Wednesday, 23 August 2017

विश्व अहिंसा दिवस के समानान्तर राष्ट्रसंघ में
महात्मा गांधी की खादी के जरिये वैश्विक अहिंसा के साथ खादी योग।

राष्ट्रसंघ यू.एन.ओ. ने महात्मा गांधी जयंती 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस  के रूप में विश्व अहिंसा का स्तूप मनाना शुरू कर दिया है। विश्व अहिंसा दिवस की सार्थकता तभी फलदायी होगी जब गांधी के चरखे, हथकरघे, निटिंग यार्न की कताई तथा हैंडनिटिंग जिसमें कताई, बुनाई तथा हाथबुनाई के साथ साथ दाहिने हाथ की चार अंगुलियों अंगूठा, तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियों के ऊर्ध्वभाग जिसे हिन्द में अंगुली पोर कहा जाता है कताई, बुनाई तथा हाथबुनाई में अपने आप योगिक क्रिया संपन्न होती है। इसे 1935 में जुलाई के महीने में परमहंस योगानंद महाराज ने सेवा गांव पहुंच कर महात्मा गांधी को कहा था कि आपका चरखा कताई, करघा बुनाई तथा कताई, बुनाई व निटिंग यार्न कताई एवं हाथबुनाई स्वाभाविक योग है। हिन्द विश्व में प्रति वर्ष 21 जून को विश्वयोग दिवस मना रहा है। गांधी की खादी चरखा कताई, हथकरघा बुनाई की स्वाभाविक योग क्रियाओं से जो पहिरावे के कपड़े तैयार होते हैं उनमें अंगुलियों के पोरवों का योग जुड़ा हुआ कृत्य है इसलिये महात्मा गांधी की 150वीं जयंती वर्ष 2 अक्टूबर 2018 से 23 अक्टूबर 2019 तक राष्ट्रसंघ में विश्व अहिंसा दिवस को कारगर रूप में योग क्रिया से जोड़ने केे लिये विदेश मंत्री महाशया सुषमा स्वराज को 100 कपास कताई करने वाले चरखे चलाने वाली माता बहनों द्वारा कपास कताई के अलावा रेशम कताई, ऊन कताई से योगिक क्रिया संपन्न करने के समानांतर हथकरघा मंे बुनाई करने वाले 10 बुनकर, ऊनी चरखे पर निटिंग यार्न की कताई करने वाली बीस महिलायें हाथ बुनाई कर स्वेटर, पुलोवर आदि बुनने वाली दस मां बहनों सहित गांधी की खादी को विश्व स्तर पर राष्ट्रसंघ मे हाथ उद्यमिता तथा हाथ से योग मार्ग का अनुसरण करने के लिये दस दर्जियों सहित एक सौ पचास लोगों का उद्यम जमावड़ा राष्ट्रसंघ में स्थापित करने का शिवसंकल्प लिया जाये ताकि राष्ट्रसंघ की विश्व अहिंसा दिवस संकल्पना  प्रत्यक्ष रूप से विश्व मानव समुदाय को देखने को मिले। विदेश मंत्रालय वर्ष 2018 में  पड़ने वाली 149वीं गांधी जयंती 2 अक्टूबर को शुरू कर विश्वसंकल्प संपूर्ति महात्मा गांधी की 150वीं जयंती वर्ष पर विश्व मानव समाज को प्रत्यक्ष देखने को मिले। गांधी की खादी पूर्णतः योगमार्ग है, दुनियां को यह दिखाने का उत्तरदायित्त्व श्रीमती सुषमा स्वराज को संपन्न करना ही चाहिये ताकि विश्व में अहिंसा का वातावरण बनाने में हिन्द के माइक्रो क्राफ्ट छोटे मोटे हाथ से संपन्न होने वाले उद्यमों केे जरिये विश्व का कायाकल्प करने में हिन्द अपनी महती भूमिका अदा कर सके। महात्मा की 150वीं जयंती पर हिन्द की चरखा कातने वालीे महिलाओं, हथकरघा बुनकरों, निटिंग यार्न कातने वाली बहनों, हैंड निटिंग कर स्वेटर, पुलोवर तैयार करने वाली महिला श्रम शक्ति तथा दर्जियों का चयन करने के लिये अलाभ अहानि पर खादी का कारोबार ईमानदारीपूर्वक संपन्न करने वाली खादी ग्रामोद्योग आयोग पोषित संस्थाओं से विचार विमर्श कर कताई करने वाली महिलाओं, बुनाई करने वाले बुनकरों सहित चयनित किये कामगारों को राष्ट्रसंघ में खादी वितान में कम से कम सात वर्ष अपनी योग्यता प्रदर्शित करने का अवसर दिया जाना चाहिये। हर सातवें वर्ष कारीगरों का नया दल संयुक्त राष्ट्र पहुंचे जिससे प्रत्येक सक्षम कारीगर को अपनी कार्य कुशलता प्रदर्शित करने का मौका मिले। जो कारीगर अवधि उपरांत भी अपना काम करते रहना चाहें उन्हें अपना भविष्य निर्धारित करने की आजादी हो पर वे विदेश मंत्रालय के तत्वावधान में केवल सात वर्ष तक ही उद्यमिता कर सकेंगे साथ ही भारतीय विदेश मंत्रालय के परिक्षेत्र में माइक्रो क्राफ्ट छोटे मोटे हाथ उद्योगों का राष्ट्रीय वितान भी निर्मित किया जाये जिसमें कारीगरों की संरचना निर्धारित करना, विभिन्न घटक राज्यों की उद्यमिता से जुड़ा हो। पूर्ण घटक राज्यों सहित संघीय शासित क्षेत्रों के कताई, बुनाई करने वाले लोगों को प्रतिनिधित्व मिले ताकि प्रत्येक घटक राज्य व संघ शासित क्षेत्र को अपनी हाथ की कारीगरी को अखिल भारतीय स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिले। ऐसे प्रयासों में भी कारीगर को कम से कम सात वर्ष ज्यादा से ज्यादा दस वर्ष तक ही लाभार्जन मिले। अवधि बीत जाने पर नये कारीगर जुड़ें ताकि कार्यक्रम में ठहराव व रूकावट न आये। विदेश मंत्रालय का यह संकल्प भारत की हाथ उद्यमिता को प्रोत्साहन देने वाला कृत्य होगा तथा आसेतु हिमाचल हिन्द के लोगों में हाथ से काम करने की जो कार्य कुशलता है उसे संबल मिल सकेगा। विदेश मंत्रालय और राष्ट्रसंघ में गांधी की खादी की पैठ विश्व में एक नया वातावरण तैयार करने में मददगार होगी। संयुक्त राज्य अमरीका में अनेक डाक्टर अपने मरीजों को हिन्द की खादी के कपड़े पहनने की सलाह देते हैं ताकि उनकी शारीरिक दुर्बलता पर रोक लगे। चीन का वस्त्र व्यापार बाजार दुनियां के हर कोने में दस्तक देरहा है पर चीन के वस्त्रों में वह गुणवत्ता नहीं है जो गांधी की खादी में स्वाभाविकतया उपलब्ध है इसलिये राष्ट्रसंघ व विदेश मंत्रालय में गांधी की खादी को स्थापित करने के उपरांत भारतीय विदेश मंत्रालय हिन्द के हर दूतावास में खादी वस्त्रों की उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त करे। दुनियां भर के देशों में चीन का वस्त्र व्यापार यत्र तत्र सर्वत्र चमकता हुआ दिखायी देता है पर चीन के परिधानों में गांधी की अहिंसा दृष्टि नहीं है। चीन एकतंत्री देश है जहां शास्ता के शब्द चीनी कम्यूनिस्टों के लिये निर्णायक ब्रह्मवाक्य हैं। वहां वाणी की वह स्वतंत्रता नहीं है जो हमारे भारत देश में उपलब्ध है। निरीश्वरवाद पर यकीन करने वाले तथा स्वयं को निरीश्वरवादी कहने वाले चीनी शासकों की अंतरंग हलचलें उस मुल्क के जनसामान्य को ही नहीं पता हैं। चीन यह तो स्वीकारता है कि तिब्बत