हिन्द के लोगों को योगवाशिष्ठ का पारायण करने का मुहूर्त्त आगया है। योगवाशिष्ठ मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम केे सवाल और महर्षि वशिष्ठ द्वारा उन्हें सुझाये गये रास्ते हैं। यह तो मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम भी मानते थे कि उन्होंने पुलत्स्य केे पौत्र, विश्रवा के पुत्र दशग्रीव रावण का वध कर ब्रह्महत्या का पाप अर्जित किया था। जब मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम लंका से लौटे उनका राज्याभिषेक संकल्पित था। कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज ने निर्णय लिया कि चूंकि मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम ने ब्रह्महत्या की है अतएव कान्यकुब्मज ब्राह्मण राजा रामचन्द्र के राज्याभिषेक में सम्मिलित नहीं होंगे। उन्हें पता था कि मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम यदि आदेश दें तो कान्यकुब्जों को देश निष्कासन सहना होगा। तब अवध के सरयूपारी ब्राह्मण और कान्यकुब्ज ब्राह्मण दो खेमों में बंट गये थे। वशिष्ठ महाराज स्वयं भी सरयूपारी थे। उन्होंने मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम को सलाह दी कि वे कान्यकुब्ज ब्राह्मणों पर कोई राजाज्ञा जारी न कर उन्हें अपनेे रास्ते चलने दें। जब कान्यकुब्जों को पता चला कि योगवाशिष्ठ के रचनाकार महार्षि वशिष्ठ ने मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम का सलाह दी कि वे कान्यकुब्ज चिंतन पोखर की अवधारणा की अनदेखी कर अपना कार्यक्रम चलाते रहें। जब राम का राज्याभिषेक मुहूर्त्त आया राम सीता का परित्याग कर चुके थे। महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें सलाह दी थी कि राज्याभिषेक समारोह के लिये सीता की उपस्थिति अनिवार्य है। राम ने कुलगुरू वशिष्ठ से कहा - सीता को राज्याभिषेक केे लिये आहूत करना पाखंड होगा इसलियेे अन्य विकल्प सोचिये। महर्षि वशिष्ठ ने विकल्प के रूप में सीता की स्वर्णमूर्ति बनवा कर उस मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कर राज्याभिषेक हेतु जलाभिषेक शुरू किया। सीता की स्वर्णमूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा से कार्य प्रारंभ हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि मूर्तिपूजा जिसे स्वामी दयानन्द सरस्वती भी अमान्य करते थे, मूर्तिपूजा का पहला प्रसंग राम का राज्याभिषेक था। राम का समूचा जीवन मर्यादापूर्ण रहा है इसलिये हिन्द के लोग उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम राम कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन रामकोट की जो जमीन है उसके भूमि विवाद में श्रीरामलला के अतिरिक्त बाबरी मस्जिद का मूल पक्षधर शिया संप्रदाय, अखाड़ा जो रामकोट की भूमि पर अपना स्वत्वाधिकार घोषित करता रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बंेच ने विवादास्पद भूमि केे दावेदार - श्रीरामलला विराजमान के अलावा अखाड़ा परिषद तथा शिया संप्रदाय के विभक्त करने का जो निर्णय दिया उसे भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अस्वीकार कर नये सिरे से भूमि विवाद को विचाराधीन मुकदमा माना। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर ने मसले का माकूल हल खोजने के लिये सभी संबंधित पक्षों को पारस्परिक परामर्श से हल करने का सुझाव दिया। क्या जमीन की मिल्कियत का फैसला ही इस विषय को निर्णयात्मक बिन्दु तक पहुंचा सकता है ? देखने मेें आरहा है कि राममंदिर या मर्यादा पुरूषोत्तम राम की मानवीय मयादाओं को स्थापित करने का पुण्यपर्व तो नहीं आगया है ? राममंदिर या मर्यादा पुरूषोत्तम राम की मानवीय मर्यादायें सुनिश्चित कर - राम जिस पर योगी रमण करता है वह राम है, यही दाशरथि राम भी है। मंदिर क्या है ? क्या मंदिर