Saturday, 12 August 2017

क्या सत्तर वर्ष पहले हुई चूक सुधार हिन्द की पहली जरूरत है ? 
हां प्रधानमंत्री मोदी इस भूल सुधार के प्रतीक हैं। 
आदिकवि वाल्मीकि ने दाशरथि राम के वनवास जाते समय साकेत जिसे अयोध्या (युद्ध व हिंसा नहीं) भी कहा जाता है, साकेतवासियों से श्रंगबेरपुर में कहा - वयम् सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरथि यथा। आदिकवि का यह कथन हिन्द नामित नीति आयोगाध्यक्ष राजीव कुमार जो स्वयं भी अवध के उत्पाद हैं उन्होंने हिन्द की नीति निर्धारण शैली कायूरोपीय तथा अमरीकी अंग्रेजीकरण के बजाय हिन्द का भाषायी तथा अनेकानेक लिपियों के द्वारा जो ज्ञानशलाका पिछले हजारों वर्षों से समृद्ध होती आयी है उस हिन्द के वे भद्रलोक जो हिन्द की आसन्न समस्याओं का समाधान यूनाइटेड किंगडम और अमरीकी, आस्ट्रेलियायी तथा हिन्दुस्तान की हिंग्लिश मंग्लिश तमलिश बंगलिश आदि के विदेशी चश्मे से देखने के आदी होगये हैं उन्हें राजीव कुमार ने पश्चिमाभिमुख या नैऋताभिमुख होने के बजाय पूर्वाभिमुख या ईशानाभिमुख होने का जो परामर्श दिया है वह आज का हिन्द युगधर्म है। महातांडव नृत्य के अवसान काल में नटराज राजा शंकर के डमरू से जो ध्वनियां निकलीं उसे व्यक्त करते हुए कहा गया कि - 
नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्का नवपंचवारम्।
तब शून्य का आविष्कार नहीं हुआ था। सांख्य केवल एक से नौ तक ही थे। डमरू जिसे हुड़का भी कहा जाता है हिमालय का महावाद्य है उससे चौदह ध्वनियां निकलीं जो वाणी तथा गिरा सरस्वती की उद्घोषिकायें हैं। 
          नीति आयोग के नवनामित उपाध्यक्ष ने हिन्द के लोगों को संदेश दिया है कि अपनी धरती को देखो। भारत की जो जो व्यथायें या आसन्न समस्यायें हैं उनका देसी उपचार आज की जरूरत है। मुल्क के सामने सबसे बड़ा सवाल तो मुल्क की विविधताओं में तात्कालिक तालमेल तभी बैठाया जा सकता है जब हिन्द का नजरिया हिन्दुस्तानी हो। जब बर्तानियां ने हिन्द के सत्तर वर्ष पूर्व अपने अंग्रेजी राज के जुए से मुक्त किया तो ब्रिटिश भारत को समानांतर अनेकों रियासतें तथा इस्लामी सल्तनत के प्रतीक नवाबों, तालुकेदारों तथा राजाओं की एक बड़ी पंगत मुल्क में विद्यमान थी। उनकी राजनीतिक राज कौशलता भी अपने अपने किस्म की थी। मुल्क में अनेकानेक भाषायें बोली जाती थीं पर सांस्कृतिक दृष्टि से हिन्द एक सांस्कृतिक राष्ट्र था जो आज भी विद्यमान है। मजहब अथवा रिलीजन की जो अवधारणा पश्चिम में है वह हिन्द के समाज में खलबली मचाने की ताकत नहीं रखती। टाइम्स आफ इंडिया के स्तंभकार अवनि महाचार्य जो दिल्ली विश्वविद्यालय में एसियन स्टडीज की प्राध्यापिका हैं उनकी राय में चीन का राष्ट्रवाद या नेशनलिज्म एक ढिंढोरा पीटने वाला दृष्टिपथ है। सोवियत संघ के महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञ चिंतनपोखर ख्रुश्चेव हुए। उन्होंने पीपल्स लिबरेशन आर्मी के जनक माओ त्से दुंग को ललकार कर कहा था - माओ आप जिस रास्ते पर जारहे हैं वह अत्यंत कटीला है और आपके विस्तारवादी जबरन कब्जा कर अपना हिस्सा बताने वाली आपकी मंशा चीन को उजाड़ देगी। हिन्द ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी के मुखिया माओ को जरूरत से ज्यादा महत्व देकर संसार के अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र तिब्बत का भयावह उत्पीड़न होने दिया। हिन्द में राष्ट्र शब्द के चार मुहाने हैं। गुजरात में सौराष्ट्र, महाराष्ट्र में महाराष्ट्र, उ.