गरीबी निवारण देश की पहली राजनीतिक आवश्यकता
संघ सरकार में विदेश मंत्रालय के राज्यमंत्री एम.जे. अकबर हिन्द के उन सधेसधाये अखबार नवीसों के अग्रणी रहे हैं जिनकी कलम में अद्भुत क्षमता है। मजहब से मुस्लिम होकर भी हिन्द की हिन्दत्व की साख के परम ज्ञाता एम.जे. अकबर हिन्द के बहुसंख्यक हिन्दू समाज केे चहेते अखबार नवीस भी रहे हैं। अखबारी विवेक के निष्णात अध्यवसायी पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की नजर पड़ी, लगता है प्रधानमंत्री मोदी महाशय एम.जे. अकबर केे अखबारी विचारों का तात्विक मनन करने वाले राजनीतिविद रहे हैं। ज्योंही उन्हें भारत की राजनीतिक सत्ता हस्तगत हुई उन्होंने एम.जे. अकबर को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री नियुक्त कर एम.जे. अकबर की दूरदर्शिता का राजनीतिक लाभार्जन किया। एम.जे. अकबर ने मोदी लक्ष्य 2022 पर तेरह सूत्री मार्गदर्शक बिन्दुओं का गरीबी निवारण के संदर्भ में जन धन योजना में 30.24 करोड़ जीरो अकाउंट में अब 66,466 करोड़ रूपये जमा हैं। गांवों में बसर करने वाले गरीबों के लिये एक नया आकर्षक रास्ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खोज डाला है। इस ब्लागर ने पिछली पोस्ट में सागरिका घोष केे स्तंभ का उल्लेख किया है। महाशया सागरिका घोष ने अखबार नवीसी के सारे स्तुत्य मानदण्डों को नकार डाला। प्रधानमंत्री पर अनपेक्षित दोषारोपण ककरने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के पूर्वाधिकारी डाक्टर मनमोहन सिंह के कथ्य को प्रस्तुत करते हुए प्रधानमंत्री पर आक्षेप किया कि प्रधानमंत्री हर नागरिक को चोर समझ रहे हैं। यह डाक्टर मनमोहन सिंह की स्वानुभूत धारणा नहीं वरन उनकी राजनीतिक मलकिनिया महाशया सोनिया गांधी की भृकुटी टेढ़ी होने का प्रमाण हैै। टाइम्स आफ इंडिया के 6 नवंबर 2017 के अंक में प्रकाशित केेन्द्रीय मंत्री का विवेचन तेरह सूत्री होने के साथ साथ हिन्दुस्तान का महत्वपूर्ण आंकड़ा सात - भगवद्गीता में सात सौ श्लोक हैं। हिन्द की महत्वपूर्ण नवदुर्गा के सप्तशती में भी सात सौ स्तंभ हैं। जब हिन्दुस्तान के लड़के लड़कियों का विवाह होता है वह विवाह तभी पूर्ण हुआ माना जाता हैै जब होमकुंड केे सात फेरे लगा कर वरवधू अंचल ग्रंथि में बंधते हैं जिसे सप्तपदी कहा जाता है सप्तपदी के बिना विवाह अधूरा है। एम.जे. अकबर ने यह सभी तत्व हृदयंगम किये हैं। वे कहते हैं - गरीबी के चाबुक की मार से संत्रस्त हिन्दुस्तान के लगभग तिहाई जनसमूह उत्पीड़ित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी में भावनात्मक सहानुभूति की महाविभूति विद्यमान है। प्रधानमंत्री उन लोगों के मोहताज नहीं हैं जो स्वयं को विशेषज्ञ मानते हैं। ज्वलंत उदाहरण पी.के. का है। प्रधानमंत्री ने स्वयं कभी भी पी.के. के बिहार के मुख्यमंत्री को परामर्श देने की आलोचना नहीं की। स्वयं पी.के. भी यह मानते हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री से कोई शिकायत न तब थी न अब है। कांग्रेस ने स्वयं को उ.प्र. में पुनः प्रतिष्ठित करने के लिये पी.के. का सहारा लिया पर कांग्रेस पुनर्जीवित नहीं हो पायी। रिफार्म जिसकी शुरूआत पी.वी. नरसिंह राव के वित्तमंत्री रहे डाक्टर मनमोहन सिंह ने शुरू की उसे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और कालांतर में 2014 के पश्चात वर्तमान प्रधानमंत्री ने पूरे मनोयोग से संभाला है। प्रधानमंत्री की विशेषता यह है कि उनके अपने दल के अंदर के विरोधी और विभिन्न गुटों में क्षत्रप सुप्रीमो प्रवृत्ति के राजनीतिक नेताओं ने प्रधानमंत्री के सुशासन मंत्र का जम कर विरोध किया है। वे सभी निस्तेज हो चुके हैं, उनकी क्षमता क्षीण हो चुकी है पर वे केवल विरोध की लाठी ही पीट रहे हैं। उन्हें यह मालूम है कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नैतिक एवं मानवोचित मर्यादाओं के आगे श्रीहीन होगये हैं। यह प्रसंग राज्यमंत्री एम.