राजनीतिक दूरदृष्टा बीजू पटनायक ने नेहरू युग में ही एक क्रांतिकारी मार्ग अपनाया। पंडित नेहरू ने बीजू पटनायक की हमेशा प्रशंसा की और उनकी दूरदर्शिता का लोहा माना। बीजू पटनायक अलग राजनीतिक खेमे के पक्षधर नहीं थे। उनके पुत्र नवीन पटनायक ने अपने प्रातः स्मरणीय लोकनमस्कृत बीजूू पटनायक की यादगार में बीजद गठित कर उड़ीसा की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत कर रखी है। बीजद के लोकसभा सदस्य वैजयंत जयपंडा युवा सांसद होने के साथ साथ वैचारिक क्षेत्र में भी अपनी पकड़ मजबूत बनाये हुए हैं। लोकसभा सदस्यता तो बीजद के जरिये है पर वैचारिक स्वातंत्र्य के पुरोधा वैजयंत जयपंडा की मान्यता है कि डिमोनेटाइजेशन व जीएसटी आने वाले सुखद भविष्य में भारतीय अर्थांग को रोजगार में कमी की स्थितियों बावजूद महत्वपूर्ण ऊँचाई तक पहुंचाने की क्षमता रखे हुए है। टाइम्स आफ इंडिया का मत है कि वैजयंत जयपंडा की यह राय उनकी अपनी निजी राय है। अखबार टाइम्स आफ इंडिया उनकी राय को अपने अखबार में महत्वपूर्ण स्थान देते हुए भी वैजयंत जयपंडा के मत का हामी नहीं लगता। अपने तेरह सूत्री आत्ममत के जरिये कहते हैं मुल्क में देश के अर्थांग पर बहस छिड़ी है, प्राइवेट सेक्टर के विनिवेश तथा रोजगार क्षेत्र में सुस्ती यद्यपि चिन्तनीय है पर वैजयंत जयपंडा मानते हैं कि स्थिति दीर्घकालिक लाभकारी है। जीएसटी ने नया वातावरण बनाया है, जीएसटी में समस्यायें भी उदित हुईं। वंशवाद केे उद्गाता कांग्रेस अध्यक्षा महाशया सोनिया गांधी के इकलौते बेटे राहुल गांधी को वंशवादी मनोभावनाओं ने घेर डाला हैै। वे प्रधानमंत्री बन जाते यदि 2004 अथवा 2009 में महाशया सोनिया गांधी हिम्मत करतीं यह नहीं कहतीं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहतीं पर उनके मन के छोर में राहुल को भारत का प्रधानमंत्री देखने की जिज्ञासा थी, वे चुक गईं। वे उतनी हिम्मत भी नहीं दिखा सकीं जो राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त कर स्वयं को इंदिरा गांधी के अनुकंपा ऋण से उऋण होने का महान साहसिक कदम उठाया। ज्ञानी जी जानते थे कि राजीव गांधी में वह पात्रता नहीं है जो एक सक्षम प्रधानमंत्री में होनी आवश्यक होती है। वे राजीव गांधी की राजनीतिक मर्यादाओं को भी भलीभांति समझते थे पर अनुकंपा के ऋण से उऋण होना ज्ञानी जी का प्राथमिक कृत्य था। यद्यपि कालांतर में ज्ञानी जी द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री ज्ञानी जी की ही जड़ें खोदने लगे। यद्यपि उनमें वह राजनीतिक पैंतरेबाजी की योग्यता नहीं थी जो राष्ट्रपति को अपदस्थ कर सके। राजीव गांधी अपनी माता श्रीमती इंदिरा गांधी की तरह सियासी हिम्मत नहीं रखते थे। उन्हें सियासी बारहखड़ी मालूम ही नहीं थी इसीलिये पांच वर्ष में ही उनका राजनीतिक पतन होगया। स्वयं सोनिया गांधी भी राजनीतिक परिपक्वतापूर्ण व्यक्तित्त्व नहीं थीं पर राजीव गांधी हत्याकांड ने उन्हें साहसी बना डाला। स्वयं आगे न आकर उन्होंने पी.वी. नरसिंह राव के दाहिने हाथ रहे डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रतिनिधि प्रधानमंत्री बना डाला।
