कर्म की दुनियां में कुछ भी असंभव नहीं
केवल सच्ची निष्ठा से कर्म करने वाली मानसिकता चाहिये।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र काशी (जिसे डाक्टर संपूर्णानंद ने वाराणसी का भारतीय वाङमय वाला नाम दे डाला) को लोग बनारस भी कहते थे। हिन्द के बहुसंख्यक लोग काशी और बनारस के कारण अपने बेटे बेटियों के नाम काशीनाथ, काशीराम, काशी कुमारी, बनारसीदास आदि भी रखते थे। काशी और बनारस हिन्द के लोगों में इतने प्रिय होगये कि हिन्द के लोग अपने जीवन के चौथे हिस्से में काशी वास करना श्रेयस्कर मानते थे। नित्य पंडित राज जगन्नाथ की भांति दशाश्वमेघ घाट पर नहाना तांबे के लोटे से गंगाजल लेकर काशी विश्वनाथ का जलाभिषेक करना। इस काशी नगरी से जुड़ा हुआ जिला गाजीपुर है। इसका पुराना संस्कृत वाङमय नाम गाधिपुर है। यह नगर काशी की तरह गंगा तट पर बसा हुआ है। इस नगर के राजा गाधि कुशिकनंदन थे। उनकी एकमात्र संतान सत्यवती नाम की कन्या थी। भृगुवंशी ऋचीक राजा गाधि के पास पहुंचे। उन्होंने राजा से प्रार्थना की कि अपनी कन्या सत्यवती का विवाह मुझसे कर दो। राजा ने मना नहीं किया किन्तु ऋचीक से कहा - सहस्त्र श्यामकर्ण अश्व लाओ तो मैं अपनी कन्या तुम्हें ब्याह दूँगा। ऋचीक ने लोकपाल वरूण की आराधना की। वरूण ने प्रसन्न होकर ऋचीक से कहा - ब्राह्मण क्या चाहते हो ? ऋचीक ने कहा - एक हजार श्यामकर्ण घोड़े (अरबी घोड़े) राजा गाधि ने चाहे हैं। मैं अगर राजा गाधि को एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दे सका तो वे अपनी सुनयना कन्या सत्यवती का विवाह मुझसे कर देंगे। एक हजार अरबी घोड़ों को लेकर ऋचीक गाधिपुर पहुंचे। उन्होंने घोड़े राजा गाधि को सौंप दिये। राजा ने अपनी प्यारी बिटिया सत्यवती का कन्यादान ऋषि ऋचीक को कर दिया। ऋचीक गृहस्थ होगये। उनकी नवोढ़़ा पत्नी ने अपने पति से कहा - जो व्यक्ति हजार श्यामकर्ण घोड़े लाकर मेरे पिता राजा गाधि को सौंप सकता है उसकी कर्तृत्व शक्ति अपार है। मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि मेरा पुत्र यशस्वी हो साथ ही मेरी मां ऐसे पुत्र को जन्म दे जिससे मेरे पिता का यश बढ़े। मेरा भाई ओर मेरा बेटा मामा भांजे के तौर पर विश्व में प्रसिद्धि पायें। ऋचीक ने पतिव्रता सत्यवती की बात मान ली। सत्यवती को दो चरू दिये और कहा - यह चरू तुम्हारे खाने के लिये है और दूसरा चरू तुम अपनी मां को खिलाना। सत्यवती ने उल्टा कर डाला। जो स्वयं खाना था वह मां को दे दिया और मां के लिये निर्धारित चरू स्वयं खा लिया। गर्भवती सत्यवती ने अपने पति से कहा - मुझे गर्भ में पीड़ा होरही है। ऋचीक ने उससे पूछा - क्या तुमने अपनी मां के लिये दिया चरू स्वयं तो नहीं खा लिया। सत्यवती ने कहा - हां यह त्रुटि मुझसे होगयी है। ऋचीक सत्यवती से बोले -
घोरो दण्ड परः पुत्रो भ्राता ते ब्रह्म विदम्।
सत्यवती तुम्हारा पुत्र घोर दण्डधर होगा और तुम्हारा भाई ब्रह्मवेत्ता ऋषि होगा। सत्यवती अपने पति से बोली - भगवन् ! मेरे पुत्र के बजाय पौत्र को घोर दण्डधर बना दीजिये। ऋचीक ने हंसते हुए अपनी गर्भवती भार्या से कहा - तुम मुझसे सृष्टि का नियम बदलवाना चाहती हो। अभी तो तुम्हारे पुत्र ने जन्म ही नहीं लिया। जब वह जन्म लेगा और वयस्क होगा तब तुम पुत्र की शादी कराओगी तब जाकर तुम्हारा पौत्र होगा। यह तो तुम अनहोनी सरीखी बात कर रही हो। सत्यवती ने अपने पति ऋषि ऋचीक से कहा - जो तपस्वी मुझे पाने के लिये एक हजार श्यामकर्ण घोड़े ला सकता है वह पुत्र के बजाय पौत्र को भी घोर दण्डधर बना सकता है। ऋचीक सत्यवती की पति सुश्रुषा से अत्यंत प्रसन्न थे अतः उन्होंने कहा - कृत्य तो उचित नहीं है पर लगता है परमात्मा को यही मंजूर है इसीलिये तुम घोर दण्डधर पौत्र चाह रही हो। ऋचीक ने पुत्र का नाम जमदग्नि रखा। गाजीपुर जिले में जमनियां नाम का एक स्थान है यही जमदग्नि ने अपना आश्रम सुनिश्चित किया। विश्वामित्र जमदग्नि के मामा थे। उस युग में वशिष्ठ, विश्वामित्र व जमदग्नि उच्चकोटि के ऋषि थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, राजर्षि विश्वामित्र तथा सामवेद गायक जमदग्नि। आजकल जमनियां गंगा जी से करीब तीन मील दूर है। जब जमदग्नि ने जमनियां में आश्रम शुरू किया जमनियां गंगा तट पर था। जमदग्नि की पत्नी का नाम रेणुका था। रेणुका गंगाजल लाने गंगा तट पर पहुंची वहां गंधर्व व अप्सरायें जलक्रीड़ारत थीं। वह भूल गयी कि उसे अपने पति के लिये गंगाजल ले जाना है। विलंब होने के कारण उसने अपनी त्रुटि महर्षि जमदग्नि को साफ साफ बता दी। दण्डधर का कुछ अंश तो जमदग्नि में विद्यमान था ही उन्होंने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि अपनी माता रेणुका का वध कर डालो। जमदग्नि के तीन पुत्रों ने पिता जी की आज्ञा मानने से इन्कार कर दिया। चौथा पुत्र जामदग्न्य राम था। राम ने पिता से कहा - आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। जमदग्नि ने प्रसन्न होकर कहा - राम, तुम सरीखा पुत्र पाकर मैं धन्य हूँ। राम को अपने पिता की योग्यता का भान था। उसने जमदग्नि से कहा - आपने मुझे माता व तीन बड़े भाइयों का वध करने का आदेश दिया, मैंने आदेश स्वीकार कर मातृवध व भ्रातृवध का पापार्जन कर लिया। मुझे मालूम है कि आप मरे हुए को जिन्दा करने की शक्ति रखते हैं अतएव यदि आप आदेश पालन के मेरे इस कृत्य से प्रसन्न हैं तो कृपा करके मेरी माता व मेरे भाइयों पुनर्जीवन प्रदान करने की कृपा करें। जमदग्नि ने अपने पुत्र रेणुकेय जामदग्न्य राम से कहा - तथास्तु। जमदग्नि के चौथे पुत्र राम का जन्म वैशाख सुदी तृतीया को हुआ था इस तिथि को हिन्द के लोग अक्षय तृतीया या अक्खा तीज कह कर बहुत बड़े पर्व के रूप में इसे मनाते हैं। महिलायें अक्षय तृतीया के दिन गहने खरीद कर पहनती हैं। समूचे पश्चिमी भारत में अक्खा तीज वैसा ही महत्वपूर्ण त्यौहार है जैसा मिथिला में अगहन की विवाह पंचमी। जमदग्नि व उनके पुत्र रेणुकेय राम जिन्हें हिन्द के लोग फरसा वाले राम याने परशुराम भी कहते हैं, का जन्म तो जमनियां जिला गाजीपुर में हुआ पर परशुराम यशोगाथा समूचे पश्चिमी भारत का महत्वपूर्ण पर्व है। ऋचीक सत्यवती प्रकरण यह प्रतीति कराता है कि व्यक्ति अपनी तकदीर को बदल भी सकता है, जरूरत केवल सत्यनिष्ठा की है। हिन्द के जिस समाज में आज भी जामदग्न्य राम की जयंती अक्खा तीज या अक्षय तृतीया के दिन प्रति वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। इसका सबसे बड़ा जलवा आधुनिक गुजरात में ही दीखता है। गुजरात ने हिन्द को स्वामी दयानंद सरस्वती सरीखा व्यक्तित्त्व दिया जिसने वेदों की व्याख्या अपने तरीके से की। दूसरी ओर महात्मा गांधी सरीखा रामभक्त भी दिया जिसने हिन्द की आजादी को अपने जीवन का अहिंसात्मक सत्याग्रह कहा। महात्मा गांधी के बाद गुजरात ने दृढ़ निश्चयी सदाचार को परम आदर्श मानने वाले नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के रूप