गुजरात राज्य के सामर्थ्यवान पाटीदारों के प्रधान नियुक्त प्रवक्ता हार्दिक पटेल ने गुजरात में आगामी दिसंबर 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्तानशीन भारतीय जनता पार्टी को सत्ताच्युत करने का संकल्प लिया है। पाटीदार आरक्षण चाहते हैं ताकि वे भी वे सभी हरकतें कर सकें जो विभिन्न आरक्षित वर्ग पिछले 67 वर्षों से करते आरहे हैं। पाटीदार सरीखे संपन्न समाज को जब लगता है कि आरक्षण सत्ता की कुंजी है उन्होंने भाजपा को सत्ताच्युत करने का बीड़ा उठा डाला। मांग रखी कि पाटीदारों को आरक्षण लाभार्जन मिले। हार्दिक पटेल को अपने शिवसंकल्प की पूर्ति में जो बाधायें हैं उनमें भाजपा का संगठित राजनीतिक दल होना विपक्षी कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा चरमरा जाना और कांग्रेस की छिन्नभिन्न राजनीतिकता को ज्यादा छिन्नभिन्न करने के लिये गुजरात के मुख्यमंत्री रहे शंकर बाघेला और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का आआपा कांग्रेस की वोट कटवा पार्टियां हैं। आआपा गुजरात में अपने पैर फैलाना चाहती है उसे कुछ जगहों पर सफलता भी हाथ लग सकती है। शंकर सिंह बाघेला और अरविन्द केजरीवाल दोनों भाजपा विरोधी मतदाताओं के सम्मान से लाभान्वित हो सकते हैं। गुजरात के आगामी विधानसभा चुनावों में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की भूमिका वह नहीं है जो 2012 में थी। पांच वर्ष पूर्व संपन्न विधानसभा चुनावों कमें भाजपा की कमान स्वयं नरेन्द्र दामोदरदास मोदी संभाले हुए थे। उनके विश्वस्त सहयोगी अमित शाह की राजनीतिक सूझबूझ मतदाताओं में गहरी पैठ मतदाताओं के रूख को भाजपा के पक्ष में करने की उनकी विशेष कार्यशैली का लाभ आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को ही मिलने वाला है। भाजपा विरोधी मत तीन खेमों मेें बंटे हुए हैं। पहला खेमा गुजरात का विरोध पक्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नवयुवा नेता राहुल गांधी यह आस लगाये बैठे हैं कि सन 2004 के लोकसभा चुनावों में शाइन इंडिया के कर्ताधर्ता महाशय महाजन के तौर तरीकों ने अटल बिहारी वाजपेयी की काम करने वाली सरकार को जिस तरह अपदस्थ कर दिया भारतीय जनता पार्टी के नरेन्द्र दामोदरदास मोदी विरोधी नेताओं जिनमें स्वयं की अपनी निजी कार्यशैली से जनप्रियता का सर्टीफिकेट देने वाले दिनेभाई तारे महाशय शत्रुघ्न प्रसाद सिन्हा कीर्ति आजाद यह मान्यता रखते हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के कारण लोकसभा सदस्यता अर्जित करने का लाभार्जन न होकर उनकी अपनी लोकप्रियता ने ही उन्हें बिहार से लोकसभा सदस्यता अर्जित की। इन दोनों का संभवतः यह मानना था कि प्रधानमंत्री उन्हें सत्ता की बागडोर सौंपेंगे। प्रधानमंत्री इन दोनों महानुभावों के तौर तरीकों से भलीभांति परिचित थे, उन्होंने इन्हें तरजीह देने के बजाय लोकसभा सदस्यता लाभ पाते रहो सत्ता की पात्रता अर्जित करने में अभी इन दोनों महानुभावों को अपनी योग्यता का पारदर्शक प्रदर्शन करना होगा जिसे वे करना पसंद नहीं करते। समय समय पर प्रधानमंत्री के विरूद्ध बयान देते रहते हैं। इन दो महानुभावों के अलावा भाजपा ने कई ऐसे लोकसभा सांसद हैं जिन्हें बयानबाजी का शौक है कुछ न कुछ कहते रहते हैं। गौरक्षा का झुनझुना पकड़ कर स्वयं को गोरक्षक प्रमाणित करते हुए हिंसा का वातावरण तैयार करते रहते हैं। उन महानुभावों को गाय विशेष तौर पर हिन्द की पारंपरिक नस्ल की गायों, ध्यान में रहे कि गुजरात के गिर नस्ल की देसी गौ संख्या आज के दिन पंद्रह हजार से अठारह हजार के बीच आंकी जाती है। देश की की अन्य हिन्दुस्तानी नस्ल की गायों का सही सही आंकड़ा केन्द्र व राज्य सरकारों के पास नहीं है। जब भारत आजाद हुआ था 1947 में मुल्क में देसी गायों की साठ नस्लें विद्यमान थीं। पिछले सत्तर वर्षों में देसी नस्ल की गायों की केवल 24 नस्लें ही शेष रह गयी हैं। बर्तानी सरकार और आजाद हिन्द की सरकार ने देसी नस्ल की गौ संरक्षण को महत्व देने केे बजाय ए-1 दूध के लिये जरसी गायों व संकर गायों का संवर्धन किया। आज मुल्क में श्वेत क्रांति का जो उद्गान किया जाता है वह जरसी व संकर गायों के दूध की बदौलत है। देश में देसी नस्ल की गायों की सही सही संख्या न केन्द्र सरकार जानती है न राज्य सरकारें अपने अपने राज्य में देसी नस्ल की गायों केे बारे में जानकारी रखती हैं। इसलिये आज मुल्क की पहली जरूरत देसी नस्ल की गायों का सही सही आंकड़ा ज्ञात करना है। प्रधानमंत्री जी ने स्मार्ट विलेज व स्मार्ट सिटी की सुसंकल्पना की है। आसेतु हिमाचल जहां जहां स्मार्ट विलेज चयनित हैं उनमें देसी नस्ल की गायों की संरक्षा सुरक्षा का संकल्प लिया जाना चाहिये। यह सही है कि श्वेतक्रांति में देसी नस्ल की गौ की गौण भूमिका है। भारत सरकार व राज्य सरकारें मानती हैं कि देसी नस्ल वाली गायों का दूध जो बाजार में पैंसठ रूपये लीटर बिक रहा है वह दूध उत्तम है पर मात्रा सीमित है। सरकार की दृष्टि श्वेतक्रांति कारक जरसी गायों व संकर गायों के दूध पर आधारित है। यह दूध बाजार में ए-1 दूध कहलाता है और चालीस रूपये लीटर से पैंतालीस रूपये लीटर बिकता है। मुल्क में रोडरेज का बोलबाला है, दुर्घटनाओं से मरने वालों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है।
पारंपरिक हिन्दुस्तान में पंचगव्य व पंचामृत बनाने का कार्य सृष्टि के प्रारंभ से चल रहा है। देसी गौ के गोमूत्र, गोबर, दूध, दही व घी से पंचगव्य बन सकता है अगर राज्य सरकारों द्वारा नीलगाय जिसे पश्चिम ब्लू बुल कहता है, के लिये हर जिले में बाड़े बनाये तो नीलगायों का गोमूत्र मुल्क की तंदुरूस्ती के क्षेत्र में एक नया पैगाम ला सकता है। नीलगाय के गोमूत्र सहित काले रंग की गाय का गोबर, तांबे के रंग की गाय का दूध, सफेद रंग की गाय का दही, कपिला गाय का घी और कुश वाला जल मिला कर पंचगव्य का विधिपूर्वक निर्माण किया जाये तो यह पंचगव्य हिन्द के लोगों को कैंसर तथा एचआईवी जैसे जटिल रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता रखता है। इसी प्रकार पंचामृत निर्माण पंचामृत का सेवन कर यात्रा पर निकलने वाले व्यक्ति की अल्पमृत्यु, अकालमृत्यु व अपमृत्यु जन्य कष्ट दूर हो सकता है। पंचगव्य व पंचामृत के बारे में भारत सरकार को जामनगर कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधानों का लाभार्जन करना चाहिये। हर राज्य में पंचगव्य तथा पंचामृत विधिपूर्वक बने तो कम खर्चे वाली औषध के रूप में एक नया माहौल बनाया जा सकता है। जहां जहां पंचगव्य पंचामृत बने गांव के सामूहिक गोबर गैस संयत्र पारिवारिक शौचालय गोबर गैस संयत्र से जोड़ कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी द्वारा संकल्पित स्वच्छता अभियान का साकार करने वाला स्मार्ट विलेज व स्मार्ट सिटी संकल्पना को जीवंत बना कर स्वच्छता गांव गांव शहर के मुहल्ले दर मुहल्ले में गंदगी दूर करने वाला स्मार्ट विलेज व स्मार्ट सिटी का स्वच्छता से जोड़ना गांव गांव व हर मुहल्ले के लिये स्वच्छता का वरदान देने वाला संकल्प आज मुल्क की अहम जरूरत है। आइये स्वच्छता से जुड़िये प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की कल्पना का भारत निर्मित करने में अपना योगदान तुरंत देना प्रारंभ कीजिये।
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