वैजयंत जयपंडा ने उन सारी परिस्थितियों की समीक्षा करने के पश्चात ही नोटबंदी से मुल्क का जो दीर्घकालिक हित संवर्धन हुआ उसका पुरजोर समर्थन अपने स्तंभ में अपने पक्ष को मजबूती में प्रस्तुत कर डाला। वैजयंत जयपंडा का मानना है कि बिल्ली चूहे की दौड़ ब्लैकमनी की हिन्द के अर्थांग में क्या भूमिका है ? वे कहते हैं यदि आप रिअल स्टेट डेवलपर्स प्राइवेट स्कूलों के संचालक समूह की ओर अपना ध्यान लगावें राजनीतिक दलों की फंडिंग का अनुशीलन करें आर्थिक स्थिति की दागदार पोल खुल कर सामने आ जायेगी। नोटबंदी से मुल्क की आर्थिक स्थिति का वास्तविक लाभ तुरंत होने केे बजाय धीरे धीरे संपन्न होगा। रिजर्व बैंक की रपट के अनुसार केवल सोलह हजार करोड़ रूपये ही आगणन में आये हैं जबकि मुल्क में 15.44 लाख करोड़ रूपयों की नोटबंदी के बावजूद दिन के उजाले में बाहर नहीं आये। नोटबंदी से उत्पन्न स्थितियों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करने के बाद पक्ष व विपक्ष की रणनीति का खुलासा होने के उपरांत भी सांसद वैजयंत जयपंडा यह मानते हैं कि नोटबंदी भारतीय राष्ट्रहित का कारक है। यद्यपि वैजयंत जयपंडा का वह दृष्टिकोण नहीं है जो डाक्टर जीवराज मेहता ने दक्षिण अफ्रीका में रहते वक्त अपनी पुस्तक महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी में मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा घोषित किया। उनकी पुस्तक दक्षिण अफ्रीका में हिन्दू संगठनों के बीच रह कर महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी ने हिन्द स्वराज के जरिये।
वैजयंत जयपंडा ने अपने विवेचन में हीलिंग ट्रायल शब्द का प्रयोग किया। जब बच्चे के दांत निकलते हैं कुछ कष्ट होना स्वाभाविक है दांत निकलने का यह क्रम ज्यादा से ज्यादा दो या तीन दिन बच्चे को परेशान करता है ज्योंही दांत निकलते हैं सारा कष्ट छूमंतर हो जाया करता है। वैजयंत जयपंडा ने नोटबंदी को दांत निकलने सरीखा क्षणिक कष्ट बताया। हिन्द का रोजगार संवर्धन - जाब ग्रोथ पर भी वैजयंत जयपंडा अपनी राय रखते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में आज 137 करोड़ लोग बसते हैं जिनमें 40 करोड़ लोग गांवों में बेरोजगारी से पीड़ित हैं। यद्यपि सांसद वैजयंत जयपंडा दूसरे सांसदों की तरह गांधी के चर्खे व कबीर के करघे केे कायल नहीं लगते पर वास्तविकता यही है कि मुल्क के 137 करोड़ हाथों को काम देने और मुल्क केे 39 करोड़ गांवों में अपने दिन बिता रहे गरीबी से झुलस रहे लोगों की प्रति व्यक्ति रोजाना आमदनी या रोजाना खर्चा क्या बीस रूपये भी नहीं है ? गांवों के बेरोजगार लोगों को केवल गांधी का चर्खा व कबीर का करघा ही थोड़ी ही सही रोजाना आमदनी वह दस रूपये के आसपास ही हो वही एक सहारा है। महात्मा गांधी ने जिस समस्या का निदान बखूबी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से हिन्द वापस आने और कोचरब आश्रम में दूधाभाई हरिजन परिवार को स्थापित कर नया गुरूमंत्र अपनाया यद्यपि उनसे वैष्णव बनिये वामन रूठ गये पर तेरापंथी अंबालाल महात्मा गांधी को तेरह हजार रूपये की थैली सौंप कर कोचरब आश्रम को चालू रखने में महात्मा का सहयोग किया। 