में अद्भुत नेतृृत्व सौंपा। दिल्ली के सत्ता गलियारे में घूमने वाले छिद्रान्वेषी महानुभाव पिछले तीन साल से प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के व्यक्तित्त्व एवं चारित्रिक गुणों में कोई ऐसा दोष नहीं खोज पाये हैं जिससे प्रधानमंत्री मोदी पर कोई आरोप जड़ सकें। अंबा भक्ति, मनुष्य मात्र के लिये सहानुभूति किसी से भी द्वेष भाव न रखने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने हिन्दत्व में चार चांद लगा दिये हैं। उनके विरोधी कोई ऐसा दोष उनमें खोजने में असमर्थ हैं। यह हिन्द की बहुत बड़ी उपलब्धि है कि नरेन्द्र मोदी सरीखा निर्लिप्त नेतृत्व मुल्क को मिला है। हर उस व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्कार्यों में अपना योगदान दे।
ऋषि ऋचीक के औरस पुत्र जमदग्न्य और पौत्र जामदग्न्य रेणुकेय राम की जीवन गाथा यह प्रतीति कराती है कि अपने आसन्न कर्त्तव्य को संपन्न करने वाले व्यक्ति की दुनियां में कुछ भी असंभव नहीं है। ऋचीक ने सत्यवती से कहा - सत्यवती, तुम ईश्वर के सृष्टि नियम तथा कर्मफल को बदलना क्यों चाह रही हो ? मुझे इस अधर्म कृत्य करने के लिये बाध्य कर रही हो। सत्यवती अपने पति से बोली - जो व्यक्ति मुझे पाने केे लिये सहस्त्र अरबी घोड़े मेरे पिता महाराज गाधि को उपलब्ध कर सकता है उसकी क्षमता पर मुझे पूरा यकीन है। आप मेरे संकल्प को सफल करने की शक्ति रखते हैं इसलिये मुझे दण्डधर पुत्र के बजाय मेरे पुत्र का पुत्र दण्डधर हो इसमें कोई त्रुटि नहीं दीखती अधर्म भी नहीं दीखता। यह हैं जामदग्न्य राम जिसे हिन्द के लोग फरसा वाले राम भी कहते हैं और उनकी जीवन शैली। जामदग्न्य राम ने यह तय किया था कि वे किसी क्षत्रिय को युद्ध विद्या विशारद नहीं बनायेंगे। गंगा अपने पुत्र देवव्रत जो भीष्म पितामह के नाम से विख्यात योद्धा रहे हैं, को लेकर परशुराम के पास गयी और उसने कहा - जामदग्न्य राम मैं जानती हूँ कि आप युद्ध विद्या क्षत्रियों को नहीं देते पर मेरा यह पुत्र देवव्रत मैं आपको सौंप रही हूँ। आपसे विद्या भिक्षा पुत्र के लिये मांग रही हूँ। मुझे निराश न करो तथा मेरी विनती मान कर सात वर्षीय बालक देवव्रत को अगले नौ वर्ष तक युद्ध विद्या विशारद बना कर पुनः मुझे सौंप दो। इसे क्षत्रिय मान कर महत्त्व दो। कल्पना करो कि यह भागीरथी गंगा का चहेता पुत्र है। परशुराम ने देवव्रत को युद्ध विद्या पारंगत बना कर गंगा को पुनः सौंप दिया। गंगा अपने प्रिय पुत्र देवव्रत को उसके पिता राजा शांतनु को सौंप आयी। महाभारत के अठारह दिवसीय कुरूक्षेत्र के रणांगण में भीष्माचार्य महाराज कुमार सुयोधन के सेनापति थे। योगेश्वर श्रीकृष्ण जानते थे कि भीष्म स्त्री पर अस्त्र नहीं चलाते हैं इसलिये श्रीकृष्ण ने शिखंडी को आगे बढ़ा दिया। महारथी भीष्म के कुछ सुनिश्चित संकल्प थे जिनमें स्त्रियों पर अस्त्रशस्त्र चलाने का निषेध भी मुख्य संकल्प था। शांतनु पुत्र शांतनव भीष्म राजसिंहासन के अधिकारी थे पर उन्होंनेे अपने पिता शांतनु का विवाह मत्स्यगंधा से संपन्न कराने के लिये दासराज से प्रतिज्ञा की थी कि मैं राज्य का चाह नहीं करूँगा जो तुम्हें ईष्ट हो वही करूँगा, संतान जो सत्यवती जनेगी राज्याधिकारी वही बनेगी। शांतनु से सत्यवती के दो पुत्र विचित्रवीर्य और चित्रांगद हुए। विमाता सत्यवती के कहने पर भीष्म ने राज्य संचालन तो किया किन्तु वे स्वयं राज्याधिकारी होते हुए भी सिंहासन में नहीं बैठे। परशुराम