हिन्द की जरूरत ''म्हाणे चाकर राखो जी'' ही है।
यह तो पता नहीं कि महाशया साबा नकवी जो एक लेखिका व जानी पहचानी पत्रकार हैं राजनीतिक दारिद्र्य की बात कह रही हैं। उनका आरोप है कि हिन्द की भाजपा शासित राज्य सरकारें लाइसेंस राज चला रही हैं। वे फरमाती हैं कि उनका संदर्भगत लेख - टाइम्स आफ इंडिया के बुधवार 20 सितंबर (हिन्द के अनुसार पितृ विसर्जनी अमावस) को छपा हुआ लेख, उनके अपने विचार में हिन्दू मुसलमान तथा गाय और गोमांसाहार से संबंधित नहीं। उनका आरोप है कि हिन्द के काउबेल्ट के उन मतदाताओं के मत को इंगित करता है जो काउबेल्ट केे मतदाता समाज के हिस्से नहीं हैं। जो बात साबा नकवी महाशया फरमा रही हैं उस पर हिन्द का सर्वोच्च न्यायालय पहले ही घोषित कर चुका है कि प्रच्छन्न गौ रक्षकों के असामाजिक कृत्यों को सराहा नहीं जा सकता। ठीक है, उन्हें भी बीफ महोत्सव मनाने वाले समाज की तरह अपनी आकांक्षायें व्यक्त करने का संवैधानिक अधिकार है पर उन्हें कानून की अवज्ञा करने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। महाशया नकवी ने आले नकवी कुरैशी 17 जनवरी 2015 को जारी लाइसेंस जिसे नौएडा के अधिकारी वर्ग ने जारी किया उसे लेकर घूम रहे हैं। उन्हें प्राप्त लाइसेंस सन 2020 तक वैध है। पिछले 6 महीनों से उन्हें काम नहीं मिल रहा। दिलशाद जो तीन टैम्पो मांस एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में किराये पर लेते थे उनका काम भी रूक गया है। दिलशाद का परिवार केला बेेच कर अपने दिन गुजार रहा है। छोटे छोटे बूचड़ों का धंधा अटक गया है। हरियाणा, राजस्थान, उ.प्र. में मांस का व्यापार करने वाले लोग पहलू खान हत्या मरते समय पहलू खान ने बयान दिया उस पर भीड़ के आक्रमण से वह इस धरती से विदा होगया। महाशया नकवी फरमाती हैं कि इमामुद्दीन तालाबों से मछली पकड़ कर बाजार में बेचता है उससे लाइसेंस मांगा जाता है। उ.प्र. के राजतंत्र के खिलाफ उन्होंने दलितों व मुसलमानों के कष्टों को उजागर करने का उपक्रम संपन्न किया हैै। उ.प्र. की सरकार को अपना पक्ष सामने लाना चाहिये। उ.प्र. में मुस्लिम आबादी चार करोड़ से ज्यादा है साथ ही साढ़े चौदह प्रतिशत दलित आबादी है। प्रच्छन्न गौरक्षकों के दुष्कृत्यों को छिपाने के लिये राज्य सरकार की दलित व मुस्लिम आबादी के सामाजिक हितों की अनदेखी करने के बजाय उन्हें संवैधानिक मानवाधिकार का सामर्थ्य देने के उपायों पर विचार करना चाहिये।
महाशया नकवी ने अपने प्रभावशाली कथन में भाजपा शासित सरकारों को कटघरे में खड़ा करने का उपाय बखूबी किया है। उन्होंने अपने लेख - इम्पौकरिशिंग अर्थात दारिद्र दोष का उल्लेख किया है। उनसे यह अपेक्षा तो नहीं की जा सकती कि वे महाभारत का शांतिपर्व पढ़ें या शांतिपर्व में जो बाते कही गयी हैं उन्हें समझें और सोचें। हिन्द का पारंपरिक समाज यह मान्यता रखता है कि यदि किसी व्यक्ति को राजनीति का यथार्थ समझना हो तो शांतिपर्व में युधिष्ठिर-भीष्म संवाद पढ़े। राजनैतिक वैचारिक दारिद्र्य निवारण का महत्वपूर्ण साधन महाभारत का शांतिपर्व है। राजनीति तो वारांगना सरीखी है समझदार लोग वारांगना से भी सीख लेते हैं। महात्मा गांधी ने इंडियन ओपीनियन के जरिये हिन्द स्वराज में घोषित किया कि बर्तानिया की पार्लमेंट बेसवा सरीखी है। महात्मा के बहुत पाठकों ने पार्लमेंट को बेसवा कहने पर आपत्ति दर्ज की पर महात्मा ने उनकी अवधारणा को महत्व देने के बजाय हिन्द स्वराज में पार्लमेंट को बेसवा कहने के अपने मत को बदला नहीं।
राजस्थान के अलवर जिले के शौकत अली नकवी के कष्ट को महाशया नकवी ने प्रच्छन्न गौरक्षकों द्वारा सताये जाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि राजस्थान पुलिस भी प्रच्छन्न गौरक्षकों की सहायता करती रही। महाशया नकवी का कहना है कि शौकत अली को प्रच्छन्न गौरक्षकों तथा पुलिस को घूस देकर अपना रास्ता निकालना पड़ा। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने राय व्यक्त कर दी है कि प्रच्छन्न गौरक्षकों को कानून की परिधि में लाया जाये और उन पर तात्कालिक कानूनी शिकंजा कसा जाये पर जब राज्य सरकारों की पुलिस ताकत तथाकथित गौरक्षकों की सहायता में आगे आयेगी और संसदीय कार्यवाही करने के बजाय मसला लटक जायेगा। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिये भारत सरकार को पहल करनी होगी। प्रच्छन्न गौरक्षक समाज लाभार्जन तो करता है ए-1 दूध का जो जरसी गायों व संकर गायों का दूध है। देसी गायों के दूध के मुकाबले बहुत सस्ता है याने एक लीटर ए-1 दूध के लिये चालीस से पैंतालीस रूपये भुगतान करना होता है जबकि देसी नस्ल की गायों के दूध जिसे ए-2 दूध कहा जाता है वह साठ से पैंसठ रूपये लीटर बिकता है। वह दूध शक्तिवर्धक तथा देसी नस्ल की गायों का उत्पाद है। सरकार इस दूध की महत्ता स्वीकार करती है पर हिन्द के सभी लोगों को यह दूध मुहैया करना टेढ़ी खीर है।
घूमफिर कर फिर सवाल उठता है कि देसी नस्ल की गायों का संरक्षण देसी नस्ल की गायों की सही सही संख्या हिन्द के किस हिस्से में कितनी है। गुजरात की गिर नस्ल की देसी गायों की संख्या भारत सरकार पंद्रह हजार से अठारह हजार के बीच मानती है। देसी गायों के गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी से देसी तरीके से पंचगव्य तथा पंचामृत से अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है। जहां जहां देश में देसी गौशाला हैं (उन गौशालाओं में जरसी व संकर गायों का प्रवेश निषिद्ध हो) वे गौशालायें मुल्क को नया पैगाम दे सकती हैं। राज्य सरकारों के सहयोग से देश में कहां कितनी गौऐं देसी नस्ल की गायों में हैं उसका सही सही खाका प्रस्तुत किया जाना चाहिये। जहां जहां देसी गौशालायें हैं उनमें पंचगव्य व पंचामृत निर्मित करने के उपायों पर प्राथमिकता पूर्ण निर्णय लिया जाये। गुजरात में जामनगर कृषि विश्वविद्यालय से जरसी गौ, संकर गौ के दूध दही घी तथा गोबर व गोमूत्र परीक्षण कराया जाना चाहिये। प्रत्येक राज्य सरकार जामनगर कृषि विश्वविद्यालय से सीधा संपर्क स्थापित कर अपने अपने इलाके की देसी गौ के गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी का रासायनिक परीक्षण करा कर अपने अपने राज्य की देसी नस्ल की गौ का पंचगव्य व पंचामृत निर्माण यदि करा कर उपलब्ध कराये तो यह उद्यम एक राष्ट्रीय महत्व का उपक्रम हो सकता हैै। हिन्द की सरकार संयुक्त राज्य अमरीका को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रूपये का गौमांस भैंस के मांस सहित निर्यात करती हैै। निर्यात किये जाने वाले गौमांस में जरसी गाय व संकर गाय तथा भैंस का मांस तो रहे पर सरकार देसी नस्ल की गाय का गौमांस निर्यात पर सटीक रोक लगाने के उपायों की तजवीज भी करे। जहां जहां गौशालायें हैं उनके साथ नीलगाय बाड़ा भी निर्मित किया जाना चाहिये। पंचगव्य के लिये नीलगाय का गोमूत्र, कृष्ण गाय का गोबर, ताम्रवर्णा गाय का दूध, श्वेतवर्णा गाय का दही, कपिला वर्णा गाय का घी इनसे बना पंचगव्य कैंसर तथा एचआईवी सरीखी व्याधियों से मुक्ति दिला सकता है। पंचामृत पीने से रोडरेज कम हो सकता है तथा सड़कों में मरने वालों की संख्या धीरे धीरे शून्य तक आ सकती है। सारा प्रसंग जामनगर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा एक विशेष अभियान द्वारा चलाया जाना समय की पुकार हैै। मुल्क अगर देसी गौ का संरक्षण चाहता है उसे बीफ महोत्सव व निरामिष भोजन करने वाले केे बीच - हम क्या चाहते हैं ? इसका फैसला जनता जनार्दन के बीच यह प्रसंग लाकर तय किया जाना चाहिये। भारत सरकार व राज्य सरकारें नीति आयोग के नये प्रमुख के तत्वावधान में मीराबाई के मशहूर गीत -
म्हाणे चाकर राखो जी। चाकर राख्यो बाग लगास्यूं नित नव फल खास्यूं। म्हाणे चाकर राखो जी।
हिन्दी में दो शब्द हैं पहला नौकर व दूसरा चाकर। नौकर तो निश्चित समय में अपनी ड्यूटी देकर नौकरी पूरी करता है पर चाकर तो अहर्निश सेवा करने वाला व्यक्ति है। ज्ञातव्य है कि चाकर और स्लेव में धरती आसमान का अंतर है। अमरीका में स्लेव(दास) की खरीद फरोख्त होती थी। हिन्द का चाकर शब्द अमरीकी स्लेव शब्द से एकदम भिन्न हैै। चाकर चौबीसों घंटे अपने मालिक के साथ रहता है इसलिये जिन्हें चाकर चाहिये वे मीराबाई की आराधना करें। मीरा उन्हें चाकर की वास्तविकता से भलीभांति अवगत करा सकती हैं।
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