टाइम्स आफ इंडिया के स्तंभ ‘पापपूर्ण हिंसा’ में विचार अभिव्यक्त करने वाले पवन के. वर्मा एक लेखक होने के साथ साथ जनता दल यूनाईटेड केे महत्वपूर्ण व्यक्ति भी हैं। उन्होंने ‘पापपूर्ण हिंसा क्या है ?’ यह सवाल उठाया है। जिसे दुनियां हिन्दूइज्म कहती है वह सनक, सनंदन, सनातन तथा सनत्कुमार की ऐसी जमात है जो सनातनता पर यकीन करती हैै। क्या हिन्दूइज्म कोई मजहब है ? या सामाजिक जीवन जीने की सनातन कला ? मजहब तो उसे कहते हैं जिसकी एक खास मजहबी पुस्तक हो यथा बाइबिल और कुरआन शरीफ अथवा हिन्दुस्तानी मजहब सिख धर्म की धर्मपोथी ग्रंथ साहब। मजहब की चौखट में जैन धर्म, बौद्ध धर्म भी पूरे पूरे फिट नहीं होते। जहां तक हिन्दू धर्म के नाम से पुकारे जाने वाले हिन्दू मजहब का सवाल है धर्म तो व्यक्ति का होता है। अपने कर्त्तव्य को संपन्न करना ही स्वधर्म है। हिन्दू समाज में विविधतायें हैं। हिन्दुस्तान में एक जगह का नाम हरदोई है, यह हरदोई शब्द संस्कृत शब्द हरिद्रोही का अपभ्रंश है। यहां पूर्व में एक राजा हुआ जिसका नाम हिरण्यकश्यप था। हिरण्यकश्यप के पिता कश्यप और माता दिति थी। हिरण्यकश्यप ने डुगडुगी पिटवाई थी कि जो आदमी गाय पाले, गायों की गौशाला बनाये उन सबको उजाड़ डालो। हिरण्यकश्यप हिन्द का पहला दैत्यराज था जिसकी राजव्यवस्था पूर्णतः अर्थकारी थी। हिरण्यकश्यप भगवान महाविष्णु का भयानक द्रोही था। उसके घर में प्रह्लाद नाम का बालक भगवान महाविष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप के जुड़वां भाई हिरण्याक्ष को भगवान महाविष्णु ने मार डाला था। हिरण्यकश्यप अपने भाई को मार डालने वाले के खिलाफ कदम उठाया करता। उसने मन में ठान ली कि अपने बेटे प्रह्लाद को भी मार डालेगा पर होगया उल्टा। महाविष्णु ने अपने अनन्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिये हिरण्यकश्यप का वध नृसिंह (न नर न ही सिंह) अवतार द्वारा संपन्न किया इसलिये जिसे लोग हिन्दू धर्म कहते हैं वह जिन्दगी जीने की एक सनातन कला है।
पाप और पुण्य मनुष्य जीवन के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। दूसरे को कष्ट देना या हिंसा करना पाप है तथा दूसरों की अहैतुक मदद करना पुण्य है। पवन के. वर्मा मानते हैं कि हिन्द में हिंसा की नयी बयार चल पड़ी हैै। जो लोग अपने हिंसापूर्ण तौरतरीकों से दलितों का मार भगा रहे हैं उनके सोच बड़ी भयानक है। वे कहते हैं कि पशुओं को भगाने का आरोप लगा कर गौमांस भोज का भी आरोप लगाते हैं। यह सारा का सारा धंधा गौरक्षा केे नाम पर बेतुके तरीके से होरहा है। ये लोग जो ऐसी हिंसा फैला रहे हैं वास्तविक गौरक्षक नहीं बनावटी गौरक्षक हैं और शांति के पुजारी हिन्दू समाज को नुकसान पहंुचा रहे हैं। इन्हें कुछ सीमा तक राज्य सरकारें भी छूट देने में अपना दीर्घकालिक हित साधन देखते हैं। सौ वर्ष पहले महात्मा गांधी ने इंडियन ओपीनियन के जरिये इस सवाल पर गहराई से विचार किया और हिन्द केे लोगों को कहा - गाय केे नाम पर लड़ो नहीं दरअसल में लगभग हजार वर्ष केे इस्लामी सल्तनत ने हिन्दू मुसलमानों में एक समझबूझ पैदा की थी। जब ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिये अंग्रेज भारत आये उन्हें एक सुनहरा मौका हिन्दू मुसलमानों में वैर पैदा करने का मिला। गौकशी दरअसल में हिन्द में अंग्रेजी राज की देन है।
