क्या एक बार उपयोग में आयी रूई का पुनः उपयोग रोअड़ कहलाता है ?
इस रोअड़ की कताई तथा खेस व दुतई बुनाई को महत्वपूर्ण उद्यमिता कहा जा सकता है।
हिन्द के वित्तमंत्री रक्षामंत्री तथा राष्ट्रीय संरक्षा के अग्रगामी महाशय अरूण जेटली की सेवा में
एक आदतन खादी पहनने वाले हिन्दुस्तानी का रोजगार स्थायित्व देने वाले खुले खत की अर्जी।
महाशय अरूण जेटली महोदय,
आपकी वाक् विशेषता ने हिन्द के मशहूर वकील राम जेठमलानी से कबूल करा लिया कि राम जेठमलानी ने जो निन्दनीय आरोप आप पर लगाये थे वे दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उन्हें बताये। मशहूर वकील राम जेठमलानी ने स्वीकार किया कि आरोप बिना बुनियाद के थे इसलिये उन्होंने केजरीवाल महाशय की वकालत करना अनैतिक माना और सच्चाई सामने आगयी। ऐसा प्रतीत होता है कि राम जेठमलानी आश्वस्त होगये कि केजरीवाल के आरोप बेबुनियाद हैं। फैसला तो दिल्ली उच्च न्यायालय को देना है, मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंच सकता है।। फैसला जो भी हो प्रतीति यह होती है कि केजरीवाल महाशय को औंधे मुंह गिरना लाजमी लगता है। यह खुला खत महाशय अरूण जेटली की सेवा में इसलिये पेश किया जारहा है कि समूचे उत्तर भारत में जहां जहां जाड़ों में लिहाफ, गद्दे, तकिया तथा रूई वाले अंगरखे पहने जाते हैं वह रूई पांच साल से आठ साल तक लिहाफ वगैरह में रहती है। कालांतर में उस रूई को जिसे उत्तर भारत में रोअड़ कहते हैं चरखे में कात कर खेस और दुतई के रूप में बिछावन और ओढ़ावन के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है। समूचे उत्तर भारत में जब बिटिया की शादी होती उसे दहेज में चरखा भी दिया जाता ताकि वह उस चरखे में रोअड़ कात कर खेस व दुतई आदि अपने परिवार के लिये उपलब्ध करा सके। रोअड़ कताई को वैकुंठ ल. मेहता ने खादी कारोबार का महत्वपूर्ण हिस्सा करार दिया और रोअड़ कताई खेस बुनाई तथा दुतई बुनाई के उपक्रमों ने पारंपरिक चरखा कताई को नया संबल दे डाला। यह काम पहले पहल गांधी आश्रम मेरठ में शुरू हुआ और पारंपरिक खादी को एक नया सहारा मिल गया। हिन्दुस्तानी न्याय मीमांसा में एक मत्स्यन्याय कहलाता है। मत्स्यन्याय के मतलब हैं तालाब में बड़ी मछली द्वारा छोटी मछली निगल जाना। अंग्रेजी राज हिन्द में जब अपनी जड़ जमा चुका था यह मत्स्यन्याय संपन्न द्वारा विपन्न को शोषण का तरीका बन गया। मत्स्यन्याय मछलियों से मनुष्यों में अपना जोर आजमाइश करने लग गया। ज्यों ज्यों आर्थिक समृद्धि का रास्ता प्रशस्त हुआ मत्स्यन्याय ने यत्र तत्र सर्वत्र अपनी पहुंच सुनिश्चित कर ली। कंपनी बहादुर तथा बर्तानी राज के करीब अढ़ाई तीन सौ वर्षों में आर्थिक विषमता की जड़ें दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ गयीं। ऐसी हालतों में मनुष्य मात्र बंधु है यही बड़ा विवेक है का सार तत्व लुप्त होगया। इन हालतों से कैसे छुटकारा पाया जाये विचारक समाज चिंतन करता रहा साथ ही आर्थिक विषमता भी अपनी जड़ें मजबूत करती रही। हिन्दुस्तान की आजादी के पश्चात इस विषमता ने नये दरवाजे खोल डाले। संवैधानिक विशेषाधिकारों का जम कर उपयोग होता रहा। स्थिति यहां तक आगयी कि कंपनी बहादुर तथा बर्तानी राज की डिस्ट्रिक्ट स्तर की सिस्टम फेलियर ने जिला प्रशासन को निरंकुश तथा भ्रष्ट आचरण का मुख्य स्तूप बना डाला। स्वतंत्रता अभियान के दर्मियान