प्रधानमंत्री की लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों के अंदरूनी लोकतांत्रिक पर गुहार - ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ का लोक हितकारी आवरण का लोकसंग्रही विस्तार कैसे हो ? प्रधानमंत्री ने भारतीय जनता पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को समृद्ध करने का आह्वान किया। इस समय हिन्द में राजनीतिक दलों में केवल भारतीय जनता पार्टी तथा कुछ हद तक कम्यूनिस्ट विचारधारा से प्रभावित राजनीतिक दलों में व्यक्ति प्रधान सुप्रीमो शैली वाली क्षत्रप राजनीति का प्रभाव नहीं है। सुप्रीमो शैली वाले राजनीतिक समूहों में सुश्री मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी, लालू प्रसाद यादव की राजद, शिरोमणि अकाली दल बादल नेतृत्व, मुफ्ती पी.डी.पी. महबूबा नेतृत्व, शेख अब्दुल्ला से लेकर उमर अब्दुल्ला तक तीन पीढ़ी वाली अब्दुल्ला राजनीतिक समुच्चय, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना, दिल्ली में नवोदित आ.आ.पा. का अरविन्द केेजरीवाल नेतृत्व, पश्चिम बंग में ममता बनर्जी नेतृत्व वाली अ.भा. तृणमूल कांग्रेस, उड़़ीसा में नवीन पटनायक नेतृत्व वाला बी.ज.द., आंध्र में तेलंगाना सहित चंद्रशेखर राव नेतृत्व, तैलुगु देशम पार्टी का नायडू नेतृत्व, आंध्र के कांग्रेस नेता रहे राजशेखर रेड्डी पुत्र का राजनीतिक समुच्चय, तमिलनाडु में करूणानिधि पुत्र एम.के. स्टालिन तथा अम्मा पद प्रतिष्ठित दिवंगता जयललिता नेतृत्व, कर्णाटक के देवगौड़ा परिवार का नेतृत्व जो मूलतः व्यक्तिपरक क्षत्रप नेतृत्व वाले राजनीतिक दल है जिनका उद्देश्य अपने वोट बैंक की मदद से सत्ता हथियाना है। इन राजनीतिक दलों की अखिल भारतीय सत्ता नहीं है। केेवल ममता बनर्जी मानती हैं कि वे अखिल भारतीय नेतृत्व हैं। मुल्क की राजनीतिक स्थिरता के लिये सुप्रीमो शैली वाले इन राजनीतिक दलों में लोकतंत्र कैसे सफल हो ? उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव 1990 से सक्रिय थे। स्वयं मुख्यमंत्री रहे एवं कालांतर में स्वयं प्रधानमंत्री बनने के उद्देश्य से लोकसभा सांसद होगये औैर बेटे को मुख्यमंत्री नियुक्त कर डाला। बेटे ने बाप को हटा कर स्वयं समाजवादी पार्टी का नेतृत्व हथिया लिया। इसलिये क्षत्रप शैली से मुलायम सिंह यादव को बाहर कर शेष जो सुप्रीमोे है उन्हें किस तरह आंतरिक राजनीतिक दलीय लोकतंत्र का अनुयायी बनाया जाये यही सवाल मुख्य प्रश्न है। जहां तक इंडियन नेशनल कांग्रेस का सवाल है पंडित नेहरू मुल्क के प्रधानमंत्री थे, सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री। 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ पंडित नेहरू चाहते थे कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति नियुक्त किया जाये पर सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा उ.प्र. के मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत ने पंडित नेहरू की बात मानी नहीं। हिन्द के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद बनाये गये। 