उसका अंग नहीं स्वतंत्र अस्तित्व वाला आटोनोमस तिब्बत राज्य है, चीन अगर दुनियां में किसी व्यक्ति से संत्रस्त है वह व्यक्तित्त्व तिब्बत के परम पावन चौदहवें दलाई लामा हैं। यद्यपि तिब्बत पर चीन का बलात कब्जा पिछले अड़सठ वर्षों से लगातार चल रहा है, चीन ध्यानयोगी दलाई लामा को अपना विरोधी मान कर चलता है यद्यपि दलाई लामा में चीन के लिये कोई दुर्भावना प्रत्यक्षतः दिखती नहीं है पर चीन के शासकों के मन में यह डर बैठ गया है कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनने में उसे अनेक बाधायेें आने वाली  हैं। हिन्द की राजनीतिक मजबूरी कहें या तिब्बत के बारे मंे राजनीतिक संशयात्मकता ने हिन्द के प्रथम प्रधानमंत्री ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान कर जो राजनीतिक भूल 1949 में की उसे उन्होंने 1959 में दलाई लामा को भारत आने और भारत में अपना धर्म शासन संचालन करने की इजाजत तो दी पर राजनीतिक मान्यता न होने के कारण परम पावन दलाई लामा ने पिछले अठावन वर्ष हिन्द में ध्यानयोग में ही बिताये हैं। पिछले कुछ वर्षांे से परम पावन दलाई लामा ने तिब्बत की संसद व राज्याधिकार नौजवान लांबसांग को सौंप कर अपना समूचा समय ध्यानयोग में केन्द्रित कर लिया है। इस विश्ववंद्य संत ने हिन्द की भूमि में पिछले अठावन वर्ष से जो तपस्या की है, हिन्द की धरती का यौगिक लाभार्जन किया है इसलिये हिन्द के शासकों का कर्त्तव्य है कि जिस तरह उन्होंने खान अब्दुल गफ्फार खां को भारत रत्न उपाधि देकर स्वधर्म का पालन किया उसी तरह भारत के प्रधानमंत्री महादय को पंद्रह अगस्त 2017 के दिन लालकिले की प्राचीर से घोषणा करनी राष्ट्रभक्ति होगी कि परम पावन चौदहवें दलाई लामा को हिन्द भारत रत्न घोषित करता है। आगामी गणतंत्र दिवस के अवसर पर परम पावन चौदहवें दलाई लामा को भारत रत्न की उपाधि दी जानी चाहिये तथा लांबसांग की धर्मशाला स्थित तिब्बत सरकार को राजनीतिक मान्यता देते हुए तिब्बत स्वतंत्रता समर्थक विश्व के राष्ट्रों को भी प्रेरित करना चाहिये कि वे भारत में कार्यशील प्रवासी तिब्बत सरकार के मुखिया लांबसांग को तिब्बत का वैध शासक मानते हैं। तिब्बत की स्वतंत्रता का मानवीय महायज्ञ संपन्न करने में यदि भारत को चीन से युद्ध भी करना पड़ जाये तो भी उसे तिब्बत की स्वतंत्र सत्ता का संकल्प लेना ही चाहिये। 
मौजूदा विश्व के 149 राष्ट्र यू.एन. के सदस्य हैं जो मुल्क राष्ट्रसंघ के सदस्य नहीं हैं वैटिकन सहित उनकी संख्या 6 है जिनमें राष्ट्रवादी चीन का ताइवान भी है। रिपब्लिक आफ चाइना जिसे मंदारिन वाङमय में चुंग हुंग मुडक्यो कहा जाता है ताइवान की राजधानी ताइपेह क्षेत्रफल 35000 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या दो करोड़ तैंतीस लाख है। मजहब बुद्धिस्ट ताओवादी कन्फ्यूसियस तिरानबे प्रतिशत हैं, ईसाई पांच प्रतिशत, साक्षरता 96 प्रतिशत, दीर्घजीवितता 79 प्रतिशत के करीब प्रति व्यक्ति आय 22083 डालर है जब कि चीन की मुख्यभूमि पीपल्स रिपब्लिक आफ चाइना विज्ञप्त है जो ताइवान से बहुत कम है याने चीन की प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी ताइवान की प्रति व्यक्ति आमदनी के तिहाई के आसपास है। इससे यही प्रतीति होती है कि मुख्य चीन से ताइवान ज्यादा समृद्ध देश है। वैसे प्रति व्यक्ति आमदनी के नजरिये से चीन हिन्द से सात गुना आगे है। यहां तुलनात्मक आर्थिकता चीन व ताइवान से संबंधित है। ऐसा प्रतीत होता है कि ताइवान का मुकाबला करने की ताकत चीन अर्जित नहीं कर पारहा है। दूसरी ओर तिब्बत के चौदहवें दलाई लामा का वैश्विक व्यक्तित्त्व चीन से टकरा रहा है। चीन चाहता है कि जब दलाई लामा दिवंगत हों उनके उत्तराधिकारी का निर्णय चीन करे पर तिब्बत का लामा समूह चीन के तर्क को मान्यता नहीं देना चाहता यह चीन का राजनीतिक संकट है। दलाई लामा मानते हैं कि उनका पुनर्जन्म अरूणाचल प्रदेश सहित हिन्द में जहां जहां तिब्बती हैं कहीं भी होना संभव है। इस तर्क को चीन मान्यता नहीं देना चाहता इसलिये दलाई लामा के बारे में चीन की संशयात्मकता लोकव्यापी है। हिन्द के जनसामान्य तथा हिन्द की सरकार को चीन को यह साफ साफ बता देना होगा कि हिन्द की उत्तरी सीमा में हिमालय पर तिब्बत है। तिब्बत की संस्कृति, सभ्यता, मजहबी भावनाओं से चीन का कोई सीधा संबंध नहीं है। तिब्बत का संस्कृत वाङमय नाम त्रिविष्टप है व पूरा तिब्बत आदित्य भूमि है इसलिये भारत ने 1 अक्टूबर 1949 के पश्चात माओ त्से दुंग की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की मुहिम को कि तिब्बत चीन का आटोनोमस रीजन है यद्यपिद स वर्ष पश्चात 1959 में भारत ने 1949 की त्रुटि को अंशतः सुधार कर तिब्बत के धर्मगुरू व उनके एक लाख तिब्बतवासियों को हिन्द में शरण दी उन्हें धर्मशाला में अपना राज चलाने की अनुमति तथाा  वित्तीय प्रावधान भी किया पर प्रवासी तिब्बती सरकार को राजनीतिक कूटनीतिक मान्यता न मिलने के कारण तिब्बत का सिक्यांग चीन के जबरी कब्जे वाले इलाके हैं। चीन से हमेशा के लिये निपटने के लिये पहली जरूरत लांबसांग की सरकार को कूटनीतिक मान्यता देना और दुनियां के उन देशों को जो तिब्बत के मानवाधिकार समर्थक हैं उनसे अनुरोध करना कि तिब्बत की हिन्द के धर्मशाला नगर में कार्यरत सरकार को वे भी मान्यता देकर मानवता की रक्षा करें। जिनपिंग अगर हिन्द पर आक्रमण करते हैं वह तीसरा विश्वयुद्ध होगा। लगता है ज्योंही तिब्बत की स्वतंत्रता का उच्चार होगा ताइवान भी आगे बढ़ेगा। पेइचिंग, हांगकांग को अपने आगोश में रखने की फिराक में है। मंदारिन की मुख्य चीन के अलावा ताइवान, सिंगापुर, हांगकांग में भी राष्ट्रीयता का उभार आयेगा। चीन के वर्तमान शास्ता जिनपिंग को महसूस हो जायेगा कि हिन्द से टकराना कितना कठिन है। हिन्द को तिब्बत की पहल में आगे बढ़ कर सर्वप्रथम 26 जनवरी 2018 को परम पावन चौदहवें दलाई लामा को भारत रत्न का सम्मान देना पहला युगधर्म है। 
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

No comments:

Post a Comment