प्र. के बुंदेलखंड क्षेत्र के हमीरपुर जिले में राठ नाम की एक जगह है जहां की खादी सारे हिन्द में पसंद की जाती रही है। उस खादी को कातने बुनने वाले लोग हिन्दू कोरी कहलाते हैं। हिन्द में हिन्दू कोरियों के अलावा मुसलमान जुलाहे जिनके अगुआ कबीरदास के करघे ने एक नया कबीर का करघा खड़ा किया। हिन्द तो गांधी के चरखे और कबीर के करघे के जरिये हिन्द की रोजगारियां स्थिर करने कातने व बुनने वाले लोगों के हाथों को काम देने के अलावा हिन्द सरीखे मुल्क के लिये पहली जरूरत है। सवाल उठता है कि क्या चीन एक राष्ट्र या नेशन है अथवा उसका ढिंढोरा पीटने वाला मानव समूह। हिन्द में तांतियों की भी एक लंबी कतार है इसलिये तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि चीन के दिखावटी नेशनलिज्म से डरा न जाये वरन् उसका सामना किया जाये। सोचने व समझने की जरूरत है कि सन् 1890 में ब्रिटिश इंडिया व तिब्बत में जो संधि हुई और ब्रिटेन ने तिब्बत के जिस सार्वभौम सत्ताधिकार को स्वीकार किया उसे फिर से उघाड़ा जाये तथा तिब्बत व भूटान की जो राजनीतिक स्थिति 1890 में संकल्पित हुई उसे पूरे वेग से बढ़ाया जाये। यहां एक सवाल यह उठता है कि क्या भारत व चीन एक दूसरे के पड़ोसी तथा एक दूसरे से लगी हुई सीमा वाले मुल्क हैं ? तिब्बत हिमालय के उत्तर में तथा चीन का हिन्द का पड़ोसी कहलाने से भी पहले से हिन्द का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं सामाजिक साझेदारी वाला पड़ोसी राष्ट्र रहा है ठीक वैसा ही जैसा कि हिन्द का सांस्कृतिक व सामाजिक साझेदार पड़ोसी राष्ट्र नैपाल है। तिब्बत तथा वामे दुनियां के नाम से मशहूर चीनी प्रांत सिक्यांग जहां मुसलमान ज्यादा हैं दोनों का दूर दूर तक कोई रिश्ता नाता चीन से नहीं है इसलिये चीन की जो मौजूदा विदेश नीतिक अवधारणा है उसे भारत-तिब्बत के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। चीन ने जो बनावटी व दिखावटी एवं जबरन कब्जा कर विस्तारवादी बनने का ढोंग रचा हुआ है उसे आज का हिन्द रौंदने की पूरी पूरी क्षमता रखता है। मौजूदा चीनी शास्ताओं की जिस विस्तारवादी विदेश नीति के चलते आज उद्यमिता के क्षेत्र में चीनी कपड़ा उद्योग दुनियां के कपड़ा बाजार में यत्र तत्र सर्वत्र फैल गया है तथा जिसकी आर्थिक अवलम्बता का एक बड़ा हिस्सा चीनी उत्पादों का सबसे ज्यादा उपयोक्ता भारत का होना है किन्तु जिस दिन गांधी का चरखा व कबीर का करघा दुनियां के वस्त्र बाजार में अपनी योग विधा से विस्तार कर लेगा चीन की उत्पादकता अर्थहीन हो जाने वाली है। आज का चीन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी और तिब्बत के परम पावन चौदहवें दलाई लामा के व्यक्तित्त्व से संत्रस्त है। जिस दिन हिन्द के लोग परम पावन दलाई लामा को भारत रत्न की उपाधि से विभूषित करेंगे तिब्बत का मानवाधिकार एक नयी लोकपाल की स्थिति उपलब्ध कर लेगा इसलिये चीन से घबराने की नहीं अपितु उससे लोहा लेने की जरूरत है। चीनी शास्ता शी जिनपिंग ने जो जाल बुना है वह उन्हें बांधने का उनका अपना ही उपक्रम सिद्ध होगा। लांबसांग की धर्मशाला स्थित प्रवासी तिब्बती सरकार को कूटनीतिक मान्यता देना आज का युगधर्म है ताकि तिब्बत अपना सिर पुनः ऊँचा कर सके। 
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