नैपाली, बांगला, उड़िया, तैलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कोंकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी और उर्दू भाषाओं में संबंधित विधान मंडलों, विधायकों, सांसदों को उपलब्ध हों ताकि प्रत्येक घटक राज्य के उच्च न्यायालय में घटक राज्य की राजभाषा मंे बहस हो सके और उच्च न्यायालय के न्यायूर्ति जिन महानुभाव अपना निर्णय संबंधित घटक राज्य की राजभाषा में भी जारी कर सके। यह इसलिये जरूरी होगया है क्योंकि हिन्द के लोगों की मौजूदा अंग्रेजी बर्तानिया की किंग्स इंग्लिश अथवा क्वीन्स इंग्लिश नहीं हिन्द की इंग्लिश होगयी है। अमरीकी अंग्रेजी ने भाषायी क्षेत्र में हमला कर बर्तानिया की अंग्रेजी को किनारे कर डाला है इसलिये हिन्दुस्तान सरीखे बहुभाषी देश के लिये अमरीकी अंग्रेजी आने वाले समय में वरदान के बजाय भाषायी अभिशाप का हेतु बन सकती है। उस दुर्दान्त स्थिति से मुल्क को बचाने के लिये निहायत जरूरी है कि भारतीय संविधान की आधिकारिक संस्करण देश की सभी भाषाओं में उपलब्ध हों। मुल्क की एक भाषा सिंधी बोलने वाले लोग हिन्दुस्तान की आजादी के बाद अनेक राज्यों में बिखर गये हैं। हिन्द के विभाजन से भयावह उत्पीड़ित सिंधी भाषी हैं। सिंधी भाषा मुखी भाषा में लिखी जाती रही पर जो हिन्दू सिंधी भाषा विभाजन के बाद भारत में आगये उन्होंने नागरी लिपि सिंधी भाषा के लिये अपना ली। हिन्द की आजादी के आन्दोलन में महात्मा गांधी का साथ देने वालों में प्रोफेसर जीवतराम भगवानदास कृपलानी तथा प्रोफेसर चौ. इकरम गिडवानी मुख्य व्यक्ति थे। कृपलानी वर्षों तक कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी रहे तथा मेरठ कांग्रेस की सदारत उन्होंने ही की एवं वे महात्मा गांधी के राजनीतिक दर्शन के अद्भुत व्याख्याता भी थे। पश्चिम बंग, बिहार व उत्तर प्रदेश से उनका नाता चोली दामन सरीखा था। आजाद भारत में पंडित नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य जयराम दास दौलतराम एकमात्र सिंधी भाषी मंत्री थे। आज मुल्क की पहली जरूरत तो यह है कि लोकप्रतिनिधि जिसे अंग्रेजी में ला मेकर कहा जाता है अपने मतदाता से मत की भिक्षा मतदाता की भाषा बोल कर मांगता है पर ला मेकर बनते ही मतदाता को भूल जाता है, अंग्रेजी तौर तरीके अपना कर राज करने की कल्पना करने लगता है इसलिये जरूरी है कि यूरप के भाषायी राज्यों की तरह हिन्दुस्तान के भाषायी घटक राज्य अपनी अपनी स्वभाषा को महत्व दें तभी मुल्क उन्नति कर सकेगा। यूरप और हिन्द में फर्क यह है कि यूरप की भाषाओं की लिपि रोमन है पर हिन्द की भाषाओं में नागरी हिन्दी व रोमन अंग्रेजी के अलावा चौदह भाषायें और उनकी चौदह लिपियां हैं। चौदह लिपियों में फारसी लिपि उर्दू भाषा के अलावा शेष तेरह भाषाओं व तेरह लिपियों में शाब्दिक उच्चारण एक सरीखा है यही हिन्द की भाषायी विशेषता हैै। दुनियां की अन्य भाषाओं में हवाई की भाषा हवाई में बारह अक्षर जिन्हें अंग्रेजी में अल्फाबेट कहा जाता है यूनानी या ग्रीक में 24 अल्फाबेट रोमन में 26 अल्फाबेट फारसी लिपि में अठाईस अल्फाबेट अरबी में 32 अल्फाबेट हैं पर हिन्दुस्तानी लिपियों में तथा हिन्द की हिन्दुस्तानी भाषाओं में 51 व 52 अल्फाबेट हैं। इन भाषाओं में जो लिखा