और भीष्म की जीवन गाथा भारत के पौराणिक काल की महत्वपूर्ण घटना है जिसे हिन्द के लोग आज भी महत्व देते हैं। परशुराम जयंती या अक्षय तृतीया समूचे पश्चिमी भारत का महत्वपूर्ण पर्व है। भीष्म पितामह के वश में मृत्यु भी थी। युद्धक्षेत्र में उन्होंने तभी प्राण त्यागे जब सूर्य मकर राशि में पहुंचे और वसंत पंचमी से तीसरे दिन भीष्माष्टमी को भीष्म पितामह ने प्राण त्याग किया। परशुराम और भीष्म पितामह जहां गुरू शिष्य भी थे वहीं दोनों की जीवन गाथा चमत्कारिकता से पूर्ण भी है। परशुराम के पास हिमालय के बदरीखंड में राजा वीतिहोत्र अपनी धेवती अथवा दौहित्री अंबा को लेकर पहुंचे। वीेतिहोत्र ने जामदग्न्य राम से प्रार्थना की कि मेरी इस दौहित्री अंबा को भीष्म हर कर लेगया पर उससे शादी नहीं करता। परशुराम ने वीतिहोत्र व अंबा को आश्वस्त किया कि वे भीष्म को तैयार करेंगे। अंबा को लेकर परशुराम भीष्म के पास हस्तिनापुर पहुँचे और उन्होंने कहा - वत्स, इस लड़की का हाथ पकड़ कर काशी से लाये हो तो इससे विवाह करो। भीष्म ने गुरू को सही कहानी बतायी तो गुरू परशुराम ने कहा - तो तुम मुझसे युद्ध करो और अगर तुम हार गये तो तुम्हें अंबा से विवाह करना होगा। गुरू शिष्य में तुमुल युद्ध हुआ सातवें दिन जामदग्न्य राम ने अपने प्रिय शिष्य भीष्म से कहा - वत्स, तुम जीते मैं हारा। राजा वीतिहोत्र से जामदग्न्य राम ने कहा - राजन् मैं अपने शिष्य से हार गया हूँ। आपकी मनोकामना पूर्ति नहीं कर सकता। परशुराम और भीष्माचार्य की गाथा अपने आप में एक अद्भुत रहस्य है। हिन्द का जनसामान्य परशुराम तथा भीष्माचार्य के चमत्कारिक कृत्यों का गीतगान करता रहता है। इन दोनों गुरू शिष्य की जीवन गाथा मनुष्य मात्र को एक शक्ति देती है कि अगर चाह हो तो वह स्वयं निकल जाती है। व्यक्ति की सत्यनिष्ठा, कर्त्तव्यपरायणता तथा सही समय पर सही कदम उठाने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति जहां निर्वैर होता है वहीं आसन्न कर्त्तव्य से मुंह भी नहीं मोड़ता। ऋचीक, सत्यवती, जमदग्न्य, रेणुका, रेणुकेय जामदग्न्य राम विश्वामित्र की गाथायें गंगा तट में आज भी यथापूर्व घट रही हैं। काशी के दशाश्वमेघ घाट पर पंडित राज जगन्नाथ गंगा लहरी गाते हुए दशाश्वमेघ घाट की पावन सीढ़ियां चढ़ कर गंगा ने पंडित जगन्नाथ को अपने में समेट लिया था। पौराणिक कथा नहीं हिन्द के मुगल सल्तनत के शाहंशाह शाहजहां की बेगम मुमताज की बहन सद्य सुल्ताना लवंगी के सौंदर्य से प्रभावित होकर बादशाह शाहजहां ने पंडित राज से कहा - पंडित जगन्नाथ इसके सौंदर्य का वर्णन करो। पंडित राज ने जो छंद गाये शाहजहां उनसे अत्यंत प्रसन्न होकर बोले - पंडित राज जो चाहो सो मांग लो। पंडित राज ने कहा - शाहनशाह यदि मेरी कविता से खुश हैं तो इस लवंगी को ही मुझे दे दीजिये। बादशाह ने स्वीकृति दी साथ ही यह भी कहा - पंडित राज हिन्द के ब्राह्मण तुम्हें झकझोर डालेंगे। पंडित राज ने कहा - जो होगा शाहनशाह निपट लूँगा। लवंगी पंडित राज की प्रेयसी होगयी पर हिन्द के ब्राह्मण पंडित राज पर खफा होगये। पंडित राज ने कहा - काशी विश्वनाथ से फैसला करा लो। अगर विश्वनाथ ने मुझे दोषी समझा तो आप लोगों की बन जायेगी पर काशी विश्वनाथ ने पंडित राज जगन्नाथ को वरदान दे दिया। काशी के पंडित नहीं माने तभी पंडित राज ने गंगा लहरी गायी, गंगा में समा गये।यही है हिन्द की जांबाजों की जीवन गाथा।
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