मैथिली शरण गुप्त ने भारत भारती की रचना कर देश के लोगों को जागरूक करते हुए उद्घोष किया - ‘हम कौन थे ? क्या होगये ? और क्या होंगे अभी ? आओ मिल कर सब विचारें ये समस्यायें सभी’। भारत भारती ने देश के सभी लोगों में जाग्रति उत्पन्न की। दूसरी ओर जयशंकर प्रसाद की कामायनी ने मुल्क में मानवता का सटीक पाठ पढ़ाने का कार्य किया। मनु और शतरूपा के गृहस्थ ने हिन्द को मानवता की नयी दिशा दी। अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने प्रियप्रवास लिख कर जाग्रति का नया मानदण्ड रखा। हिन्दी कवियों लेखकों ने राष्ट्रीयता को नया बाना देकर सुभद्रा कुमारी चौहान से कहलाया - बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविताओं के जरिये देश में राष्ट्रीय जाग्रति का बीजमंत्र उच्चारा। सन 1915 में जब महात्मा गांधी ने कोचरब आश्रम स्थापित किया वहां दूधाभाई हरिजन के परिवार को अपने आश्रम का आकर्षण बनाने का उपक्रम किया। वैष्णव समाज ने महात्मा गांधी से असहयोग का रास्ता अपनाया। ज्योंही यह प्रसंग साराभाई के यशस्वी पुत्र अंबालाल तेरापंथी को पता चला उन्होंने महात्मा गांधी को तेरह हजार की थैली सौंप कर एक नया आदर्श प्रस्तुत किया। महात्मा गांधी का उपक्रम चलता रहा। वैष्णव बनिया बामन समाज भी रास्ते में आगया और अपनी त्रुटि के लिये महात्मा गांधी से क्षमा याचना करने लगा पर गांधी का आदर्श छुआछूत रहित समाज का निर्माण करना था। जब महात्मा गांधी ने पब्लिक ओपीनियन के जरिये हिन्द स्वराज की आधारशिला रखी डाक्टर जीवराज मेहता ने अपनी पुस्तक के जरिये मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी संबोधन देकर एक इतिहास रच डाला। टाइम्स आफ इंडिया की रपट के मुताबिक इंडिया फैब्रिक तथा खादी ग्रामोद्योग आयोग में नया विवाद उठा है। खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष महाशय विनय कुमार सक्सेना का मत है कि फैब्रिक इंडिया ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के साथ छलप्रपंच का रास्ता अपनाया है। संभवतः 14 अक्टूबर 2014 के दिन जब भारत सरकार ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डा. महेश शर्मा को बर्खास्त किया खादी ग्रामोद्योग आयोग को जो 1954 से लगातार 31.3.1957 तक अ.भा. खादी ग्रामोद्योग बोर्ड 1.4.57 से के.वी.आई.सी. के.वी.आई.सी. एक्ट एलएक्सआई 1956 के अनुसार घोषित हुआ। साठ वर्ष कार्यरत रहने के पश्चात लुप्त होगया। तत्कालीन मंत्री महावीर प्रसाद ने घोषित किया कि खादी ग्रामोद्योग आयोग के समस्त कर्तव्य ए.आर.आई. मंत्रालय स्वयं देखेगा। खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष की बर्खास्तगी और आयोग के कृत्यों को मंत्रालय द्वारा स्वयं संचालित करने के निर्णय ने अजीबोगरीब स्थिति उत्पन्न कर दी। एक ऐसा संगठन जो हिन्द के गांवों की उद्यमिता के लिये समर्पित था लुप्त होगया। भारत सरकार ने दो वर्ष पश्चात खादी आयोग का पुनर्गठन श्रीमती कुमुद बेन जोशी को आयोग का नया अध्यक्ष तैनात कर संपन्न किया पर खादी ग्रामोद्योग आयोग वह स्तर अर्जित नहीं कर सका जो उसे डा. महेश शर्मा की बर्खास्तगी तक उपलब्ध था। जहां तक गरीबी रेखा या पावर्टी लाइन का सवाल है गरीबी रेखा अवधारणा ही गरीब लोगों की अनदेखी करने का मुख्य हेतु है। महात्मा गांधी व पंडित नेहरू ने गरीबी रेखा अवधारणा का कभी भी समर्थन नहीं किया। श्रीमती इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ नारे ने गरीबी प्रकरण को पूरा राजनीतिक मसला बना डाला जिसका नतीजा सामने है कि महात्मा गांधी के सिद्धांत गरीबी ओढ़ो याने गरीब और अमीर केे जीवनयापन में खाई निरंतर चौड़ी न हो इसका ध्यान रखने से गरीबी निवारण का रास्ता खोजा जा सकता है। 