जाता है वही बोला भी जाता है। यूरप की भाषाओं का उच्चारण दोष हिन्द की भाषाओं में नहीं घुस पाया है इसलिये हिन्द के चौदहवें राष्ट्रपति जब मुल्क के राष्ट्रपाल पद की शपथ लें उनसे मुल्क के लोग यह अपेक्षा करें कि महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 तक भारतीय संसद भारतीय संविधान के प्रामाणिक संस्करण जारी करने के लिये असमी, मइती (मणिपुरी), नैपाली, बांगला, उड़िया, तैलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कोंकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी भाषाओं में भारतीय संविधान की प्रामाणिक आधिकारिक संस्करण जारी कर हिन्द के घटक राज्यों के उच्च न्यायालयों के निर्णय अंग्रेजी अथवा हिन्दी के समानांतर उन राज्यों की राजभाषाओं में भी जारी हों ताकि न्यायिक क्षेत्र में भारतीय भाषाओं का अस्तित्व कालांतर में स्वभाषा प्रयोग का आत्मानंद राज्य के लोग अनुभूति कर सकेें। ऐसी व्यवस्था तैयार करने के लिये संबंधित घटक राज्य के विधानमंडल का प्रस्ताव प्राथमिक अनिवार्यता है। संसद के दोनों सदनों में घटक राज्यों के लोकप्रतिनिधियों को भी अपनी अपनी भाषा में भारतीय संविधान की अधिकृत संस्करण की उपलब्धि के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहना होगा ताकि मुल्क की हर भाषा में भारतीय संविधान की आधिकारिक संस्करण उपलब्ध कराये जा सकें। यह भाषायी संवैधानिक सौहार्द स्थापित करने के लिये देश के चौदहवें राष्ट्रपति महोदय को भी निरंतर गतिशील रह कर संसद के दोनों सदनों तथा केन्द्र सरकार को तैयारी रखने के लिये आह्वान करना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी स्मार्ट विलेज तथा स्मार्ट सिटी अभियान के जरिये हिन्द के गांवों व शहरों का कायाकल्प करना चाहते हैं उसे उपलब्ध करने में संवैधानिक भाषायी विशिष्टता का विशेष महत्व है। आज मुल्क के अनेक घटक राज्यों में नागरी व हिन्दी विरोध वाला जो उबाल आरहा है उसे भी भारतीय संविधान की आधिकारिक संस्करण मुल्क की हर भाषा में उपलब्ध करने के प्रयास से शासन तंत्र में भी गतिशीलता आयेगी और स्वभाषा मातृभाषा के समानांतर चाहत भाषा सहित देश की भाषा से एक दूसरे के नजदीक लाने और साने गुरू जी की आंतर भारती जिज्ञासा को लोकप्रियता दिलाने में मदद मिलेगी साथ ही लोकसभा तथा राज्यसभा में लोकप्रतिनिधि अपनी भाषा में बोलें और उन्हें साथी सांसदों की भाषाओं के वक्तव्य को उनकी मातृभाषा या चाहत भाषा में सुनने का मौका लोकसभा स्पीकर एक समयबद्ध योजना के अंतर्गत सुव्यवस्थित कराने का संकल्प लें। भारतीय भाषाओं में पारस्परिक सौहार्द के लिये नितांत आवश्यक है। सभी भारतीय भाषायें एक समान मानी जायें तथा उनके आपसी सौहार्द के लिये साने गुरू जी की आंतर भारती का आश्रय लिया जाये।