1957 में फिर मसला गर्माया तब सरदार पटेल दिवंगत हो चुके थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद व पंडित पंत ने जो नेहरू मंत्रिमंडल में तब गृहमंत्री थे पंडित पंत के प्रस्ताव का समर्थन करने के बजाय डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को ही राष्ट्रपति का पद दुबारा सौंप डाला इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस पर पंडित नेहरू का एकाधिकार था, हां मौलाना आजाद व पंडित पंत के देहांत के बाद कांग्रेस में बदलाव आना शुरू हुआ पर स्वयं पंडित नेहरू 1964 में दिवंगत होगये। कामराज प्लान के अलावा पंडित नेहरू के जीवन काल में कांग्रेस को एक व्यक्ति की जेबी राजनीतिक पार्टी के बिल्ला लगा कर खारिज नहीं किया जा सकता। अलबत्ता श्रीमती इंदिरा गांधी के राजकाल में कांग्रेस छिन्नभिन्न होगयी। उसका राजनीतिक लोकतंत्र वाला स्वरूप समाप्त होगया, केवल नाम ही रहा। कांग्रेस आयी याने इंदिरा कांग्रेस।
प्रधानमंत्री ने जो प्रसंग भारतीय जनता पार्टी केे समक्ष प्रस्तुत किया है उसे अन्य राजनीतिक दलों में यत्किञ्चित् किस विधि से शनैः शनैः अपनाने की प्रेरणा मिले ? सरदार वल्लभ भाई पटेल ने हिन्द की रियासतों को भारत संघ से जोड़ने का महान राष्ट्रीय कर्त्तव्य संपन्न किया। सरदार पटेल केे दाहिने हाथ वी.पी. मेनन ने अपन पुस्तक में लिखा कि जम्मू कश्मीर के महाराज हरी सिंह पंडित नेहरू व शेख अब्दुल्ला युति के प्रतिकूल थे। वे भारत में विलय करने के प्रस्ताव के एकदम विरूद्ध थे। यह उनका भारत विभाजनजन्य स्वाधिकार भी था। सरदार पटेल ने गुरू गोलवलकर जी से परामर्श किया। सरदार पटेल की मान्यता थी कि गुरू गोलवलकर अगर राजा हरी सिंह को आदेश देंगे तो राजा हरी सिंह भारत में विलय प्रस्ताव पर अपनी स्वाक्षरी कर देंगे। गुरू जी को लेकर वी.पी. मेनन श्रीनगर गये। विमानपत्तन में राजा हरी सिंह ने गुरू जी को साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हुए निवेदन किया - गुरू जी आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। इसे कहते हैं राजनीतिक विवेक की पराकाष्ठा। सरदार वल्लभ भाई पटेल राजनीतिक विवेक के चिंतन पोखर थे। जम्मू कश्मीर के डोगरा महाराज हरी सिंह ने भारत विलय पत्र में स्वाक्षरी कर जम्मू कश्मीर को हिन्द का अभिन्न अंग निश्चित कर दिया। आज भारत में जो राजनीतिक क्षत्रप समुच्चय हैं उन्हें सटीक राजनीतिक दल के रूप में प्रतिष्ठित करना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजनीतिक क्षत्रप समुच्चयों के नेताओं से वार्ता करने के लिये वह विधि अपनायें जो सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपनाई थी। केवल कानून के जरिये राजनीतिक सुप्रीमो समूह को रास्ते पर नहीं लाया जा सकता, दिवंगता जयललिता इसका उदाहरण हैं। तमिलनाडु के जन जन में जयललिता का अस्तित्व मातृस्वरूपा अम्मा का था। कानून ने उन्हें दण्डित किया पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जन जन का नेता को समर्थन देना है। सुब्रह्मण्यम स्वामी सरीखे कानूनविद को यह मानना पड़ा कि जयललिता अपने अंतर्मन में किसी की विरोधी नहीं। जयललिता प्रसंग से जुड़ी शशिकला जेल के सीखचों में है। न्याय ने उसे दंडित किया है, ऐसे मामलों में बहन मायावती समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव भी कानून के दायरे में दंडभागी हो सकते हैं पर वह एक लंबी प्रक्रिया है। लालू प्रसाद यादव प्रसंग उनका राजनीतिक तथा संपदा वैभव संभवतः उन्हें आज नहीं तो