2006 में एमएसएमई एक्ट पास हुआ जिसने महात्मा गांधी की चरखा कताई, करघा बुनाई के सारे प्रसंग को मत्स्यन्याय का विषय बना डाला। तालाब में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है यही मत्स्यन्याय कहलाता है। गरीबी हटाओ नारा गरीबी को तो नहीं हटा पाया पर उसने एक नयी बीमारी को अवश्य ही जन्म दे डाला। भारत सरकार ने तिरंगा झंडा, गांधी टोपी तथा चरखे के कते सूत के अलावा बाकी सारे कपड़ा व्यवसाय में जी.एस.टी. के माध्यम से एक ऐसी रोजगार को खत्म करने वाली कुल्हाड़ी चल दी जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित रोअड़ कताई, खेस बुनाई तथा दुतई बुनाई के काम पर पड़ा। खादी मार्क को परंपरागत खादी के लिये अनिवार्य कर देने से सही या वातावरण गांधी की खादी के लिये एमएसएमई मंत्रालय ने सृजित कर वह खादी जो घर घर में ओढ़न बिछावन का रास्ता प्रशस्त करती थी उसे खादी मार्क का बंदी बना डाला। एमएसएमई एक्ट पास होने से पहले खादी पर किसी किस्म का कोई कराधान नहीं था। खादी घर घर को रोजगार मुहैया करने वाली प्रवृत्ति थी। वित्त मंत्री जी कृपापूर्वक टाइम्स आफ इंडिया में 20.7.2017 के अंक में प्रकाशित खादी कमीशन और फैब्रिक इंडिया विवाद का अवलोकन करने की महती कृपा करें। खादी कमीशन के सदर महाशय विनय कुमार सक्सेना फैब्रिक इंडिया के खादी बिजनेस पर एतराज कर रहे हैं पर फैब्रिक इंडिया इस प्रसंग में अकेला नहीं उसके दूसरे साथी रेमण्ड व अरविन्द मिल भी खादी कमीशन को चुनौती देने वाले हैं। संभवतः महाशय विनय कुमार सक्सेना खादी आयोग के सदर नियुक्त होने से पहले रेमंड से जुड़े थे। उन्हें चाहिये था कि हिन्द के परंपरागत खादी कताई, बुनाई तथा निटिंग यार्न कताई प्रसंग को रोजगार संवर्धन के नजरिये से देखते। टाइम्स ने जो सवाल उठाये उनका सही सही निष्कर्ष खोजने के बजाय खादी कमीशन के नये चेयरमैन ने जबलपुर हाईकोर्ट के 1934 के फैसले को फैब्रिक इंडिया रेमंड व अरविन्द मिल के लिये एक नया रास्ता खोल कर खादी क्या है ? क्या फैब्रिक इंडिया जो कपड़े बेच रहा है उसे खादी कहा जा सकता है ? यह फैसला तो पचपन वर्ष पुराना है। खादी मार्क की डफली खादी ग्रामोद्योग आयोग ने कताई बुनाई कार्यक्रम से रोजगार का जो वितान 1954 से चल रहा था वह एमएसएमई एक्ट व खादी मार्क ने लील डाला है। इसलिये माननीय वित्त मंत्री जी को गांधी के चरखे व कबीर के करघे से रोजगार मुहैया करने का जो बीजमंत्र महात्मा ने जारी किया उसे बंद मत कीजिये। खादी मार्क की खादी के लिये परंपरागत रोअड़ की मदद के लिये आगे बढ़ाइये। मुल्क का मानना है कि 40 करोड़ लोगों के अस्सी करोड़ हाथों को केवल गांधी का चरखा व कबीर का करघा ही रोजगार मुहैया करा सकता है। विनोबा ने अंग्रेजी के हजबैंड व वाइफ शब्द की बहुत शानदार व्याख्या की। हजबैंड के माने हल का मूठ पकड़ने वाला किसान तथा वाइफ माने कपड़ा बुनने वाली महिला शक्ति। इसलिये वित्त मंत्री महोदय खादी पर किसी प्रकार का कोई कर न लगे, खादी का चरखा व कबीर का करघा वर्तमान में चालीस करोड़ गांव वासियों को रोजगार दिलाये। मुल्क के शहरी व देहाती दोनों इलाकों में जहां जहां कपड़ा व्यवसाय खेतीबाड़ी के बाद आज भी उतना ही महत्वपूर्ण रोजगार दाता है जो मुल्क के वर्तमान में 138 करोड़ लोगों के हाथों में चरखे का सूत करघे पर उस सूत की बुनाई के जरिये रोजगार का कम खर्चीला और पंगत के आखीर में खड़े व्यक्ति वह पुरूष हो या स्त्री, उसे रोजगार से जोड़े। यह तभी संभव हो सकता है जब वित्त मंत्री कपड़ा मंत्रालय के कामकाज की पड़ताल करें और चरखे में कताई व करघे में बुनाई के जरिये जो पारिश्रमिक या मेहनताना कतकर व बुनकर अर्जित करता है उसे रोजगार की उपलब्धि का सीधा साधन बनाया जाये। इसके लिये पहली जरूरत खादी व हथकरघा कपड़े के उत्पादन में लगे लोगों को यह अहसास कराया जाये कि गांधी के चरखे व कबीर के करघे में आज भी वह ताकत है जो हर परिवार की आमदनी में इजाफा कर रोजगार की गंगा - गंगोत्री से गंगासागर तक प्रवाहमान बना सकता है। इसलिये वित्त मंत्री से प्रार्थना है कि खादी पर जो कराधान होरहा है उसे तुरंत रोका जाये और मुल्क की रोजगार क्षमता को सतत गतिशील बनाने का तात्कालिक उपक्रम हो। महात्मा गांधी के सामने 1915 में जो दिक्कतें थीं वह आज भी उतनी ही वेग से जनसंख्या के भयावह बढ़त के साथ बढ़ रही हैं। गांधी का चरखा व कबीर का करघा ही वित्त मंत्री जीे को राहत देने की स्थिति में है इसलिये चरखा व करघा को प्राथमिकता देना युगधर्म है। गांधी का चरखा और उसमें कताई, कबीर के करघे में बुनाई के साथ साथ सभी किस्म केे चरखों पर सूत, ऊन, रेशम या किन्हीं दो के मिश्रण की कताई तथा हाथकताई, निटिंग यार्न की कताई, निटिंग यार्न की हाथबुनाई आज भी ऐसे उद्यम हैं जिनके सहारे हिन्द के हर परिवार की आमदनी बढ़ा कर गांधी का चरखा चाहे वह सोलर चरखा हो अंबर चरखा हो किसान चरखा हो गांधी का प्यारा प्यारा देसी चरखा ही क्यों न हो केवल गांधी मार्ग ही हिन्द की रोजगार उपलब्ध करने की कला को वह ऊँचाई देने की ताकत रखता है जिसके सहारे महात्मा गांधी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदि प्रवर्तक ने 25 अक्टूबर 1925 के दिन विजयादशमी पर्व से पांच सात वर्ष पूर्व हिन्द की आजादी के लिये अपने आपको न्यौछावर किया था, डाक्टर हेडगेवार की छुआछूत न मानने की तार्किक शक्ति से महात्मा गांधी ने अत्यधिक प्रभावित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूरिभूरि प्रशंसा की थी। आज के हिन्द की मूर्धण्य आवश्यकता ही ऐसे प्रसंगों की याद करते हुए गांधी की खादी को वह शक्ति फिर दिलानी है जिसने हिन्द की आजादी का बिगुल बजाया। खादी पर किसी किस्म का भी कोई कराधान न करने का शिवसंकल्प लेकर भारत के वित्त मंत्री गांधी व कबीर का हिन्दत्व योग संवर्धन करेें तथा खादी कमीशन के नये चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना के लोकसंग्रह के सन्मार्ग में दौड़ायें ताकि आयोग के सदर विनय कुमार सक्सेना मुल्क की बेरोजगारी का संत्रास मुक्त करने केे लिये गांधी के चरखे और कबीर के करघे का वैसा ही उपयोग कर सकें जो वैकुंठ ल. मेहता ने 1954 से लगातार 1963 तक संपन्न किया। चरखा और करघा के द्वारा हिन्द की सामान्य जनता के परिवारों की आमदनी में इजाफा करने के महान यज्ञ संपन्न करने मेें अपनी भूमिका स्वयं तय करें।
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