मर्यादा पुरूषोत्तम राम की वैश्विक मर्यादाओं से अलग है या मयार्दाओं का अनुपालन करने का एक महत्वपूर्ण स्तंभ ? राममंदिर बने तो उसमे रामलला विद्यमान हों पर विचारणीय बिन्दु यह है कि लोक मर्यादाओं का संपादन करने वाला मर्यादा पुरूषोत्तम राम का आयतन क्या मूर्तिपूजा का विकल्प बन सकता है ? अयोध्या शब्द के माने होते हैं जहां युद्ध नहीं, हिंसा नहीं वरन् मानवीय मर्यादाओं का विशाल पुंज स्थापित हो इसलिये विचारणीय बिन्दु यह है कि अयोध्या में मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम का मानवीय मर्यादा स्तूप क्या हिन्द का रामलला विराजमान का वैश्विक पर्याय बन सकता है ? मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम ने अपनी मर्यादायें सुनिश्चित की थीं। राम की मर्यादा गाथा का उद्गान योगवाशिष्ठ ने किया। योगवाशिष्ठ मर्यादा पुरूषोत्तम राम के प्रश्नों का महर्षि वशिष्ठ द्वारा समीचीन योग वितान है इसलिये जो बिन्दु मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने महर्षि वशिष्ठ के समक्ष प्रस्तुत किये योगवाशिष्ठ उन सभी मानवीय मर्यादाओं का प्रतीक है। यदि रामलला जिन्हें अवध सहित समूचे हिन्द के लोग विवादित भूमि का सजीव स्वामित्व धारक मानते हैं तब भी मर्यादाओं की अपनी विशेषता है इसलिये सबसे आवश्यक बिन्दु यह प्रतीत होता है कि मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम की मानवीय मर्यादाओं का सार्वभौम, सर्वस्वीकार्य लक्ष्य घोषित किया जाये। हिन्द का सर्वोच्च न्यायालय संभवतः भूमि विवाद संबंधी प्रसंग पर इस वर्ष - ग्रेग्रेरियन कैलेंडर के अंतिम माह दिसंबर तक कोई निर्णयात्मक मार्ग सुनिश्चित कर ले पर अंततोगत्वा विवाद का हल केवल मर्यादाओं की मानवीय मानसिकताओं पर ही निर्भर करेगा इसलिये क्या राममंदिर प्रसंग को मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम का वह स्वरूप दिया जाये जो श्रंगबेरपुर में अयोध्या वासियों ने ऊर्ध्वबाहु होकर उद्घोष किया था - वयं सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरथि यथा। हम सभी अयोध्या वासी रामचन्द्र का पथ अपनायेंगे। दाशरथि राम ने अयोध्यावासियों से अनुरोध किया वे अयोध्या लौट जायें एवं भरत का अनुसरण करें। हिन्द का श्रंगबेरपुर तो गंगा तट में वर्तमान रायबरेली जिले में है पर विशाल भारत का एक अन्य श्रंगबेरपुर (वर्तमान सिंगापुर) है। सिंगापुर भारतीय संस्कृति का - भगती उपजी द्रविड़ देश का प्रतीक है। यहां के लोगों में तमिल एक महत्वपूर्ण वाणी है। तमिल के अलावा यहां के लोग मंदारिन भाषी भी हैं। मंदारिन भाषा का सीधा संबंध क्षीरसागर मंथन तथा अमृतोत्पादन कार्य से भी है इसलिये विशाल भारतीय सांस्कृतिक महत्व का सिंगापुर हिन्द की श्रंगबेरपुर सभ्यता का उद्गाता है। यह उद्गान विशेष महत्व इसलिये पागया है कि इसके पीछे जो सर्वमान्य विशेषता है वह मर्यादाओं को अपने आप में संजोने वाला मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम के जीवन तत्व का प्रतीक है इसलिये अयोध्या में - मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम का मर्यादा धारक व्यक्तित्त्व उभारना आज के हिन्द की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीयता संवर्धक शक्ति है इसलिये वह बेला आगयी प्रतीत होती है कि हिन्द के लोग मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम मर्यादा रथ अयोध्या में स्थापित करें और विश्व भर के तमाम विविध धर्मावलंबियों का आह्वान करें कि मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम उन सबके हितू हैं। सबका विकास सबका साथ लेकर चलना हिन्द के नेतृत्व का उद्गान है इसलिये मर्यादा पुरूषोत्तम दाशरथि राम की मानवीय मर्यादाओं का पुनीत पर्व अयोध्या से ही प्रारंभ हो।
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