1915 के मुकाबले 2017 में हिन्द की आबादी बेतहाशा बढ़ी है, इस समय मुल्क में 137 करोड़ लोगों केे दोनों हाथों को काम देने का भगीरथ प्रयास प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का पहला कदम है। उन्हें गांधी का चर्खा व कबीर का करघा ही पहला मददगार है। जो मुल्क के हर काम करने योग्य हाथों को चर्खे पर सूत कताई, करघे पर हैंडलूम बुनाई, चर्खे पर सूत कताई केके अलावा ऊनी चर्खे पर हाथ बिनाई के जरिये हर हाथ बिनाई करने वाले व्यक्ति पुरूष या स्त्री के लिये हाथ बिनाई खाते कम से कम रोजना दस रूपये भी मिलें हाथ बिनाई के जरिये भारत के हर उस हिस्से में जहां कड़ाके की सर्दी होती है स्वेटर, पुलोवर आदि की हाथ बिनाई से महिला वर्ग को रोजाना दस रूपये की मजदूरी दिलायी जा सके तो उद्यमिता के क्षेत्र में एक नयी क्रांति आ जायेगी। इसलिये नये रोजगार खोलने, नयी नौकरियां उपलब्ध कराने के समानांतर मुल्क की बुनियादी जरूरत काम करने योग्य हाथोें को गांधी के चर्खे व कबीर के करघे के जरिये छोटे से छोटा रोजगार भी क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है इसलिये वैजयंत जयपंडा सहित सभी सांसदों को गांधी के चर्खे व कबीर के करघे से मिलने वाले छोटे छोटे रोजगार को पहल देनी होगी ताकि मुल्क अपनी जरूरतों को संपूर्त करने में देश के 137 करोड़ हाथों को छोटा ही सही काम देकर रोजाना हर घर में कुछ न कुछ आमदनी हो। मुल्क के स्मार्ट विलेज गांवों तथा स्मार्ट सिटी के प्रत्येक मुहल्ले में गांधी का चर्खा कबीर का करघा मनरेगा - महात्मा गांधी रूरल इम्प्लायमेंट गारंटी को इम्प्लायमेंट गारंटी याने हर गांव में जहां जहां स्मार्ट विलेज चुने गये हैं हर स्मार्ट विलेज में चर्खा, करघा, सिलाई मशीनों के जरिये परिधान निर्माण का कार्य शुरू हो। हर स्मार्ट विलेज के हर परिवार को रोजना काम मिले स्मार्ट विलेज व स्मार्ट सिटी में जहां जहां रोजगार का रोडमैप बन चुका है चर्खा, करघा, सिलाई मशीन, हाथ बुनाई के द्वारा हर हाथ को काम दिया जा सकता है। जरूरत केवल इतनी है कि महात्मा गांधी रूरल इम्प्लायमेंट गारंटी स्मार्ट विलेज व स्मार्ट सिटी में इम्प्लायमेंट गारंटी के रूप में संपन्न हो। मुल्क में मनरेगा के तहत जो संपदा निर्माण का कार्य हुआ है उसकी जांच पड़ताल की जाये कि क्या वस्तुतः गांवों में कुछ निर्माण हुआ है ? आज मुल्क की जरूरत केवल मनरेगा नहीं - सारे मुल्क के स्मार्ट विलेज व स्मार्ट सिटी में इम्प्लायमेंट गारंटी है। मुल्क की आज जो जनसंख्या है उसे देखते हुए केवल गांधी का चर्खा व कबीर का करघा मुल्क को रोजगार की गंगा बहाने की क्षमता रखता है।
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