देश में व्याप्त छद्म गौरक्षकों के संजाल को तोड़ना आज निहायत जरूरी होगया है। कहीं कहीं राज्य सरकारें भी इन छद्म गौरक्षकों को उत्साहित करती दिख रही हैं इसलिये ‘गौरक्षा’ अखिल भारतीय विषय है। भारत सरकार को ही आगे आना होगा और समाज में व्याप्त बीफ भोज (गौमांस) की जो अवधारणा व्याप्त होरही है उसे देखते हुए भारत की जो परंपरागत गौ शक्ति है उसकी संरक्षा करना भारत सरकार का काम है। देश में देसी नस्ल की गायों की संख्या निरंतर कम होरही है श्वेत क्रांति में जरसी गाय व संकर गायों के दूध का बोलबाला है उसे ए-1 दूध कहा जाता है। देसी गायों का दूध पौैष्टिक होने के साथ साथ गुणकारी हैै। उसे हिन्द के दूध व्यापारी ए-2 दूध कहते हैं वह मात्रा में कम है मुल्क की जरूरत देश की स्थानीय गायों की संरक्षा है। यह संरक्षा बनावटी और छद्म गोरक्षा से संपन्न होना मुश्किल हैै। उससे नयी सांप्रदायिक समस्या पैदा होगी इसलिये हिन्द की देसी नस्ल की गायें कहां कहां कितनी हैं ? इसका पता लगाना जरूरी है। गुजरात राज्य केे गिर गायों की संख्या अब केेवल पंद्रह हजार से अठारह हजार के बीच आंकी जारही है। गिर नस्ल की गायों की तरह देश में जो 24 नस्लें गायों की बची हैं कहां कहां कितनी देसी नस्ल की गायें हैं यह पता लगाना राज्य सरकारोें का कर्तव्य है। जामनगर कृषि विश्वविद्यालय के विभिन्न किस्म की गायों के दूध, दही, घी के अलावा गोमूत्र तथा गोबर पर अनुसंधान किये हैं। उन अनुसंधानों का लाभ राज्य सरकारों को मिले यह प्रयत्न करना केन्द्रीय सरकार का कर्तव्य है। आज श्वेत क्रांति का जो राष्ट्रीय रोडमैप है उससे तो देसी नस्ल की गायों की संरक्षा संभव नहीं बतनी इसलिये मुल्क की पहली जरूरत देसी नस्ल की गायों की सही सही संख्या ज्ञात करना तथा देसी नस्ल की गायों को खुला छोड़ने के खिलाफ एक राष्ट्रीय आंदोलन की जरूरत है। राज्य सरकारें नगर पालिकायें गायों को खुला छोड़ने वालों पर सख्ती करे तथा देसी नस्ल की गायों की गौशालाओं के प्रबंध कोे हर राज्य सरकार महत्व दे ताकि देश में निरंतर घट रही देसी नस्ल की गायों की संरक्षा केे उपाय हो सकेें। गोरक्षक केेवल उन्हीं को माना जाये जो देसी गाय को अपने घर में पालते हैं। छद्म गोरक्षकों की पहचान राष्ट्रीय आवश्यकता है। जो लोग अपने आपको गोरक्षक कहते हैं क्या वे निरामिष हैं ? सामिष व्यक्ति अपने आपको गोरक्षक कह कर सामाजिक उत्पीड़न का रास्ता प्रशस्त करता है। गोरक्षक बनने वाले लोगों से पूछा जाये क्या वे स्वयं गोमांस भक्षण नहीं करते ? जब हिन्द से बाहर के देशों में जाते हैं वहां के होटलों में रेस्तराओं में भोजन करते समय यह ताकीद देते हैं कि वे निरामिष हैं ? अथवा रेस्तराओं में जो भोजन मिलता है उसे खाते हैं ?
