तुलसीदास का गुरुमंत्र
मांग के खाइबो मजीद पै सोइबो
समूचा बलूचिस्तान नहीं बर्तानी कब्जे वाला बलूचों का वह इलाका जिसे क्वेटा कहा जाता है जहां बर्तानी हुकूमत विद्यमान थी, क्वेटा, सिंध, सीमाप्रांत, अविभाजित भारत का पूरा पंजाब इन सभी इलाकों की जनसंख्या 1931 की जनगणना तथा जाति जनगणनानुसार भी लगभग दस करोड़ थी याने 1931 की बर्तानी हिन्द की पूरी जनसंख्या का तिहाई हिन्द विभाजन से पूर्व 3 जून 1947 को बंगाल असेंबली ने सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया कि बंगाल हिन्दुस्तान के साथ नहीं रह सकता ? बंगाल असेंबली के प्रस्ताव सहित भारत विभाजन से पूर्व बर्तानी भारत के दस करोड़ से ज्यादा लोगों को जातीय जनगणना के आंकड़ों से जोड़ कर नहीं देखा गया। यह भूल मंडल कमीशन से ज्यादा स्वयं को संत विनोबा के भूदान आंदोलन का सहायक बताने वाले राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब उन्हें तकदीर की दौड़ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से हिन्द का प्रधानमंत्री बना डाला। उनकी पत्नी सीतादेवी ने राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह को मानसिक रोगी घोषित करने वाला शपथपूर्ण बयान देकर राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की नैतिक बखिया भले ही उघाड़ डाली हो तत्कालीन राजनीतिक पुरोधाओं के बलबूते पर राजा मांडा की तूती बोलने लगी। उन्हें अपने ख्यातनामा अथवा कुख्यातनामा करतूतों को अंजाम देने के लिये वी.पी. मंडल कमीशन की सिफारिशों को आननफानन में लागू करने का हुक्मनामा जारी कर डाला। मंडल कमीशन की सिफारिशें लंगड़ी थीं उनमें बंगाल, सिंध, क्वेटा, सीमाप्रांत (नार्थ ईस्ट फ्रंटियर), पंजाब (अविभाजित भारत का पूर्ण पंजाब प्रांत) के लगभग दस करोड़ लोगों का सामाजिक पिछड़ापन नहीं जोड़ा गया था क्योंकि बंगाल हिन्द का हिस्सा नहीं रहना चाहता था। सिंध नार्थ ईस्ट फ्रंटियर पंजाब के पिछड़े समाज को न गिने जाने से तब के बर्तानी हिन्दुस्तान के तैंतीस करोड़ लोगों में दस करोड़ से ज्यादा लोग 1931 की जातिगणना के मुताबिक पिछड़ेपन के नजरिये से आगणित नहीं होने का लाभार्जन राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने अल्पकालिक प्रधानमंत्रित्व के जरिये विख्यात कहें अथवा कुख्यात इतिहास के पन्ने में विख्यात और कुख्यात दोनों तरीके के लोगों के लिये निश्चित जगह बन जाती है। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उसका सहारा लिया तथा सामाजिक पिछड़ों के लिये उत्कर्ष का ऐलान कर डाला। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के फैसले ने उ.प्र. में समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव और बिहार में यादव-मुस्लिम युति के विरोध में थी। लालू प्रसाद यादव ने अपने अपने तरीकों से पिछड़ों को गोलबंद कर यह दिखाने की कोशिश की कि हिन्द के नब्बे प्रतिशत लोग सामाजिक पिछड़ेपन से पीड़ित हैं। सवर्ण माने जाने वाले मात्र दस फीसदी हिन्दुस्तानी नब्बे फीसदी सामाजिक पिछड़ों का शोषण कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव ने प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की घोषणा का सामाजिक लाभार्जन इस स्तर तक संपन्न कर लिया कि उ.