कल दंडित कर दे, अर्धदंडित तो वे हैं ही। उन्होंने प्रसिद्ध वकील रामजेठमलानी को राज्यसभा में भेजा ही इसलिये कि जेठमलानी लालू प्रसाद यादव को निर्दोष साबित कर दें। यह तो आने वाला कल ही बतायेगा कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद का ऊँट किस करवट बैठता है। इन सभी राजनीतिक सुप्रीमो जनों से प्रधानमंत्री एक संवाद कायम कर सकते हैं। मुलायम सिंह यादव की सुप्रीमो शैली उनके पुत्र महाशय अखिलेश यादव ने निरस्त कर दी है। मायावती बहन अपने सहोदर भाई व भतीजे की सहायता लेरही हैं। मेरठ रैली में उन्होंने अकेले आत्मनेतृत्व के स्थान पर सहोदर भाई व भाई के बेटे का सहारा लिया है। इसलिये हिन्दुस्तान की दलित प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखने वाली मायावती अपने दल के कम से कम सात व्यक्तियों का समुच्चय घोषित कर पार्टी प्रमुख का पद एक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा छः वर्ष तक ही धारण कर सके। छः वर्ष पश्चात सुप्रीमो का विश्वस्त व्यक्ति दल का प्रमुख बने। नेता या नेत्री के अगले छः वर्ष पश्चात फिर दल प्रमुख बनने का प्रावधान संकल्पित हो तो मुफ्ती महबूबा, डाक्टर फारूख, शिरोमणि अकाली दल नेता प्रकाश सिंह बादल उनके पुत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और पश्चिम बंग की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा राजद सुप्रीमो, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के वर्तमान नेता एम.के. स्टालिन, कर्णाटक जनता दल नेता स्वयं प्रधानमंत्री रहे महाशय देवगौड़ा भी स्वयं के अलावा अपने बेटे पोते को दल प्रमुख बनाने को राजी हो सकते हैं। शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे संभवतः वह रास्ता अपनायें जो ममता बनर्जी व अरविन्द केजरीवाल ने अपनाया है। उद्धव ठाकरे अपने पुत्र पुत्री को दल प्रमुख बनाने को तैयार हो सकते हैं। श्री नवीन पटनायक संभवतः लचीला रूख अपनायें। इन सभी राजनीतिक दलों से दल प्रमुख ज्यादा से ज्यादा छः वर्ष तक रहें। कांग्रेस का जहां तक सवाल है राहुल गांधी कांग्रेसाध्यक्ष की कुर्सी पाने चले हैं। उन्हें भी अपने राजनीतिक दल को कायम रखने के लिये विचार करना होगा। जब एक बार पारस्परिक विचार विमर्श से राजनीतिक दल का मुखिया एक व्यक्ति एक बार में छः वर्ष से ज्यादा पद धारण नहीं करेगा। इससे राजनीतिक जाग्रति आयेगी। प्रधानमंत्री अपने प्रत्युत्पन्न मति कौशल से चंद्रबाबू नायडू व राजशेखर रेड्डी के पुत्र तथा तेलंगाना के चंद्रशेखर राव सहित सुप्रीमो शैली वाले राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिकता का प्रयोग करा सकते हैं। हो सकता है दो एक मुख्यमंत्री अपने नेतृत्व का आंच न आने दें। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों की मान्यात तभी स्वीकार करनी चाहिये जब राजनीतिक दल का प्रमुख छः वर्ष से ज्यादा अवधि तक प्रमुख पद पर न रहने का आश्वासन दें भले ही अगले छः वर्ष पश्चात नेता फिर दल प्रमुख बन जाये। ऐसी आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति आज हिन्द के लिये आवश्यक है, इसका प्रबंधन प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी संपन्न कर सकते हैं।
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