देश की भाषाओं में घटक राज्यों की राजभाषा को अखिल भारतीय भाषायी सम्मान मिलने पर वे भाषायें जिन्हें हिन्द के संविधान भाषायी सूची में स्थान प्राप्त है पर वे भाषायें किसी घटक राज्य की राजभाषा नहीं हैं उनकी बारी भी आनी चाहिये। इन भाषाओं में सिंधी एक ऐसी भाषा है जिसके बोलने वाले हिन्द के घटक राज्यों में फैले हुए हैं इसलिये सिंधी भाषा को दूसरी भाषाओं से वरीयता देना राष्ट्रधर्म है। सिंधी के अलावा संस्कृत कश्मीरी डोगरी मैथिली संथाली बोडो संवैधानिक मान्यता प्राप्त हैं पर ये भाषायें किसी घटक राज्य की राजभाषायें नहीं हैं। वर्तमान में देश के घटक राज्यों में दस करोड़ आबादी वाला बिहार ऐसा राज्य है जिसकी एक भाषा मैथिली को संविधान भाषा सूची में जोड़ा गया हैै। बिहार में बोली जाने वाली भोजपुरी भाषा बिहार के अलावा पूर्वी उ.प्र. और लातिन अमरीकी देशों तथा लघु भारत के नाम से विख्यात मारिशस में जनसाधारण द्वारा बोला जाता है। इस तरह भोजपुरी बिहार की राजभाषा न होकर विश्व के अनेकानेक देशों में बोली जाने वाली भाषा है। मारिशस में 48 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू है जो आपस मे हिन्दुस्तानी भाषा भोजपुरी बोलती है। ऐसा लगता है कि भोजपुरी तथा मैथिली भाषाओं को अंततोगत्वा बिहार की राजभाषा होना ही है। वर्तमान में बिहार की राजभाषा नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी है इसलिये घटक राज्य की राजभाषा बदलाव को जब उफान मिलेगा मैथिली व भोजपुरी को आगे आना ही है। इसी तरह झारखंड की वर्तमान राजभाषा हिन्दी है वहां संताली भी बड़़ी तादाद में बोलने वालों की भाषा है दोनों की लिपि नागरी होने से झारखंड में भाषा के साथ लिपि विवाद न होने से नागरी लिपि में लिखी जाने वाली संताली और हिन्दी साथ साथ चल सकती हैं। अंततोगत्वा जम्मू के डोगरा भाषियों मिथिला के मैथिल भाषियों बिहार के भोजपुरी भाषियों असम के बोडो भाषियों एवं छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़ी भाषियों की आकांक्षायें भी भारतीय संसद को संपूर्त करनी ही होंगी इसलिये काश्मीरी व संस्कृत सहित सभी भाषाओं में भारतीय संविधान की प्रामाणिक प्रतियां उपलब्ध कराने की दिशा में संसदीय सक्रियता संपन्न करनी चाहिये। प्राथमिकता उन भाषाओं लिपियों को जो भारतीय संघ के घटक राज्यों की राजभाषा व लिपियां हैं केन्द्र सरकार भारतीय संसद (राष्ट्रपति लोकसभा राज्यसभा एवं लोकसभा स्पीकर राज्यसभा के अध्यक्ष उपराष्ट्रपति द्वारा भारतीय भाषाओं को संवैधानिक भाषायी स्तर) उपलब्ध कराने के लिये कृतसंकल्प हों। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभागभवेत्। सब की बराबरी कोई छोटा बड़ा नहीं यही आज के हिन्द की भाषायी आवश्यकता है। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री महाशय प्रकाश जावड़ेकर को मुल्क के गैर हिन्दी भाषा भाषियों व नागरी लिपि के बजाय असमी, मइती (मणिपुरी), नैपाली, बांगला, उड़िया, तैलुगु, तमिल, मलयाली, कन्नड़, कोंकणी, मराठी, गुजराती, पंजाबी भाषा भाषियों सहित मुल्क के उन लोगों को जो अपनी मातृभाषा उर्दू बताते हैं उन्हें भी आश्वस्त करना होगा कि केन्द्र सरकार सभी भारतीय भाषाओं व लिपियों की स्वायत्तता की पक्षधर है तथा हर हिन्दुस्तानी भाषा की उसका संवैधानिक अधिकार उपलब्ध कराना अपना राष्ट्रधर्म समझती है। आश्वासन तथा क्रमिक कार्यान्वयन से भारत संघ के घटक राज्यों में आपसी सहमति को संबल मिलेगा तथा मुल्क में मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक का एकच्छत्र राज्य व घटक राज्यों की राजभाषाओं के जरिये भाषायी सौहार्द का वातावरण भी तैयार किया जा सकेगा।
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