प्र. और बिहार जहां दो राज्यों की आबादी तब के हिन्दुस्तान की पूरी आबादी की तिहाई थी समाजवादी मुलायम सिंह यादव व लालू प्रसाद यादव-मुस्लिम युति ने इन दोनों नेताओं को जहां राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह घोषणा का सर्वोच्च लाभार्थी बनाया वहीं मुल्क में एक भयावह विग्रह का बिगुल बज गया। राजा मांडा को कुछ ऐसा कर दिखाने का जोश था जो उन्हें हिन्द के इतिहास के पन्नों में अमर कर डाले। ऐतिहासिक अमरता - ख्याति व कुख्याति दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है। यह तो भावी हिन्दुस्तान को देखना होगा कि राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के फैसले ने मुल्क के किन लोगों को फायदा पहुंचाया तथा क्या राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह पिछड़ों को अद्वितीय अवसर प्रदान कर लाल प्रसाद यादव के मतानुसार जहां पिछड़े लोगों को नयी बहार देने वाली सामाजिक समरसता का उपहार दिया पिछड़ों के दो नेताओं - मुलायम सिंह यादव व लालू प्रसाद यादव के हाथ सत्ता की कुंजी आगयी। लालू प्रसाद यादव यहां तक कहने लगे कि हिन्द का नब्बे फीसदी समाज उनके साथ है जिन पर दस फीसदी वे लोग राज कर रहे हैं जिन्हें उन्होंने सामाजिक अन्याय का कर्ता गिरोह घोषित कर डाला। नतीजा सामने है देश में सवर्ण, दलित पिछड़ों के खेमे बन गये हैं। नब्बे फीसदी लोगों को उनके अनुसार शोषण करने वाले तथा सामाजिक ज्यादतियां फैलाने वाले समूह जिन्हें वे सवर्ण संज्ञा देते हैं देश में विभाजनकारी बंटा हुआ हिन्दुस्ततान जिसे पश्चिमी लोग डिवाइडेड इंडिया कहते हैं। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के ख्यात अथवा कुख्यात फैसले ने जो नक्शा डिवाइडेड इंडिया का प्रस्तुत किया उसे पटरी में लाने के लिये भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को सामाजिक हित तथा उत्कृष्ट राजनीतिक चेतना से अठाईस वर्ष पश्चात ही सही समग्र राष्ट्रीय चिंतन के जरिये हिन्द के हिन्दत्व का नया बीज राष्ट्रमंत्र उच्चारना होगा जिसमें दलितों सहित पिछड़ों अत्यंत पिछड़ों अत्यंत पीड़ित दलितों व पिछड़े वर्गों के जिन लोगों को समाजवादी नेता मुलायम सिंह, मुस्लिम-यादव युति के कर्ता लालू प्रसाद यादव तथा कर्णाटक में पिछड़ों का नेतृत्व करने वाले देवगौड़ा सहित पिछड़ों की अगुवाई सतह पर सफलतापूर्वक संचालन करने वाले इन तीन महानुभावों समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव, मुस्लिम-यादव युति प्रवर्तक लालू प्रसाद यादव तथा कर्णाटक में पिछड़ों के सर्वमान्य नेता देवगौड़ा ने जो यशस्विता अर्जित की है उसमें राज विश्वनाथ प्रताप सिंह की ख्याति अथवा कुख्याति एवं इन तीन लाभार्थी नेताओं का सामूहिक पिछड़ा हित साधन कितनी ख्याति पिछले अठाईस वर्षों में उपलब्ध कर चुका है ? आगे आने वाले जमाने में जब मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की नजर भावी भारत के निर्माण पर है। उनका कहना है कि उनका कोई रिश्तेदार नहीं है सब हिन्दुस्तानी उनके अपने हैं सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के विरोधी उनमें कोई ऐसा दोष नहीं खोज पाये हैं जो उन्हें नाचने का आनंद दे सके। इसके बजाय वर्तमान में अपनी पैनी नजर से अपने समर्थकों व धुर विरोधियों का सामाजिक चालचलन उघाड़ कर रख रहे हैं। राजीव देशपांडे - टाइम्स आफ इंडिया के मंगलवार 26 सितंबर 2017 के अंक में व्यक्त कर रहे हैं कि बीजेपी अब भी 2019 के लोकसभा निर्वाचन की सर्वश्रेष्ठ लाभार्थी है। महाशय देशपांडे कह रहे हैं कि डेमोक्रेसी पश्चिम (यूरप व अमरीका) का विशेषाधिकार नहीं हिन्द की डेमोक्रेसी हिन्द के लोगों की हार्दिक विशालता का प्रतीक है। विचार भिन्नता के बावजूद हिन्द में लोकमानस में विचार-आचार स्वातंत्र्य वसुधैव कुटुंबकम अर्थात सारा विश्व एक परिवार सरीखा है। विचार भिन्नता हिन्द की मानसिकता का प्रभावित नहीं करती। भाजपा का नेतृत्व वह व्यक्ति कर रहा है जिसका व्यक्तिगत स्वार्थ ही राष्ट्रीय स्वार्थ हैै। व्यक्तित्त्व दोषदर्शन करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के विरोधियों में राहुल गांधी की छिन्नभिन्न कांग्रेस के अलावा समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव, मौका मिले नामी वकील रामजेठमलानी अपने तर्कों से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। कर्णाटक के पिछड़ा वर्ग नेता महाशय देवगौड़ा प्रधानमंत्री की कुर्सी में बैठ चुके हैं मौका मिले दुबारा भी प्रधानमंत्री बनने में उन्हें गुरेज नहीं। दलित मसीहा मायावती भी हिन्द के प्रधानमंत्री पद की दावेदार हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के विरूद्ध काशी से चुनाव भी लड़ चुके हैं। उनकी सोच है कि उनकी कल्पना का हिन्दुस्तान रचने में वे कृतकृत्य होंगे। पश्चिम बंग की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सोच है कि वही हिन्द की सफल प्रधानमंत्री हो सकती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों में प्रधानमंत्रित्व के घोषित उम्मीदवार एक नहीं अनेक हैं। साउथ कैलिफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने वंश परंपरा व प्रधानमंत्री उम्मीदवारी का बिगुल बजाया पर उनकी माता श्री महाशया सोनिया गांधी ने वैसी हिम्मत दिखायी होती जैसी राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने श्रीमती इंदिरा गांधी की मृत्यु के पश्चात आव देखा न ताव देखा इंदिरा गांधी ने उनके ऊपर जो अनुकंपा की थी उसके जवाब में ज्ञानी जी ने राजनीतिक बारहखड़ी न जानने वाले इंदिरा पुत्र राजीव गांधी को भारत का प्रधानमंत्री नियुक्त कर डाला, भले ही उन्हें यह भलीभांति ज्ञात था कि राजीव गांधी उनकी खिलाफत करेंगे। अगर श्रीमती सोनिया गांधी ने 2004 में प्रतिनिधि प्रधानमंत्री के तौर पर डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी में न बैठा कर अपने बेटे राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की हिम्मत की होती तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जाते। अब तो बरत्याई विलायत प्रधानमंत्रित्व के विरोधपक्षी दावेदारों में रायशुमारी करा कर किसी एक को उम्मीदवार बनाने का संकल्प कोरा संकल्प है उससे कुछ बनने वाला नहीं है फिर दूसरी ओर प्रधानमंत्री पद के विरोधी दावेदार में वे राहुल गांधी हों, मुलायम सिंह यादव या अखिलेश यादव हों, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव हों, दक्षिण के देवगौड़ा हों, दलित नेत्री मायावती हों उनमें से किसी एक को उम्मीदवार बनाने में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी विरोधियों का एकमत होना वैसे ही असंभव लगता है। चाणक्य ने नीति में कहा है -
असंभवम् हेममयी कुरंगम तथापि रामो लुलुभे मृगाय।
प्रायः समापन्नविपत्ति कालेधियोपि पुंसाम् मलिनी भवति।
प्रायः समापन्नविपत्ति कालेधियोपि पुंसाम् मलिनी भवति।
इसलिये यह संभव ही नहीं लगता कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी विरोधी एक मंच पर आकर सर्वसम्मत विरोधी उम्मीदवार का संकल्प लेें। कहावत है - न नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी। इसलिये 2019 के लोकसभा चुनावों में भी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का ही डंका बजेगा। महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर हिन्द की राजनीति का रोडमैप समूची दुनियां के लिये नया आदर्श प्रस्तुत करने की क्षमता अर्जित करेगी।
इस ब्लागर ने 2012 में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी महाशय को जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे - ‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ का बीजमंत्र प्रस्तुत करते हुए संकल्पना की थी कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी दिल्लीश्वर होरहे हैं।
दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा।
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