संयुक्त राज्य अमरीका में पंद्रह लाख हिन्दू हैं। वहां यत्र तत्र कहीं कहीं जैन निरामिष भोजनालय हैं जहां प्याज, लहसुन भी प्रयोग नहीं होता बाकी जो भोजनालय हैं चाहे उन्हें हिन्दू चला रहे हैं अथवा अमरीकी लोग चला रहे हों उनमें भोजन करने वाला हिन्दू यह दावा नहीं कर सकता कि वे गोमांस नहीं खारहे हैं क्योंकि यूरप व अमरीका में नित्य गोमांस भोजी समाज बहुतायत में होता है। जो हिन्दुस्तान का हिन्दू उन भोजनालयों में भोजन करता है वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसने गोमांस नहीं खाया है।
मुल्क में बहुत से लोग निरामिष हैं वे निरामिष होने का ढिंढोरा नहीं पीटते। मुल्क में जस्टिस काटजू और मणिशंकर अय्यर सरीखे महानुभाव भी हैं जो खुले आम कहते हैं कि वे बीफ भोजी हैं। प्रच्छन्न गोरक्षकों ने जो तरीका अपनाया है वह हिंसा बढ़ाने वाला मार्ग है। भारत सरीखे देश में परम वैष्णव समाज तथा नैनी समाज के अलावा कहीं कहीं पर निरामिष लोगों को पाया जाता है। बहुत से निरामिष हों इसलिये निरामिष हैं उन्हें सामिष भोजन खरीदने की क्षमता नहीं है। फिर भी हिन्द में निरामिष लोगों की संख्या दूसरे देशों से ज्यादा हैै। भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रहे महाशय तीर्थ सिंह ठाकुर ने स्वीकार किया कि वे निरामिष नहीं हैं। जो व्यक्ति निरामिष नहीं है वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसने जाने अनजाने गोमांस भक्षण किया है। राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न यह है कि जो हिन्दुस्तानी निरामिष है उसे भी जीने का अधिकार है। सामिष लोग अपनी चाहत का भोजन करें पर निरामिषों को भी हिन्द में रहने दें यह आज की राष्ट्रीय जरूरत है।
गोरक्षा के नाम पर हिंसा का रास्ता अपनाना सरासर राष्ट्रद्रोह है इसलिये प्रच्छन्न गोरक्षकों पर सरकार की नजर रहना जरूरी है। भारत में पंचगव्य तथा पंचामृत परंपरा लाखों वर्ष से चल रही है। आज भी मुल्क में विधिपूर्वक पंचगव्य बनाने वाले लोगोें की अच्छीखासी संख्या है। पंचगव्य पंचामृत जब व्यापार बन जाते हैं उनमें अविवेकशीलता घर कर जाती है। मुनाफा कमाने की भावना बलवती होती है इसलिये जो गौशालायें पंचगव्य व पंचामृत निर्माण करने में आगे आना चाहती हैं उन्हें पंचगव्य व पंचामृत के व्यापार से स्वयं को मुक्त करना होगा। बाबा रामदेव पतंजलि के अथातो योग जिज्ञासा को व्यापारिक रूप दे चुके हैं। वे पंचगव्य निर्माण भी करा रहे हैं। आज मुल्क की जरूरत पंचगव्य व पंचामृत को व्यापार के चंगुल से निकाल कर गौशाला धर्म से जोड़ने की जरूरत है। विधिपूर्वक निर्मित पंचगव्य व पंचामृत हिन्द के लोगों का जीवन पथ सुधारने की क्षमता रखता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के हाथ मजबूत करने के लिये हर हिन्दुस्तानी को अपना योगदान देना युगधर्म है।
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