जे. अकबर ने विवेकसंगत तर्कों से प्रस्तुत किया है। यहां तक कि महाशय रामचंद्र झा के टाइम्स आफ इंडिया के स्तंभ मंगलवार 7 नवंबर 17 डिमोनेटाइजेशन तथा जीएसटी समग्र आर्थिक उत्कर्ष के लिये सही निदान है। वे कहते हैं - व्हाइ सीकनेसिंग मैटर्स ? उन्होंने जिन तर्कों का सहारा लिया है वे सभी तर्क नोटबंदी के प्रशंसक प्रतीत होते हैं। कांग्रेस पार्टी का अधकचरा और विवेकहीन नेतृत्व के कारक महाशय राहुल गांधी ने नोटबंदी के खिलाफ जिसे आगे खड़ा किया वह महाशय नंदलाल वस्तुतः प्रधानमंत्री के नोटबंदी के प्रशंसक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह को अपनी अंतरात्मा की पुकार को सुनना चाहिये। इतिहास में डाक्टर मनमोहन सिंह अपनी विवेकपूर्ण उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं जब वे सही सही चिंतन पथ का अनुसरण करें। राहुल गांधी की छिछली और सातत्यहीन वाणी को अपना नेता मानने से इन्कार करते हुए श्रीमती सोनिया गांधी के प्रति अपनी वफादारी को उजागर करने के लिये उन्हें यह समझाने की कोशिश करें कि राहुल गांधी का नेतृत्व कांग्रेस को धोबी का कुत्ता घर का न घाट का बना डालेगा। साफगोई करने से डाक्टर मनमोहन सिंह द्वारा 2004 से 2014 तक जो लकीर पिटाई हुई है उससे स्वयं उबरें और हिन्द के इतिहास में अपनी ईमानदारी का तमगा न उखाड़ कर जो उन्हें सही लगता है वह बतायें। उनके इस कथन में कोई तथ्य नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी हर किसी नागरिक को चोर उचक्का समझते हैं। अब डाक्टर साहब प्रधानमंत्री नहीं हैं न ही उनके लिये महाशया सोनिया गांधी और राजकुमार राहुल गांधी की हां में हां मिलाना जरूरी है। उन्हें चाहिये कि अपनी दस साला प्रधानमंत्रित्व तथा राजनीति के परम तत्वज्ञ पी.वी. नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व में देश का वित्त मंत्री रह कर आर्थिक सुधारों की जो भव्य मिसाल डाक्टर साहब ने मुल्क में पेश की उसे मुरझाने न दें।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली से गांव की ओर जाने वाले एक रूपये के पूरे पूरे सौ नये पैसे गांव तक पहुंचाने का रास्ता खोज डाला है। उनके पूर्व अधिकारी रहेे डाक्टर मनमोहन सिंह पंद्रह पैसे वाली बात नहीं कहते पर राजीव गांधी ने 1985 में मुंबई में कांग्रेस शताब्दी समारोह के समय स्वीकार किया कि दिल्ली से चलने वाला एक रूपया याने सौ नये पैसे गांव तक पहुंचने के बजाय मात्र पंद्रह नये पैसे गांव के लोगों तक पहुंचते हैं। यह रहस्योद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने नहीं पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी ने कांग्रेस शताब्दी समारोह के अवसर पर व्यक्त किया। क्या ही अच्छा होता यदि डाक्टर मनमोहन सिंह पंद्रह पैसे वाली बात को भी अपने संज्ञान में रख कर मौजूदा प्रधानमंत्री पर बेतुके व बेपैर के आरोप न मढ़ते। उन्हें यह मालूम है कि हिन्द का आम आदमी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर यकीन करता है तथा जन जन की मान्यता है कि मोदी जो करेंगे वह देश व समाज के हित में ही होगा। क्या सामान्य जन ने जो विश्वास प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर व्यक्त किया है वह विश्वास जन जन के दिल में डाक्टर मनमोहन सिंह के लिये भी था ? डाक्टर साहब महाशया सोनिया गांधी के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री थे। अपने पौरूष के स्वामी नहीं, मलकिनियां के हुक्म का परिपालन करते थे। डाक्टर साहब तब भी हिन्द की राजनीतिक आर्थिकी से जुड़े थे जब 1977 में मोरारजी रणछोड़जी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के प्रतिनिधि के तौर पर सक्षम मंत्री थे। डाक्टर मनमोहन सिंह यस सर ! यस मैडम ! उद्गाता हैं इसलिये मौजूदा प्रधानमंत्री व पूर्व प्रधानमंत्री के राजनीतिक कौशल की तुलना नहीं की जा सकती। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के पारंगत हैं उनकी बराबरी डाक्टर साहब नहीं कर सकते। डाक्टर साहब की प्रधानमंत्री पद धारण करने की अवधि में उनको राजनीतिक विवेकशीलता पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी उपलब्ध कराते थे। प्रणव मुखर्जी का स्व व्यक्तित्त्व भी विशिष्ट था। वे यह कबूल करते थे कि हिन्दी भाषा का व्यावहारिक कामचलाऊ ज्ञान न होना उनके प्रधानमंत्री बनने की सबसे बड़ी बाधा थी। जब बाल ठाकरे ने महाशय प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिये शिवसेना समर्थित उम्मीदवार बताया, सोनिया गांधी महाशया ने विरोध के बावजूद प्रणव बाबू मुंबई जाकर मातोश्री में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को धन्यवाद ज्ञाप करने के लिये स्वयं गये। उन्होंने राजनीतिक मर्यादा का अनुपालन किया। बाबू प्रणव राष्ट्रपति निर्वाचित होगये उन्हें महाराष्ट्र के मराठा नेता शरद पवार ने सुझाया था कि बाल ठाकरे का धन्यवाद ज्ञाप करें।
गरीबी निवारण केे लिये कांग्रेस भी बड़े बड़े वादे करती रही पर धरातल में गरीबी निवारण कांग्रेस का मनोवांछित लक्ष्य नहीं था। गरीबी निवारण का जो रास्ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुनिश्चित किया है उसका दीर्घकालिक असर हिन्द की आर्थिकी पर पड़ना स्वाभाविक है। आबादी दिन प्रति दिन बढ़ रहीं है सवा अरब से ज्यादा हाथों को काम देना तभी कारगर हो सकता है जब सरकार महात्मा गांधी के बताये रास्ते पर चलने का संकल्प ले। गांधी का चरखा व कबीर का करघा खेतीबाड़ी के बाद महत्वपूर्ण काम है जो कम आमदनी के बावजूद मुल्क की आर्थिकी को संजीवनी दे सकता है। सन 1905 में जब महात्मा दक्षिण अफ्रीका से भारत आये उन्होंने साबरमती आश्रम का श्रीगणेश किया। साबरमती आश्रम आज भी हिन्द के लिये उतनी ही महत्वशील है जितनी 1915 में थी। विदेश मंत्रालय को सूती कपड़ों के निर्माण के लिये राष्ट्रसंघ व हिन्द के सभी विदेशों में स्थित दूतावासों में गांधी का चरखा व कबीर के करघे के बदौलत चीन का सामना करने की क्षमता अर्जित करनी जरूरी है। गरीबी निवारण के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो संकल्प - स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज व स्मार्ट छावनी परिषदों के मार्फत चरखा व करघा तथा हाथ कते व हाथ बुने कपड़ों का योगमार्ग अपनाना राष्ट्रहित में है। हाथकताई व हाथबुनाई अंगुलियों के पोरों का योगपथ है। 1935 में परमहंस योगानंद महाराज ने जुलाई के महीने में महात्मा गांधी को सेवाग्राम में कहा - महात्मा जी आपका चरखा योगमार्ग का प्रतीक है। चरखे पर कताई, करघे पर बुनाई में योग स्वयं ही हो जाता है। योगानंद महाराज ने जो बात महात्मा जी से कही वह कताई, बुनाई व हाथबुनाई के नजरिये से हिन्द केे लिये योग वरदान है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment